नानाजी देशमुख
भारतरत्न नानाजी देशमुख ( 11 अक्टूबर 1916- 27 फरवरी 2010) भारत के एक राजनेता, अर्थचिन्तक एवं समाजसेवी थे। वे सत्ता को सेवा से जोड़नेवाले अनूठे व्यक्ति थे। वे करोड़ों भारतीयों के बीच एक रत्न थे। वे कार्यों से रत्न थे। कार्यों से ऋषि थे। वे ग्रामोदय और अंत्योदय के अखंड उपासक थे। वे राजनीति में रहकर भी रचनाधर्मी और सृजनकारी थे। उन्होंने स्कूल को स्कूल नहीं कहा, 'सरस्वती शिशु मंदिर' कहा। नानाजी देशमुख द्वारा जड़ में बोया गया बीज ही आज पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक विद्या भारती द्वारा सरस्वती शिशु मंदिरों के रूप में पोषित और पल्लवित हो रहा है।
नानाजी का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को कडोली में मराठी भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था. यह हिंगोली जिले का छोटा सा शहर है. अपनी शिक्षा के लिए पैसे जुटाने की खातिर उन्होंने सब्जी बेचने तक का काम किया. उन्होंने सीकर से हाई स्कूल किया. सीकर के रावराजा ने नानाजी को स्कॉलरशिप दी। फिर उन्होंने बिड़ला कॉलेज में पढ़ाई की. उसी साल वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी शामिल हो गए. 1952 में जनसंघ की स्थापना होने पर उत्तर प्रदेश में उसका कार्य नानाजी को सौंपा गया. 1967 में वे जनसंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बनकर दिल्ली आ गए. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के बाद 1968 में उन्होंने दिल्ली में 'दीनदयाल शोध संस्थान' की स्थापना की.
नानाजी देशमुख एक सोच थे। नानाजी देशमुख एक विचार थे। नानाजी के पुरुषत्व में मातृत्व था। जिसके पुरुषत्व में मातृत्व होता है, उसे लोग ईश्वर का अंश ही मानते हैं। नानाजी का संबंध धनाढ्य लोगों से रहा परंतु उन्होंने धनाढ्य के धन का उपयोग ग्रामोदय और अंत्योदय में किया। ग्राम उनकी पूजा थी। उन पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बहुत प्रभाव था। वे सत्ता के चकाचौंध से कभी प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने सत्ता को सेवा से जोड़ा। वे जनसंघ के जो 10-12 प्रमुख प्रारंभिक स्तंभ थे, उनमें से एक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से निकले और आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का सान्निध्य प्राप्त कर उन्होंने प्रारंभ में संघ के विचार को और जब संघ की प्रेरणा से जनसंघ बना, तो उसके दीये की अखंड ज्योति से उसका चिन्मयी बनकर वे भारत के कोने-कोने में जनसंघ के विचार को लेकर पहुंचे।
जनता पार्टी की सरकार बनी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी धराशायी हुई। आपातकाल में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ कदम से कदम मिलाकर गुप्त क्रांति की प्रेरणा नानाजी देशमुख ने दी। नानाजी देशमुख कहा करते थे, ‘हौसले से बड़ा हथियार नहीं होता।’ जयप्रकाश नारायण के हौसले का नाम नानाजी देशमुख था। जयप्रकाश नारायण नानाजी से अटूट प्रेम करते थे। यही कारण था कि आपातकाल की काली साया के दौरान जेल में रहने के बाद रोशनी देनेवाले में जो अग्रणी थे, वे थे जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख। सन 77 में सत्ता आई, जनता पार्टी की सरकार बनी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई सहित अनेक नेताओं ने आग्रह किया कि नानाजी जनसंघ कोटे से मंत्री बनें। लेकिन वे सत्ता की चकाचौंध में संगठन छोड़ने को तैयार नहीं थे। उन्होंने कह दिया,’मैं 60 वर्ष के बाद राजनीति से संन्यास ले लूंगा’। वे 60 साल के हुए और अपने शब्दों को आचरण का परिधान पहनाते हुए उन्होंने घोषणा की, ‘मैं राजनीति से संन्यास लेता हूं, सेवा से नहीं’।
भारत की राजनीति में जनसेवा, ग्रामसेवा, कृषिसेवा और ग्रामों की आराधना का केंद्र उन्होंने मंदाकिनी नदी के किनारे बसे चित्रकूट को बनाया। जिस चित्रकूट में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम ने अपने 12 वर्ष वनवास में बिताए, नानाजी देशमुख ने उसे दीनदयाल शोध संस्थान के विविध आयामों का कार्यक्षेत्र बनाया। मंदाकिनी के घाट पर सियाराम कुटीर बनाकर उन्होंने चित्रकूट के आस-पास 500 ग्रामों का जो प्रकल्प चलाया उसे देखकर हर किसी को दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। नानाजी के प्रारब्ध की पुण्याई अगर कोई चाहता हो तो उसे चित्रकूट जाकर दीनदयाल शोध संस्थान के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के ग्रामीण उत्थान के प्रकल्प को अवश्य देखना चाहिए।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- हम अपने लिए नहीं, अपनों के लिए हैं, अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित एवं उपेक्षित हैं।
- हौसले से बड़ा हथियार नहीं होता।
- प्रकृति का संतुलन यदि बिगड़ेगा तो मनुष्य, समाज और राष्ट्र का भी संतुलन बिगड़ेगा।
- अंग जो भी काम का हो, दूसरे जीवन के लिए उपयोग में ले लेना चाहिए।
- समाज के परस्परावलम्बन की भावना से ही ग्रामोदय संभव होगा। वे कहते थे नूतन संतान में सामाजिक दायित्व का बीजारोपण करना परिवार का नैसर्गिक कर्तव्य है।
नानाजी के बारे में विचार
[सम्पादित करें]- नानाजी देशमुख ने जीवन सार्थक कर दिया। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम के वनवासधाम को भौतिकवादी युग में उन्होंने जो सेवाधाम बना दिया, वह सदैव स्मरणीय रहेगा। मैं प्रधानमंत्री निवास में तो आ गया हूं पर नानाजी देशमुख के दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा किये जा रहे ग्रामों के उदय का प्रकल्प मेरे आंखों से ओझल नहीं हो रहा। -- प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी , दीनदयाल शोध संस्थान के प्रकल्पों का दर्शन करने के बाद दिल्ली लौटने पर
- मेरी यहां से जाने की इच्छा नहीं हो रही है। आपके ग्रामोदय की जो सोच है, इससे गांव की संस्कृति और सभ्यता सदैव जीवंत रहेगी। -- राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम आजाद, दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा चलाये जा रहे प्रकल्पों को अपनी आंखों से देखने पर
- ग्राम स्वराज के शिल्पकार, कुशल संगठनकर्ता भारत रत्न नानाजी देशमुख जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटिशः नमन। पंचायती राज को सशक्त कर गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नाना जी देशमुख जी के ग्राम स्वराज की अवधारणा आज भी प्रासंगिक है। चाहे आपातकाल का संघर्ष हो, जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी हो या भारतीय जनसंघ की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाना हो, हमेशा राष्ट्रप्रथम के लिए समर्पित नाना जी देशमुख जी समस्त देशवासियों के लिए प्रेरणापुंज हैं। -- भारत के गृहमन्त्री अमित शाह, २७ फरवरी २०२५ को