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महाशय धर्मपाल

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महाशय धर्मपाल का जन्म 27 मार्च 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। इनके पिता का नाम महाशय चुन्नीलाल और माता का नाम चन्नन देवी था। देश के विभाजन के बाद ये 1947 में भारत आ गए। उस समय इनके पास केवल 1500 रुपये थे। इन्ही पैसे में से 650 रुपये में इन्होने एक तांगा खरीदी और नयी दिल्ली स्टेशन के पास चलाने लगे।

‘महाशय दी हट्टी’ के नाम से मिर्च-मसालों का कार्य प्रारंभ किया। 1969 में कंपनी ने अपनी प्रयोगशाला भी स्थापित की । कंपनी का कार्यालय लंदन में भी है। एक फैक्ट्री दुबई में है। एम०डी०एच।० के 50 से ज्यादा उत्पाद फ्रांस, यूरोप, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, ईरान और अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं। गुडगाँव, नागौर, राजस्थान, अमृतसर, गाजियाबाद व अन्य कई शहरों में फैक्ट्री आफिस स्थापित किए हैं। उनकी व्यावसायिक बुद्धि बेमिसाल है। इनका जीवन संघर्ष और सफलता का एक बेजोड़ नमूना है।

  • यदि इस समय हमने देश, समाज, धर्म एवं संस्कृति रक्षा का कार्य नहीं किया तो आने वाला समय संकट का हो सकता है।
  • सद्ज्ञान और अच्छी तालीम से मेरा मतलब केवल बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करने से नहीं, बल्कि ज्ञान के उस पक्ष से है जो चरित्र निर्माण में सहायक हो। भले, बुरे में फर्क समझने की क्षमता पैदा कर सके और जिसके सहारे हम जीवन पथ पर अग्रसर होकर अपना, अपने कुल-खानदान का और राष्ट्र का नाम रोशन कर सकें।
  • हमें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि एकांगी विकास से सुख-शांति हासिल कर पाना नामुमकिन है। इसके लिए व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास जरूरी है और यह सद्ज्ञान से ही मुमकिन हो सकता है।
  • अन्न दान, वस्त्र दान और ज्ञान दान सबसे बढ़ कर है।
  • आदमी करोडपति हो सकता है लेकिन जिसमें अपने माँ-बाप और बुजुर्गों का आशीर्वाद नहीं लिया, उनके मन को कभी शांति नहीं मिल सकती।
  • रूपये-पैसे का दान करने पर एक निश्चित अवधि के बाद उसका महत्व नहीं रह जाता।
  • कामयाबी और काबिलियत का आपस में गहरा ताल्लुक है।
  • पेट के लिए मेहनत और ईमानदारी से किया गया कोई काम बुरा नहीं होता।
  • सद्ज्ञान ही सबसे बड़ी सम्पत्ति और सद्ज्ञान का दाने ही सबसे बड़ा दान है।
  • व्यक्तित्व को निखारने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ज्ञान की होती है। सद्ज्ञान, अच्छी तालीम के बल पर ही हम काबिल बन सकते हैं कि अपने अरमानों को आकार दे सकें।