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शंकर शरण

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शंकर शरण एक भारतीय समाजशास्त्री हैं। वे NCERT नई दिल्ली से संबद्ध हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म, इस्लाम, कम्युनिज्म और अन्य राजनीतिक विषयों पर अनेक पुस्तकों की रचना की है। वे मूलतः बिहार के जमालपुर के मूल निवासी हैं। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ ये हैं-

  • गांधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग
  • जे एन यू का सच
  • इस्लाम और कम्युनिज्म
  • आध्यात्मिक आक्रमण और घर वापसी
  • साम्यवाद के सौ अपराध
  • भारत में प्रचलित सेक्युलरवाद
  • धर्म बनाम मजहब
  • मुस्लिम सोच
  • गांधी, अहिंसा और राजनीति
  • जिहादी आतंकवाद
  • दोहरे पर मुसलमान और हिन्दू चिन्ता : समस्या और समाधान
  • संघ परिवार की राजनीति : एक हिन्दू आलोचना
  • मैं हिन्दू कैसे बना : एक बौद्धिक आत्मकथा
  • भारत का प्राचीन इतिहास
  • भारतीय इतिहास दृष्टि और मार्क्सवादी लेखन
  • नेहरूवाद : एक वैचारिक समीक्षा
  • बुद्धिजीवियों की अफीम
  • स्वधर्म परधर्म
  • अज्ञेय की इतिहास दृष्टि
  • मुसलमानों की घर वापसी : क्यों और कैसे
  • हिन्दू धर्म और सामी मजहब (श्री अरविन्द की दृष्टि में)
  • धर्म संस्कृति और राजनीति
  • पिछड़ें क्यों मुसलमान
  • राजनीति के उपेक्षित प्रश्न
  • भारत में मार्क्सवादी इतिहास लेखन
  • इस्लाम और मुसलमान
  • Soljenitsin
  • Fifty Years after the Asian Relations Conference

