बाबू जगदेव प्रसाद
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बाबू जगदेव प्रसाद ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
विचार
[सम्पादित करें]- दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
- सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
- धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
- जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
- मानववाद की क्या पहचान
- ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
- पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
- इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
- लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
- अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
- यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
- हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
- पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
- यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो।
- जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
बाबू जगदेव प्रसाद के नारे
[सम्पादित करें]अगला सावन भादों में
गोरी कलाई कादों में।'
‘दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’
‘सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है’
‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।'
‘कमाए धोतीवाला और खाये टोपी वाला’
‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,
सबको शिक्षा एक सामान।
‘मानववाद की क्या पहचान
ब्राह्मण भंगी एक सामान’
‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद
इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’
ऊँची जाति की क्या पहचान?
गिट बिट बोले करे न काम॥
नीची जाति की क्या पहचान?
करे काम पर सहे अपमान।
जो जमीन को जोते बोय
वही जमीन का मालिक होय।