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जैन दर्शन

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जैन दर्शन अत्यन्त प्राचीन, अति समृद्ध एवं गहन दर्शन है।

उक्तियाँ

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  • अन्तरबाहिरजप्पे, जो वट्टइ सो हवेइ बहिरप्पा।
जप्पेसु जो ण वट्टइ, सो उच्चइ अंतरंगप्पा॥ जो अंदर और बाहर के जल्प (विचन-विकल्प) में रहता है वह बहिरात्मा है। और जो किसी भी जल्प में नहीं रहता, वह अन्तरात्मा कहलाता है।
  • अक्खाणि बहिरप्पा, अंतरअप्पा हु अप्पसंकप्पो। -- मोक्खपाहुड : ५
इन्द्रियों में आसक्ति बहिरात्मा है और अंतरंग में आत्मानुभव रूप आत्मसंकल्प अन्तरात्मा है।
  • जे जिण-वयणे कुसला भेयं जाणंति जीवदेहाणं।
णिज्जय-दुट्ठट्ठमया अंतरअप्पा य ते तिविहा॥ -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : १९४
अंतरात्मा त्रिविध है-जो जिन-वचनों में कुशल है, जीव और देह के भेद को जानता है और आठ दुष्ट मदों-अभिमानों को जीत चुका है, वह अंतरात्मा है, जो (जघन्य-मध्यम-उत्तम भेद से) तीन प्रकार का है।
  • सिविणे वि ण भुंजइ, विसयाइं देहाइभिण्णभावमई।
भुंजइ णियप्परूवो, सिवसुहरत्तो दु मज्झिमप्पो सो॥ -- रयणसार : १३३
शरीर आदि से स्वयं को भिन्न समझने वाला जो मनुष्य स्वप्न में भी विषयों का भोग नहीं करता अपितु निजात्मा का ही भोग करता है तथा शिव-सुख में रत रहता है, वह मध्यम-अंतरात्मा है।
  • कि तुमंधो सि किन्वा सि धत्तूरिओ।
अहव कि सन्निवाएण आऊरिओ॥ अमयसमधम्म जं विस व अवमन्नसे।
विसयविस विसम अमियं व बहु मन्नसे॥ -- इन्द्रियपराजयशतक : ७४
हे मनुष्य ! क्या तू अंधा बन गया है ? या क्या तूने धतूरा-पान किया है ? अथवा क्या तू सन्निपात रोग से पागल बन गया है ? जिससे कि अमृत समान धर्म को तू विषवत् तिरस्कृत करता है और भवोभव में परिभ्रमण कराने वाले विषयरूपी विष को अमृत के समान पी रहा है।
  • भूत्वा च निस्संग:, निजभावं निगृह्य सुखदु:खम्।
निद्र्वन्द्वेन तु वर्तते, अनगार: तस्याऽऽकिन्चन्यम्॥ -- समणसुत्त : १०५
जो मुनि सब प्रकार के परिग्रह का त्याग करा नि:संग हो जाता है, अपने सुखद और दु:ख भावों का निग्रह करके निद्र्वन्द्व विचरता है, उसके अकिंचन्य धर्म होता है।
  • प्रत्येकम् प्रत्येकम् निजभाव्, कर्मफलमनुभवताम्।
क: कस्य जगति स्वजन:? क: कस्य वा परजनो भणित:॥ -- समणसुत्त : ५१५
यहाँ प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मफल को अकेला ही भोगता है। ऐसी स्थिति में यहाँ कौन किसका स्वजन है और कौन किसका परजन ?
  • एगो य मरदि जीवो एगो य जीवदि सयं।
एगस्स जादि मरणं एगो सिज्झदि णीरयो॥ -- नियमसार : १०१
जीव अकेला ही मरता है, अकेला ही जन्म लिया करता है। जन्म-मरण अकेले का ही होता है और वह अकेला ही कर्म-रज-रहित सिद्ध हुआ करता है।
  • भाजन भेद कहावत नाना, एक मृत्तिका रूप री।
तैसे खण्ड कल्पना रोपित, आप अखण्ड सरूप री॥ -- आनन्दघन ग्रंथावली, पद : ६५
जिस प्रकार मिट्टी एक होकर भी पात्र-भेद से अनेक नामों से पुकारी जाती है, उसी प्रकार एक अखण्ड रूप परमतत्त्व (शुद्धात्मा) में विभिन्न कल्पनाओं के कारण, अनेक नामों की कल्पना कर ली जाती है, किन्तु वस्तुत: वह तो अखण्ड स्वरूप ही है।
  • चित्तवदचित्तवद्वा, अल्पं वा यदि वा बहु (मूल्यत:)।
दन्तशोधनमात्रमपि, अवग्रहे अयाचित्वा (न गृह्णन्ति)॥ -- समणसुत्त : ३७१
सचेतन अथवा अचेतन, अल्प अथवा बहुत, यहाँ तक कि दांत साफ करने की सींक तक भी साधु बिना दिए ग्रहण नहीं करते।
  • भक्खणे देव-दव्वस्स, परत्थी-गमणेण य।
सत्तमं नरइयं इंति, सत्तवाराओ गोयमा॥ -- कामघट कथानक : १२४
हे गौतम ! देव-द्रव्य के हड़पने से और परस्त्री के साथ मैथुन करने से सातवें नरक में सात बार जाना पड़ता है।
  • वज्जिज्जा तेनाहडतक्कर जोगं विरुद्धं रज्जं च।
कूडतुल-कूडमाणं, तप्पडिरूवं च ववहारं॥ -- सावयपण्णत्ति : २६८
चोरी का माल लेना, तस्करी करना, राज्य-आज्ञा का उल्लंघन करना, नाप-तौल की गड़बड़ तथा मिलावट-ये सब चोरी के तुल्य हैं।
  • ग्रामे वा नगरे वा-ऽरण्ये वा प्रेक्षित्वा परमार्थम्।
यो मुचंति ग्रहणभावं, तृतीयव्रतं भवति तस्यैव॥ -- समणसुत्त: ३७०
ग्राम हो, नगर हो अथवा अरण्य हो, कहीं भी पराई वस्तु देख उसे लेने के भाव से मुक्त रहना तीसरा व्रत (अचौर्य) होता है।
  • अज्ञानात् ज्ञानी, यदि मन्यते शुद्धसम्प्रयोगात्।
भवतीति दु:खमोक्ष:, परसमयरतो भवति जीव:॥ -- समणसुत्त : १९४
अज्ञानवश यदि ज्ञानी भी ऐसा मानने लगे कि शुद्ध सम्प्रयोग अर्थात् भक्ति आदि शुभभाव से दु:ख-मुक्ति होती है, तो वह भी राग का अंश होने से परसमयरत होता है।
  • जल बुब्बयसारिच्छं धनजोव्वण जीवियं पि पेच्छंता।
मण्णंति तो वि णिच्चं अइवलिओ मोहमाहप्पो॥ -- द्वादशअनुप्रेक्षा : २१
धन, यौवन और जीवन को जल के बुलबुले के समान देखते हुए भी मनुष्य उन्हें नित्य मानता है, यह बड़ा आश्चर्य है। मोह का माहात्म्य अति बलवान है।
  • जो अप्पणा दु मण्णदि दुक्खिदसुहिदे करेमि सत्तेति।
सो मूढो अण्णाणी, णाणी एत्तो दु विवरीदो॥ -- समयसार : २५३
‘जो ऐसा मानता है कि मैं दूसरों को दु:खी या सुखी करता हूँ’, वह वस्तुत: अज्ञानी है। ज्ञानी ऐसा कभी नहीं मानते।
  • अनुशोचत्यन्यजनमन्यभवान्तरगतं तु बालजन:।
नैव शोचत्यात्मानं, क्लिश्यमानं भवसमुद्रे॥ -- समणसुत्त : ५१८
अज्ञानी मनुष्य अन्य भवों में गए हुए दूसरे लोगों के लिए तो शोक करता है, किन्तु भवसागर में कष्ट भोगने वाली अपनी आत्मा की चिन्ता नहीं करता।
  • हा ! जह मोहियमइणा, सुग्गइमग्गं अजाणमाणेणं।
भीमे भवकन्तारे, सुचिरं भमियं भयकरम्मि॥ -- मरण-समाधि : ५९०
हा ! खेद है कि सुगति का मार्ग न जानने के कारण मैं मूढ़मति भयानक और घोर संसार-रूपी अटवी में चिरकाल तक भ्रमण करता रहा।
  • जल बालुयाए बाला, पुलिणे कीलंति अलिय-कयघरया।
अलिय-वियप्पिय-माया-पिय-पुत्त-परंपरा-मूढा॥ -- कुवलयमाला : ६६
नदी के किनारे बालक रेती का नकली घर बनाकर क्रीड़ा करते हैं, उसी तरह मूढात्मा संसार में माता-पिता पुत्र की अयथार्थ परम्परा को मानता है।
  • अंधो णिवडइ कुवे बहिरो ण सुणेदि साधु-उपदेसं।
पेच्छंतो णिसुणंतो णिरए जं पडइ तं चोज्जं॥ -- तिलोयपण्णत्ति
अंध कूप में गिर जाता है और बहरा साधु (सज्जन) का उपदेश नहीं सुनता, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। आश्चर्य यही है कि यह जीव देखता और सुनता हुआ भी नरक कूप जा पड़ता है।
  • जह निन्बदुमुपन्नो कीडो कडुअंपि मन्नए महुरं।
तह सिद्धिसुरूवपरुक्खा, संसारदुहं सुहं विंति॥ -- इन्द्रियपराजयशतक : १२
जिस तरह नीम के वृक्ष में उत्पन्न क्रीड़ा नीम की कटुता को भी मीठा मानता है, उसी तरह मोक्ष-सुख से परांगमुख व्यक्ति संसार के दु:ख को भी सुख मानता है।
  • प्राणिवधमृषावादा दत्तपरदारनियमनैश्च।
अपरिमितेच्छातोऽपि च, अणुव्रतानि विरमणानि॥ -- समणसुत्त : ३०९
हिन्सा, असत्य, चोरी, परस्त्रीगमन और असीम इच्छा, इन पापों का त्याग करना अणुव्रत है।
  • यथा भवति धर्मद्रव्यं, तथा तद् जानीहि द्रव्यमधर्माख्यम्।
स्थितिक्रियायुक्तानां, कारणभूतं तु पृथिवीव॥ -- समणसुत्त : ६३४
धर्म द्रव्य की तरह ही अधर्मद्रव्य है। परन्तु अन्तर यह है कि यह स्थिति रूप क्रिया से युक्त जीवों और पुद्गलों की स्थिति में पृथ्वी की तरह निमित्त बनता है।
