भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सन १८८५ ई० में एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा स्थापित भारत का एक राजनैतिक दल है। जब अंग्रेजों ने भारत को स्वतन्त्र किया तो इसी दल को सत्ता सौंप कर गये।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- आज भारत स्वाधीन हो गया है, पर उसने अखंडता प्राप्त नहीं की है। केवल आधी-अधूरी खंडित स्वतंत्रता पाई है। कांग्रेस द्वारा तय किए गए विभाजन को सदा के लिए स्थायी निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। हमें आशा है कि धीरे-धीरे विभाजन की इस मनोवृत्ति और तनाव से मुक्ति मिलेगी। मेल-मिलाप बढ़ेगा, शांति आएगी और अस्थायी विभाजन की रेखा पानी की लहर के समान मिट जाएगी। जो भी हो, इस विभाजन को मिटाना ही होगा भारतमाता की अखंड प्रतिमा ही पूजा के योग्य रहेगी जब तक यह प्रतिमा अखंड नहीं होती, हमें इसकी अखंडता के लिए निरंतर प्रयास करना ही होगा। -- महर्षि अरविन्द घोष ; 15 अगस्त, 1947 को आकाशवाणी से प्रसारित अपने सन्देश में
- कांग्रेस की मुसलिम तुष्टीकरण की नीति पर मेरे तीव्र मतभेद हैं। मैं हिंदू महासभा का ही नेतृत्व करूँगा। -- विनायक दामोदर सावरकर, १० मई, १९३७ को अपनी नजरबंदी रद्द होने पर कांग्रेस में सम्मिलित होने के प्रश्न पर
- पिछले पचास वर्षों में, मुसलमानों को प्रसन्न कर व उन्हें एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करके कम से कम इस हेतु प्रेरित करने के लिए कि सर्वप्रथम वे भारतीय हैं व फिर मुसलमान हैं, कांग्रेस के प्रयासों का बुरी तरह असफल होने का क्या कारण था ? ऐसा नहीं है कि मुसलमान एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र नहीं बनाना चाहते किन्तु एकता, राष्ट्रीय एकता की कल्पना उसके प्रादेशिक एकता पर आधारित नही है। इस विषय पर किसी मुसलमान ने यदि स्पष्ट एवं बोधगम्य रूप से अपना मानस व्यक्त किया है तो वह मोपला आन्दोलन के नेता अली मुसलियार ने हजारों हिन्दू महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को धर्मान्तरित करने अथवा तलवार के बल पर समाप्त करने के अति दुष्ट अभियानके समर्थन में उसने घोषित किया कि भारत को एक संयुक्त राष्ट्र होना ही चाहिए और हिन्दू मुसलमान की शाश्वत एकता स्थापित करने का केवल एक ही मार्ग हैं और वह है सारे हिन्दुओं का मुसलमान बन जाना। -- विनायक दामोदर सावरकर, नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण में
- मुसलमान, मुसलमान प्रथम और अंतिम रूप से मुसलमान रहेगा, भारतीय कभी नहीं। वे तब तक तटस्थ रहे जब तक कि दिगम्रमित हिन्दुओं ने अंग्रेजी राज से सभी भारतीय के लिए राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने का संघर्ष जारी रखा और लाखों की संखया में जेल गये, हजासरों की संखया में अण्डमान गये, सैकड़ों की संखया में फाँसी पर झूल गये और जैसे ही एक ओर कांग्रेसी हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निःशस्त्र आन्दोलन एवं दूसरी ओर कांग्रेस से बाहर सशस्त्र हिन्दू क्रान्तिकारियों द्वारा अधिक भयावह एवं प्रवासी जीवन-मृत्यु का संघर्ष चलाये जाने से अंग्रेजी शासन पर पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ा और उन्हें भारतीय को महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति देने को विवश होना पड़ा, तुरन्त ही मुसलमान चाहरदीवारी से कहने लगे कि वे भी भारतीय हैं, उन्हें भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। अंततोगत्वा बातयहाँ तक पहुँची कि भारतवर्ष को 'मुस्लिम भारत' व 'हिन्दू भारत' में विभाजित करने का प्रस्ताव ज़ोरशोर से रखा गया और इस हेतु मुस्लिम लीग जैसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने मुस्लिम राष्ट्रों के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध मित्रता करने की तत्परता बताई। -- विनायक दामोदर सावरकर, नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण में
- मुस्लिम लीग 'वन्देमातरम्' को इस्लाम विरोधी घोषित कर चुकी है। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले कांग्रेसी मुस्लिम नेता भी 'वन्देमातरम्' गाने से इनकार कर अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय दे चुके हैं। हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित व दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वन्देमातरम् का विरोध कर रहे हैं। कल 'हिन्दुस्थान' या 'भारत' नामों पर एतराज़ करेंगे-इन्हें इस्लाम विरोधी करार देंगे। हिन्दी की जगह उर्दू को राष्ट्रभाषा व देवनागरी की जगह अरबी लिपि का आग्रह करेंगे। उनका एकमात्र उद्देश्य ही भारत को 'दारूल इस्लाम' बनाना है। तुष्टीकरण की नीति उनकी भूख और बढ़ाती जायेगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना होगा। -- विनायक दामोदर सावरकर, अहमदाबाद का हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण में
- श्री गांधी देश के लिये निश्चित खतरा बन गये हैं। उन्होंने सारे मुक्त-चिन्तन का गला घोंट दिया है। वे कांग्रेस को एकजुट करके रख रहे थे जो समाज के सभी बुरे एवं स्वार्थी लोगों का जमवाड़ा है, जो किसी भी सामाजिक या नैतिक सिद्धान्त पर एकमत नहीं होते सिवा गांधी की प्रसंशा और चापलूसी करने के। ऐसी संस्था किसी भी देश का शासन संभालने के योग्य नहीं है। -- भीमराव अंबेडकर, अम्बेडकर के पत्र, पृष्ट २०५ पर
- मुझे लगता है कि कांग्रेस दो बातें समझने में विफल रही है। पहली बात जो कांग्रेस समझने में विफल रही है, वह यह है कि तुष्टिकरण और समझौते में अंतर है, और यह अंतर बहुत जरूरी है। तुष्टिकरण का मतलब है, हमलावर की हत्या, बलात्कार, आगजनी और लूटपाट के कामों में सांठगांठ करके उसे खरीद लेना, उन निर्दोष लोगों के खिलाफ़ जो उस समय उसके नाराज़ होने का शिकार होते हैं। दूसरी ओर, समझौते का मतलब है, ऐसी सीमाएँ तय करना जिनका कोई भी पक्ष उल्लंघन नहीं कर सकता। तुष्टिकरण हमलावर की माँगों और आकांक्षाओं पर कोई सीमा नहीं लगाता। समझौता करता है। दूसरी बात जो कांग्रेस समझने में विफल रही है, वह यह है कि रियायत की नीति ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ाया है, और इससे भी बुरी बात यह है कि मुसलमान इन रियायतों को हिंदुओं की पराजय और प्रतिरोध करने की इच्छा की कमी के रूप में देखते हैं। तुष्टिकरण की यह नीति हिंदुओं को उसी भयावह स्थिति में डाल देगी जिसमें मित्र राष्ट्र हिटलर के प्रति अपनाई गई तुष्टिकरण की नीति के परिणामस्वरूप खुद को पाया था। यह एक और बीमारी है, जो सामाजिक ठहराव की बीमारी से कम गंभीर नहीं है। तुष्टिकरण निश्चित रूप से इसे और बढ़ा देगा। इसका एकमात्र उपाय समझौता है। -- भीमराव अंबेडकर, पाकिस्तान या भारत का विभाजन (1946)
- मैं कांग्रेस से उब चुकी हूँ। मैं कांग्रेस की अपेक्षा बीजेपी को पसन्द करने लगी हूँ क्योंकि इस समय कांग्रेस बीजेपी की अपेक्षा बहुत अधिक साम्प्रदायिक है। कांग्रेस ने ही मुसलमानों को वोट-बैंक बनाया। मैं बीजेपी को इसलिये अधिक पसन्द करती हूँ क्योंकि यह कम भ्रष्ट है। -- कमला दास, लीला मेनन द्वारा उद्धृत जिसको पुनः एल्स्ट कोनराड ने २०१४ में उद्धृत किया।