उक्तियाँ

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  • सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं, यह ठीक है। सभी मनुष्यों को समान समझना और सद्बाव रखना चाहिए यह भी उचित है। किंतु इस का अर्थ यह नहीं कि विचारधाराओं, विश्वास, रीति-नीति, राजनीतिक-सामाजिक-कानूनी प्रणालियों आदि के भेद भी नगण्य हैं। धर्म और मजहब का भेद तो और भी बुनियादी है। भारत के ‘धर्म’ का पश्चिम के ‘रिलीजन’ का पर्याय समझना सब से घातक भूल है। इसी से दूसरी भूलों का स्रोत जुड़ता है।
    धर्म आचरण से जुड़ा है, जबकि रिलीजन विश्वास से। धर्म कहता है आपका विश्वास कुछ भी क्यों न हो, आपका आचरण नीति, मर्यादा, विवेक के अनुरूप होना चाहिए। यही धर्म है। इसी लिए भारतीय समाज में ऐसी अवधारणाएं और शब्द हैं जिनके लिए पश्चिमी भाषाओं में कोई शब्द नहीं है। जैसे, राज-धर्म, पुत्र-धर्म, क्षात्र-धर्म, आदि। दूसरी ओर, आप का आचरण कुछ भी क्यों न हो, यदि आप कुछ निश्चित बातों पर विश्वास करते हैं तो आप ईसाई या मुस्लिम रिलीजन को मानने वाले हुए। इसीलिए उन के बीच रिलीजन को ‘फेथ’ भी कहा जता है। बल्कि फेथ ही रिलीजन है।
    मिथिलांचल के गंगातटीय क्षेत्र में लोकोक्ति है, “बाभन बढ़े नेम से, मुसलमान बढ़े कुनेम से”। इसे जिस अर्थ में भी समझें, पर अंततः यह धर्म और मजहब (रिलीजन) की पूरी विचार-दृष्टि के विपरीत होने का संकेत है। इस में कोई दुराग्रह नहीं है, वरन सामान्य हिन्दू का सदियों का अवलोकन है। ... विडंबना यह है कि शिक्षित हिन्दू इस तथ्य से उतने अवगत नहीं हैं। वह नहीं जानते कि रिलीजन और धर्म का बुनियादी भेद मात्र आध्यात्मिक ही नहीं – अपनी सामाजिक, वैचारिक, नैतिक, राजनीतिक निष्पत्तियों में भी बहुत दूर तक जाता है।[]
  • हिन्दू उदारता का प्रयोग उसी के विरुद्ध किया जाता है। उस की दुर्गति इसलिए होती है कि हिन्दू शिक्षित वर्ग, विशेषकर इस का उच्चवर्ग अपनी परिकल्पनाओं को दूसरों पर भी लागू मान लेता है। वह रटता है कि सभी धर्म एक समान हैं; किंतु कभी जाँचने-परखने का यत्न नहीं करता कि क्या दूसरे धर्मावलंबी, उन की मजहबी किताबें, उन के मजहबी नेता, निर्णयकर्ता भी यह मानते हैं? यदि नहीं, तो ऐसा कहकर वह अपने आपको निहत्था क्यों कर रहा है?[]
  • ऐसे प्रश्नों पर समुचित विचार करने में एक बहुत बड़ी बाधा सेक्युलरवाद है। इस का प्रभाव इतना है कि इस झूठे देवता को पूजने में कई हिंदूवादी भी लगे हुए हैं। यह किसी विषय को यथातथ्य देखने नहीं देता, चाहे वह इतिहास, दर्शन, राजनीति हो या अन्य समस्याएं। सेक्यूलर समझी जाने वाली अनेक धारणाएं वास्तव में पूर्णतः निराधार हैं। जैसे, यही कि ‘सभी धर्मों में एक जैसी बातें हैं’ या ‘कोई धर्म हिंसा की सीख नहीं देता’। इसे बड़ी सुंदर प्रस्थापना मानकर अंधविश्वास की तरह दशकों से प्रचारित किया गया। मगर क्या किसी ने कभी आकलन किया कि इस से लाभ हुआ है या हानि? सच्चाई से विचार करें तो विश्वविजय की नीति रखने वाले, संगठित धर्मांतरणकारी सामी (Semitic) मजहबों को सनातन हिंदू धर्म के बराबर कह कर भारत को पिछले सौ साल से निरंतर विखंडन के लिए खुला छोड़ दिया गया है।[]