  • ज्ञानमेकाग्रचित्तश्च, स्थित: च स्थापयति परम्।
श्रुतानि च अधीत्य, रत: श्रुतसमाधौ॥ -- समणसुत्त : १७४
अध्ययन के द्वारा व्यक्ति को ज्ञान और चित्त की एकाग्रता प्राप्त होती है। वह स्वयं धर्म में स्थित होता है और दूसरों को भी स्थिर करता है तथा अनेक प्रकार के श्रुत का अध्ययन कर वह श्रुतसमाधि में रत हो जाता है।
  • जह सूरमणी जलणं, मुंचइ सुरेण ताविओ संतो।
तह जीवो वि हु नाणं पावइ तव-सोसियप्पाणो॥ -- कुवलयमाला : १७९
जिस तरह सूर्य से तप्त हुआ सूर्यकांत मणि अग्नि को प्रकट करता है, उसी तरह अपने तप से तपा हुआ जीव अनंत ज्ञान को प्रगट करता है।
  • मासे मासे तु यो बाल:, कुशाग्रेण तु भुङ्क्ते।
न स स्वाख्यातधर्मस्य, कलामर्घति षोडशीम्॥ -- समणसुत्त : २७३
जो बाल (परमार्थशून्य अज्ञानी) महीने-महीने के तप करता है और (पारणे में) कुश के अग्रभाग जितना (नाममात्र का) भोजन करता है, वह सुआख्यात धर्म की सोलहवीं कला को भी नहीं पा सकता।
  • सो नाम अणसण तवो, जेव मणो मंगुलं न चिन्तेइ।
जेण न इंदियहाणी, जेण य जोगा न हायंति॥ -- मरण-समाधि : १३४
वही अनशन तप श्रेष्ठ है जिससे कि मन अमंगल न सोचे, इन्द्रियों की हानि न हो और नित्य-प्रति की योग-धर्म क्रियाओं में विघ्न न आए।
  • एतांश्च संगान् समतिक्रम्य, सुदुस्तराश्चैव भवन्ति शेषा:।
यथा महासागरमुत्तीर्य, नदी भवेदपि गंगासमाना॥ -- समणसुत्त : ११४
जो मनुष्य इन स्त्री-विषयक आसक्तियों का पार पा जाता है, उसके लिए शेष सारी आसक्तियाँ वैसे ही सुतर (सुख से पार पाने योग्य) हो जाती हैं, जैसे महासागर का पार पाने के लिए गंगा जैसी बड़ी नदी।
  • विषयलोभिल्ला, पुरिसा कसायवसगा।
करेन्ति एक्केक्कमविरोहं॥ -- पउमचरियं : ४/४९
विषयों में लोभी और कषायों के वशीभूत पुरुष बिना वैर-विरोध के भी एक-दूसरे का अनिष्ट करते हैं।
  • पितृ-पुत्र-नातृ-भव्यक-भातृणाम् एक पुरुषसम्बन्ध:।
न च स एकस्य पिता इति शेषकाणां पिता भवति॥ -- समणसुत्त : ६७०
एक ही पुरुष में पिता, पुत्र, पौत्र, भानजे, भाई आदि अनेक सम्बन्ध होते हैं। एक ही समय में वह अपने पिता का पुत्र और अपने पुत्र का पिता होता है। अत:: एक ही पिता होने से वह सबका पिता नहीं होता। (यही स्थिति सब वस्तुओं की है।)
  • सविकल्प-निर्वकल्पम् इति पुरुषं यो भणेद् अविकल्पम्।
सविकल्पमेव वा निश्चयेन न स निश्चित: समये॥ -- समणसुत्त : ६७१
निर्वकल्प तथा सविकल्प उभयरूप पुरुष को जो केवल निर्वकल्प अथवा सविकल्प (एक ही) कहता है, उसकी मति निश्चय ही शास्त्र में स्थिर नहीं है।
  • जेण विणा लोगस्स वि, ववहारो सव्वहा ण णिव्वडइ।
तस्स भुवणेक्कगुरुणो, णमो अणेगंतवायस्स॥ -- सन्मति तर्क प्रकरण : ३-७०
जिसके बिना विश्व का कोई भी व्यवहार सम्यक् रूप से घटित नहीं होता है, अतएव जो त्रिभुवन का एकमात्र गुरु (सत्यार्थ का उपदेशक) है, उस अनेकांतवाद को मेरा नमस्कार है।
  • एको मे शाश्वत आत्मा, ज्ञानदर्शनसंयुत:।
शेषा मे बाह्या भावा:, सर्वे संयोगलक्षणा:॥ -- समणसुत्त : ५१६
ज्ञान और दर्शन से संयुक्त मेरी एक आत्मा ही शाश्वत है। शेष सब अर्थात् देह तथा रागादि भाव तो संयोग लक्षण वाले हैं-उनके साथ मेरा संयोग संबंध मात्र है। वे मुझसे अन्य ही हैं।
  • संयोगमूला जीवेन, प्राप्तदु:खपरम्परा।
तस्मात्संयोगसम्बन्धं, सर्वभावेन व्युत्सृजामि॥ -- समणसुत्त : ५१७
इस संयोग के कारण ही जीव दु:खों की परम्परा को प्राप्त हुआ है। अत: सम्पूर्ण भाव से मैं इस संयोग-संबंध का त्याग करता हूँ।
  • यो ज्ञात्वा देहं, जीवस्यवरूपात् तत्त्वत: भिन्नम्।
आत्मानमपि च सेवते, कार्यकरं तस्य अन्यत्वम्॥ -- समणसुत्त : ५१९
जो शरीर को जीव के स्वरूप से तत्त्वत: भिन्न जानकर आत्मा का अनुचिन्तन करता है, उसकी अन्यत्व भावना कार्यकारी है।
  • खंडिज्जंतो वि ससी अवमाणं सहइ पुण्णिमा जाव।
सूरो पयावहरणे अत्थमइ न खंडणं सहइ॥ -- गाहारयण कोष : ७४
खंडित होता हुआ चन्द्र र्पूिणमा तक अपमान को सहन करता रहता है। इससे विपरीत सूर्य अपने प्रताप के चले जाने पर अस्त होना (मरण) ही पसन्द करता है, किन्तु अपमान को नहीं सहता।
  • यो ममायितमिंत जहाति, स त्यजति ममायितम्।
स खलु: दृष्टपथ: मुनि:, यस्य नास्ति ममायितम्॥ -- समणसुत्त : १४२
जो परिग्रह की बुद्धि का त्याग करता है, वही परिग्रह को त्याग सकता है। जिसके पास परिग्रह नहीं है, उसी मुनि ने पथ को देखा है।
  • ग्रंथत्याग: इन्द्रिय-निवारणे, अंकुश इव हस्तिन:।
नगरस्य खातिका इव च, इन्द्रियगुप्ति: असंगत्वम्॥ -- समणसुत्त : १४६
जैसे हाथी को वश में रखने के लिए अंकुश होता है और नगर की रक्षा के लिए खाई होती है, वैसे ही इन्द्रिय-निवारण के लिए परिग्रह का त्याग (कहा गया) है। असंगत्व (परिग्रह-त्याग) से इन्द्रियां वश में होती है।
  • होऊण य णिस्संगो, णियभावं णिग्गहित्तु सुहदुहदं।
णिद्दंदेण दु वट्टदि, अणयारो तस्सऽिंकचण्हं॥ -- बारह अणुवेक्खा : ७९
जो साधक सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग कर नि:संग हो जाता है, अपने सुखद व दु:खद भावों का निग्रह करके निद्र्वंद्व विचरता है, उसे आिंकचन्य धर्म होता है, अर्थात् वह नितान्त अपरिग्रह-वृत्ति वाला होता है।
  • जे ण कुणइ अवराहे, णो णिस्संको दु जणवए भमदि। -- समयसार : ३०२
जो किसी प्रकार का अपराध नहीं करता, वह निर्भय होकर जनपद में भ्रमण कर सकता है। इसी प्रकार निरपराध (निर्दोष) आत्मा (पाप नहीं करने वाला) भी सर्वत्र निर्भय होकर विचरता है।
  • संवेगजनितकरणा:, नि:शल्या मन्दर इव निष्कम्पा:।
यस्य दृढ़ा जिनभक्ति:, तस्य भयं नास्ति संसारे॥ -- समणसुत्त : ३०७
जिसके हृदय में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने वाली, शल्य रहित तथा मेरुवत् निष्कम्प और दृढ़ जिनभक्ति है, उसे संसार में किसी तरह का भय नहीं है।
  • अभयं पत्थिवा! तुब्भं , अभयदाया भवाहि य। -- समणसुत्त : १५९
  • हे र्पािथव ! तुझे अभय है। तू भी अभयदाता हो ! यत् क्रियते परिरक्षा, नित्यं मरणभयभीरुजीवानाम्।
तद् जानीहि अभयदानम् , शिखामणिं सर्वदानानाम्॥ -- समणसुत्त : ३३५
सदैव मृत्यु से भयभीत जीवों की रक्षा करने को ही अभयदान जानो ! अभयदान सभी दानों में शिरोमणि है।
  • श्रद्दधाति च प्रत्येति च, रोचयति च तथा पुनश्च स्पृशति।
धर्मं भोगनिमित्तं, न तु स कर्मक्षयनिमित्तम्॥ -- समणसुत्त : १९७
अभव्य जीव यद्यपि धर्म में श्रद्धा रखता है, उसकी प्रतीति करता है, उसमें रुचि रखता है, उसका गालन भी करता है, किन्तु यह सब वह धर्म को भोग का निमित्त समझकर करता है, कर्मक्षय का कारण समझकर नहीं करता।
  • ण मुयइ पयडिमभव्वो, सुट्ठु वि अज्झाइण सत्थाणि।
गुडदुद्धं पि पिबंता, ण पण्णया णिव्विसा हुंति॥ -- समयसार : ३१७
अभव्य जीव चाहे कितने ही शास्त्रों का अध्ययन कर ले, किन्तु फिर भी वह अपनी प्रकृति (स्वभाव) नहीं छोड़ता। साँप चाहे जितना भी गुड़-दूध पी ले, किन्तु अपना विषैला स्वभाव नहीं छोड़ता।
  • पुरिसा जे गुणरहिया कुलेण गव्वं वहंति ते मूढा।
वंसुप्पण्णं पि धणू गुणरहियं भणह किं कुणइ॥ -- गाहारयण कोष: ९८
वे पुरुष मूर्ख हैं, जो गुणरहित होते हुए भी कुल का अभिमान करते हैं, उत्तम बांस से बना हुआ धनुष यदि गुण (रस्सी) रहित है जो कहो वह क्या कर सकता है ?
