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मीरा बाई

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मीरा बाई (1498 – 1547) भारत की एक भक्ति युगीन संत, भक्त कवयित्री और कृष्ण की परम भक्त थीं। वह राजस्थान के मेड़ता राजघराने में जन्मी थीं और कृष्ण प्रेम में लीन होकर उन्होंने कई भक्ति पदों की रचना की जो आज भी लोक गीतों और भजनों के रूप में गाए जाते हैं।


"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"
(कृष्ण के प्रति उनका पूर्ण समर्पण दर्शाता है)

"हरि बिना मैं रही न सकूं, मोहे पीर सतावे।"
(कृष्ण से दूर होने की वेदना)

"प्रेम दीवानी मैं नाम की, हरि गुण गाऊं रात-दिन।"
(कृष्ण-प्रेम में दीवानी मीरा निरंतर भजन गाती हैं)

"जाको प्रिय हरि रंग लाग्यो, ये तन माया छोड़े।"
(जिसे कृष्ण का रंग लग गया, वह संसार की माया छोड़ देता है)

"मैं तो सांवरिया के रंग रांची।"
(मीरा स्वयं को कृष्ण रंग में रंगी हुई बताती हैं)

"मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरि दरस बिन नाहिं सुखु पावै।"
(मीरा को केवल कृष्ण दर्शन में ही सच्चा सुख मिलता है)

"सांझ सकारे मांगू तोहे, तू जानत है मूरख मैया।"
(मीरा कृष्ण से अपने सच्चे प्रेम को जताती हैं)

"लागी लगन मीराँ हो गई मगन, वो तो गइँ हरि के रंग रँगी।"
(कृष्ण प्रेम में रंगी मीरा अपने आप को खो देती हैं)

"छोटे जोगी बड़ा जोगी, जोगी जनम गँवायो।"
(मीरा का उपदेश कि केवल वस्त्र पहन लेने से कोई सच्चा योगी नहीं बनता)

"दरसन दीजो गोविंद, मोहे दरसन दीजो गोविंद।"
(मीरा की कृष्ण से प्रार्थना – दर्शन दो)

  • टाइपिंग बाबा (मीरा बाई के पद)
  • विभिन्न लोक भजन संग्रह
  • ऐतिहासिक भक्ति साहित्य

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