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साने गुरुजी

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पांडुरंग सदाशिव साने (२४ दिसम्बर १८९९ - ११ जून १९५०) मराठी के प्रसिद्ध लेखक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे साने गुरूजी के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं।

  • जिससे भी ले सकते हो, जिससे भी सीख सकते हो, आदरपूर्वक ले लो।
  • दुनिया में किसी ने भी सारा ज्ञान अकेले नहीं खोजा है।
  • पुराने घिसे-पिटे रीति-रिवाज आज कैसे चलेंगे?
  • बच्चे का कोट कैसे बड़ा होगा?
  • मासूमों की रक्षा करना ही शक्ति की असली सफलता है।
  • अगर अतीत की कुछ बातें अब गलत लगती हैं, तो उन्हें न हटाना अतीत का अपमान है।
  • अगर हम ऐसे ही चलते रहे, तो यह सही नहीं है। यह अतीत की शान नहीं है। यह पुरखों का गर्व नहीं है। बल्कि, यह उन महान पुरखों का अपमान करने जैसा है।
  • सुधारने के कई तरीके हैं।
  • लक्ष्य हमेशा बढ़ रहा है।
  • ज्ञान चर्चा नहीं है। बहस भी नहीं, और शरीर को मरोड़ना ज्ञान नहीं है। लक्ष्य के लिए शरीर को फेंक देना ज्ञान है।
  • लक्ष्य जितना बड़ा होगा, रास्ता उतना ही लंबा और मुश्किल होगा।
  • आज़ादी ज़ुल्म नहीं है, आज़ादी ज़िम्मेदारी है। दिल में अपार सेवा की भावना भर जाती है कि सभी दोस्त दिखाई देते हैं।
  • आज संस्कृति की रक्षा के नाम पर आंदोलन हो रहे हैं। नवीन विचारों की बयार न आने पाए, इसलिए 'सनातनी' कहलाने वाले लोग किलेबंदी कर रहे हैं। परंतु ये संस्कृति के रक्षक नहीं, बल्कि भक्षक हैं। वे भारतीय संस्कृति के शव को गले लगा रहे हैं और उसकी अंतरात्मा का दम घोंट रहे हैं। ये सनातनी नहीं, बल्कि अ-सनातनी हैं। 'सनातन' शब्द का अर्थ ही क्या है? 'सनातनो नित्य नूतनः'—जो सदैव नवीन स्वरूप प्रकट करता रहे, वही टिका रहेगा। -- भारतीय संस्कृती
  • रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा है: 'तुम्हें अकेले ही जाना होगा। जाओ, तुम अपना दीपक लेकर चलो। लोगों की आलोचना का बवंडर उठेगा और तुम्हारे हाथ का दिया बुझ जाएगा। परंतु उसे फिर से जलाओ और कदम आगे बढ़ाओ। तुम्हें अकेले ही चलना होगा।' -- श्यामची आई
  • स्वतंत्रता देवी की (जय हो)। -- अमोल गोष्टी
  • स्वदेश ही मेरा देव है और स्वजन-सेवा ही मेरी देव-पूजा है। -- अमोल गोष्टी
  • यदि मैं सड़क पर कर्मशून्य होकर 'नारायण-नारायण' जपते हुए बैठूँ, तो मेरे सामने पैसों के ढेर लग जाएंगे। परंतु यदि मैं सड़क की गंदगी साफ करूँ, कूड़ा उठाऊँ, तो मुझे पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता; फिर भरपेट भोजन की तो बात ही दूर है! कर्महीनों की पूजा हो रही है और जिनका जीवन श्रममय है, उन्हें लातें मारी जा रही हैं। -- भारतीय संस्कृती