  • शैलेशीं संप्राप्त:, निरुद्धनि: शेषास्रवो जीव:।
कर्मरज: विप्रमुक्तो, गतयोग: केवली भवति॥ -- समणसुत्त ५६४
जो शील के स्वामी हैं, जिनके सभी नवीन कर्मों का आस्रव अवरुद्ध हो गया है तथा जो पूर्वसंचित कर्मों से (बंध से) सर्वथा मुक्त हो चुके हैं, वे अयोगी केवली कहलाते हैं।
  • स तस्मिन् चैव समये, लोकाग्रे ऊध्र्वगमन-स्वभाव:।
संचेष्टते अशरीर:, प्रवराष्टगुणात्मको नित्यम्॥ अष्टविधकर्मविकला:, शीतीभूता निरंजना नित्या:।
अष्टगुणा कृतकृत्या:, लोकाग्रनिवासिन: सिद्धा:॥ -- समणसुत्त : ५६५-५६६
इस (चौदहवें) गुणस्थान को प्राप्त कर लेने के उपरांत उसी समय ऊध्र्वगमन स्वभाव वाला वह अयोगी केवली अशरीरी तथा उत्कृष्ट आठ गुणसहित होकर सदा के लिए लोक के अग्रभाग पर चला जाता है। (उसे सिद्ध कहते हैं।)
  • घनघातिकर्ममथना:, त्रिभुवनवरभव्यकमलमार्तण्डा:।
अर्हा: (अर्हन्त:) अनन्तज्ञानेन, अनुपमसौख्या जयन्तु जगति॥ -- समणसुत्त : ७
सघन घाति कर्मों का आलोड़न करने वाले, तीनों लोकों में विद्यमान भव्य जीव रूपी कमलों को विकसित करने वाले सूर्य, अनन्तज्ञानी और अनुपम सुखमय अर्हंतों की जगत में जय हो।
  • जीवाश्चैव अजीवाश्च, एष लोको व्याख्यात:।
अजीवदेश आकाश: अलोक: स व्याख्यात:॥ -- समणसुत्त : ६३६
यह लोक जीव और अजीवमय कहा गया है। जहाँ अजीव का एक देश (भाग) केवल आकाश पाया जाता है, उसे अलोक कहते हैं।
  • अवियारिऊण कज्जं सहसच्चिय चे नरा पयट्टन्ति।
डज्झंति तेवराधा, दीवसिहाय पयंगो व्व॥ -- गाहारयण : २५३
अविचारपूर्वक आवेश में सहसा जो काम करते हैं, वे दीपशिखा में पतंगे की तरह जल जाते हैं।
  • यावन्तोऽविद्यापुरुषा:, सर्वे ते दु:खसम्भवा:।
लुप्यन्ते बहुशो मूढा:, संसारेऽनन्तके॥ -- समणसुत्त : ५८८
समस्त अविद्यावान (अज्ञानी पुरुष) दु:खी हैं-दु:ख के उत्पादक हैं। वे विवेक-मूढ़ अनन्त संसार में बार-बार लुप्त होते हैं।
  • वित्तं पशवश्च ज्ञातय:, तद् बाल: शरणमिति मन्यते।
एते मम तेष्यप्यहं, नो त्राणं शरणं न विद्यते॥ -- समणसुत्त : ५०९
अज्ञानी जीव धन, पशु तथा जातिवर्ग को अपना रक्षक या शरण मानता है कि ये मेरे हैं और मैं इनका हूँ किन्तु वास्तव में ये सब न तो रक्षक हैं और न शरण।
  • एकत: सकलं पापमसत्योत्थं ततोऽन्यत:।
साम्यमेव वदन्त्यार्यास्तुलाया धृतयोस्तयो:॥ -- ज्ञानार्णव : १२६
एक ओर जगत् के समस्त पाप एवं दूसरी ओर असत्य का पाप-इन दोनों को तराजू में तोला जाय, तो बराबर होंगे-ऐसा आर्य पुरुष कहते हैं।
  • मृषावाक्यस्य पश्चाच्च पुरस्ताच्च, प्रयोगकाले च दु:खी दुरन्त:।
एवमदत्तानि समाददान:, रूपेऽतृप्ता दु:खितोऽनिश्र:॥ -- समणसुत्त : ९३
असत्य भाषण के पश्चात् मनुष्य यह सोचकर दु:खी होता है कि वह झूठ बोलकर भी सफल नहीं हो सका। असत्य भाषण से पूर्व इसलिए व्याकुल रहता है कि वह दूसरे को ठगने का संकल्प करता है। वह इसलिए भी दु:खी रहता है कि कहीं कोई उसके असत्य को जान न ले। इस प्रकार असत्य-व्यवहार का अंत दु:खदायी होता है। इसी तरह विषयों से अतृप्त होकर वह चोरी करता हुआ दु:खी और आश्रयहीन हो जाता है।
  • वियलिय धणाण दानं, जरजज्जर जुव्वणाण परिणयणं।
मरणसरणाय धम्मो, किसिकम्मं सरयसमयम्मि॥ -- गाहारयण कोष : ६६
धन के नाश होने पर दान, यौवन के नष्ट होने पर विवाह, मृत्यु के समय धर्माचरण और शरदकाल में खेती-ये सब असमय हैं।
  • सव्वेसिमासमाणं हिदयं गब्भो व सव्व सत्थाणं। -- भगवती आराधना : ७९०
अहिंसा सब आश्रमों का हृदय है, सब शास्त्रों का गर्भ-उत्पत्तिस्थान है।
  • जीववध आत्मवधो, जीवदयाऽत्मनो दया भवति।
तस्माद् सर्वजीवहिंसा, परित्यक्ताऽऽत्मकामै:॥ -- समणसुत्त : १५१
जीव का वध अपना ही वध है। जीव की दया अपनी ही दया है। अत: आत्म-हितैषी (आत्म-काम) पुरुषों ने सभी तरह की जीव हिंसा का परित्याग किया है।
  • तुंगं न मन्दरात् , आकाशाद्विशालकम नास्ति।
यथा तथा जगति जानीहि, धर्मोऽहिंसासमो नास्ति॥ -- समणसुत्त : १५८
जैसे जगत में मेरु पर्वत से ऊँचा और आकाश से विशाल और कुछ नहीं है, वैसे ही अिंहसा के समान कोई धर्म नहीं है।
  • सर्वेषामाश्रमाणां हृदयं, गर्भो वा सर्वशास्त्राणाम्।
सर्वेषां व्रतगुणानां, पिण्ड: सार: अहिंसा हि॥ -- समणसुत्त : ३६८
अहिंसा सब आश्रमों का हृदय, सब शास्त्रों का रहस्य तथा सब व्रतों और गुणों का पिण्डभूत सार है।
  • रागादीममणुप्पा अिंहसगत्तं। -- सर्वार्थसिद्धि : ७-२२-३६३-१०
  • रागादिक का उत्पन्न न होना वस्तुत: अिंहसा है। अत्ता चेव अहिंसा। -- भगवती आराधना : ८०३
(शुद्ध, निर्विकार) आत्मा ही अिंहसा है।
  • मरदु व जियदु व जीवो, अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा।
पयदस्स णत्थि बंधो, िंहसामेत्तेण समिदस्स॥ -- प्रवचनसार : ३-१७ ८०३
बाहर से प्राणी मरे या जीये, अयतनाचारी-प्रमत्त को अंदर से हिंसा निश्चित है। परन्तु जो अिंहसा की साधना के लिए प्रयत्नशील है, समिति वाला है, उसको बाहर में प्राणी की िंहसा होने मात्र से कर्मबंध नहीं है, अर्थात् वह हिंसक नहीं है।
  • आदाने निक्षेपे, व्युत्सर्जने स्थानगमनशयनेषु।
सर्वत्राऽप्रमत्तो, दयापरो भवति खल्विंहसक:॥ -- समणसुत्त : १६९
(चीजें) उठाने-रखने में, मल-मूत्रादि त्याग करने में, उठने-बैठने व चलने-फिरने में तथा शयन करने में जो दया-भाव से काम लेते हुए सदैव अप्रमत्त रहता है, वह अिंहसक ही हुआ करता है।
  • चेतनारहितममूत्र्तं अवगाहनलक्षणं च सर्वगतम्।
