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सम्पूर्णानन्द

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डॉ॰ संपूर्णानन्द (1 जनवरी 1890 - 10 जनवरी 1969) कुशल तथा निर्भीक राजनेता एवं सर्वतोमुखी प्रतिभावाले साहित्यकार एवं अध्यापक थे। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। वे सदा हिन्दी के पक्षधर रहे। उन्हें हिन्दी की श्रीवृद्धि के लिए 'समाजवाद' पुस्तक पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक भी मिला। 1940 में वे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित हुए। लम्बे समय तक वे नागरी प्रचारिणी सभा के भी अध्यक्ष और फिर संरक्षक रहे।

  • कुश्ती का उद्देश्य सुरुचिपूर्ण स्पर्धा ही होनी चाहिए, निर्दयता का प्रसार नहीं। जिसके शरीर में बल है और पास में मल्लशास्त्र का ज्ञान है वह आवश्यकता पड़ने पर शत्रु को परास्त कर सकता है और दुष्ट को दंड दे सकता है परंतु अखाड़े में प्रतिस्पर्धी के हाथ-पाँव तोड़ना कदापि श्लाघ्य नहीं है।
  • योगी न होते हुए भी सच्चा कलाकार वितर्क का अतिक्रमण करके विचार और आनंद की भूमिकाओं के बीच पेंगें मारता रहता है। साधना के अभाव के कारण वह किसी एक जगह टिक नहीं सकता, परंतु थोड़ी देर के लिए उसको सत्य की जो आभा देख पड़ती है, जड़ चेतन के आवरण के पीछे अर्द्ध-नारीश्वर की जो झलक मिलती है, वह उसको इस जगत के ऊपर उठा देती है, उसके जीवन को पवित्र और प्रकाशमय बना देती है।
  • बुरा कर्म बुरा है चाहे वह कृत हो, चाहे कारित और चाहे अनुमोदित।
  • एक सच्चा वैद्य जिसने अपने शास्त्र के आचार्यों की शिक्षा हृदयंगम की है, धन के लिए अपना कार्य नहीं करता। किंतु समाज को चाहिए कि ऐसे व्यक्तियों के प्रति अपना कर्तव्यपालन करे।
  • महापुरुष अपने युग का प्रतीक है और समसामयिक शक्तियों का नाभिबिन्दु होता है।

समाजवाद पर

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  • यदि भारत को दुनिया में एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखना है तो उसे समाजवाद के मूल सिद्धान्तों और नीतियों को अपनाना होगा। वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीक की महान प्रगति ने मनुष्य को स्पष्ट ही मशीन का दास बना दिया है। आज ऐसी अर्थ-नीति की आवश्यकता है कि जो उत्पादन पर नियन्त्रण रख सके और समाज में न्याय-वितरण की व्यवस्था कर सके। विश्व की वर्तमान स्थिति में हमारे सामने कोई विकल्प नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में हमारे लिए आवश्यक हो गया है कि हम अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को ऐसा रूप दें जिससे विज्ञान और तकनीकी कौशल से अधिक से अधिक लाभ तो उठाया जा सके किन्तु मनुष्य के व्यक्तित्व की सहज स्वतन्त्रता का अपहरण न हो और अपने स्वभाव के अनुरूप अपना विकास करने के मार्ग में उसे बाधा न हो। -- (सम्पूर्णानन्द, 1961, पृ021)
  • रूस, चीन या कोई देश जिस समाजवाद की बात करता है, उसकी एक व्यावहारिक योजना और पद्धति उसके पास है। एक नीति है, जिसमें उसने अपने समाजवाद को चेहरा दिया है या उसे क्रियान्वित करने में सफल हुआ है किन्तु भारत के पास इस शब्द के सिवाय कुछ नहीं है, अतः यह सिर्फ नारा है। इस भ्रान्तिपूर्ण शब्द-प्रयोग के कारण किसी दिन यह खतरा भी सामने आ सकता है कि जो भी दल आए, वह अपने ढंग से समाजवाद की एक योजना बनाये और उसे थोपना शुरू कर दे। हो सकता है कि किसी दिन कम्युनिस्ट दर्शन पनप जाए और वह अपनी शासन पद्धति को जनतन्त्रीय और समाजवादी कहकर क्रियान्वित करने लगे। वैसी स्थिति में क्या सचमुच जनतंत्र के उस समाजवादी रूप की कल्पना हो सकेगी जिसे महात्मा गाँधी ने आकार दिया था। -- (सम्पूर्णानन्द, 1961, पृ017)
  • संसार में इतने दुख क्यों हैं? पदार्थ की अपार राशि प्रतिवर्ष उत्पन्न होती है, मिलों से वस्त्रों के पहाड़ निकलते हैं, लाखों वर्ग कोस भूमि बसने योग्य पड़ी है, एक देश में उत्पन्न वस्तु सुगमता से दूसरे देश में पहुँच सकती है। घातक रोगों पर चिकित्साशास्त्र विजय प्राप्त करता जा रहा है। राष्ट्रों की स्वतन्त्रता का अपहरण क्यों किया जाता है? युद्ध क्यों होता है? मनुष्य जल, वायु, विद्युत को अपने वश में कर सकता है, अरबों कोस दूर की निहारिकाओं को दृष्टिगत कर सकता है, अगोचर परमाणुओं की गति-विधि की गणना कर सकता है पर उसकी बुद्धि अपने जीन को संघटित क्यों नहीं कर सकती। -- (दैनिक आज, 19 जनवरी 1969)
  • मूल पदार्थ एक ही था। एक पदार्थ मानने वाला अर्थात् अद्वैतवादी सिद्धान्त भी दो प्रकार का हो सकता है। एक तो यह कि मूल पदार्थ चेतन था। यह शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदान्त का विशुद्धाद्वैतवाद है। मार्क्स इस सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करता। वह दूसरे प्रकार के अद्वैतवाद को स्वीकार करता है जिसमें जगन्मूल अद्वैत पदार्थ चेतन नहीं है। उसके अनुसार इस जगत् का मूल स्वरूप 'मैटर' था। -- (सम्पूर्णानन्द, 1936, पृ076)
  • जगत् का मूल आधार शुद्ध चेतना है। द्वन्द्वात्मक स्वभाव वाली प्रक्रिया के परिणामस्वरूप यह चिन्मय हुआ। आगे चलकर इसका विकास विभिन्न गुणों वाले तत्व के रूप में हुआ, जिसे हम जगत् के नाम से जानते हैं। शुद्ध अवस्था में जो ब्रह्म कहा जाता है, वही आत्मज्ञान की स्थिति में परमात्मा के नाम से जाना जाता है। -- (सम्पूर्णानन्द, 1961, पृ003)
  • जो मनुष्य समाज की गतिविधि का अध्ययन करना चाहता हो और उसमें सुधार करना चाहता हो, उसको आचार-विचार, कानून, शिक्षण, सामाजिक संगठन, शासन पद्धति, आर्थिक व्यवस्था सभी बातों पर ध्यान देना होगा। आर्थिक व्यवस्था का महत्व बहुत बड़ा है पर उसी को सब कुछ नहीं माना जा सकता। -- (सम्पूर्णानन्द, 1936, पृ0299)
  • वर्गों के मध्य हितों की टकराहट को भारतीय समाजवादी भी स्वीकार करता है। वह भी इस स्थिति को समाप्त करने का इच्छुक है, किन्तु किसी वर्ग को नष्ट करके वह इस लक्ष्य को नहीं पाना चाहता। वह मानता है कि एक औद्योगिक संस्थान को सफलतापूर्वक चलाने के लिए बहुत से लोगों का सहयोग और संगठित प्रयत्न चाहिए- व्यवस्थापक, इंजीनियर, क्लर्क, श्रमिक इत्यादि सबका सहयोग अपेक्षित है। -- (सम्पूर्णानन्द 1961 पृ010)
  • भारतीय समाजवाद को यह सत्य विस्मृत नहीं करना है कि वर्गहीन समाज की स्थापना, शोषण का उन्मूलन, आत्मभिमान का पोषण, बेरोजगारी की समाप्ति, सबको उचित शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा-यह सब समाजवादी कार्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग हैं और भारतीय समाजवाद, अन्य समाजवादी विचारधाराओं से, जिसमें कम्युनिस्ट भी है, इस सीमा तक सहमत है, किन्तु भारतीय समाजवाद के अनुसार व्यक्ति का अपना एक महत्व है। वही धुरी है, वही केन्द्रबिन्दु है। सामाजिक कल्याण और उन्नति केवल उपकरण है, साध्य नहीं। भारतीय समाजवाद नैतिक मूल्यों और सदाचार पर बल देगा, जिसकी पूर्ण अभिव्यक्ति सत्य और अहिंसा में होती है। इन सिद्धान्तों का कठोर पालन कभी-कभी दुखद हो सकता है। ऐसे अवसर आ सकते हैं जब भौतिक प्रगति अवरुद्ध हो जाए और राजनीतिक उलझनें उठ खड़ी हों, किन्तु मानव जाति इस विश्वास के बल पर जीवित रह सकती है कि अन्तिम विजय उसी की होगी जो धर्म-विमुख नहीं होता तथा जो साधनों की श्रेष्ठता पर विश्वास करता है। -- (सम्पूर्णानन्द 1961 पृ010)
  • हम भारतवासियों ने गणतन्त्रात्मक वातावरण में नियोजित विकास का कठिन श्रम अपने हाथ में लिया है। नियोजन कुछ अंश तक जीवन को नियन्त्रित करता है। इसको कार्यरूप में परिणत करने का काम जिस शासन के हाथों में होगा, वह जितना शक्तिशाली होगा, भौतिक अर्थों में नियोजन उतना ही सफल कहा जाएगा। वाद-विवाद और तर्क-वितर्क गणतन्त्र में अभिन्न अंग हैं और इस बात की बहुत सम्भावना है कि विकास की गति में इससे बाधा पड़े। प्रगति के पथ पर जल्दी बढ़ने की स्वाभाविक इच्छा के कारण यह भी असम्भव नहीं है कि हम वर्जनाओं की ऐसी दीवार खड़ी कर लें, जो गणतन्त्र को एकदम रोक दे। -- (सम्पूर्णानन्द 1961 पृ021)
  • समाजवादी राज्य में अधिकारों की अपेक्षा कार्यों पर बल होगा और दूसरों के जीवन की सफलता में सहयोग देने के प्रयत्न उस श्रद्धा और सहिष्णुता की ओर ले जायेंगे जो धर्म का सार-तत्व है। यद्यपि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है किन्तु अधार्मिकता और धार्मिक विश्वासों का उपहास करने की प्रवृत्ति प्रभावी धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी शत्रु है। विज्ञान की आड़ में धर्म की ओछी आलोचना आधुनिक विज्ञान से अपना अज्ञान प्रकट करना है। अतः राज्य में हमें सच्ची धर्मनिरपेक्षता को लागू करना होगा। -- (सम्पूर्णानन्द 1961 पृ036)
  • लोकतन्त्र तभी सफलतापूर्वक चल सकता है जब नागरिक शिक्षित हों और उनकी कर्त्तव्यबुद्धि उदात्त हो। साथ ही इसके लिए राजनीति के गम्भीर अध्ययन और प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है। 'जनता के हित के लिए जनता के शासन' का अर्थ यह नहीं है कि जनता स्वयं शासन करे। अपितु जनता के जो प्रतिनिधि सरकार बनाने के लिए चुने जायँ, उनकी योग्यता का मापदण्ड यह भी होना चाहिए कि उन्होंने कुछ लोकसेवा की है या नहीं। लोकतन्त्र शासन की कुछ विशेषताएँ हैं, जो उसको अन्य व्यवस्थाओं से पृथक करती है। लोकतंत्र किसी विशेष प्रकार की शासन व्यवस्था का ही नाम है, वह विशेष प्रकार की मनोवृत्ति का प्रतीक है। यदि हम मनोवृत्ति ढीली हुई तो अच्छा से अच्छा लोकतान्त्रिक संविधान देर तक नहीं टिक सकता। (सम्पूर्णानन्द, 1962 पृ0228)

शिक्षा पर

