नरेन्द्र देव
आचार्य नरेन्द्र देव ( 31 अक्टूबर 1889 - 19 फरवरी 1956) भारत के स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, शिक्षाविद, समाजवादी विचारक एवं राजनेता थे। उन्हें भारतीय समाजवाद का पितामह कहा जाता है। 1934 में आचार्य ने कांग्रेस पार्टी के अंदर ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना की और उसके पहले सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस से बाहर आने पर 1949 में सोशलिस्ट पार्टी के पटना सम्मेलन की अध्यक्षता भी आचार्य ने ही की और बाद में 1954 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष चुने गए।
हिंदी, उर्दू, फारसी, बांग्ला, संस्कृत, प्राकृत, पालि, जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी भाषाओं के जानकार आचार्य जी का अध्ययन अत्यंत विशाल और अध्यापन शैली अत्यंत सरल थी। बौद्ध दर्शन के अध्ययन में आचार्य जी की विशेष रुचि रही।
वे आजीवन वे बौद्ध दर्शन का अध्ययन करते रहे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में 'बौद्ध-धर्म-दर्शन' उन्होंने पूरा किया और ‘अभिधर्मकोश’ भी प्रकाशित कराया। साथ ही ‘अभिधम्मत्थसंहहो’ का हिंदी अनुवाद भी किया। प्राकृत तथा पालि व्याकरण हिंदी में तैयार किया। बौद्ध दर्शन के पारिभाषिक शब्दों के कोश का निर्माण कार्य भी उन्होंने शुरू किया था। अपने जीवन के अंतिम दिनों में आचार्य जी ने पेरुंदुराई में एक व्याख्यात्मक कोश भी बनाया था, किंतु उनके आकस्मिक निधन से यह काम पूरा न हो सका।
हिंदी भाषा एवं साहित्य के विकास के लिए वह कई समितियों के सदस्य भी रहे। अखिल भारतीय राष्ट्रीय भाषा समिति और हिंदी साहित्य सम्मेलन के सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने देश के बौद्धिक विकास में अमूल्य योगदान दिया।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- मेरे जीवन में सदा दो प्रवृत्तियां रही हैं- एक पढ़ने-लिखने की और, दूसरी राजनीति की, और इन दोनों में संघर्ष रहता है. यदि दोनों की सुविधा एक साथ मिल जाए तो मुझे बड़ा परितोष रहता है और यह सुविधा मुझे विद्यापीठ में मिली. इसी कारण वह मेरे जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा है जो विद्यापीठ की सेवा में गुज़रा. अपनी जिंदगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आंखें मुंदेंगी तो मुझे एक परितोष होगा कि जो काम मैंने विद्यापीठ में किया वह स्थायी है। -- अपने ‘संस्मरणों’ में
- इस युग की दो मुख्य प्रेरणाएं राष्ट्रीयता और समाजवाद हैं।
- समाजवाद का ध्येय वर्गहीन समाज की स्थापना है। समाजवाद प्रचलित समाज का इस प्रकार का संगठन करना चाहता है कि वर्तमान परस्पर विरोधी स्वार्थ वाले शोषक और शोषित, पीड़क और पीड़ित वर्गों का अंत हो जाए; वह सहयोग के आधार पर संगठित व्यक्तियों का ऐसा समूह बन जाए जिसमें एक सदस्य की उन्नति का अर्थ स्वभावतः दूसरे सदस्य की उन्नति हो और सब मिल कर सामूहिक रूप से परस्पर उन्नति करते हुए जीवन व्यतीत करें। -- अपनी पुस्तक ‘समाजवाद : लक्ष्य और साधन’ में
- जिस तरह से जमींदारों ने किसानों को लूटा, खसोटा और चूसा है यदि उसका हिसाब लगाया जाए तो किसानों के ऋण से मुक्त होना जमींदारों के बूते की बात नहीं। ऐसी हालत में जमींदारों को मुआवजा देने का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। -- 1947 में जमींदारी उन्मूलन कमेटी को लिखे ‘मेमोरेंडम’ में