लोकालोकद्विभेदं, तद् नभोद्रव्यं जिनोद्दिष्टम्॥ -- समणसुत्त : ६३५
जिनेन्द्र देव ने आकाश द्रव्य को अचेतन, अमूर्त, व्यापक और अवगाह लक्षण वाला कहा है। लोक और अलोक के भेद से आकाश दो प्रकार का है।
  • तस्य मुखोद्गतवचनं, पूर्वापरदोषविरहितं शुद्धम्।
‘आगम’ इति परिकथितं, तेन तु कथिता भवन्ति तत्त्वार्थ:॥ -- समणसुत्त : २०
अर्हत् के मुख से उद्भूत पूर्वापरदोषरहित शुद्ध वचनों को आगम कहते हैं। उस आगम में जो कहा गया है, वह सत्यार्थ है।
  • बहुगंपि सुदमधीदं किं काहदि अजाणमाणस्स।
दीवविसेसो अंधे णाणविसेसो वि तह तस्स॥ -- मूलाचार : १०/६५
जो आचरणरहित है वह बहुत से शास्त्रों को भी पढ़ ले तो उसका वह शास्त्र ज्ञान क्या कर सकता है ? जैसे अंधे के हाथ में दीपक की कोई उपयोगिता नहीं होती, उसी प्रकार आचारहीन के ज्ञान की कोई विशेषता-उपयोगिता नहीं होती।
  • पंचमहाव्रततुंगा:, तत्कालिक स्वपरसमयश्रुतधारा:।
नानागुणगणभरिता:, आचार्या मम प्रसीदन्तु॥ -- समणसुत्त : ९
पाँच महाव्रतों से समुन्नत, तत्कालीन स्वसमय और परसमय रूप श्रुत के ज्ञाता तथा नाना गुण समूह से परिपूर्ण आचार्य मुझ पर प्रसन्न हों।
  • यथा दीपात् दीपशतं, प्रदीप्यते स च दीप्यते दीप:।
दीपसमा आचार्या:, दीप्यन्ते परं च दीपयन्ति॥ -- समणसुत्त : १७६
जैसे एक दीप से सैकड़ों दीप जल उठते हैं और वह स्वयं भी दीप्त रहता है, वैसे ही आचार्य दीपक के समान होते हैं। वे स्वयं प्रकाशवान् रहते हैं और दूसरों को भी प्रकाशित करते हैं।
  • गुर्वाज्ञाकरणं हि सर्वगुणेभ्योऽतिरिच्यते। -- त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित : १-८
गुरु-आज्ञा का पालन करना सब गुणों से बढ़कर है।
  • कह सो घिप्पई अप्पा ? पण्णाए सो उ घिप्पए अप्पा। -- समयसार : २९६
यह आत्मा किस प्रकार जाना जा सकता है ? आत्म प्रज्ञा अर्थात् भेद विज्ञान रूप बुद्धि से ही जाना जा सकता है।
  • जो अप्पाणि वसेइ, सो लहु पावइ सिद्धि सुहु। -- योगसार : ६५
जो निज आत्मा में वास करता है, वह शीघ्र ही सिद्धि-सुख को प्राप्त करता है।
  • अहमिक्को खलु सुद्धो, दंसणणाणमइयो सदारूवी।
ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि अण्णं परमाणुमित्तं पि॥ -- समयसार : ३८
आत्मद्रष्टा विचार करता है कि-‘‘मैं तो शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप, सदा काल अमूर्त, एक शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वरूप, सदा काल अमूर्त, एक शुद्ध शाश्वत तत्त्व हूँ। परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा नहीं है।’’
  • अप्पसंसं परिहरह सदा मा होह जसविणासयरा।
अप्पाणं थोवंतो तणलहुदो होदि हु जाणम्मि॥ -- भगवती आराधना : ३५९
आत्म-प्रशंसा का सदा के लिए त्याग कर देना चाहिए। कारण यह कि आत्म प्रशंसा यश को नष्ट करने वाली है। स्वयं अपनी प्रशंसा करने वाला संसार में तिनके की तरह तुच्छ हुआ करता है।
  • मा अप्पयं पसंसइ जइ वि जसं इच्छसे धवलं। -- कुवलयमाला
यदि निर्मल यश चाहते हो तो अपनी प्रशंसा मत करो।
  • वदणियमाणि धरंता, सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता।
परमट्ठबाहिरा जे, णिव्वाणं ते ण विदंति॥ -- समयसार : १५३
भले ही व्रत, नियम को धारण करे, तप और शील का आचरण करे, किन्तु जो परमार्थ रूप आत्मबोध से शून्य है, वह कभी निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता।
  • * तारा नक्षत्र ग्रह चंद्रनी, ज्योति दिनेष मोसार रे।
दर्शन-ज्ञान-चरण थकी, शक्ति निजताम धार रे॥ -- आनंदघन ग्रंथावली १५३
जिस प्रकार सूर्य में तारों, नक्षत्रों, ग्रहों और चंद्रमा की ज्योति अन्तर्भूत हो जाती है, उसी तरह आत्मा में भी दर्शन-ज्ञान-चारित्र गुण की शक्ति अन्र्तिनहित है।
  • अंतरतच्चं जीवो, बाहिरतच्चं हवंति सेसाणि। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : २०५
जीव (आत्मा) अन्तस्तत्त्व है, बाकी सब द्रव्य बहिस्तत्त्व है।
  • सुण्णीकयम्मि चित्ते, णूणं अप्पा पयासेइ। -- आराधनासार : ७४
चित्त को (विषयों से) शून्य कर देने पर उसमें आत्मा का प्रकाश झलक उठता है।
  • कत्ता भोत्ता आदा, पोग्गलकम्मस्स होदि ववहारो। -- नियमसार : १८
आत्मा पुद्गल कर्मों का कत्र्ता और भोक्ता है, यह मात्र व्यवहार दृष्टि है।
  • जारसिया सिद्धप्पा, भवमल्लिय जीव तारिसा होंति। -- नियमसार : ४७
जैसी शुद्ध आत्मा सिद्धों (मुक्त आत्माओं) की है, मूल स्वरूप से वैसी ही शुद्ध आत्मा संसारस्थ प्राणियों की है।
  • आलंबणं च मे आदा। -- नियमसार : ९६
मेरा अपना ही आत्मा ही मेरा अपना एकमात्र आलम्बन है।
  • अप्पाणं विणु णाणं, णाणं विणु अप्पगो न संदेहो। -- नियमसार : १७१
यह निश्चित सिद्धांत है कि आत्मा के बिना ज्ञान नहीं और ज्ञान के बिना आत्मा नहीं।
  • उवओग एव अहमिक्को। -- समयसार : ३७
मैं (आत्मा) एकमात्र उपयोगमय (ज्ञानमय) हूँ।
  • आया णे अज्जो ! सामाइए, आया णे अज्जो ! सामाइयस्स अट्ठे। -- भगवती सूत्र : १-९
हे आर्य ! आत्मा ही सामायिक (समत्वभाव) है, और आत्मा ही सामायिक का अर्थ (विशुद्धि) है।
  • तिमिरहरा जइ दिट्ठी, जणस्स दीवेण णत्थि कायव्वं। तह सोक्खं सयमादा, विसया किं तत्थ कुव्वंति ? -- प्रवचनसार : १-६७
जिसकी दृष्टि ही स्वयं अंधकार का नाश करने वाली है, उसे दीपक क्या प्रकाश देगा ? इसी प्रकार जब आत्मा स्वयं सुख रूप है तो उसे विषय क्या सुख देंगे ?