  • कानून के समक्ष और सामाजिक व्यवहार में विभिन्न धर्मावलंबियों की समानता एक बात है। किंतु विचार-दर्शन के क्षेत्र में ईसाइयत, इस्लाम, हिंदुत्व आदि को समान बताना खतरे से खाली नहीं। इस से अनजाने ही भारतीय ईसाइयों को अपने देश की संस्कृति, नियम, कानून आदि की उपेक्षा कर, यहाँ तक कि घात करके भी, दूर देश के पोप के आदेशों पर चलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसी तरह, भारतीय मुसलमानों को भी दुनिया पर इस्लामी राज का सपना देखने वाले इस्लामियों के हवाले कर दिया जाता है। केवल समय और परिस्थिति की बात रहती है कि कब कोई प्रभावशाली मौलाना दुनिया के मुसलमानों का आह्वान करता है, जिस में भारतीय मुस्लिम भी स्वतः संबोधित होंगे।[]
  • दुनिया में एक भी व्यक्ति ने स्वेच्छा से इस्लाम नहीं स्वीकारा हैं, भारत क्या, अरब में भी नहीं।
  • कुरान मूलतः एक राजनीतिक दस्तावेज है, किन्तु लोग इसे वैसा ही समझ बैठते हैं जैसा दूसरे धर्मग्रन्थों को।
  • कुरान का दो-तिहाई भाग गैर-मुसलमानों के बारे में है, और शेष एक तिहाई में कुछ भी अच्छी बात नहीं कही गयी है।
  • न केवल हिन्दू, बल्कि मुसलमान भी, नहीं जानते कि कुरान में वास्तव में क्या कहा गया है।
  • कुरान के जितने भी अनुवाद हैं उनमें मूल अरबी अर्थों को बहुत नरम करके, और कभी-कभी बदलकर, प्रस्तुत किया गया है। ऐसा इसलिये किया गया है कि पढ़ने वालों को खटका न लगे।
  • भारत की भाषा नीति ने हिंदी को नुकसान पहुंचाया, न कि स्टालिन या ठाकरे भाइयों ने।[]
  • मुस्लिमों को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए। इस्लाम, कुरान या हदीस की सभी बातें न मानें।
  • इस्लाम के अनुसार अच्छा मुसलमान वह है जो प्रोफेट के सुन्ना का पालन करता है। यही एकमात्र निर्धारक है। यदि इस्लाम को जानना है तो सदैव मुहम्मद की ओर देखें, न कि किसी नेता, विद्वान या मौलाना को। तभी आपको सत्य मिलेगा। वरना धोखे खाने की ही पूरी संभावना है।… इस्लाम द्वारा दूसरों के साथ सह-अस्तित्व की सारी बातें सदैव अस्थाई होती हैं।… इसलिए पहले इस्लामी सिद्धांत व इतिहास जान कर ही सच्चाई समझे। यह अब कठिन नहीं रहा। तभी जरूरी है कि इस्लाम के सिद्धांत और व्यवहार के इतिहास को पूरी तरह जानने की व्यवस्था करना अनिवार्य कर्तव्य है। इस्लाम, सह-अस्तित्व के लिये सीधी चुनौती है। इस्लाम के साथ सामंजस्य का मतलब है उस की ओर से आती रहने वाली क्रमशः अंतहीन माँगें (डॉ. अंबेदकर ने कहा था, ‘मुसलमानों की माँगे हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं’) पूरी करते जाना। प्रोफेट मुहम्मद अपनी माँगों में कभी नहीं रुके,जब तक कि उन की १००% माँगें पूरी नहीं हो गईं। वही मुसलमानों के आदर्श हैं। इसलिए काफिरों के लिए कोई आसानी का रास्ता नहीं। उन्हें समझ लेना होगा कि इस्लाम उस एक चीज – जिहाद – को कभी नहीं छोड़ेगा, जिस से उसे आज तक सारी सफलता मिली। इस्लाम की सारी सफलता राजनीतिक समर्पण की माँग, दोहरेपन और हिंसा पर आधारित है। बेचारा काफिर जो बदलना चाहता है वह यही चीज है – हिंसा, दबाव, हुज्जत, और राजनीति। जबकि काफिर से समर्पण की माँग करना और हिंसा करना, यही इस्लाम की सफलता का गुर रहा है। अतः हिंसा, दबाव, हुज्जत, और माँगें कभी नहीं रुकने वाली, क्योंकि वह १४०० वर्षों से काम कर रही हैं। आज तो वह पहले किसी भी समय से अधिक काम कर रही हैं!

