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नीरद चन्द्र चौधुरी

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नीरद चन्द्र चौधुरी (23 नवम्बर 1897 – 1 अगस्त 1999) भारत के एक बंगाली और अंग्रेजी के लेखक, एवं साहित्यकार थे।

  • 15 अगस्त 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन के अंत का स्वागत करने वाली अपार शोरगुल भरी भीड़ को हर्षोल्लास के गगनभेदी नारों के साथ यह पुरानी कहावत याद नहीं आई। उन्हें लगा था कि गोरे लोगों, जिन्होंने इसे चलाया था, के जाने के बाद, उनके देश में ब्रिटिश शासन का कुछ भी नहीं बचेगा। उन्होंने कभी यह नहीं समझा कि भारत में ब्रिटिश शासन ने एक अवैयक्तिक ढाँचा बना दिया था... एक ऐसी शासन प्रणाली जिसका कोई विकल्प नहीं था। -- Three Horsemen of the New Apocalypse (नए सर्वनाश के तीन घुड़सवार) : नीरद सी. चौधरी, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997। एस. बालकृष्ण, सत्तर साल की धर्मनिरपेक्षता में उद्धृत।
  • हम (भारतीयों) में जो भी अच्छा और जीवन्त था उसे बनाने, आकार देने और बढ़ाने का काम उसी ब्रिटिश राज ने किया।
  • मेरे विचार से मुसलमानों को एक मस्जिद के अपवित्रीकरण पर शिकायत करने का लेश मात्रा भी अधिकार नहीं है। 1000 ई. से, काठियावाड़ से लेकर बिहार तक, हिमालय से लेकर विंध्य तक, हर हिंदू मंदिर को लूटा और बर्बाद किया गया। पूरे उत्तर भारत में एक भी मंदिर बचा नहीं... मंदिर केवल वहीं नष्ट होने से बच गए जो घने जंगलों आदि में स्थित थे और जहाँ मुस्लिम सत्ता पहुँच नहीं पाई। अन्यथा यह बर्बरता का एक निरंतर काल था। कोई भी राष्ट्र, चाहे वह कितना भी स्वाभिमानी क्यों न हो, इसे माफ़ नहीं करेगा। उन्होंने हमारी महिलाओं का अपहरण किया और उन्होंने जजिया कर भी लगाया। हम यह सब क्यों भूलें और क्यों माफ़ करें? अयोध्या में जो हुआ, वह न होता, यदि मुसलमानों ने इस ऐतिहासिक तर्क को एक बार भी स्वीकार कर लिया होता। तब हम कह सकते थे: ठीक है, जो बीत गया सो बीत गया और देखते कि हम इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान कैसे निकाल सकते हैं। -- नीरद चंद्र चौधरी, संडे टाइम्स ऑफ इंडिया, 8 अगस्त, 1993 ; संपादक दिलीप पडगांवकर को दिए एक साक्षात्कार में