  • मणसलिले थिरभूए, दीसइ अप्पा तहाविमले। -- तत्त्वासार : ४१
मन रूपी जल, जब निर्मल एवं स्थिर हो जाता है, तब उसमें आत्मा का दिव्य रूप झलकने लगता है।
  • अरसमरूपमगन्धम् , अव्यक्तं चेतनागुणमशब्दम्।
जानीह्यलिंगग्रहणं, जीवमनिर्दिष्टसंस्थानम्॥ -- समणसुत्त : १८५
शुद्ध आत्मा वास्तव में अरस, अरूप, अगंध, अव्यक्त, चैतन्य गुण वाला, अशब्द, अलिंगग्राह्य (अनुमान का अविषय) और संस्थानरहित है।
  • निर्दण्ड: निद्र्वन्द्व:, निर्मम: निष्कल: निरालम्ब:।
नीराग: निद्र्वेष, निर्मूढ: निर्भय: आत्मा॥ -- समणसुत्त : १८६
आत्मा मन, वचन और काय रूप त्रिदंड से रहित, निद्र्वन्द्व-अकेला, निर्मम-ममत्वरहित, निष्कल-शरीररहित, निरालम्ब-परद्रव्यालम्बन से रहित, वीतराग, निर्दोष, मोहरहित तथा निर्भय है।
  • आत्मा खलु मम ज्ञानं, आत्मा मे दर्शनं चरित्रं च।
आत्मा प्रत्याख्यानं, आत्मा मे संयमो योग:॥ -- समणसुत्त : २१८
आत्म ही मेरा ज्ञान है। आत्मा ही दर्शन और चारित्र है। आत्मा ही प्रत्याख्यान है और आत्मा ही संयम और योग है। अर्थात् ये सब आत्मरूप ही हैं।
  • सरवंगा सब नइ घणीरे, माने सब परमान।
नयवादी पल्लो गहै (प्यारे), करइ लराइ ठान॥ -- आनंदघन ग्रंथावली, पद : ६१
वस्तुत: आत्मा में सभी नय घटित होते हैं। अत: यह आत्मा नय और प्रमाण से जाना जाता है। यह (आत्मा) सर्वांगी और स्वयं सब नयों का स्वामी है। इसका रूप एक नय द्वारा सिद्ध नहीं होता। अन्तत: आनन्दघन ने नयवाद से भी ऊपर उठकर आत्मा को अनुभवगम्य बताया है। उनका स्पष्ट कथन है कि यह आत्मा अनुभव ज्ञान से ही जाना जा सकता है।
  • जो खलु सुद्धो भावो सो अप्पणि तं च दंसणं णाणं। -- तत्त्वसार : ८
शुद्ध भाव (स्वभाव) जो है, वह आत्मा है और वह दर्शन-ज्ञान-सहित है।
  • नापि भवत्यप्रमत्तो, न प्रमत्तो ज्ञायकस्तु यो भाव:।
एवं भणंति शुद्धं, ज्ञातो य: स तु स चैव॥ -- समणसुत्त : १८८
आत्मा ज्ञायक है। ज्ञायक न अप्रमत्त होता है, न प्रमत्त। प्रमत्त और अप्रमत्त जो न हो, वह शुद्ध होता है। आत्मा ज्ञायक के रूप में ही ज्ञात है और वह शुद्ध अर्थ में ज्ञायक ही है। उसमें ज्ञेयकृत अशुद्धि नहीं है।
  • नाहं देहो न मनो, न चैव वाणी न कारणं तेषाम्।
कत्र्ता न न कारयिता, अनुमन्ता नैव कर्तृणाम्॥ -- समणसुत्त : १८९
मैं न देह हूँ, न मन हूँ, न वाणी हूँ और न ही उनका कारण हूँ। न मैं करने वाला हूँ, न कराने वाला हूँ और न ही करने वाले का अनुमोदन करने वाला हूँ।
  • को नाम भणेद् बुध:, ज्ञात्वा सर्वान् परकीयान् भावान्।
ममेदमिति च वचनं, जानन्नात्मकम् शुद्धम्॥ -- समणसुत्त : १९०
आत्मा के शुद्ध रूप को तथा उसके परकीय भावों को जानने वाला ऐसा विद्वान कौन होगा जो कहे-‘यह मेरा है।’
  • आतम अनुभव पूâल की, नवली कोऊ रीति।
नाक न पकरै वासना, कान गहै न परतीति॥ -- आनंदघन ग्रंथावली, पद :: २८
आत्मानुभव रूपी पुष्प की विलक्षणता ही कुछ निराली है। इसकी सुगंध को न नाक ग्रहण कर पाती है और न कान इसका संगीत सुन सकते हैं।
  • आतम अनुभौ रस कथा, प्याला अजब विचार।
अमली चाखत ही मरै, घूमै सब संसार॥ -- आनंदघन ग्रंथावली, पद :: ५३
आत्मानुभव रूप रस का प्याला एक ऐसा विलक्षण रस का प्याला है, जिसका आस्वादन करते ही, व्यक्ति आत्मानुभव में लीन हो जाता है। जिसने इस रस का पान नहीं किया, वह इस संसार में ही भटकता रहता है।
  • य: चिन्तयति न वक्र्म्, न करोति वव्रंâ न जल्पति वक्रम्।
न च गोपयति निजदोषम् , आर्जवधर्म: भवेत् तस्य॥ -- समणसुत्त : ९१
जो कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता और अपने दोषों को नहीं छिपाता, उसके आर्जव-धर्म होता है।
  • अलस: सर्वकर्मणामनधिकारी। -- नीतिवाक्यामृत :१०-१४४
आलसी व्यक्ति सब कार्यों के लिए अयोग्य होता है।
  • अनाभोगकृतं कर्म, यत्किमपि मनसा कृतम्।
तत्सर्वमालोचयेत् खलु, अव्याक्षिप्तेन चेतसा॥ -- समणसुत्त : ४६१
मन-वचन-काय द्वारा किए जाने वाले शुभाशुभ कर्म दो प्रकार के होते हैं-आभोगकृत और अनाभोगकृत। दूसरों द्वारा जाने गए कर्म आभोगकृत हैं और दूसरों के द्वारा न जाने गए कर्म अनाभोगकृत हैं। दोनों प्रकार के कर्मों की तथा उनमें लगे दोषों की आलोचना गुरु या आचार्य के समक्ष निराकुल चित्त से करनी चाहिए।
  • यथा कण्टकेन विद्ध:, सर्वांगे वेदर्नािदतो भवति।
तथैव उद्धृते तु निश्शल्यो निर्वृतो भवति॥ एवमनुद्धृतदोषो, मायावी तेन दु:खितो भवति।
स एव त्यक्तदोष:, सुविशुद्धो निर्वृतो भवति॥ -- समणसुत्त : ४६३-४६४
जैसे कांटा चुभने पर सारे शरीर में वेदना या पीड़ा होती है और कांटे के निकल जाने पर शरीर नि:शल्य अर्थात् सर्वांग सुखी हो जाता है, वैसे ही अपने दोषों को प्रकट न करने वाला मायावी दु:खी या व्याकुल रहता है और उनको गुरु के समक्ष प्रकट कर देने पर सुविशुद्ध होकर सुखी हो जाता है-मन में कोई शल्य नहीं रह जाता। अर्थात् श्रावक या साधु सभी को अपने समस्त दोषों की आलोचना माया-मद/छल-छद्म त्याग करनी चाहिए।
  • य: पश्यत्यात्मानं, समभावे संस्थाप्य परिणामम्।
आलोचनामिति जनीत, परमजिनेन्द्रस्योपदेशम्॥ -- समणसुत्त : ४६५
अपने परिणामों को समभाव में स्थापित करके आत्मा को देखना ही आलोचना है। ऐसा जिनेन्द्रदेव का उपदेश है।
  • परित्यक्त्वा परभावं, आत्मानं ध्यायति निर्मलस्वभावम्।
आत्मवश: स भवति खलु, तस्य तु कम्र्म भणन्ति आवश्यकम्॥ -- समणसुत्त : ४१७
परभाव का त्याग करके निर्मल-स्वभावी आत्मा का ध्याता आत्मवशी होता है। उसके कर्म को ‘आवश्यक’ कहा जाता है।
  • राग दोस मोह के पासे, आप वणाए हितधर।
जैसा दाव परे पासे का, सारि चलावे खिलकर॥ -- आनंदघन ग्रंथावली, पद : ५६
आत्मा ने स्वयं प्रसन्न होकर संसार रूप चौपड़ को खेलने के लिए राग-द्वेष और मोह रूप पासे बना लिए हैं। जैसे पासा आता है, उसी के अनुसार आत्मा रूप कर्म खिलाड़ी द्वारा सार (गोट) चलाई जाती है। तात्पर्य यह कि चतुर्गति रूप चौपड़ में आत्मा को राग-द्वेष और मोह पासे के कारण ही विभिन्न शरीर धारण करना पड़ता है। आत्म राग-द्बेष-मोह की जैसी-जैसी प्रवृत्तियां करता है, तद्वत् उसे विभिन्न गतियों एवं उत्पत्ति-स्थानों में जाना पड़ता है।
  • नीया वि समत्थेहिं गहिया उच्चं लहंति संठाणं।
धूलिकणा पुहवीए चरंति गयणम्मि वाएण॥ -- गाहारयणकोष : १२०
नीच व्यक्ति भी यदि बड़ों का सहारा लेते हैं तो ऊँचे पद तक पहुँच जाते हैं। जैसे पृथ्वी के धूलि-कण हवा का आश्रय पाकर आकाश में गमन करते हैं।