भारतीय बौद्धिकता को धिम्मी वाद की दीमक

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भारतीय मीडिया में एक ही तरह की घटनाओं पर, मुस्लिम या हिन्दू मामलों में दोहरे मानदंड अपनाने की व्याख्या एक ही अवधारणा कर सकती है – ‘जिम्मी' मानसिकता। अफ्रीकी मूल की लेखिका "बात ये’ओर" ने इस पर गंभीर पुस्तक लिखी है, Islam and Dhimmitude (‘इस्लाम एंड जिम्मीच्यूड’)। मुख्यतः अरबी पृष्ठभूमि पर लिखी इस पुस्तक से वह मानसिकता ठीक-ठीक समझी जा सकती है, जिस से अधिकांश भारतीय नेता, बुद्धिजीवी ग्रस्त हैं।

अरबी शब्द ‘जिम्मा' का अर्थ है करार, जिस से जिम्मेदारी शब्द भी बना है। वह करार जो सदियों पहले इस्लाम द्वारा अपने राज्य में कुछ ईसाइयों, यहूदियों को जिंदा रहने देने की शर्त के रूप में एकतरफा तय किया गया था। (हालाँकि वह छूट बौद्धों, मूर्तिपूजकों के लिए नहीं थी – उन्हें इस्लाम या मौत के बीच एक ही चुनना था।) खलीफा उमर के शासन में, सन् 634 के आस-पास, जिम्मियों संबंधी बारह नियम सूत्र-बद्ध हुए थे। इस की मूल बात है कि जिम्मी लोग इस्लाम और मुसलमानों को श्रेष्ठ मानते हुए, उन्हें जजिया टैक्स और नजराने देते हुए नीच लोगों की तरह रहेंगे। इस प्रकार, इस्लामी अधीनता में लंबे समय रहते गैर-मुस्लिमों में जो हीन-भाव उन का स्वभाव बन जाता है, उसे ही जिम्मी मानसिकता कहा गया है। इस की विशेषता यह है कि इस्लामी शासन से मुक्त हो जाने पर भी जिम्मियों के विचार-व्यवहार में इस्लाम के प्रति विशेष आदर-भाव आदतन बना रहता है।

उसी भाव में हमारे पत्रकारों, बुद्धिजीवियों का दोहरा व्यवहार समझा जा सकता है। भारत में छः सौ वर्ष तक इस्लामी शासन रहने के कारण हिन्दुओं, विशेष कर उच्चवर्गीय हिन्दुओं में जिम्मी भाव जम कर बैठ गया, जिस से वे मुक्त नहीं हुए हैं।

उसी का समानांतर, उच्च भाव मुस्लिमों में भी है। वे सदैव अपने लिए हर चीज कुछ विशेष, कुछ ऊपर, अधिक चाहते हैं। याद करें, जिन्ना ने मुसलमानों के मालिक कौम (‘मास्टर रेस’) होने के दावे से अलग पाकिस्तान माँगा था। आखिर मालिक और नौकर बराबरी से कैसे रहते, जो स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र में होता!

