सम्राट अशोक
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सम्राट अशोक (ईसा पूर्व 304 – ईसा पूर्व 232), जिन्हें अशोक महान कहा जाता है, मौर्य वंश के सबसे प्रसिद्ध सम्राटों में से एक थे। वे चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र थे। उनका शासन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण युग माना जाता है। कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने हिंसा का त्याग किया और बौद्ध धर्म अपना लिया। उन्होंने अपने धर्म-लेखों द्वारा नीति, नैतिकता और धर्म का प्रचार किया।
उद्धरण
[सम्पादित करें]सम्राट अशोक के प्रमुख उद्धरण:
- "धर्म विजय, युद्ध विजय से श्रेष्ठ है।"
- "सभी प्राणी मेरे पुत्र समान हैं, और मैं उनकी भलाई चाहता हूँ।"
- "क्रूरता का त्याग कर दया और करुणा की ओर बढ़ो।"
- "सच्चा विजेता वही है जो अपने अंदर के अज्ञान और क्रोध को जीतता है।"
- "जो धर्म का आदान-प्रदान करता है, वह सच्चा सेवक है।"
- "मैंने कलिंग युद्ध में जो विनाश देखा, उसने मेरी आत्मा को झकझोर दिया।"
- "राजा को प्रजा की सेवा करनी चाहिए, न कि उस पर शासन।"
- "बिना हिंसा के धर्म की विजय ही स्थायी विजय है।"
- "धर्म कोई मज़बूरी नहीं, आत्मा की स्वेच्छा है।"
- "मुझे रात में नींद नहीं आती, जब तक मैं यह न सोच लूँ कि मेरी प्रजा सुखी है या नहीं।"
- "प्रजा की भलाई ही राजा की सच्ची जीत है।"
- "मैं सभी धर्मों का समान आदर करता हूँ और यही मेरे राज्य की नींव है।"
- "सच्चा धर्म वह है, जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे।"
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
[सम्पादित करें]- कलिंग युद्ध (ईसा पूर्व 261) के बाद सम्राट अशोक ने हिंसा का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया।
- उन्होंने धर्म-लेखों (Edicts) के माध्यम से नैतिकता और बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार किया।
- अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे और इनमें अहिंसा, धर्म, न्याय और करुणा के संदेश दिए गए हैं।