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यज्ञ

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यज्ञ शब्द का अनेक अर्थों में उपयोग होता है।

यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्रतीक है । हिन्दू धर्म में जितना महत्व यज्ञ को दिया गया है उतना ओर किसी को नहीं दिया गया । हमारा कोई भी कार्य इसके बिना पूरा नहीं होता । जन्म से मृत्यु तक सभी संस्कारों में यज्ञ आवश्यक है । हमारे धर्म में वेदों का जो महत्व है वही महत्व यज्ञों को भी प्राप्त है क्योंकि वेदों का प्रधान विषय ही यज्ञ है । वेदों में यज्ञ के वर्णन पर जितने मंत्र हैं उतने अन्य किसी विषय पर नहीं । यदि यह कहा जाये कि यज्ञ वैदिक धर्म का प्राण है तो इसमें भी अत्युक्ति नहीं । वैदिक धर्म यज्ञ प्रधान धर्म है । यज्ञ को निकाल दें तो वैदिक धर्म निष्प्राण हो जायेगा ।

उक्तियाँ

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स्वर्गकामो यजेत् दर्शपूर्णमासाभ्ययां स्वर्ग कामा यजेत् ।। मीमांसा- ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत् ।। शाबर भाष्यस्वर्ग की कामना इच्छा वाला पुरुश दर्शपूर्णमास यज्ञ करे ।। स्वर्गकाम पुरुष ज्योतिष्टोम यज्ञ करे ।। यह वाक्य श्री शाबर स्वामी ने मीमांसा का भाष्य करते हुए- द्रव्याणां कर्मसंयोगे गुणत्वेनाभिसम्बंधः ।(मीमा.अ.6पा.1सू.1)

  • स्वर्गकामो यजेत् । -- शाबरभाष्य
स्वर्ग की इच्छा वाला पुरुष यज्ञ करे।
  • दुष्टस्य दण्डः सुजनस्य पूजा न्यायेन कोषस्य च संप्रवृद्धिः ।
अपक्षपातोऽर्थिषु राष्ट्ररक्षा पञ्चैव यज्ञाः कथिता नृपाणाम् ॥ -- अत्रिसंहिता ; द्वात्रिंशत्पुत्तलिकासिंहासनम् (=सिंहासनबत्तीसी)
दुष्ट को दण्ड, सज्जन की पूजा, न्यायपूर्वक राजकोष की वृद्धि करना, न्याय करते समय अभ्यर्थियों से पक्षपात न करना और राष्ट्र की रक्षा करना - ये राजाओं के लिये पाँच यज्ञ हैं।
  • क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञश्च पुत्रिकाः।
क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमया‌विष्टितं जगत्॥ -- वाल्मीकि रामायण
क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है। क्षमा यश है, क्षमा ही धर्म है। यह जगत् क्षमा पर ही टिका हुआ है।
( कुशनाभ की पुत्रियों के नैतिक आचरण पर वायुदेव ने उनको कुबड़ी हो जाने का शाप दिया था । यद्यपि वे वायुदेव को प्रतिशापित कर सकतीं थीं, तथापि उन्होंने वायुदेव को क्षमादान दिया । अपनी पुत्रियों के इस सदाचरण पर कुशनाभ ने उप्परोक्त श्लोक से क्षमागुण को गौरान्वित किया । )
  • सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ -- गीता ३-१०[]
प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।
  • यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म -- शतपथ ब्राह्मण
यज्ञ ही संसार का सर्वश्रेष्ठ शुभ कार्य है।
  • नाग्निहोत्रोत्परो धर्मः -- कूर्म पुराण
अग्निहोत्र से बढ़कर और कोई धर्म नहीं।
  • यज्ञं जनयन्तु सूरयः -- ऋग्वेद 10।66।2
हे विद्वानो, संसार में यज्ञ का प्रचार करो।
  • यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः -- अथर्ववेद
यज्ञ ही समस्त विश्व ब्रह्माण्ड का मूल केन्द्र है।
  • अनाहूतोऽध्वरंव्रजेत् -- याज्ञवल्क्य
बिना बुलाये भी यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए।
  • अयज्ञियो हत वर्चो भवति -- अथर्ववेद
यज्ञ रहित मनुष्य का तेज नष्ट हो जाता है।
  • यज्ञोऽयं सर्व काम धुक् -- अंगिरा
यह यज्ञ सब कामनाएं पूर्ण करने वाला है।
  • प्राचं यज्ञं प्रणतया सस्वायः -- ऋग्वेद 10।101।2
  • प्रत्येक शुभ कार्य को यज्ञ के साथ आरम्भ करो।
  • ईजानाः स्वर्गं यान्ति लोकम् -- अथर्व 18।4।2
यज्ञ करने वाले को स्वर्ग सुख प्राप्त होता है।
  • सर्वेषा देवानां आत्मा यद् यज्ञः । -- शतपथ 13।3।2।1
सब देवताओं की आत्मा यज्ञ ही है।
  • अतप्त तनूर्न तदामो अश्नुते । -- ऋग्वेद 9।83।1
जो तप नहीं करता वह सुख नहीं पाता।
भद्रो नो अग्नि राहुतः -- यजु 15।38
यज्ञ में दी हुई आहुतियां कल्याणकारक होती हैं।
  • असंस्तिोथ वा एष यज्ञः -- तैत्तिरीय ब्राह्मण 1।4।9
यज्ञ का पुण्य फल कभी नष्ट नहीं होता।
  • मा सुनोतेति सोमम् -- ऋग्वेद 2।30।7
यज्ञानुष्ठान की महान् उपासना बन्द न करो।
  • सम्यञ्चो अग्निं सपर्यत -- अथर्व 3।30।6
सब को मिलकर यज्ञानुष्ठान करना चाहिये।
  • अग्ने होत्रिणे प्रणुदे सपत्नाम् -- अथर्व 9।2।6
यज्ञ करने से शत्रु नष्ट हो जाते हैं।
  • सप्रेद्धो अग्निजिंह्वाभि रुदेतु हृदयादधि -- अथर्व
जो हवन करते हैं उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है।
  • यज्ञा कल्याण हेतवः -- विष्णुपुराण
यज्ञ से सबका कल्याण होता है।
  • कस्मै त्व विमुञ्चति तस्मै त्वं विमुञ्चति -- यजुर्वेद
जो यज्ञ को त्यागता है, उसे परमात्मा त्याग देता है।
  • यज्ञादिभिर्देवाः शक्ति सुखदीनाम्
यज्ञ से देवत्व, शक्ति, सुख आदि सम्पत्तियां मिलती हैं।
  • यज्ञेषु देवास्तुष्यन्ति -- कालिका पुराण
यज्ञों के द्वारा देवता सन्तुष्ट होता है।
  • अग्निहोत्रात्परंनान्यत्पवित्रमिह पठयते । -- पद्म पुराण
अग्निहोत्र से बढ़कर पवित्र कर्म संसार में अन्य नहीं है।
  • निष्कामः कुरुते यस्तु स परब्रह्म गच्छति । -- मत्स्यपुराण
निष्काम भाव से हवन करने वाले को निश्चय ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
  • सर्व बाधा निवत्यर्थ सर्वान् देवान यजंत बुधः । -- शिव पुराण
सभी बाधाओं की निवृत्ति के लिये, बुद्धिमान पुरुषों को देवताओं की यज्ञ द्वारा पूजा करनी चाहिये।
  • सर्व सपापंतरतियोऽश्चमेघं यजेतवै । -- पद्म पुराण
सब पापों में रत व्यक्ति भी यज्ञ करने से पाप मुक्त हो जाता है।