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दण्डी

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दण्डी, संस्कृत के महान् कवि।

उक्तियाँ

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  • इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वथा।
वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते॥ -- काव्यादर्श
इस संसार में शिष्टों (अर्थात शब्दशास्त्रियों) द्वारा अनुशासित शब्दों एवं उनसे भिन्न अननुशासित शब्दों की सहायता से ही सर्वथा लोक व्यवहार चलता है।
  • कथ्यते काव्यम् इष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली। -- काव्यादर्श
अभीष्टार्थ की द्योतक पदावली काव्य कहलाती है।
  • अस्त्यनेको गिरां मार्गः सूक्ष्मभेदः परस्परम्।
तत्र वैदर्भी गौडीयौ वयेते प्रस्फुटान्तरौ॥ -- काव्यादर्श
इसमें दण्डी ने रीति को पारिभाषित किया है।
  • सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्। -- काव्यादर्श
उपमेय की उपमान के रूप में सम्भावना उत्प्रेक्षा अलंकार कहलाता है।
  • अरत्नालोकसंहार्यमवार्यं सूर्यरश्मिभिः।
दृष्टिरोधकरं यूनां यौवनप्रभवं तमः॥ -- काव्यादर्श
यौवन से उत्पन्न अंधकार युवाओं के दृष्टि को अवरोधित करने वाला अंधकार है। यह न तो रत्नों के प्रकाश से हटाया जा सकता है, न सूर्य की किरणों से।

दण्डी के बारे में उद्धरण

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  • कविर्दण्डी कविर्दण्डी कविर्दण्डी न संशयः ।
दण्डी कवि हैं, दण्डी कवि हैं, दण्डी कवि हैं - इसमें कोई सन्देह नहीं।
  • दण्डिनः पदलालित्यम्
दण्डी का पदलालित्य (बेजोड़ है।)
  • यथा योग्नयस्त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयो गुणाः।
त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः॥ -- कविवर राजशेखर, अपनी कृति शार्ङ्गधरपद्धति में
जिस प्रकार योग योग अग्नि तीन हैं, वेद तीन हैं, देव तीन हैं और गुण तीन हैं। उसी प्रकार दण्डी के तीन प्रबन्ध भी हैं जो लोकविश्रुत हैं।