सामग्री पर जाएँ

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'

विकिसूक्ति से

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' हिन्दी के एक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं।

  • नित्यता क्षणों की है, पर क्षण, क्षण–भंगुर हैं। मैं भी हूँ, मुझमें जो कुछ नूतनता है, उसे मुझे इसी क्षण में कह डालना है, क्योंकि वह भविष्य की वस्तु है, मैं उसे कहे बिना रुक नहीं सकता और सोचने का समय नहीं—क्षण का अस्तित्व कितना?
  • सत्य अपने अन्तर की पीड़ा से जाना जाता है। -- नदी के द्वीप
  • मैं जो सदा आगे की ओर ही देखता रहा, अपनी जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुँच कर पीछे देख रहा हूँ कि मैं कहाँ से चलकर किधर-किधर भूल-भटककर, कैसे-कैसे विचित्र अनुभव प्राप्त करके यहाँ तक आया हूँ । और तब दिखता है कि मेरी भटकन में भी एक प्रेरणा थी...। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', शेखर : एक जीवनी - १
  • क्यों डरूं मैं मृत्यु से या
क्षुद्रता के शाप से भी?
क्यों डरूं मैं क्षीण-पुण्या
अवनि के संताप से भी?
व्यर्थ जिसको मापने में
हैं विधाता की भुजाएं—
वह पुरुष मैं, मर्त्य हूं पर
अमरता के मान में हूं!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूं!”
  • वैज्ञानिक सब नीतिज्ञ नहीं तो नैतिक अवश्य थे, और यहाँ तक विज्ञान का रेकार्ड वैज्ञानिकों के लिए गौरव का विषय है। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • कला यानी पोस्टर, संगीत यानी फ़ौजी बैंड…और साहित्य यानी पैम्फ़लेट, परचे, अख़बारनवीसी, रिपोर्टाज का नया माध्यम जो न पूरा तथ्य है न पूरी कल्पना। -- नदी के द्वीप
  • वह सिवाय तीखी उत्तेजना के कुछ समझता ही नहीं, लिहाजा चन्द्रमाधव भी एक तरह का नशेबाज है और जीवन की महत्त्वपूर्ण चीज़ों को नहीं पहचान सकता। -- नदी के द्वीप
  • एक आदमी के भीतर जो शैतान होता है, वह तब तक दूसरे आदमी के भीतर के शैतान का पक्ष लेता है, जब तक कि उसका स्वार्थ न बिगड़े। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', मेरी प्रिय कहानियाँ
  • प्रेम आईने की तरह स्वच्छ रहता है, प्रत्येक व्यक्ति उसमें अपना ही प्रतिबिम्ब पाता है, और एक बार जब वह खंडित हो जाता है, तब जुड़ता नहीं। अगर किसी प्रकार निरन्तर प्रयत्न से हम उसके भग्नावशिष्ट खंडों को जोड़कर रख भी लें तो उसमें पुरानी कान्ति नहीं आती। वह सदा के लिए कलंकित हो जाता है। स्नेह अनेकों चोटें सहता है, कुचला जाकर भी पुनः उठ खड़ा होता है; किन्तु प्रेम में अभिमान बहुत अधिक होता है, वह एक बार तिरस्कृत होकर सदा के लिए विमुख हो जाता है। आज इस वल्लरी के प्रति मेरा अनुराग बहुत है, पर उसमें प्रेम का नाम भी नहीं है—वह स्नेह का ही प्रतिरूप है। वह विह्वलता प्रेम नहीं है, वह केवल प्रेम की स्मृति की कसक ही है। -- अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • जो एक बार अपनी इच्छा से पतित होता है, उसका उत्थान होना असम्भव है। कोई उसका मित्र नहीं होता, कोई उसकी सहायता नहीं करता। मेरे लिए यही जीवन है—यही जिसे एक दिन मैंने इतनी व्यग्रता से अपनाया था, और जिसने आज साँप की तरह मुझे अपने पाश में बाँध लिया है। -- अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ


  • वहीं, नित्य-प्रति रात को लोग आते थे, हमारे शरीरों को देखते थे, गन्दे संकेत करते थे, और हम बैठी सब कुछ देखा करती थीं। वहाँ, जब चूसे हुए नींबू की तरह बीमारियों से घुले हुए वे पूँजीपति साफ़-साफ़ कपड़े पहनकर इठलाते हुए आते थे—उफ़्! जिसने वह नहीं देखा, वह पूँजीवाद और साम्राज्यवाद का दूरव्यापी परिणाम नहीं समझ सकता! धन के आधिक्य से ही कितनी बुराइयाँ समाज में आ जाती हैं इसको जानने के लिए वह देखना ज़रूरी है। -- अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • मन की यह भी एक शक्ति है कि ज़रा से भी साम्य के सहारे वह सहज ही सम्पूर्ण लयकारी सम्बन्ध जोड़ लेता है। -- नदी के द्वीप
  • "क्रान्ति सुधार नहीं है, न सही। परिवर्तन ही सही। लेकिन परिवर्तन का भी तो ध्येय होता है! क्रान्ति परिवर्तन भी नहीं है।" मैंने सोचा, पूछूँ तो फिर क्रान्ति है क्या? किन्तु मैं बिना पूछे उसके मुख की ओर देखने लग गया। वह स्वयं बोली, “क्रान्ति आन्दोलन, सुधार, परिवर्तन कुछ भी नहीं है; क्रान्ति है विश्वासों का, रूढ़ियों का, शासन की और विचार की प्रणालियों का घातक, विनाशकारी, भयंकर विस्फोट! इसका न आदर्श है, न ध्येय, न धुर। क्रान्ति विपथगा, विध्वंसिनी है, विदग्धकारिणी है। -- अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • अमरवल्लरी के स्पर्श में एक साथ ही वसन्त के उल्लास का, ग्रीष्म के ताप का, पावस की तरलता, शरद् की स्निग्धता का, हेमन्त की शुभ्रता का और शिशिर के शैथिल्य का अनुभव हुआ है, न जाने कितनी बार इसके बन्धनों में बँधकर और पीड़ित होकर मुझे अपने स्वातन्त्र्य का ज्ञान हुआ है! एक व्यथा, एक जलन, मेरे अन्तस्तल में रमती गई है कि मैं मूक ही रह गया, मेरी प्रार्थना अव्यक्त ही रह गई—पर मुझे इस ध्यान में सान्त्वना मिलती है कि मैं ही नहीं, सारा संसार ही मूक है… -- अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • चलती गाड़ी में मुझ-से व्यक्ति को एक स्वच्छन्दता का बोध होता है। -- नदी के द्वीप
  • औद्योगिक क्रान्ति के साथ वह सुविधा का गुलाम बन कर एक के बाद एक विभ्राट् उत्पन्न करता चले? -- नदी के द्वीप
  • मेरा वश होता, और भविष्य बने-बनाए मिलते, तो मैं आपको एक ऐसा सुन्दर भविष्य ला देती कि बस। उसके चार पाये चार इन्द्रधनुष होते, और फूलों पर पड़ी हुई चाँदनी उसके ऊपर होती, तितलियों के पंखों से रंग लेकर उसे रँगा जाता। -- नदी के द्वीप
  • वेदना में एक शक्ति होती है, जो दृष्टि देती है । जो यातना में है, वो दृष्टा हो सकता है...! -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', शेखर: एक जीवनी - २
  • हमें केवल युद्ध नहीं जीतना है, हमें शान्ति भी नहीं जीतनी है, हमें संस्कृति जीतनी है, विज्ञान जीतना है, नीति जीतनी है, हमें मानव की स्वाधीनता और प्रतिष्ठा जीतनी है। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • तुम्हें जो राह दीखती है, उस पर चलो, गौरा। धैर्य के साथ, साहस के साथ। और हाँ, जो तुमसे सहमत नहीं हैं उनके प्रति उदारता के साथ, जो बाधक हैं उनके प्रति करुणा के साथ। और राह पर जब ऐसा साथी मिलेगा जिस का साथ तुम्हें प्रीतिकर, वांछनीय, कल्याणप्रद लगे, तब किसी की बात न सुनना, जान लेना कि अब स्वतंत्र रूप से जोखम वरने का समय आ गया। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • पुराने ज़माने में जब वैज्ञानिक और नीतिज्ञ एक ही था, तब विज्ञान नीति को पुष्ट करता था। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • 'कमला’! विवेक कहता है, ‘यह प्रेम नहीं है, मोह है।’ कमला, कमला, कमला! तुम्हें नहीं छोड़ सकूँगा…प्रेम न सही, आसक्ति सही, मोह सही, वासना सही, पर कितनी सुखद आसक्ति, कितना मनोरम मोह, कितनी मीठी, कितनी सुरभित, कितनी प्रकांड वासना है यह। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • और गार्हस्थ्य एक लम्बी यात्रा है—बल्कि पथ-यात्रा नहीं, सागर-यात्रा, जिस में मोड़-चौराहे पर नहीं, क्षण-क्षण पर संकल्प-पूर्वक जोखम का वरण करना होता है और कोई लीकें आँकी हुई नहीं मिलतीं, नक़्शे और कम्पास और अन्ततोगत्वा अपनी बुद्धि और अपने साहस के सहारे चलना होता है। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • संकट में हम हार जाएँगे, मैं नहीं मानती, और मुझे लगता है कि यह न मानना भी स्वयं एक मोर्चा है क्योंकि मानव-नियति में विश्वास खोना मानव की प्रतिष्ठा की लड़ाई हार जाना है…। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • तुम विमुख हो किंतु मैंने
कब कहा उन्मुख रहो तुम?
साधना है सहसनयना
बस, कहीं सम्मुख रहो तुम!
विमुख-उन्मुख से परे भी
तत्व की तल्लीनता है—
लीन हूं मैं, तत्वमय हूं
अचिर चिर-निर्वाण में हूं!
मैं तुम्हारे ध्यान में हूं!”
  • नीति से अलग विज्ञान बिना सवार का घोड़ा है, बिना चालक का इंजिन : वह विनाश ही कर सकता है। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', नदी के द्वीप
  • मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना कैसे रहा जाए ? शहर के, दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे जाए । -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', शेखर: एक जीवनी - २
  • कहने लगी : “यह उचित ही हुआ। और क्या हो सकता था? अगर कर्तव्य भूलकर सुख ही खोजने का नाम प्रेम होता, तो—! मैं जो-कुछ सोचती हूँ, समझती हूँ, अनुभव करती हूँ, उसका अणुमात्र भी व्यक्त नहीं कर सकी—पर इससे क्या? जो कुछ हृदय में था—है—उससे मेरा जीवन तो आलोकित हो गया है। प्रेम में दुःख-सुख, शान्ति और व्यथा, मिलन और विच्छेद, सभी हैं, बिना वैचित्र्य के प्रेमी जी नहीं सकता…नहीं तो जिसे हम प्रेम कहते हैं, उसमें सार क्या है? -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ
  • विश्वकर्मा से मूक प्रार्थना करने लगता—विश्वकर्मा मूक प्रार्थना भी सुन लेते हैं—कि उस स्त्री को भी कोई वैसी ही दारुण वेदना हो! वह मुझे देवता मानकर पुष्पों से पूजा करती थी और मैं उसके प्रति इतनी नीच कामना करता था—किन्तु प्रेम के प्रमाद में बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। -- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', अज्ञेय की सम्पूर्ण कहानियाँ