  • महिलाकरेणुयाणं, लुद्धो घरवाहि-नियल-पडिवद्धो।
अणुहवइ तत्थ दुक्खं पुरिसगओ बम्महासत्तो॥ -- पउमचरिउ : ५६६
स्त्री रूपी हथिनियों से लुब्ध, घरबार रूपी जंजीरों से जकड़ा हुआ और काम में आसक्त पुरुष रूपी गज जीव संसार में दु:ख अनुभव करता है।
  • आस्रवद्वारै: सदा, हिंसादिक कर्मास्रवति।
यथा नावो विनाशश्छिद्रै: जलम् उदधिमध्ये॥ -- समणसुत्त : ६०२
हिंसा आदि आस्रव द्वारों से सदा कर्मों का आस्रव होता रहता है। जैसे कि समुद्र में जल के आने से सछिद्र नौका डूब जाती है।
  • मिच्छत्ताविरदी वि य, कसायजोगा य आसवा होंति। -- जयधवला : १-९-५४
मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग-ये आस्रव के हेतु हैं।
  • रसा: प्रकामं न निषेवितव्या:, प्रायो रसा दीप्तिकरा नराणाम्।
दीप्तं च कामा: समभिद्रवन्ति, द्रुमं यथा स्वादुफलमिव पक्षिण:॥ -- समणसुत्त : २९३
रसों का अत्यधिक सेवन नहीं करना चाहिए। रस प्राय: उन्मादवर्धक होते हैं, पुष्टिवर्धक होते हैं। मदाविष्ट या विषयासक्त मनुष्य को काम वैसे ही सताता या उत्पीड़ित करता है जैसे स्वादिष्ट फल वाले वृक्ष को पक्षी।
  • न बलायु:स्वादार्थं, न शरीरस्योपचयार्यं तेजोऽर्थम्।
ज्ञानार्थं समयार्थं, ध्यानार्थं चैव भुंजीत॥ -- समणसुत्त : ४०६
मुनिजन न तो बल या आयु बढ़ाने के लिए आहार करते हैं, न स्वाद के लिए करते हैं और न शरीर के उपचय या तेज के लिए करते हैं। वे ज्ञान, संयम और ध्यान की सिद्धि के लिए ही आहार करते हैं।
  • सुष्ठ्वपि माग्र्यमाण:, कुत्रापि कदल्यां नास्ति यथा सार:।
इन्द्रियविषयेषु तथा, नास्ति सुखं सुष्ठ्वपि गवेषितम्॥ -- समणसुत्त : ४७
बहुत खोजने पर भी जैसे केले के पेड़ में कोई सार नहीं दिखाई देता, वैसे ही इन्द्रिय–विषयों में भी कोई सुख दिखाई नहीं देता।
  • सयरं बाधासहियं, विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं।
जं इंदियेहिं लद्धं, तं सोक्खं दुक्खमेव तहा॥ -- प्रवचनसार : १-७६
जो सुख इन्द्रियों से प्राप्त होता है, वह पराश्रित, बाधारहित, विच्छिन्न, बंध का कारण तथा विषम होने से वस्तुत: सुख नहीं, दु:ख ही है।
  • न भवो भंगविहीनो, भंगो वा नास्ति सम्भवविहीन:।
उत्पादोऽपि च भंगो, न विना ध्रौव्येणार्थेन॥ -- समणसुत्त : ६६३
उत्पाद व्यय के बिना नहीं होता और व्यय उत्पाद के बिना नहीं होता। इसी प्रकार उत्पाद और व्यय दोनों त्रिकाल स्थायी ध्रौव्य अर्थ (आधार) के बिना नहीं होते।
  • उत्पादस्थितिभंगा, विद्यन्ते पर्यायेषु पर्याया:।
द्रव्यं हि सन्ति नियतं, तस्माद् द्रव्यं भवति सर्वम्॥ -- समणसुत्त : ६६४
उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य (उत्पत्ति, विनाश और स्थिति) ये तीनों द्रव्य में नहीं होते, अपितु द्रव्य की नित्य परिवर्तनशील पर्यायों में होते हैं। परन्तु पर्यायों का समूह द्रव्य है, अत: सब द्रव्य ही हैं।
  • समवेतं खलु द्रव्यं, सम्भवस्थितिनाशसंज्ञितार्थै:।
एकस्मिन् चैव समये, तस्माद् द्रव्यं खलु तत् त्रितयम्॥ -- समणसुत्त : ६६५
द्रव्य एक ही समय में उत्पाद, व्यय व ध्रौव्य नामक अर्थो के साथ समवेत–एकमेक है। इसलिए तीनों वास्तव में द्रव्य हैं।
  • होदि कसाउम्मत्तो उम्मत्तो, तह ण पित्तउम्मत्तो -- भगवती आराधना : १३२५
वात, पित्त आदि विकारों से मनुष्य वैसा उन्मत्त नहीं होता, जैसा कि कषायोंन्मत्त ही वस्तुत: उन्मत्त है।
  • धर्मे धर्मोपदेष्टार:, साक्षिमात्रं शुभात्मनाम्। -- त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् : २-३
धर्मात्माओं को धर्म में प्रेरित करने के लिए उपदेशक तो साक्षि-मात्र ही होते हैं।
  • उपशमनम् अक्षाणाम्, उपवास: र्विणत: समासेन।
तस्मात् भुंजाना: अपि च, जितेन्द्रिया भवन्ति उपवासा:॥ -- समणसुत्त : ४४६
संक्षेप में इन्द्रियों के उपशमन को ही उपवास कहा गया है। अत: जितेन्द्रिय साधु भोजन करते हुए भी उपवासी ही होते हैं।
  • अज्ञानघोरतिमिरे, दुरन्ततीरेहिण्डमानानाम्।
भव्यानाम् उद्योतकरा, उपाध्याय वरमिंत ददतु॥ -- समणसुत्त : १०
जिसका ओर-छोर पाना कठिन है, उस अज्ञान रूपी घोर अंधकार में भटकने वाले भव्य जीवों के लिए, ज्ञान का प्रकाश देने वाले उपाध्याय मुझे उत्तम मति प्रदान करें।
  • णाणं किरियारहियं, किरियामेत्तं च दोवि एगंता। -- सन्मतिप्रकरण : ३-६८
क्रियाशून्य ज्ञान और ज्ञानशून्य क्रिया, दोनों ही एकांत हैं। अर्थात् जैन दर्शन सम्मत नहीं है।
  • मा होह कोवणा भो खलेसु मित्त च मा कुणह॥ -- कुवलयमाला : ८५
हे मानव ! जीवों को मत मारो, उन पर दया करो, सज्जनों को अपमानित मत करो, क्रोधी मत होओ और दुष्टों से मित्रता न करो।
  • धम्मम्मि कुणह वसणं राओ सत्थेसु णिउणभणिएसु।
पुणरुत्तं च कलासु ता गणणिज्जो सुयणमज्झे॥ -- कुवलयमाला : ८५
शास्त्रों में, विद्वानों के वचनों में अनुराग करो एवं धर्म का अभ्यास करो एवं कलाओं का बार-बार पुनरावर्तन करो, तब सज्जनों के बीच में गिनने योग्य होवोगे।
  • थोवं थोवं धम्मं जइ ता बहुं न सक्केह।
पेच्छह महानईयो बिन्दूहिं समुद्दभूयाओ॥ -- अर्हत्प्रवचन : १९-१४
यदि अधिक न कर सको तो थोड़ा-थोड़ा ही धर्म करो। बूँद-बूँद से समुद्र बन जाने वाली महानदियों को देखो।
  • जीवाणं चेयकडा कम्मा कज्जंति, नो अचेयकडा कम्मा कज्जंति। -- भगवती सूत्र : १६-२
आत्माओं के कर्म चेतनाकृत होते हैं, अचेतनाकृत नहीं।
  • कर्म चिन्वन्ति स्ववशा:, तस्योदये तु परवशा भवन्ति।
वृक्षमारोहति स्ववश:, विगलति स परवश: तत:॥ -- समणसुत्त : ६०
जीव कर्मों का बंध करने में स्वतंत्र है पर उस कर्म का उदय होने पर भोगने में उसके अधीन हो जाता है। जैसे कोई पुरुष स्वेच्छा से वृक्ष पर तो चढ़ जाता है, किन्तु प्रमादवश नीचे गिरते समय परवश हो जाता है।
  • कर्मवशा: खलु जीवा:, जीववशानि कुत्रचित् कर्माणि।
कुत्रचित् धनिक: बलवान् , धारणिक: कुत्रचित् बलवान्॥ -- समणसुत्त : ६१
कहीं जीव कर्म के अधीन होते हैं तो कहीं कर्म जीव के अधीन होते हैं। वैसे कहीं (ऋण देते समय तो) धनी बलवान् होता है तो कहीं (ऋण लौटाते समय) कर्जदार बलवान होता है।
  • य इन्द्रियादिविजयी, भूत्वोपयोगमात्मवंâ ध्यायति।
कर्मभि: स न रज्यते, कस्मात् तं प्राणा अनुचरन्ति॥ -- समणसुत्त : ६३
जो इन्द्रिय आदि पर विजय प्राप्त कर उपयोगमय (ज्ञानदर्शनमय) आत्मा का ध्यान करता है, वह कर्मों से नहीं बंधता। अत: पौद्गलिक प्राण उसका अनुसरण केसे कर सकते हैं ? (अर्थात् उसे नया जन्म धारण नहीं करना पड़ता।)
  • कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह सुसीलं।
कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेदि॥ -- समयसार : १४५
अशुभ कर्म बुरा (कुशील) और शुभ कार्य अच्छा (सुशील) है, यह साधारणजन मानते हैं किन्तु वस्तुत: जो कर्म प्राणी को संसार में परिभ्रमण कराता है, वह अच्छा वैâसे हो सकता है, अर्थात् शुभ या अशुभ, सभी कर्म अन्तत: हेय ही हैं।
  • कर्मत्वप्रायोग्या:, स्कन्धा जीवस्य परिणतिं प्राप्य।
गच्छन्ति कर्मभावं, न हि ते जीवेन परिणमिता:॥ -- समणसुत्त : ६५५
कर्मरूप में परिणमित होने के योग्य पुद्गल जीव के रागादि (भावों) का निमित्त पाकर स्वयं ही कर्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं। जीव स्वयं उन्हें (बलपूर्वक) कर्म के रूप में परिणमित नहीं करता।
  • जह कोई इयरपुरिसो, रंधेऊणं सयं च तं भुंजे।
तह जीवो वि सयं चिय, काउं कम्मं सयं भुंजे॥ -- कुवलयमाला : १७९
जिस तरह कोई व्यक्ति रसोई बनाकर स्वयं उस रसोई को खाता है, वैसे ही जीव स्वय कर्म कर उसका उपभोग करते हैं।
  • जह देहम्मि सिणिद्धे लग्गइ रेणू अलक्खिओ चेय।
रायद्दोससिणिद्धे जीवे कम्मं तहच्चेव॥ -- कुवलयमाला : १७९
जिस तरह स्निग्ध देह पर लगी रज दिखाई नहीं देती, वैसे ही रागद्वेष से स्निग्ध जीव पर लगे कर्म दिखाई नहीं देते।
  • कम्मेहिं दु अण्णाणी किज्जदि णाणी तहेव कम्मेहिं।
कम्मेहिं सुवाविज्जादि जग्गाविज्जदि तहेव कम्मेहिं॥ -- समयसार : ३३२
(जीव) को कर्म अज्ञानी बनाते हैं और ज्ञानी भी कर्म ही बनाते हैं। कर्म उसे सुलाते हैं और जगाते भी कर्म ही हैं।
  • सौवण्णियं पि णियलं बंधदि कालायसं पि जह पुरिसं।
बंधदि एवं जीवं सुहमसुहं वा कदं कम्मं॥ -- समयसार : १४६
बंधन सोने का हो या लोहे का, पुरुष को जिस प्रकार बांधकर ही रखता है, उसी प्रकार कर्म अशुभ हो या शुभ, प्राणी को संसार के बंधन में ही रखा करता है।
  • कम्मं पुण्णं पावं, हेऊ तेसिं च होंति सच्छिदरा।
मंदकसाया सच्छा, तिव्वकसाया असच्छा हु॥ -- समणसुत्त : ५९८
कर्म के दो रूप होते हैं-पुण्य और पाप। पुण्य कर्म स्वच्छ भाव से र्अिजत होता है और पाप कर्म अस्वच्छ अथवा अशुभ भाव से बंधता है। शुभ भाव मंद कषाय वाले जीवों का हुआ करता है और अशुभ भाव तीव्र कषाय वाले जीवों को होता है।
  • जं अण्णाणी कम्मं, खवेदि भवसयहस्स-कोडीहिं।
तं णाणी तिहिं गुत्तो, खवेदि उस्सासमेत्तेण॥ -- प्रवचनसार : ३-३८
अज्ञानी साधक बाल तप के द्वारा लाखों-करोड़ों जन्मों में जितने कर्म खपाता है, उतने कर्म मन, वचन, काया को संयत रखने वाला ज्ञानी साधक एक श्वास मात्र में खपा देता है।
  • भवकोडी-संचियं कम्मं, तवसा निज्जरिज्जइ। -- उत्तराध्ययन : ३०-६
साधक करोड़ों भवों के संचित कर्मों को तपस्या के द्वारा क्षीण कर देता है।
  • अप्पाणं जो णिंदइ, गुणवंताणं करेइ बहुमाणं। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ११२
जो मनुष्य अपनी निंदा करता है और गुणवन्तों की प्रशंसा करता है, उसके कर्म-निर्जरा होती है।
  • ण य वत्थुदो दु बंधो, अज्झवसाणेण बंधोत्थि। -- समयसार : २६५
कर्मबंध वस्तु से नहीं, राग और द्वेष के अध्यवसाय-संकल्प से होता है।
  • भोगामिषदोषण्ण: हितनि:श्रेयसबुद्धिविपर्यस्त:।
बालश्च मन्दित: मूढ:, बध्यते मक्षिकेव श्लेष्मणि॥ -- समणसुत्त : ५०
आत्मा को दूषित करने वाला भोगामिष (आसक्तिजनक भोग) में निमग्न, हित और श्रेयस में विपरीत बुद्धि वाला, अज्ञानी, मंद और मूढ़ जीव उसी तरह (कर्मों से) बंध जाता है, जैसे श्लेष्म (बलगम) में मक्खी।
  • अध्यवसितेन बन्ध:, सत्त्वान् मारयेद् मा अथ मारयेत्।
एष बन्धसमासो, जीवानां निश्चयनयस्य॥ -- समणसुत्त : १५४
िंहसा करने के अध्यवसाय से ही कर्म का बंध होता है, फिर कोई जीव मरे या न मरे। निश्चय-नय के अनुसार संक्षेप में जीवों के कर्मबंध का यही स्वरूप है।
  • सौर्विणकमपि निगलं, बध्नाति कालायसमपि यथा पुरुषम्।
बध्नात्येवं जीवं, शुभमशुभं वा कृतं कर्म॥ -- समणसुत्त : २०१
बेड़ी सोने की हो चाहे लोहे की, पुरुष को दोनों की बेड़ियाँ बांधती हैं। इसी प्रकार जीव को शुभ-अशुभ कर्म बांधते हैं।
  • अर्थेन तत् न बध्नाति, यदनर्थेन स्तोकबहुभावात्।
अर्थे कालादिका:, नियामका: न त्वनर्थके॥ -- समणसुत्त : २३२
प्रयोजनवश कार्य करने से अल्प कर्मबंध होता है और बिना प्रयोजन कार्य करने से अधिक कर्मबंध होता है क्योंकि सप्रयोजन कार्य में तो देशकाल आदि परिस्थितियों की सापेक्षता रहती है, लेकिन निष्प्रयोजन प्रवृत्ति तो सदा ही (अमर्यादित रूप से) की जा सकती है।
  • भावेन येन जीव:, प्रेक्षते जानात्यागतं विषये।
रज्यति तेनैव पुन-र्बध्यते कर्मेत्युपदेश:॥ -- समणसुत्त : ६५६
जीव अपने राग या द्वेष रूप जिस भाव से संयुक्त होकर इन्द्रियों के विषयों के रूप में आगत या ग्रहण किए गए पदार्थों को जानता-देखता है, उन्हीं से उपरक्त होता है, और उसी उपरागवश नवीन कर्मों का बंध करता है।
  • सर्वजीवनां कर्म तु, संग्रहे षड्दिशागतम्।
सर्वेष्वपि प्रदेशेषु, सर्वं सर्वेण बद्धकम्॥ -- समणसुत्त : ६५७
सभी जीवों के लिए संग्रह (बद्ध) करने के योग्य कर्म-पुद्गल छहों दिशाओं में सभी आकाश-प्रदेशों में विद्यमान हैं। वे सभी कर्म-पुद्गल आत्मा के सभी प्रदेशों के साथ बद्ध होते हैं।
  • पक्के फलम्हि पडिए, जह ण फलं बज्झए पुणो विंटे।
जीवस्स कम्मभावे, पडिए ण पुणोदयमुवेइ॥ -- समयसार : १६८
जिस प्रकार पका हुआ फल गिर जाने के बाद पुन: वृन्त से नहीं लग सकता, उसी प्रकार कर्म भी आत्मा से विमुक्त होने के बाद पुन: आत्मा (वीतराग) को नहीं लग सकते।
  • श्रद्धां नगरं कृत्वा, तप:संवरमर्गलाम्।
क्षान्तिं निपुणप्राकारं, त्रिगुप्तं दुष्प्रधर्षकम्॥ तपोनाराचयुक्तेन, भित्त्वा कर्मकचुकम्।
मुर्नििवगतसंग्राम:, भवात् परिमुच्यते॥ -- समणसुत्त : २८६-२८७
श्रद्धा को नगर, तप और संवर को अर्गला, क्षमा को (बुर्ज, खाई और शतघ्नीस्वरूप) त्रिगुप्ति (मन-वचन-काय) से सुरक्षित तथा अजेय सुदृढ़ प्राकार बनाकर तपरूप वाणी से युक्त धनुष से कर्म-कवच को भेदकर (आंतरिक) संग्राम का विजेता मुनि संसार से मुक्त होता है।
  • परेषां दूषणाज्जातु न बिभेति कवीश्वरा:।
किमुलूकभयाद् धुन्वन् ध्वान्तं नोदेति भानुमान्॥ -- आदिपुराण : १-७५
दूसरों के भय से कविजन (विद्वान) कभी डरते नहीं हैं। क्या उल्लुओं के भय से सूर्य अंधकार का नाश करना छोड़ देता है ?
