मैं गुरु पे लिखू उस काबिल हुआ नही हु

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मै आज कोई कविता नहीं , ज़िन्दगी की सच्चाई लिख रहा हु | मुझे इंसान बनाने वालो के , योगदान लिख रहा हु ||

राह पिता ने दिखाया , तो चलना माँ ने सिखाया है | अच्छे बुरे का फर्क देखो , क्या बखूबी सिखाया है ||

भाई ने लिखना सिखाया , तो बहन ने पढ़ना सिखाया है | मुझ जैसे जाहिल को , उठने - बैठने का सलीका सिखाया है ||

किताबों से जो उलझा , तो शिक्षक ने हाथ थामा है | मेरी गलतियों पे ना जाने , कितनी दफा फटकार लगाया है ||

इन् फटकारो ने , आज मुझे इस काबिल बनाया है | या एषु सुप्तेषु जाग्रति , का मुझे पाठ पढ़ाया है ||

मुझे माफ़ करना मै आज कोई कविता नहीं लिख सकता क्यूंकि...

मैं गुरु पे लिखू , मैं उतना बड़ा हुआ नही हु | चंद लफ़्ज़ों में समेट दू , मैं अभी उस काबिल हुआ नही हु ||