- वह पुरुष जो आज हिन्दू धर्म में किसी नियम को नही मानता, वह क्यों असंख्य सनातनी हिन्दुओं का आराध्य देवता बना हुआ है। पंडित समाज चाहे उनका भले ही विरोध करे किन्तु अपढ़ जनता उनकी पूजा करती है। इस रहस्य को हम तभी समझ सकते हैं, जब हम जानें कि भारतीय जनता पर श्रमण संस्कृति का कही अधिक प्रभाव पड़ा है। जो व्यक्ति घर-बार छोड़ कर निःस्वार्थ सेवा करता है उसके आचार की ओर हिन्दू जनता ध्यान नही देती। -- महात्मा गांधी के बारे में तथा श्रमण संस्कृति का हिन्दुओं के मानस पर प्रभाव के बारे में लिखते हुए
- भारत की वास्तविक राष्ट्रीयता तभी संभव है जब समाज के सभी वर्गों को, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से हों, समान अधिकार और मान्यता मिले। उनका मानना था कि एक मजबूत और समावेशी राष्ट्रीयता तभी विकसित हो सकती है, जब समाज के सभी हिस्से एक दूसरे के प्रति सम्मान, सहिष्णुता और समझ का भाव रखें।
- भारतीय राष्ट्रीयता का विकास केवल तभी संभव है जब यह समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं को स्वीकार कर सके। भारतीय राष्ट्रीयता का मतलब केवल एकजुटता नहीं है, बल्कि एक ऐसा समावेशी दृष्टिकोण है जो विभिन्नताओं को साथ लेकर चल सके।
- सत्य की तो सदा से आराधना किया करता हूँ किंतु इसमें मुझे संदेह है कि बिना कुछ हिंसा के राज्य की शक्ति हम अंग्रेजों से छीन सकेंगे। -- गांधीजी के इस प्रश्न पर कि "सत्य और अहिंसा के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?" , आचार्य नरेन्द्र का उत्तर
- न्याय की धारणा मनुष्य-समाज को में रखने वाली आंतरिक शृंखला है। व्यवस्था और क्रम अपनी एक न्याय की क्रम और नियंत्रण समाज की प्रत्येक धारणा रखता है। यह धारणा उस सामाजिक व्यवस्था को पूर्णता के लक्ष्य और आदर्श की ओर संकेत करती रहती है। विचारों की क्रांति का काम हमारी न्याय की धारणा को नए मार्ग पर लाना है।
- 42 से आंदोलन की क्रांति अधूरी है। उस क्रांति से स्वतंत्रता हासिल करनी थी, समता हासिल करनी थी, सांप्रदायिक सद्भाव प्राप्त करना था और किसानों, मजदूरों का राज कायम करना था। वह सब हो नहीं सका है इसलिए उस भावना को जागृत रखना जरूरी है।
- यह सत्य है कि सिनेमा, रेडियो और टेलीविजन ने साहित्य पर आक्रमण कर उसके महत्त्व को घटा दिया है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के अधिपत्य ने भी साहित्य की मर्यादा को घटाया है। किंतु यह असंदिग्ध है कि साहित्य आज भी जो कार्य कर सकता है वह कोई दूसरी प्रक्रिया नहीं कर सकती।
- भारत के विभिन्न साहित्यों की आराधना कर उनकी उत्कृष्टता को हिंदी में उत्पन्न कर हिंदी साहित्य को सचमुच राष्ट्रीय और सफल राष्ट्र के विकास का समर्थ उपकरण बनाना हमारा आप का काम है। इस दायित्व को हम दूसरों पर नहीं छोड़ सकते।
- `मेरे जीवन के कुछ ही वर्ष रह गए हैं। शरीर संपत्ति अच्छी नहीं है। किंतु मन में अब भी उत्साह है। सदा अन्याय से लड़ते ही जीवन बीता। यह कोई छोटा काम नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और आवश्यकता है। -- 1947 में
आचार्य नरेन्द्र देव पर अन्य पुरुषों के विचार
[सम्पादित करें]- ऐसी पुस्तक हिंदी तो क्या भारत की किसी अन्य भाषा में नहीं है। बल्कि ऐसी पुस्तक दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। -- गोपीनाथ कविराज, आचार्य नरेन्द्र देव की पुस्तक 'बौद्ध धर्म दर्शन' पर
- आचार्य नरेंद्र देव बोधिसत्व की साक्षात प्रतिमा थे। उनके भीतर अगाध करुणा थी। -- वासुदेव शरण अग्रवाल