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  • हमारी शिक्षा-पद्धति का विकास भी त्रुटिपूर्ण रहा है। इसमें उन मौलिक सिद्धांतों की उपेक्षा की जाती है जिन पर उच्च-शिक्षा आधारित होनी चाहिए। हमारे विष्वविद्यालयों में कला एवं विज्ञान संकाय हैं, परन्तु उनमें पढ़ाये जानेवाले विषयों में कोई सम्बन्ध नहीं हैं। कला विभाग में इतिहास, अर्थशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र पढ़ाये जाते हैं, परन्तु छात्रों को यह नहीं बताया जाता है कि ये सभी समाजशास्त्र के अंग हैं जो कला एवं धर्म ज्ञान से भी सम्बन्ध रखते हैं। किसी एक विषय का ज्ञान मानव विकास का अधूरा चित्र प्रस्तुत करता है।
  • शिक्षा का उद्देश्य शिष्य के जीवन को सफल बनाना षिष्य को समाज का कुषल नागरिक बनाना है। छात्र को अपनी प्रतिभा के अनुसार ऊंची से ऊंची शिक्षाप्राप्त करने का अवसर मिले और उसकी योग्यतानुसार काम मिले तथा वह उन प्रश्नों को समझ सके जो समाज के सामने उठते हैं और उनके सम्बन्ध में यथोचित व्यवहार कर सके जिससे समाज का अधिक से अधिक लाभ हो। जो व्यक्ति ईश्वर को नहीं कर सकता जो ईमानदार ईसाई कहेगा। जिस मनुष्य को प्राचीन बातों पर श्रद्धा हो, उसके सामने जीवन का जो लक्ष्य है उसके अनुसार यदि शिक्षा देने की व्यवस्था की जायेगी तो उसका उद्देश्य नितान्त भिन्न होगा। परन्तु आजकल की शिक्षा निरूद्देश्य है अर्थात् अन्तिम लक्ष्यों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
  • हमारे शिक्षा केन्द्रों को आधुनिक जीवन की सीमाओं के अन्दर पुराने कुलपति के वास्तविक आश्रमों जैसा बनने की चेष्टा करनी होगी। उन्हें श्रम को स्वयं पहले आत्मसात् करके वितरित करना होगा और अध्यवसायपूर्ण अनुसन्धानों से इस ज्ञान भण्डार की वृद्धि करनी होगी। उन्हें यह भी देखना होगा कि जीवन को अधिक निष्कलुष, सुखी और परिपूर्ण बनाने में इस ज्ञान का प्रयोग किस प्रकार किया जा सकता है। यह हमारे विद्वानों और वैज्ञानिकों को पूरे समय स्मरण करना होगा कि जीवन का यही पक्ष, जिसे हम भौतिक पक्ष कहते हैं, सब कुछ नहीं है। मैं चाहता हूं कि हमारे शिक्षा केन्द्रों में एक वास्तविक धर्म का वातावरण व्याप्त रहे-गुरु के लिए, सत्य के लिए, उस यथार्थ के लिए जो हमें परिव्याप्त किये हुए है, जो हमारे अन्दर है और हमारी पहुंच से बाहर भी है, उस सबके लिए श्रद्धापूर्वक सम्मान हो। वैज्ञानिक विश्व को गणित के कुछ फार्मूलों में सीमित कर लेता है, जिनसे कि सिर्फ अधिक से अधिक कुछ अनुभवों को प्रकट करता है। एक अनुभव, एक मनोवृत्ति अथवा चेतना में एक स्फुरणमात्र है। मैं यह मानता हूं कि जनजीवन में अधिक निर्मलता की गुंजाइश है, अधिक उत्सर्ग-भावना की आवश्यकता है। इस प्रेरणा के लिए अपने विद्वानों, वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों को छोड़कर हम और किसकी ओर देखें? एक नैतिक और आध्यात्मिक आन्दोलन शिक्षकों के बीच स्वरूप धारण करे, जिससे राष्ट्र को नवजीवन प्राप्त हो।
  • जो व्यक्ति सच्चे अर्थों में अध्यापक बनना चाहता है उसे अनेक दार्शनिक प्रश्नों के उत्तर देना चाहिए अन्यथा वह मशीन चलानेवाले फोरमैन की तरह रह जायेगा। आज समाज को भी सोचना चाहिए कि वह अपने अध्यापकों से कैसा काम लेना चाहता है? उनसे क्या तैयार कराना चाहता है? जीवनरूपी रणभूमि के लिए पहलवान, मूक, बधिर, सिपाही या सच्चा मनुष्य? डा. सम्पूर्णानन्द जी शिक्षाके वास्तविक स्वरूप पर सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं और उपनिषद् और गीता में शिक्षा पर जो श्लोक कहे गये हैं उसका भरपूर समर्थन भी करते हैं। आज हमको एक-दूसरे से बैर नहीं है, पर अपने स्वार्थ की आंख लगी है। सबकी यही दषा है। यदि यह बात समझ में आ जाय कि आपस का द्वन्द्व बन्द हो जायेगा। सबको सुख-समृद्धि प्राप्त होगी, कम से कम हमको एक-दूसरे के दुःख को बढ़ाने का कारण नहीं बनना चाहिए।
