भारतीय आपातकाल, १९७५
भारत में जून सन १९७५ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी और नागरिकों के अधिकार छीन लिये। प्रेस की स्वतन्त्रता पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया। विरोधी पक्ष के नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। आपातकाल की घोषणा और 'मीसा' कानून लगाने का सबसे बड़ा कारण था इलाहाबाद हाईकोर्ट का 12 जून 1975 का वो आदेश, जिसके अंतर्गत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया गया था। वहीं लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में चल रहा ‘संपूर्ण क्रांति’ का आंदोलन भी अपने उफान पर था।
25 जून 1975 की अर्द्ध रात्रि को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल घोषित कर दिया। आपातकाल की घोषणा के बाद देश में मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) लागू किया गया। देश की न्यायपालिका के हाथ-पांव बांध दिए गए। समूचे विपक्ष और जनता को सलाखों के पीछे भेजने का क्रम शुरू हो गया। प्रेस सेंसरशिप लगाकर पत्रकारिता की हत्या की जाने लगी। कोई प्रतिरोध में बोलता और लिखता तो उसके हिस्से जेल की सज़ा का फरमान जारी हो जाता। जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई, जॉर्ज फर्नांडीस, जयपुर की महारानी गायत्री देवी, विजयाराजे सिंधिया समेत समूचे विपक्षी नेताओं को क्रमशः गिरफ्तार कर जेल भेजा जाने लगा।
30 जून 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बाला साहेब देवरस को नागपुर स्टेशन में गिरफ्तार कर पुणे की यरवदा जेल में कैद कर दिया गया। घबराई और बौखलाई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सरकार युद्ध स्तर पर संघ के स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी में जुट गई। इस प्रकार इंदिरा सरकार के विरोध में उठी हर आवाज़ को ख़ामोश करने के लिए जेलों में ठूंसा जाने लगा।
आपातकाल के दौरान ऐसा कानून बनाया गया, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत माँगने का अधिकार नहीं था। नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों को भी नहीं दी गई। जेल में बंद नेताओं को किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थीl उनकी डाक तक सेंसर होती थी। इस दौरान पुरुष और महिला बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार किया गया।
21 महीने तक चले इस आपातकाल का अंत 21 मार्च, 1977 को हुआ, जब इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा की। जनता पार्टी जीती और उसने सरकार बनाई, जो राजनीतिक शक्ति में बदलाव का प्रतीक बनी।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
- जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है ।
- दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है॥ -- रामधारी सिंह 'दिनकर'
- जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है,
- तिलक लगाने तुम्हे जवानों क्रान्ति द्वार पर आई है।
- आज चलेगा कौन देश से भ्रष्टाचार मिटने को,
- बर्बरता से लोहा लेने,सत्ता से टकराने को
- आज देख लें कौन रचाता मौत के संग सगाई है॥ -- रामधारी सिंह 'दिनकर'
- पर्वत की दीवार कभी क्या रोक सकी तूफ़ानों को,
- क्या बन्दूकें रोक सकेंगी बढते हुए जवानों को?
- चूर–चूर हो गयी शक्ति वह , जो हमसे टकराई है,
- उठे जवानों तुम्हे जगाने क्रान्ति द्वार पर आई है॥ -- रामधारी सिंह 'दिनकर'
- छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको
- काले चिकने माल का मस्का लगा आपको
- किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको
- अन्ट-शन्ट बक रही जनून में
- शासन का नशा घुला ख़ून में
- फूल से भी हल्का समझ लिया आपने
- हत्या के पाप को इन्दु जी, क्या हुआ आपको
- बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को! -- नागार्जुन
- खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूक
- नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
- उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
- जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक॥ -- नागार्जुन
- बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले,
- उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
- उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
- वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनाएं॥ -- भवानीप्रसाद मिश्र
- कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
- दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
- ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
- इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये॥ -- भवानीप्रसाद मिश्र
- धर्मयुग के संपादक और हिंदी के जाने-माने कवि-लेखक धर्मवीर भारती ने भी आपातकाल के दिनों में एक कविता लिखी- मुनादी। यह कविता आने वाले दिनों में जन प्रतिरोध के नारे में बदलती नज़र आई .कविता कुछ इस तरह शुरू होती है-
- खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का हुकुम शहर कोतवाल का…
- हर खासो-आम को आगह किया जाता है कि खबरदार रहें
- और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
- गिरा लें खिड़कियों के परदे और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
- क्योंकि एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
- अपनी काँपती कमजोर आवाज में सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है! -- धर्मवीर भारती, ('मुनादी' नामक कविता)
- भाइयो और बहनो! राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। -- इंदिरा गाँधी, 25 जून, 1975 की सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर दिये संदेश में
- आप लोगों को केवल झुकने के लिये कहा गया था, किन्तु आप लोग घुटनों के बल चलने लगे। -- लालकृष्ण आडवाणी, आपातकाल में प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाने पर समाचार माध्यमों की प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में
- इंदिरा तेरी सुबह की जय, तेरी शाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय। -- कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ, 20 जून, 1975 के दिन कांग्रेस की एक विशाल रैली में
- सब विरोधी पक्षों को देश के हित के लिए एकजुट हो जाना चाहिए अन्यथा यहाँ तानाशाही स्थापित होगी और जनता दुखी हो जायेगी। -- जयप्रकाश नारायण, 25 जून,1975 को रामलीला मैदान पर विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए
- इसके बाद इंदिरा जी के त्यागपत्र की मांग लेकर गाँव-गाँव में सभाएं की जाएंगी और राष्ट्रपति के निवास स्थान के सामने 29 जून से प्रतिदिन सत्याग्रह होगा। -- लोक संघर्ष समिति के सचिव नानाजी देशमुख की घोषणा
- प्रेस को कुचल दिया गया था। साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’, दैनिक ‘तरुण भारत’, और हिंदी मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’, जो जन संघ समूह के हिंदी प्रकाशन का हिस्सा थे; को बंद कर दिया गया। बिना किसी सर्च वारंट या किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के एक पुलिस पार्टी इन अखबारों के परिसर में दाखिल हुई, प्रेस के कर्मचारियों को धक्के मारकर बाहर निकाला और सारी पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद करने के लिए प्रेस पर ताला लगा दिया। इन अखबारों के प्रकाशक, राष्ट्रधर्म प्रकाशन को लखनऊ में वकील मिलना मुश्किल हो गया। वकील डरे हुए थे। जो तैयार होता, उसे भारत के रक्षा नियम के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता था। -- वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर , ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ पृ.57 प्रभात प्रकाशन संस्करण 2020
- नवजीवन ट्रस्ट प्रेस, जहाँ से महात्मा गांधी अपने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ का प्रकाशन कराते थे और अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ रहे थे, ने धरती पुत्र के मामले पर एक बुकलेट छापी। पुलिस ने प्रेस पर धावा बोल दिया, उसे सील कर दिया और छह दिनों तक बंद रखा। प्रेस ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कुछ समय बाद उसे यह कहा गया कि अगर नवजीवन अपनी सारी प्रकाशित होनेवाली सामग्री सेंसरशिप के लिए सौंप दे, तो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी। जीतेंद्र देसाई, जो प्रेस के मैनेजर थे, ने कहा कि आजाद भारत की सरकार ने उस संस्थान को सील कर दिया, जिसे महात्मा ने देश को आजादी दिलाने के लिए खड़ा किया था। -- कुलदीप नैयर , ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ पृ.107 प्रभात प्रकाशन संस्करण 2020
- संविधान हमारे प्रगतिशील कदमों की बेड़ियाँ नहीं बन रहा है। यह तो न्यायपालिका है जो संविधान के प्रावधानों की व्याख्या कर बाधायें खड़ी कर रही है और हमे इसे परिवर्तित करना है। -- इन्दिरा गांधी, 29 जुलाई, 1976 को कांग्रेस कमेटी के समक्ष दिये गये वक्तव्य का अंश
- ‘मीसा’ के अंतर्गत जो 30 हज़ार लोग बंदी बनाए गए थे। उनमें से 25 हज़ार से अधिक संघ के स्वयंसेवक थे। इतना ही नहीं लोकतंत्र की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 कार्यकर्ता अधिकांशतः जेल के अंदर और बाहर बलिदान हो गए। उनमें संघ के अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख श्री पांडुरंग क्षीरसागर भी थे। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने इंदिरा गांधी सरकार के समक्ष घुटने नहीं टेके। संविधान के आदर्शों के साथ आपातकाल की त्रासदी को समाप्त करने में जुटे रहे। -- हो. वे. शेषाद्रि, 'कृतिरुप संघ दर्शन', पृ.492
- जिन वर्गों ने निर्भीक लगन के साथ यह कार्य किया, उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विशेषतः उल्लेखनीय है। उन्होंने सत्याग्रह का आयोजन किया। अखिल भारतीय संचार तंत्र को बनाए रखा। आंदोलन के लिए चुपचाप धन एकत्र किया। बिना किसी विघ्न बाधा के साहित्य वितरण की व्यवस्था की। कारागार में अन्य दलों और मतों के संगी बंदियों को सहायता प्रदान की। इस प्रकार उन्होने सिद्ध कर दिया कि स्वामी विवेकानंद ने देश में सामाजिक और राजनीतिक कार्य के लिए जिस सन्यासी सेना का आवाहन किया था, उसके वो सबसे निकटतम पात्र हैं। वह एक परंपरावादी क्रांतिकारी शक्ति है। -- पूर्व न्यायधीश एम.सी. सुब्रमण्यम , इंडियन रिवियू – मद्रास, अप्रैल 1977
- सी०पी०आई० ने आपातकाल को एक अवसर के रूप में देखा और स्वागत किया। सीपीआई नेताओं का मानना था कि वे आपातकाल को कम्युनिस्ट क्रांति में बदल सकते थे। सीपीआई ने 11वीं भटिंडा कांग्रेस में इन्दिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल का समर्थन किया था। -- Coalition Strategies and the Tactics of Indian Communism, पृष्ठ 224