  • यदि सेवा-कर्म को उत्कृष्ट बनाना है, तो अपने साधनों को पवित्र मानिए। सजीव और निर्जीव, दोनों साधनों को पवित्र मानकर उन्हें प्रसन्न रखिए। जो कारखाना मालिक अपने मजदूरों को देव तुल्य मानेगा और उन्हें अपनी सेवा का पवित्र साधन समझकर संतुष्ट रखेगा, वह ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय होगा। -- भारतीय संस्कृती
  • ज्ञान का क्षेत्र चाहे जो भी हो, उस ज्ञान का अनुसरण करते हुए जो उसके अंतिम छोर तक पहुँचता है और सर्वोच्च स्थान प्राप्त करता है, वही ऋषि है। -- भारतीय संस्कृती
  • हमारा समाज जब परिवर्तन स्वीकार नहीं करता, तब वह बहुत बड़ी भूल कर रहा होता है। पुरानी जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियां आज कैसे चल सकती हैं? बचपन का अंगरखा बड़े होने पर बालक को कैसे आएगा? रूढ़ियों के वस्त्र सदैव बदलते रहने चाहिए। यदि ऐसा बदलाव नहीं करोगे, तो ठंड में ठिठुर कर मरोगे और गर्मी में तपकर! -- भारतीय संस्कृती
  • ज्ञान के बिना भक्ति अंधी है, भक्ति के बिना ज्ञान सूखा है, और जब तक कर्म में अवतरित न हों, तब तक ज्ञान-भक्ति का कोई अर्थ नहीं है। ज्ञानमयी गंगा को भक्तिमयी यमुना में मिलने दो, और कर्ममयी सरस्वती को भक्ति-ज्ञान का स्पर्श होने दो। -- भारतीय संस्कृती
  • किसी कर्म को उत्कृष्ट बनाने के लिए और उस कर्म से ऊब न होने देने के लिए, कर्म के प्रति रुचि और जिसके लिए कर्म करना है उसके प्रति मन में अपार प्रेम होना अनिवार्य है। -- भारतीय संस्कृती
  • संसार में स्वतंत्र बुद्धि बहुत कम होती है। सनातनी लोग पुराने ऋषियों के गुलाम बन जाते हैं, तो नए लोग पश्चिमी विद्वानों के! परंतु भारतीय संस्कृति अपना स्वतंत्र दीपक जलाने की सीख देती है। स्वयं देखो कि तुम्हारे समाज के लिए हितकर क्या है। -- भारतीय संस्कृती
  • नदी यानी क्या? नदी यानी सैकड़ों छोटे-बड़े प्रवाहों का परम मंगलकारी 'अद्वैत' दर्शन! वह अद्वैत की मूर्ति है। वे प्रवाह एक-दूसरे को तुच्छ नहीं समझते। 'हमारी गंदगी नीचे बैठ जाएगी और हमारी प्रसन्नता प्रकट होगी'—यही भाव नदी सिखाती है। -- भारतीय संस्कृती
  • लेखनी हो या तलवार, तराजू हो या हल, चूल्हा हो या झाड़ू—भारतीय संस्कृति इन सभी सेवा-साधनों को पवित्र मानती है; और भविष्य में जो नवीन साधन निकलेंगे, उन्हें भी वह पवित्र ही मानेगी। -- भारतीय संस्कृती
  • मैं जो भी कर्म करता हूँ वह उत्कृष्ट है—ऐसा जो कह सके, वह व्यक्ति धन्य है। -- भारतीय संस्कृती
  • एक बार क्या हुआ, वह अमावस्या की रात थी। भाई ने कहा—'कैसी अमावस्या और कैसा शनिवार! जो होना है सो होगा। प्रत्येक दिन शुभ है।' -- श्यामची आई
  • अद्वैत का अर्थ प्रत्यक्ष व्यवहार है। अद्वैत केवल चर्चा नहीं, बल्कि अनुभूति है। -- भारतीय संस्कृती
  • जहाँ-जहाँ देखता हूँ, वहाँ तुम्हारे ही चरण दीखते हैं; सर्वत्र तुम्हारा ही रूप समाया हुआ है। -- भारतीय संस्कृती
  • भारतीय संस्कृति आकाश के समान विशाल और सागर के समान अपार है। -- भारतीय संस्कृती