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श्रीधर वेम्बु

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श्रीधर वेम्बु (जन्म 1968) एक भारतीय अरबपति व्यवसायी तथा ज़ोहो कॉर्पोरेशन के संस्थापक और सीईओ हैं। फोर्ब्स के अनुसार, वह 2020 तक 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ दुनिया के 59वें सबसे धनी भारतीय व्यक्ति हैं। उन्हें 2021 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

  • जोहो एक तरह की औद्योगिक अनुसंधान प्रयोगशाला है, जो अपने लिए धन भी जुटाती है। हम लघु-अवधि में होने वाले लाभ को नजरअंदाज कर देते हैं, जब तक कि हमें नुकसान न हो।
  • चूँकि ज़ोहो (Zoho) भारत में तेज़ी से बढ़ रहा है, हमारे पास तमिलनाडु में ग्रामीण इंजीनियर हैं जो मुंबई और दिल्ली के ग्राहकों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं - हमारा अधिकांश व्यवसाय इन्हीं शहरों और गुजरात से संचालित होता है। तमिलनाडु में ग्रामीण रोज़गार उन ग्राहकों को अच्छी सेवा देने पर निर्भर करता है। तमिलनाडु में हमारे लिए हिंदी न जानना अक्सर एक गंभीर बाधा बन जाता है।- श्रीधर वेम्बु, एक्स (X) पर किये गये एक पोस्ट में[]
  • मैंनेने पिछले पाँच सालों में हिंदी पढ़ना सीखा है और अब मैं 20% तक समझ सकता हूँ।
  • मैंने यह बात अक्सर अपने कर्मचारियों से कही है कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को मैकेनिकल इंजीनियरों, या सिविल इंजीनियरों, या केमिस्टों, या स्कूल शिक्षकों से बेहतर वेतन मिलता है। यह उनका कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है, और हम इसे हल्के में नहीं ले सकते, और हम यह मानकर नहीं चल सकते कि यह हमेशा रहेगा।
  • मुझे हाल ही में पता चला कि भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए वियतनाम जा रहे हैं। वहाँ के कॉलेज उनसे सालाना 4 लाख रुपये फीस लेते हैं। मुझे बताया गया है कि शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी है। यह शर्म की बात है कि सस्ती मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारतीय छात्रों को विदेश जाना पड़ता है।
  • मुझे आज एक हस्तलिखित नोट मिला, जो अंग्रेजी में लिखा था – बस इतना अस्पष्ट था कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसमें क्या लिखा है और मुझे अपने दोस्त से समझना पड़ा। मुझे भी कागज पर पेन से लिखने में कठिनाई होती है, जबकि मैं पढ़ने लायक लिखने की कोशिश कर रहा हूं। मुझे लगता है कि हस्तलेखन एक लुप्त कला बनने जा रही है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल नौकरियों के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि भविष्य में यह हमारे घरों की बिजली व्यवस्था को भी ठप कर सकता है।
  • व्यवसाय, जिंदगी का ही हिस्सा है। व्यवसाय को जिंदगी से अलग नहीं किया जा सकता । दोहरापन ही दिक्कत है। मैं अपनी जिंदगी को उस तरह व्यतीत करना चाहूंगा, जो मेरे पैशन (महत्वाकांक्षा) और मूल्यों से लगातार कदमताल कर सके। उस जीवन में ग्रामीण विकास का प्रमुख स्थान है और उस व्यक्ति तक अवसर पहुंचाने की भी, जो अभी अवसरों से बहुत दूर बैठा है। काम के साथ देश की वास्तविक समस्याओं से निपटना और समाज पर सकारात्मक असर डालना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
  • मैं चाहता हूँ कि जितना कम हो सके उतना कम तनाव लूँ। जो लोग ज्यादा दबाव में काम करते हैं वो स्वास्थ्य से समझौता करते हैं। मैं अपने लिये और मेरे कर्मचारियों के लिए ऐसा माहौल नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि मेरे कर्मचारी भी गांवों में रहें ताकि विचारों का प्रचुरता से आदान-प्रदान हो। एक बार जब ज्यादा कमाई करने वाले लोग गांव पहुंचते हैं तो कई अच्छी और बुरी आदतें भी साथ पहुंचती हैं। हम अच्छी आदतों पर फोकस करें, तो लोगों को एक मार्गदर्शक मिलेगा, उन्हें कोचिंग मिलेगी। शहरी लोग, गांव वालों से सीखेंगे। ये अच्छा आदान-प्रदान है।
  • जब आप गांव में रहते हैं, तो अनावश्यक तनाव, जैसे कि मेरे पड़ोसी के पास फरारी है, या वो विदेश में छुट्टियां बिता रहा है, अपने आप चले जाते हैं। जीवन की सरलता आप समझते हैं। मैं हमेशा से कम चीजों में जीवन बिताने वाला रहा हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो नया फोन लॉन्च होते ही ले लेते हैं, मैं तो तब खरीदता हूँ जब उसे आए दो-एक साल बीत चुके होते हैं और सब के पास वो होता है। मैं खुद से और मेरे लोगों से शहरों को 'न रहने लायक' नहीं बनाना चाहता।
  • बुद्धिमान लोगों को "प्रतिष्ठा की स्पर्धा" में नहीं फंसना चाहिए।
  • प्रतिष्ठा प्रगति की दुश्मन है। व्यापार में, प्रतिष्ठा लाभ की दुश्मन है। सार्वजनिक जीवन में, प्रतिष्ठा सेवा की दुश्मन है।
  • मैं एक तकनीकी-आशावादी हूँ और तकनीक की तेज़ प्रगति में विश्वास करता हूँ। लेकिन मैं एक वित्तीय निराशावादी भी हूँ।
  • मैं 13 साल का था जब मुझे पहली बार एहसास हुआ कि जीवन में सुरक्षा जैसी कोई चीज़ नहीं है। मुझे यह अजीब तरह से मुक्तिदायक लगा।
  • मैंने खुद को अमूर्त गणितीय प्रमेयों का अध्ययन करते हुए पाया, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। मेरी औपचारिक शिक्षा के वर्ष पूरी तरह से व्यर्थ गए।
  • जिस प्रकार प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार ने श्रद्धालुओं के लिए बाइबिल को आसानी से उपलब्ध करा दिया, जिससे उनके और ईश्वर के बीच बिना किसी पूजा-पाठ की आवश्यकता के एक व्यक्तिगत संबंध स्थापित हो गया, उसी तरह इंटरनेट ने औपचारिक ज्ञान के भंडार को कमजोर कर दिया है। आज, हम अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करना सीख रहे हैं।
  • हम अपने लोगों को सोचने की जगह देना पसंद करते हैं । इसके लिए हम सही माहौल बनाना चाहते थे। डीएलएफ आईटी पार्क (पोरुर ) में हमारा ऑफिस बहुत ज़्यादा कॉर्पोरेट था, इसलिए हमने शहर की चहल-पहल और उसकी कृत्रिम रूप से ऊँची रियल एस्टेट कीमतों से दूर अपना कैंपस बनाने का फैसला किया।
  • मैं सदा असफलता के लिए तैयार रहता हूँ, न केवल पायलट अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं में, बल्कि व्यापार की असली गलाकाट दुनिया में भी। महत्वपूर्ण बात यह है कि अगले काम पर आगे बढ़ें, यह समझें कि अवसर हमेशा मौजूद रहते हैं। लोग इस संस्कृति को पसंद करते हैं।
  • क्लाउड व्यवसाय से होने वाली आय अगले कुछ वर्षों में पारंपरिक सॉफ़्टवेयर उत्पादों से होने वाली आय से आगे निकल जाएगी। मुझे 'मेक इन इंडिया' पर गर्व है, और अब मैं भारत के लिए निर्माण करना चाहता हूँ।
  • आज पैदा होने वाले हर चार बच्चों में से एक भारतीय है। यह तर्कसंगत है कि हमें अन्य चीज़ें भी बनानी चाहिए।...पहली बार, हमारे पास अतीत से मुक्त युवाओं का एक समूह है। मैं भारत को लेकर आशावादी हूँ।
  • हमें स्टील से लेकर खिलौनों और इलेक्ट्रिक वाहनों तक, हर चीज़ में चीनी सामानों के हमले का सामना करना पड़ेगा। जिसे हम व्यावसायिक आक्रमण समझते हैं, वह असल में चीन द्वारा नासमझी से बनाए गए विशाल अतिरिक्त उत्पादन के सामने हताशा है। इससे निपटना एक बड़ी चुनौती होगी।
  • हमें (भारतीयों को) उपभोक्ता वस्तुओं के आयात के बजाय उत्पादन के लिए उपयुक्त पूंजीगत वस्तुओं के आयात को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनका उत्पादन हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
  • भारत को अपने अनुसंधान एवं विकास निवेश से प्राप्त ज्ञान के प्रकाश को गरीब देशों के साथ उदारतापूर्वक साझा करना चाहिए... यही अधिक न्यायसंगत और अधिक स्थिर वैश्विक व्यवस्था का एकमात्र रास्ता है।