वह मानसिकता आज भी पाकिस्तान में, और भारत के मुसलमान नेताओं में भी है। वे ऐसे विशेषाधिकार चाहते हैं, जो दूसरों को न हों। जैसे, वे ‘काफिरों’, ‘मूर्तिपूजकों’, राष्ट्र-गान, आदि की हर साँस में निंदा करेंगे, क्योंकि यह उन का मजहबी विश्वास है। किंतु हिन्दुओं, बौद्धों, जैनों, आदि के विश्वास कुछ भी हों, वे इस्लामी कुरीतियों और ‘शरीयत’ की आलोचना क्या, उपेक्षा तक नहीं कर सकते। ऐसा होते ही मुस्लिम नेता धमकियाँ देने लगते हैं। जब चाहे किसी की हत्या का आवाहन कर सकते हैं। आवाहन करने वाला मंत्री पद पर क्यों न हो, उसे कुछ नहीं कहा जाता! मीडिया, न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग, सब बगलें झाँकने लगते हैं। ध्यान दें, कोई तर्क-वितर्क या विचार-विमर्श नहीं, सदैव धमकी, हिंसा की भाषा का प्रयोग होता है। यह सब मुसलमानों की ‘भावना’ के नाम पर स्वीकार किया जाता है। मानो मुस्लिम भावनाएं अन्य समुदायों, संविधान, कानून या सामान्य न्याय-बुद्धि और विवेक से ऊँची चीज हों! यानी, इस्लाम की वरिष्ठता की स्वीकृति। इस में डर भी समाहित है। मुस्लिम नेता इसे जानते हैं, और जम कर उपयोग करते हैं। अभी ईद के असर पर ओवैसी ने यही कहा। पर हमारे सेक्यूलर नेता, पत्रकार और प्रोफेसर, सब यशपाल की कहानी में फूलो की तरह अपने कुरते से इज्जत ढाँकने का विफल प्रयास करते हैं। हमारे मीडिया और राजनीति में जिम्मी मानसिकता सर्वत्र फैली हुई है। कश्मीर से हिन्दुओं को सामूहिक रूप से मार कर, अपमानित, बलात्कृत, धमका कर भगा देने के बाद उन की छोड़ी गई संपत्ति – घर, दुकान, खेत आदि – की खुली लूट-बाँट हुई। उन संपत्तियों को ‘माले गनीमत’ कहकर हिन्दुओं द्वारा बेची जाने वाली संपत्ति की कीमत कौड़ी के मोल लगी। किंतु उन घटनाओं पर कभी कोई रिपोर्ट, तस्वीरें, इंटरव्यू आदि नहीं आए। ‘फ्रंटलाइन’, ‘ई.पी.डबल्यू’, ‘एन.डी.टी.वी’., ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, किसी भी मीडिया महारथियों से पूछ देखिए। उन हिन्दू मकानों, खेतों, दुकानों की गिनती या हश्र पर उन्होंने कभी कोई स्टोरी की? कोई आँकड़ा, कोई तस्वीर है उन के पास? वर्षों सामूहिक संहार का शिकार होने पर भी उन लाखों कश्मीरी हिन्दुओं में से कोई वह ‘आइकन’ न बना, जैसे गुजरात का वह मुस्लिम दर्जी युवक, कुतुबुद्दीन अंसारी, जो हाथ जोड़े, आँखों में आँसू भरे, संभवतः किसी से रक्षा की याचना कर रहा है। 2002 की वह तस्वीर आज भी इस्तेमाल हो रही है। अभी असम विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने उस का उपयोग किया। किन्तु, उसी वेदना, दीनता और असहायता से भरे हजारों हिन्दू अंतहीन बार कश्मीर, केरल, असम, बल्कि अब तो उत्तर प्रदेश में भी, सामूहिक संहार, उत्पीड़न का शिकार हुए हैं। उन में से किसी की तस्वीर वैसी प्रचारित क्यों न हुई? क्या इसीलिए नहीं, क्योंकि उसे समान्य, मैटर ऑफ कोर्स, लिया जाता है?

कुतुबुद्दीन अंसारी के समानांतर किसी कश्मीरी पंडित की दयनीय तस्वीर का गायब रहना, जिम्मीवाद का ही एक उदाहरण है। इस्लामी आतंक के सामने किसी हिन्दू की दुर्दशा सदियों से यथावत् सामान्य घटना की तरह ली जाती है।

क्षमा कौल का ‘दर्दपुर’ या कुंदनलाल चौधरी का कविता-संग्रह ‘ऑफ गॉड, मेन एंड मिलिटेंट्स’ पढ़कर देखें। उस गुजराती मुस्लिम युवक, कुतुबुद्दीन अन्सारी की आँखों की वेदना आपको क्षणिक और हल्की जान पड़ेगी! क्योंकि असंख्य हिन्दू कुतुबुद्दीन उसी वेदना के साथ बचे नहीं, सपरिवार मारे गए! अपमान और जिल्लत के साथ, यहाँ तक कि कुछ मामलों में धर्मांतरित होकर मुसलमान बनने के बावजूद, उन की बहू-बेटियों को बलात्कार के बाद लोमहर्षक रूप से काट कर फेंक दिया गया। इस तरह कश्मीर हिन्दुओं से खाली हुआ। जैसे, पहले लाहौर, मुलतान और ढाका से हुआ था।

