राजा भोज
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राजा भोज (राज्यकाल 1010 ई० – 1055 ई०) परमार राजवंश के राजा थे । उनका साम्राज्य मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में केन्द्रित था। उनकी राजधानी धारा-नगरी थी जो वर्तमान समय में 'धार' नाम से प्रसिद्ध है।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालंकारभूतो गतः।
- सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यांतकः।।
- अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते ।
- नैकेनापि समं गता वसुमती नूनं त्वया यास्यति॥ -- भोज प्रबन्ध (भोज द्वारा मुंज को लिखे पत्र में)
- सतयुग के भूषण स्वरूप राजा मान्धाता चले गये, समुद्र पर पुल बाँध कर रावण को मारने वाले रामचन्द्रजी भी आज कहाँ है ? और युधिष्ठिर आदि जैसे राजा भी स्वर्ग को सिधार गए परन्तु यह पृथ्वी किसी के भी साथ नहीं गयी । हे राजन! लेकिन आपको देख के ये जान पड़ता है कि ये पृथ्वी आपके साथ जायेगी।
- प्रियो मेयो भवेन्मुर्खःसपुराहहिरस्तुमे ।।
- कुम्भकारोपि यो विद्धवान सतिष्ठतु पुरेमम ।।
- (राजा भोज का कहना था कि) अगर कोई मेरा प्यारा भी हो, लेकिन मूर्ख हो, तो वह मेरे राज्य में ना रहें, किंतु अगर कुम्हार भी हो, ओर वह विद्धवान हो, तो निःसंदेह मेरे राज्य में रहें।
राजा भोज के बारे में उद्धरण
[सम्पादित करें]- अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
- पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
- आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पण्डित आदृत हैं।
जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -
- अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती।
- पण्डिताः खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
- आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।
- काव्यं करोमि न हि चारुतरं करोमि
- यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
- भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
- हे साहसांक कवयामि वयामि यामि।
- हे राजन !! में काव्य करती हूं, लेकिन अत्युत्तम काव्य नही करती, में यत्न से कपड़े बुनकर अपनी जिविका चलाती हूँ, हे साहशांक महाराज, लेकिन में काव्य ओर जुलाहापन दोनो तरह की विद्या जानती हूं, क्या में आपके नगर में रहने लायक हूँ ??
- (महाराज भोज में उस कोलिन को 5 लाख रुपये दिए, ओर कहा ,की तुम ब्राह्मण से पांच गुणा ज़्यादा श्रेष्ठ हो !! )
- कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली !
- भारतीय राजाओं में परमार राजा भोज अद्धितीय है। उनकी राजधानी धारानगरी (धार) होने से घारेश्वर और राज्य का केन्द्र मालवा होने से मालवाधीश भी कहलाते थे। वे परम विद्धान, परम शक्तिशाली और सुयोग्य तथा लोकप्रिय राजा के रूप में अपने समय ही विख्यात हो गये थे। उनके ताम्रपत्र, शिलालेख तथा मुर्तिलेख प्राप्त होते है। अपने असामान्य कर्मो के कारण राजा भोज अपने युग में ही कथा कहानियां के नायक के रूप में प्रसिद्ध होने लगे थे। बाद में तो महाराज विक्रमादित्य के समान महाराज भोज भी भारत के ऐसे लोकनायक के रूप में मान्य हो गये कि उनकी कहानियाँ न केवल भारतीय जनता में, लोक में प्रसिद्ध हो गयी थी अपितु लंका, नेपाल, तिब्बत, मंगोलिया सहित कई देशो में भी फैल गयी थी। मंगोली भाषा मे ‘अराजि बुजि’ पुस्तक राजा भोज सम्बन्धी है। राजा भोज की ‘चाणक्यमाणिक्य’ पुस्तक का एक तिब्बती रूप भी प्राप्त होता है। राजा भोज इतिहास पुरुष होते हुए भी मिथक पुरुष हो गये। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। वे अपने अपने युग के मित्र राजाओं के समान शत्रु राजाओं के भी अपने विविध वर्णी उदात्त गुणों के कारण आदर्श बन गये थे। यही नहीं सदियों तक परवर्ती अनेक राजा भी स्वयं को लघु भोजराज, अपर भोजराज, नव भोजराज आदि कहने में गौरव का अनुभव करते रहे है। राजा भोज के अभिलेख 1010 से 1034 ई. तक प्राप्त होते है। -- "राजा भोज" पुस्तक के लेखक एवं राजा भोज पर गहन शोध और अध्ययन कर चुके डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित