फैज अहमद फैज

फैज अहमद फैज (१९११ - १९८४) उर्दू साहित्य के महान कवि, लेखक और वामपन्थी बुद्धिजीवी थे। उन्हें आधुनिक उर्दू शायरी में क्रांतिकारी बदलाव लाने का श्रेय दिया जाता है। 13 फरवरी 1911 को पंजाब (अब पाकिस्तान) के सियालकोट में जन्मे फैज ने अपनी शायरी में प्रेम, सामाजिक अन्याय, और मानवीय भावनाओं को गहरी संवेदनशीलता के साथ पिरोया। उनकी रचनाएं न केवल साहित्यिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का भी हिस्सा बनीं। उनकी शायरी में मजदूरों, किसानों और शोषित वर्गों की आवाज़ प्रमुखता से उभरी। साथ ही उनकी शायरी में प्रेम और क्रांति का अनूठा मेल देखने को मिलता है। उनकी शायरी, जैसे 'हम देखेंगे' और 'मुझ से पहली सी मोहब्बत' आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं।
फैज को अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई बार जेल में भी डाला गया, लेकिन उनकी लेखनी कभी रुकी नहीं। उन्हें 1962 में लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उद्धरण
[सम्पादित करें]कुछ प्रसिद्ध कविताएँ (शेर)
[सम्पादित करें]- फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमाएं जलीं
फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम
- दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
- वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है
- गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
- और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
- जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं
- और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
- उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं
- इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा
इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए
- दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
- आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के बाद आए जो अज़ाब आए
- और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
- दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
- तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
- उतरे थे कभी 'फ़ैज़' वो आईना-ए-दिल में
आलम है वही आज भी हैरानी-ए-दिल का
- वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है
- दिल से तो हर मोआ'मला कर के चले थे साफ़ हम
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई
- कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
- आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के बा'द आए जो अज़ाब आए
- वीरां है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
- अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें
दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें
मरने के बाद भी मेरी आंखें खुली रहीं,
आदत जो पड़ गई थी तेरे इंतजार की
वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे, जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे, हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क किया, कुछ काम किया (मशरूफः व्यस्त)
दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है।
जिंदगी क्या किसी मुफलिस की कबा है,
जिसमें हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं।
(मुफलिसः गरीब, कबाः लंबा चोगा)
आये तो यूं कि जैसे हमेशा थे मेहरबां,
भूले तो यूं कि जैसे कभी आश्ना न थे। (आश्नाः परिचित)
आदमियों से भरी है यह सारी दुनिया मगर,
आदमी को आदमी होता नहीं दस्तयाब। (दस्तयाबः उपलब्ध)
जो गुज़र गई हैं रातें, उन्हें फिर जगा के लाएं
जो बिसर गई हैं बातें, उन्हें याद में बुलाएं
चलो फिर से दिल लगाएं, चलो फिर से मुस्कराएं
बात बस से निकल चली है
दिल की हालत संभल चली है
अब जुनूं हद से बढ़ चला है
अब तबीयत बहल चली है
निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन, कि जहां
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले