संजीव सान्याल
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संजीव सन्याल (जन्म 27 अगस्त 1970) भारत के एक अर्थशास्त्री और लोकप्रिय इतिहासकार हैं जिन्होंने भारत के संशोधित इतिहास पर आधारित अनेक पुस्तकें लिखीं हैं। वे भारत के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं और उन्होंने भारतीय आर्थिक सर्वेक्षण के छह संस्करण तैयार करने में सहायता की है और जी-७ और ओईसीडी की बैठकों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। वे गोखले राजनीति और अर्थशास्त्र संस्थान के कुलाधिपति भी हैं।
विचार
[सम्पादित करें]- भारत की न्यायिक प्रणाली, 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा है।
- न्यायालय 'माई लॉर्ड' जैसे सामन्ती शब्दों का प्रयोग क्यों करते हैं?न्यायधीशों को २ महीने की छुट्टी क्यों मिलती है जबकि पुलिस और अस्पताल कभी बन्द नहीं होते?
- 'बहुसंख्यकवाद' शब्द भारत में हिन्दुओं को बिना किन्ही मूल सिद्धान्तों के ही राक्षस जैसा दिखाने का एक सरल तरीका बन गया है। -- 'द मेजोरिटिज्म मिथ' नामक पुस्तक में
- व्यापार में भारतीय वस्तुओं और व्यापारियों का इतना बोलबाला था कि अरब के लोग बसरा को 'अल-हिन्द' कहते थे।
- भारत की तरह चीन अन्तर्मुखी हो गया और सदियों तक उसका नीचे गिरता रहा। प्रौद्योगिकी की उत्कृष्टता चीन को बचा नहीं पायी। कुछ समय तक लगा कि हिन्द महासागर अरबों का हो जाएगा किन्तु ऐसा होने वाला नहीं था।
- आरम्भ में ही यह स्पष्ट कह दूँ कि संसार में 'शुद्ध जाति' नाम की कोई मानव-जाति नहीं है।
- गालिब की कविता साहित्यिक दृष्टि से बहुत अच्छी हो सकती है किन्तु यह उस दुनिया के लिये रोदन है जो उनके आसपास नष्ट हो रही थी। उनकी कविता में भविष्य की कोई दृष्टि नहीं है।
- अरबिंदो का दिशा-परिवर्तन समझ से परे लग सकता है, लेकिन उनके लेखन इनके कारणों को स्पष्ट करते हैं। ऐसा लगता है कि वे इस निष्कर्ष पर पहुँच गए थे कि राष्ट्रवाद की ज्वाला प्रज्वलित करके उन्होंने भारत के माज़िनी (इटली का राष्ट्रभक्त) के रूप में अपनी भूमिका पहले ही पूरी कर ली थी। अब अंग्रेजों को जाने के लिए मजबूर होना ही था। हालाँकि, उन्हें यह भी लगता था कि भारत को एक और भी महत्वपूर्ण सभ्यतागत लड़ाई लड़नी होगी, जो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने से कहीं अधिक कठिन साबित होगी। सदियों तक विदेशी शासन के अधीन रहने के बाद, भारत के लोग अपनी संस्कृति को उन लोगों के दृष्टिकोण से देखने लगे थे जिन्होंने उन्हें पराजित किया था। अरबिंदो के पिता की तरह भारतीय अभिजात वर्ग के कई सदस्यों ने यह विचार आत्मसात कर लिया था कि वेद और उपनिषद जैसे पवित्र ग्रंथ केवल अंधविश्वास हैं। वे यह मानने लगे थे कि आधुनिकीकरण का अर्थ पश्चिमीकरण है। कोई यह तर्क दे सकता है कि यह अविश्वसनीय दूरदर्शिता दर्शाता है, क्योंकि एक सदी से भी अधिक समय बाद, राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के साढ़े सात दशक बाद, यह समकालीन भारत में एक गरमागरम बहस का विषय बना हुआ है। श्री अरविन्द ने महसूस किया कि भारतीय सभ्यता के वास्तविक मूल को पुनः खोजना और उसे भारतीयों तथा व्यापक विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना मेरा कर्तव्य है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, श्री अरविंद ने हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और पूजनीय ग्रंथ, ऋग्वेद का गहन अध्ययन किया। -- संजीव सान्याल, Revolutionaries : The Other Story of How India Won Its Freedom , HarperCollins India (2023)
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में संघ लोक सेवा आयोग बिलकुल अप्रसंगिक हो चुका हैं।