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भाष्य

विकिसूक्ति से

भाष्य अर्थात किसी सूत्रग्रन्थ (संक्षेप में लिखे गये ग्रन्थ) की व्याख्या करना।

उक्तियाँ

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  • पदच्छेदः पदार्थोक्तिर् विग्रहो वाक्ययोजना।
आक्षेपेषु समाधानं व्याख्यानं पञ्चलक्षणम् ॥ -- महीधर
  • सूत्रग्रन्थों को पढ़ने के लिये पराशर पुराण में छः नियम और उनके क्रम का निरूपण निम्नलिखित श्लोक द्वारा किया गया है-
पदच्छेद पदार्थोक्ति विग्रहो वाक्ययोजना ।
आक्षेपश्च समाधानं व्याख्यानं षडविध मतम् ॥

अर्थात् पदच्छेद, प्रतिपाद्य का अभिकथन, व्युत्पत्ति का प्रदर्शन, वाक्य की योजना, आक्षेप और समाधान रूपी छः विधियों का अनुप्रयोग करते हुए किसी शास्त्र के उस ग्रन्थ का व्याख्यान किया जाय जो सूत्रों की संहति में प्रस्तुत हुआ हो तो उस ग्रन्थ का निहितार्थ सम्यक् रूप से उद्घाटित हो जाता है। व्याख्याकार सर्वप्रथम व्याख्येय प्रसंग के वाक्यों को पदों में बांटता है। इसी को पदच्छेद अथवा अन्वय कहते हैं।

आरम्भोऽथापि सम्बन्धः सूत्रार्थस्तद विशेषणम् ।
चोदकं परिहारस्य व्याख्या सूत्रस्य षडविधा ॥

अर्थात् पूर्वापर सम्बन्धात्मक संगति (अवतरण) विषय के साथ प्रकरण का सम्बन्ध प्रतिपाद्य का अभिकथन, उसके विशेषण के अभिप्राय का परिष्कार, पूर्वपक्ष का उत्थापन और उसका परिहार करना सूत्र की व्याख्या में अपेक्षित होता है। इसी बात को अन्यत्र भी थोड़े शब्दान्तर से कहा गया है। वह यह कि व्याख्या के लिए सूत्रार्थ, पदार्थ, हेतु क्रम और निरुक्ति तथा सम्यक् प्रस्तुति आवश्यक है।

  • सूत्रार्थश्च पदार्थश्च हेतुश्च क्रमशस्तथा ।
निरुक्तमय विन्यासो व्याख्या योगस्य षडविधा ॥

एक अन्य बहुश्रुत श्लोक में भी व्याख्या के षडविध तंत्रों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि व्याख्या के लिए भूमिका अर्थात् अवतरण के साथ व्युत्पत्ति का प्रदर्शन पूर्वक प्रतिपादय का कथन, संदेह का उत्थापन एवं उसका निराकरण करते हुए सिद्धान्त पक्ष की उपस्थापना विवक्षित है। यहाँ केवल वाक्य योजना की बात नहीं कही गई है लेकिन इसे तंत्रगत स्वयं ही गतार्थ माना जा सकता है।

उपोद्घातः प्रथमतः पदार्थः पदविग्रहः ।
अविमर्शः प्रत्यवस्था व्याख्या तंत्रस्य षडविधा ॥

उपर्युक्त षडतंत्री व्याख्या पद्धति से मिलती-जुलती एक पंचसूत्री व्याख्या पद्धति भी है जो पूर्वमीमांसा व्याख्या पद्धति के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अनुसार किसी भी विषय पर विचार करते समय पक्ष-विपक्ष के बलाबल की चिन्ता करते हुए निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया मीमांसाशास्त्र में अपनाई गई है। केवल विषय का उल्लेख मात्र निर्णय के लिए पर्याप्त नहीं है अपितु उस विषय में उहापोह के पश्चात् इदमित्थं का अवधारण किया जाता है। यहाँ पाँच प्रकार से उहापोह करने की प्रक्रिया निर्दिष्ट की गई है। पहले विवाद का विषय प्रस्तुत किया जाता है और फिर उस विषय में सम्भावित शंका उठाई जाती है। पूर्वपक्ष की युक्तियाँ प्रदर्शित की जाती हैं, पुनश्च उसके निराकरण हेतु बाधक प्रमाण दिखाकर उत्तरपक्ष अर्थात् सिद्धांत पक्ष के साधक प्रमाण दिखाये जाते हैं। इस तरह स्वाभिमत में बाधक प्रमाणों का अभाव दिखाकर साधक प्रमाणों की संगति पूर्वक सिद्धांत स्थिर होता है।

  • सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र पदैः सुत्रानुसारिभिः।
स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥
जिस ग्रन्थ में सूत्र में आये हुए पदों से सूत्रार्थ का वर्णन किया जाता है, तथा ग्रन्थकार अपने द्वारा पद प्रस्तुत कर उनका वर्णन करता है, उस ग्रन्थ को भाष्य के जानकार लोग "भाष्य" कहते हैं।
  • अल्पाक्षरमसन्दिन्धं सारवद् विश्वतोमुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥
सूत्र को जानने वाले सूत्र उसको कहते हैं जो अल्पाक्षर (कम अक्षरों से युक्त) हो, असंदिग्ध हो, सारवत् (सार रूप) हो, विश्वतोमुख (सभी विषयों पर वक्तव्य देता हो) अस्तोभ (निरर्थक अक्षरों से रहित) और अनवद्य (अर्थ दोष से रहित) हो।
  • सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वाक्यैः सूत्रानुकारिभिः ।
स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः॥
भाष्य : explains the meaning of the sutra, through sentences that closely follow the sutra. The Bhāṣya also explains its own words. That is, the commentator explains his own words too apart from explaining the sutra.
  • पदच्छेदः पदार्थोक्तिर्विग्रहो वाक्ययोजना ।
आक्षेपस्य समाधानं व्याख्यानं पञ्चलक्षणम् ॥
व्याख्यान : has five components: splitting of the conjoined words, giving the meaning of the words, parsing of compounded words, showing clearly the syntax, replying the objections.
  • उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते ।
तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुः वार्तिकज्ञा मनीषिणः॥
वार्तिक : A review of what is said ,unsaid and improperly said (in the bhashya) is called vārtikam.
  • शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम शास्त्रभेदविचक्षणाः॥
प्रकरण : is a treatise or digest that concerns itself with a certain segment or part of a discipline, is aimed at a particular purpose of the discipline. Thus, a prakarana grantha will not deal with everything the discipline is about.
  • लघूनि सूचितार्थानि स्वल्पाक्षरपदानि च।
सर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिणः॥ -- वाचस्पतिमिश्र, भामती
  • व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्नहि सन्देहादलक्षणम्॥ -- परिभाषेन्दुशेखर
  • न केवलानि चर्चापदानि व्याख्यानम्-.... किं तर्हि? उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहार इत्येतत्समुदितं व्याख्यानं भवति। (व्याख्यान की परिभाषा) -- पतञ्जलि, व्याकरण महाभाष्य
  • उदाहृतिः पदकृतिः पदार्थानां विवेचनम्, तन्त्राणां त्रिविधा व्याख्या शिशूनां शीघ्रबोधिनी। -- प्रयोगरत्नमाला व्याकरण
शिशुओं के शीघ्र बोध के लिये व्याख्या की तीन विधिया हैं- उदाहरण (उदाहृतिः), वाक्य से शब्दों की व्युत्पत्ति (पदकृतिः), तथा पदों के अर्थ (पदार्थानां)।
  • नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते। -- मल्लिनाथ (सञ्जीविनी टीका में)
मैं ऐसी कोई बात न लिखूँगा जो निराधार हो, और कुछ नहीं कहूँगा जो अपेक्षित न हो।

व्याख्यानम्

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  • सूत्रार्थप्रधानो ग्रन्थो वृत्तिः । -- पदमञ्जरी[]
Factors that are to be considered when presenting Vrttis are thus as follows- (१) सूत्रार्थे विवरणं । (२) उदाहरणं प्रत्युदाहरणं । (३) अधिकारा (४) पदच्छेदः । (५) प्रसिद्धहनिः शब्दानाम् अप्रसिद्धे च कल्पना न कार्या... (कुमारितकृत तन्त्रवार्त्तिक)

वार्त्तिक

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  • उक्तानुक्तदुरुक्तादिचिन्ता यत्र प्रवर्तते तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुः वार्तिकज्ञा विपश्चितः। (सुरेश्वर, सम्बन्ध वार्तिक)
  • उक्तानुक्तदुरुक्तचिन्ताकारि वार्त्तिकमिति। (काव्यमीमांसा)
  • प्रयोजनं संशयनिर्णयौ च व्याख्याविशेषो गुणलाघवश्च ॥ कृतव्युदासोऽकृतशासनं च सा वर्तिको धर्मगुणोऽष्टकश्च ॥ -- विष्णुधर्मोत्तरपुराण
वार्तिक में निम्नलिखित गुण होने चाहिये- प्रयोजनं, संशय-निर्णयौ (शंशय करना और उसका निराकरण भी करना), व्याख्याविशेषो, गुणलाघवः, कृतव्युदासः (सूत्रकार द्वारा कही बात का खण्डन), अकृतशासनं ।
  • वार्तिककारेण नैतदन्वाख्येयं सर्वाधिकाराणाम् अन्वाख्यानप्रसङ्गात्। -- कैय्यट
वार्तिकाकार को 'अधिकार' पर चर्चा नहीं करनी चाहिये।
  • आक्षेपसमाधानपरो ग्रंन्थः भाष्यम् । -- पदमञ्जरी
वह ग्रन्थ जो किसी आक्षेप का समाधान करता है उसे भाष्य कहते हैं।
  • सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः, स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः।
  • टीका निरन्तरा व्याख्या ।
  • यथासम्भवमर्थस्य टीकनं टीका।

अन्य प्रकार के व्याख्यान

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  • (१) पञ्जिका' - विषमपदभञ्जिका पञ्जिका। -- राजशेखर, काव्यमीमांसा
  • (२) पस्पशा - शास्त्रस्यारम्भको ग्रन्थ उपोद्घात इतिरितः स एव ग्रन्थसन्दर्भः पस्पश कथितो बुधैः।
  • (३) उपोद्घात
  • (४) कारिका - अर्थप्रदर्शनकारिका कारिका।
  • (५) पद्धति - सूत्रवृत्तिविवेचनं पद्धतिः ।
  • (६) समीक्षा - अन्तर्भाष्यं समीक्षा ।  ; अवान्तरार्थविच्छेदश्च सा ।

इन्हें भी देखें

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