  • छात्रों की अनुशासनहीनता रोकने के लिए तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को विनाष व तोड़-फोड़ के विरुद्ध एक विषेश कानून बनना चाहिए। सभी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में प्राक्टर मजिस्ट्रेट नियुक्त करने की पद्धति पुनः लागू करना चाहिए। (पहले कुछ स्थानों में इस तरह के अधिकारी होते थे।) प्राक्टर मजिस्ट्रेट की नियुक्ति से कुछ वे जटिल समस्याएं भी हल हो जायेंगी जो पुलिस द्वारा विश्वविद्यालय क्षेत्र में प्रवेष के बाद उत्पन्न हो जाती हैं।
  • शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी के लिए विषय का चुनाव बड़ा महत्वपूर्ण है। इस कार्य के लिए ऐसे कुषल व्यक्तियों की आवश्कता है जो विद्यार्थी की मनोवैज्ञानिक जांच करके उसके रुझान का पता लगायें और उसे परामर्ष दें कि वह कौन-सा विषय ले। इससे कभी इंजीनियर और कभी डाक्टर बनने की अंधी दौड़ पर रोक लगायी जा सकती है। प्रौढ़ शिक्षा का पाठ्यक्रम इस ढंग से बनाया जाय कि जिससे प्रौढ़ व्यक्ति को विश्वास हो कि इस पढ़ाई से उसे अपने कार्य में सहायता मिलेगी, वह किताबी ज्ञान की ओर आकर्षित न होगा। पढ़े-लिखे व्यक्ति के आचार–व्यवहार में एक शालीनता होनी चाहिए। डा. सम्पूर्णानन्द जी कहते हैं कि जो व्यक्ति भारतीय संस्कृति के मूलभूत सिद्धांतों से अपरिचित है, जिसको उस संस्कृति के प्रति अस्वारस्य है, वह जब उस संस्कृति के विषय में दूसरों को उपदेष देता है तो हंसी भी आती है और रोना भी आता है। जो उपदेष अनाधिकारियों के मुंह से भारतीय नवयुवकों को सुनने को मिलते हैं वह उसके मस्तिष्क को भ्रष्ट करते हैं। एक ओर तो वह अपने उपदेष्टाओं, नेताओं, बुजुर्गों के आचरण से यह देखता है कि पुरानी बातों का शीघ्र से शीघ्र परित्याग करना चाहिए।
  • अहिंसा आदि सद्गुणों का समुच्चय ही धर्म है। इस अर्थ को ध्यान में रखने पर स्पष्ट हो जाती है कि धार्मिक शिक्षा अनिवार्य रूप से देनी चाहिए। धार्मिक षिक्षक को, चाहे वह किसी देष या समाज का अंग हो अपने देश की परम्पराओं और वीरगाथाओं से उसे उस विषय में बड़ी सहायता मिलती है। उसे अपने शिष्यों तथा समाज के बीच इसका प्रचार तथा प्रसार करना चाहिए। भारत तो इस विषय में बहुत भाग्यशाली है। 'सच बोलो, सच बोलो' सौ बार कहने से भी जितना प्रभाव नहीं पड़ता उतना एक हरिश्चन्द्र की कथा से पड़ता है। आत्म-त्याग के लिए षिवि, दधिची, रन्तिदेव, जीमूतवाहन की कथाओं से बढ़कर ज्वलंत उदाहरण और कहां मिल सकता है। देष भक्ति के लिए प्रताप की कथा तथा स्त्रियोचित आचरणों के लिए सती-सावित्री, सीता और लक्ष्मीबाई के नाम किसी भी देश की स्त्रियों के लिए पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं। कभी-कभी यह आपत्ति उठायी जाती है कि हमारी पुरानी गाथाओं में ऐसी बातों का चर्चा होता है, जिनका मजहब से सम्बन्ध है, देव-देवियों की चर्चा आ जाती है। यह बात सही है लेकिन प्राचीन काल की गाथाओं से ऐसी बातों को निकाला नहीं जा सकता।