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दादू दयाल

विकिसूक्ति से

झूठे अंधे गुर घणें, भरंम दिखावै आइ।

दादू साचा गुर मिलै, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ॥


हस्ती छूटा मन फिरै, क्यूँ ही बंध्या न जाइ।

बहुत महावत पचि गये, दादू कछू न बसाइ॥


दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव।

तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाव॥


जहाँ आतम तहाँ रांम है, सकल रह्या भरपूर।

अंतर गति ल्यौ लाई रहु, दादू सेवग सूर॥


मीरां कीया मिहर सौं, परदे थैं लापरद।

राखि लीया, दीदार मैं, दादू भूला दरद॥


मीठे मीठे करि लीये, मीठा माहें बाहि।

दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाइ॥


भरि भरि प्याला प्रेम रस, अपणैं हाथि पिलाइ।

सतगुर के सदकै कीया, दादू बलि बलि जाइ॥


केते पारिख जौंहरी, पंडित ग्याता ध्यांन।

जांण्यां जाइ न जांणियें, का कहि कथिये ग्यांन॥


दादू बिरहनि कुरलै कुंज ज्यूँ, निसदिन तलफत जाइ।

रांम सनेही कारनैं, रोवत रैंनि बिहाइ॥


आसिक मासूक ह्वै गया, इसक कहावै सोइ।

दादू उस मासूक का, अलह आसिक होइ॥