सामग्री पर जाएँ

शिष्य

विकिसूक्ति से

शिष्य का अर्थ है विद्यार्थी, चेला, या वह व्यक्ति जो किसी गुरु से शिक्षा प्राप्त करता है। यह शब्द गुरु-शिष्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भारतीय संस्कृति में ज्ञान और सीखने के संबंध को दर्शाता है। शिष्य का शाब्दिक अर्थ है- "वह जो शिक्षा या उपदेश देने के योग्य हो"। अनेक लोगों का विचार है कि गुरु-शिष्य परम्परा भारत का सर्वोत्कृष्ट वैभव है तथा इसी के कारण भारतभूमि आध्यात्मिक दृष्टि से सामर्थ्यवान एवं 'विश्वगुरु' के पद पर विराजमान है ।

उक्तियाँ

[सम्पादित करें]
  • मधुलुब्ध यथाभ्रंग-पुष्प पुष्पान्तरं ब्रजेत्।
ज्ञान लुब्ध तथा शिष्य-गुरू गुर्वान्तरं ब्रजेत्॥
जिस प्रकार मधुलोभी एक भ्रमर पराग-संचय के लिए अनेक पुष्पों पर भ्रमण करता है उसी प्रकार ज्ञानामिलाषी साधक एक गुरू के देहत्याग के पश्चात् अन्य गुरू की शरण में जाता है।
  • पित्रा प्रताडितः पुत्रः शिष्योऽपि गुरुणा तथा ।
सुवर्णं स्वर्णकारेण भूषणमेव जायते॥
पिता के द्वारा डाँटा गया पुत्र, गुरु द्वारा डाँटा गया शिष्य व सुनार द्वारा पीटा गया सोना , ये सब लोक का आभूषण बनते हैं।

ब्रह्म विद्योपासना तथा तत्व ज्ञान प्राप्ति हेतु उपयुक्त शिष्य के लक्षण

[सम्पादित करें]

1 जो यम-नियमादि साधनों का सतत अभ्यास करता रहता है।

2 जो उत्तम शील-स्वभाव वाला, विनम्र तथा उदारचित्त है।

3 जो मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त है।

4 जो अहंकार शून्य, मितहारी तथा प्रमाद रहित है।

5 जो ईश्वर, गुरू तथा धर्मग्रन्थों पर विश्वास रखता है।

6 जो सांसारिक दुख-सुखों से विचलित न होकर निरन्तर ब्रह्म चिन्तन करता है।

7 जो अपने गुरू के प्रत्येक वाक्य को प्रामाणिक तथा अन्तिम मानते हुए उनपर पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास रखते हुए उनके निर्देशानुसार पूजन- अर्चन में तत्पर रहता है।

8 जो अपना तन, मन तथा धन समर्पित करके अपने गुरू की सेवा में तत्पर रहता है तथा जो भी न्यूनाधिक प्राप्त हो जावे उसी पर संतोष कर लेता है।

9 जो दूसरों की निन्दा तथा अपनी प्रसंशा सुनना पसन्द नही करता है।

10 जो गुरू, इष्टदेवी तथा मंत्र को एक समान समझकर नित्य उपासना करता है।

11 जो अपनी धन-सम्पत्ति, जाति, पद तथा सम्मान का अहंकार नहीं करके सदैव गुरू-भक्ति तथा आत्मचिन्तन में व्यस्त रहता है।

12 जो प्राणिमात्र तथा वृक्ष-लताओं में भी अपने इष्ट को ही देखता है तथा अपनी कामना पूर्ति के लिए एक तृण को भी नहीं तोड़ता है।

13 जो समस्त सांसारिक क्रिया-कर्मों को निष्काम भाव से करते हुए भी जल में कमल की भांति सासांरिक माया-मोह से निर्लिप्त रहकर जीवन व्यतीत करता है।

इन्हें भी देखें

[सम्पादित करें]