भारतीय मापन पद्धति का इतिहास
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भारतीय मापन पद्धति का इतिहास सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय तक जाता है जो ५ हजार पर्ष से भी पुराना है। बहुत प्राचीन काल से ही भारत में लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन, भार, समय, धारिता, आदि के मापन के लिये यन्त्र थे और विभिन्न इकाइयों का प्रयोग होता था। मौर्य काल (322–185 ईसापूर्व) नाप-तौल की एक विस्तृत (उन्नत) प्रणाली विद्यमान थी। इतना ही नहीं, मापन से सम्बन्धित अपराधों की रोकथाम के लिये नियम भी बनाये गये थे। मुगल काल में किसी परिवार द्वारा धारित भूमि के क्षेत्रफल के अनुसार कर लगता था। १ अक्टूबर १९५८ से भारत सरकार ने मापन की अन्तरराष्ट्रीय प्रणाली (SI प्रणाली) को स्वीकार कर लिया।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात् सुलक्षितम्।
- षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत्॥ -- मनुस्मृति, अध्याय ८, श्लोक ४०३
- राजा को प्रति छः माह पश्चात् भारों (बाटों) तथा तुला (तराजू) की सत्यता सुनिश्चित करके राजकीय मुहर द्वारा सत्यापित करना चाहिए।
- लौकिके वैदिके वापि तथा सामायिकेऽपि यः ।
- व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते ॥ ९॥
- बहुभिर्विप्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
- यत्किचिद्वस्तु तत्सर्वं गणितेन विना न हि ॥ १६॥ -- महावीराचार्य विरचित गणितसारसंग्रह[१]
- "लौकिक, वैदिक या वर्तमान समय में जो भी कार्यकलाप होते हैं उनमें सर्वत्र संख्यान (गणना) प्रयुक्त होती है। (1:9) बहुत कहने से क्या लाभ है? तीनों लोकों में, तथा चर और अचर सभी में, कुछ भी बिना मापन के अस्तित्व में नहीं रह सकता।(1:16)
- सिन्धु घाटी की भार-मापन प्रणाली गंगा के मैदानों के आरम्भिक राजाओं के राज्य में प्रयुक्त मापन-प्रणाली के समान है। . . . यह प्रणाली भारत (और पाकिस्तान) के पारम्परिक बाजारों में अब भी प्रयुक्त होती है। -- Kenoyer, Jonathan Mark as quoted by Danino. Kenoyer, Jonathan Mark, Ancient Cities of the Indus Valley Civilization°, p. 98. in Danino, M. (2010). The lost river : on the trail of the Sarasvatī. Penguin Books India.
- १०८ अंगुल एक धनुष के बराबर होता है जो मार्ग और नगर के दीवारों के मापन में प्रयुक्त होती है। -- कौटिल्य, अर्थशास्त्र 2.20.19 में।