यदि कोई तर्क देने को अधीर हों कि ‘जिम्मी वाली बातें पुराने समय की है’, तो दो बातों पर ध्यान दें। प्रथम, इस्लामी मूल किताबों, जिन से ऐसे कायदे-कानून बने हैं, को आज भी पत्थर की लकीर माना जाता है। सैयद शहाबुद्दीन या रफीक जाकरिया जैसे आधुनिक प्रबुद्ध मुस्लिम भी यही दुहराते रहे हैं कि उन किताबों का एक शब्द भी अमान्य नहीं किया जा सकता। दूसरे, ‘पुराने समय’ वाला तर्क भी मुस्लिम प्रवक्ता केवल भारत जैसे देश में देते हैं जहाँ सभी इस्लामी मान्यताओं की माँग करना उन्हें अभी लाभप्रद नहीं लगता। अन्यथा, मुस्लिम देशों में आज भी सिद्धांत और व्यवहार वही है।

आज के सऊदी विद्वान अब्दुल रहमान बिन हम्माद अल-उमर ने अपनी पुस्तक ‘द रिलीजन ऑफ ट्रुथ’ में लिखा, ‘‘मुस्लिम शासन वाले किसी देश में किसी गैर-मुस्लिम को अपने विश्वास की आजादी है… किन्तु उसे समर्पित भाव से सदैव मुसलमानों को आदर, नजराना देना होगा, इस्लामी कानूनों के सामने आत्मसमर्पण करना होगा, और अपने बहुदेव-पंथी रिवाजों का पालन सार्वजनिक रूप से नहीं करना होगा।’’ यह मूल इस्लामी मान्यता ही है, जिसे छोड़ा नहीं गया है। केवल इंडोनेशिया, तुर्की जैसे देश जो शरीयत कानूनों से नहीं चलते, वहाँ स्थिति भिन्न है।

इस प्रकार, उन जिम्मी कानूनों के प्रसंग में ही भारत में आज भी उन आपत्तियों को समझा जा सकता है, जब भारत में दशहरे या रामनवमी अवसरों पर मुस्लिम बस्तियों के पास हिन्दू जुलूसों, ढोल, कीर्तन आदि पर की जाती हैं। यह आपत्तियाँ उस गुजरे मुगल शासन दौर के जिम्मी कानूनों के पालन की जिद है जिस के तहत हिन्दू सार्वजनिक रूप से अपने पर्व-त्योहार नहीं मना सकते थे! अतः रामनवमी जुलूस पर आपत्ति का भाव यह है कि मुगल काल वाले बलात् कानून हिन्दू समाज इस स्वतंत्र, लोकतांत्रिक भारत में भी यथावत स्वीकारता रहे। डॉ. अंबेदकर ने भी लिखा है कि अफगानिस्तान, ईरान, आदि मुस्लिम देशों में मस्जिद के बाहर गाने-बजाने पर आपत्ति नहीं होती, किन्तु भारत में होती है तो केवल इसलिए कि हिन्दुओं को वह अधिकार नहीं देना है। अंबेदकर के अनुसार, यह मुगलिया राज के अहंकार के अवशेष हैं, कोई इस्लामी सिद्धांत नहीं।

स्वतंत्र भारत के हिन्दू पत्रकार वह दावा स्वीकारते हैं! मुस्लिम इलाकों से रामनवमी के जुलूस नहीं जाने दिए जाते, जबकि रमजान में कश्मीर में किसी हिन्दू या ईसाई को भी दिन में सार्वजनिक रूप से खाने-पीने नहीं दिया जाता। सेक्यूलर मीडिया को इस में कुछ गलत नहीं लगता।

इसीलिए वह इस्लामी बयानों, आपत्तियों, कांडों, मुद्दों, व्यक्तियों, देशों, संगठनों पर कभी वह मानदंड लागू नहीं करता जो गैर-इस्लामी माँगों, इच्छाओं, देशों, संगठनों, नेताओं पर करता है। यह एक रोग है। इसे समझें, सही नाम से पुकारें। रोग के लक्षण पहचानें, तभी किसी उपचार की आशा हो सकती है।

इन्हें भी देखें

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