  • ज्ञानेन च ध्यानेन च, तपोबलेन च बलान्निरुध्यन्ते।
इन्द्रियविषयकषाया, धृतास्तुरगा इव रज्जुभि:॥ -- समणसुत्त : १३१
ज्ञान, ध्यान और तपोबल से इन्द्रिय-विषयों और कषायों को बलपूर्वक रोकना चाहिए, जैसे कि लगाम के द्वारा घोड़ों को बलपूर्वकर रोका जाता है।
  • ऋणस्तोदकम् व्रणस्तोकम्, अग्निस्तोवंâ कषास्तोवंâ च। न हि भवद्भिर्विश्वसितव्यं, स्तोकमपि खलु तद् बहु भवति। -- समणसुत्त : १३४
ऋण को थोड़ा, घाव को छोटा, आग को तनिक और कषाय को अल्प मान, विश्वस्त होकर नहीं बैठ जाना चाहिए क्योंकि ये थोड़े भी बढ़कर बहुत हो जाते हैं।
  • कामासक्तस्य नास्ति चिकित्सितम्। -- नीतिवाक्यामृत : ३-१२
कामासक्त व्यक्ति का कोई इलाज नहीं है। अर्थात् काम रोग की कोई चिकित्सा नहीं है।
  • धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत। -- नीतिवाक्यामृत : ३-२
धर्म और धन का नाश न करते हुए काम का सेवन करना उचित है।
  • नागो जहा पंकजलावसन्नो, दट्ठुं थलं नाभिसमेइ तीरं।
एवं जिआ कामगुणेसु गिद्धा, सुधम्ममग्गे न रया हवंति॥ -- इन्द्रियपराजयशतक : ५९
जैसे कीचड़-युक्त जल में रहा हाथी तट की भूमि को देखते हुए भी तट पर नहीं आ सकता, वैसे ही काम-विषय में आसक्त बना मनुष्य समझते हुए भी धर्म मार्ग में लीन नहीं हो सकता।
  • पज्जलिओ विसयअग्गी, चरित्तसारं डहिज्ज कसिणंपि। -- इन्द्रियपराजयशतक : ८२
प्रज्जवलित कामाग्नि समस्त चारित्र रूपी धन को जला डालती है।
  • छारस्स कए नासन्ति चन्दणं मोत्तियं च दोरत्थे।
तह मणुय भोग-मूढा नरा वि नासन्ति देविड्ढिं॥ -- पउमचरियं : ४/५०
जैसे मूर्ख व्यक्ति राख के लिए चंदन और डोरे के लिए मोती को नष्ट करते हैं, वैसे ही मानवीय भोगों में मूढ़ मनुष्य जीवन की दिव्य उपलब्धियों को तुच्छ वस्तुओं के लिए नष्ट करते हैं।
  • सुखेन भावितं ज्ञाने, दु:खे जाते विनश्यति।
तस्मात् यथाबलं योगी, आत्मानं दु:खै: भावयेत्॥ -- समणसुत्त : ४५३
सुखपूर्वक प्राप्त किया हुआ ज्ञान दु:ख के आने पर नष्ट हो जाता है। अत: योगी को अपनी शक्ति के अनुसार दु:खों के द्वारा अर्थात् कायक्लेशपूर्वक आत्म-चिन्तन करना चाहिए।
  • दैवसिकनियमादिषु, यथोक्तमानेन उक्तकाले।
जिनगुणचिन्तनयुक्त:, कायोत्सर्गस्तनुविसर्ग:॥ -- समणसुत्त : ४३४
दैनिक प्रतिक्रमण के नियमानुसार यथोचित समयावधि (२७ श्वासोच्छ्वास) तक जिनप्रभु के गुणों का चिन्तन करते हुए शरीर की ममता को छोड़ देना कायोत्सर्ग है।
  • देहमति: जाड्यशुद्धि: सुखदु:ख-तितिक्षता अनुप्रेक्षा।
ध्यायति च शुभं ध्यानम् एकाग्र: कायोत्सर्गे॥ -- समणसुत्त : ४८१
कायोत्सर्ग करने से शरीर की जड़ता समाप्त होती है (उसके कफ आदि दोष दूर होते हैं)। बुद्धि की जड़ता समाप्त होती है (जागरूकता बढ़ती है)। सुख-दु:ख समतापूर्वक सहने की शक्ति बढ़ती है। धर्म-भावनाओं को यथोचित अवसर मिलता है और शुभ ध्यान के लिए आवश्यक एकाग्रता मिलती है।
  • स्पर्शरसगन्धवर्णव्यतिरिक्तम् अगुरुलघुकसंयुक्तम्।
वर्तनलक्षणकलितं कालस्वरूपम् इदं भवति॥ -- समणसुत्त : ६३७
स्पर्श, गन्ध, रस और रूप से रहित, अगुरु-लघु गुण से युक्त तथा वर्तना लक्षण वाला काल द्रव्य है।
  • जीवानां पुद्गलानां भवन्ति परिवर्तनानि विविधानि।
एतेषां पर्याया वर्तन्ते मुख्यकाल आधारे॥ -- समणसुत्त : ६३८
जीवों और पुद्गलों में नित्य होने वाले अनेक प्रकार के परिवर्तन या पर्यायें मुख्यत: कालद्रव्य के आधार से होती हैं-उनके परिणमन में कालद्रव्य निमित्त होता है। (इसी को आगम में निश्चयकाल कहा गया है।)
  • समय आवलि उच्छवास: प्राणा: स्तोकाश्च आदिका भेदा:। व्यवहारकालनामान: निर्दिष्टा वीतरागै:। -- समणसुत्त : ६३९
वीतराग देव ने बताया है कि व्यवहार-काल, समय, आवलि, उच्छ्वास, प्राण, स्तोक आदि रूपात्मक हैं।
  • सयलजणनयणकडुयं नित्यामं तह पयायपरब्भट्ठं।
नियतणयं धूमं पेच्छिऊण छारं गओ अग्गी॥ -- गाहारयणकोष : ८१०
समस्त लोगों की आँखों को कडुवा लगने वाला, पुरुषार्थ रहित, प्रताप से भ्रष्ट अपने पुत्र धुएं को देखकर आग (लज्जा से) स्वयं जलकर राख बन गई है। (बड़े व्यक्ति भी अपने कुपुत्रों से लज्जित होते हैं।)
  • पुरिसाण कुलीणाण वि न कुलं विणयस्स कारणं होइ।
चंदाऽमय-लच्छि सहोयरं पि मारेइ किं न विसं॥ -- गाहारयणकोष : १००
कुलीन पुरुषों का कुल विनय (आचार) का कारण (प्रमाण) नहीं होता। विष चन्द्र, अमृत एवं लक्ष्मी का सहोदर होते हुए भी क्या प्राण नाश नहीं करता ?
  • देंतोच्चिय उवएसं हवइ कयत्थो गुरु सुसीसाणं।
विवरीयाण निरत्थो दिणयरतेओ व्व उलुयाणं॥ -- पउमचरिउ : ५०५
सुशिष्यों को उपदेश देने पर गुरु कृतार्थ होता है, किन्तु जिस तरह उल्लू के लिए सूर्य निरर्थक होता है, उसी तरह विपरीत अर्थात् कुशिष्यों को उपदेश देने पर वह निरर्थक हो जाता है।
  • नहि मुसगाणं संगो, होइ सुहो सह बिडालीहिं। -- इन्द्रियपराजयशतक : ५४
चूहों का बिल्ली के साथ संगत करना मृत्यु की गोद में सोना है।
  • करिणो हरि-नहरविदारियस्स दीसंति मुत्तिया कुम्मे।
अहव किवणाण मरणे पथडच्चिय होंति भंडारा॥ -- गाहारयण कोष : १५५
िंसह के नख से विदारित होने पर हाथी के कुम्भस्थल में मोती दिखाई पड़ते हैं अथवा कृपणों के मरने पर ही उनका भंडार (धन) प्रकट होता है।
  • सोसं न गओ रसायलं, जलहिं ! कि न पुâडियोसि ?
तउ संठिया वि सउणा, तण्हइया जस्स वोलीणा॥ -- गाहारयण कोष : ४४
जिसके किनारे पर रहकर भी पक्षीगण प्यासे रह जाते हैं, ऐसे हे समुद्र ! तू सूख क्यों नहीं गया ? रसातल में क्यों नहीं गया ? अथवा फूट क्यों नहीं गया ? (धनवान के पास से यदि कोई याचक निराश लौट जाता है तो उस अयोग्य के पास रहा हुआ धन नष्ट क्यों नहीं होता।)
  • अं अत्थीहिं न पिज्जइ आसाइज्जइ न सउणसत्थेहिं।
तं सायरस्स सलिलं खवंत वडवानल ! नमो ते॥
पक्षीरूप सार्थ जिस जल को न पीते हैं और न आस्वादन करते हैं, उस सागर के जल को खाने वाले हे बडवानल! तुझे नमस्कार है। -- गाहारयण कोष : ४७
  • बरसंति न मेहा गज्जिऊण न दिंति हसिऊण।
न फलंति तरू जे फूल्लिऊण ते कह न लज्जंति॥
गरज करके जो बादल नहीं बरसते, हँसकर जो अतिथि को दान नहीं देते, विकसित होकर भी जो वृक्ष फल नहीं देते, सचमुच ये सब ऐसा करते हुए लज्जित क्यों नहीं होते ? -- गाहारयण कोष : ११४
  • तह य अलोयं सव्वं तं णाणं सव्व-पच्चक्खं॥
जो द्रव्य-पर्याय से युक्त संपूर्ण लोक को और संपूर्ण अलोक को (सब कुछ को) प्रकाशित एवं प्रत्यक्ष करता है, वह केवलज्ञान हुआ करता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : २५४
  • मुत्तममुत्तं दव्वं चेयणमियरं सगं च सव्वं च।
पेच्छंतस्स दु णाणं पच्चक्खमणिंदिय होइ॥
मूर्त-अमूर्त, जड़-चेतन द्रव्यों, स्वात्मा और सर्वस्व को देखने वाला ज्ञान इन्द्रियों द्वारा न होने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान है। यही केवलज्ञान है। -- नियमसार : १६७
  • पासम्मि बहिणिमायं, सिसुं पि हणेइ कोहंधो।
क्रोध में अंधा हुआ मनुष्य पास में खड़ी माँ, बहिन और बच्चे को भी मारने लग जाता है। -- वसुनन्दि श्रावकाचार : ६७
  • कोवेण रक्खसो वा, णराण भीमो णरो हवदि।
क्रुद्ध मनुष्य राक्षस की तरह भयंकर बन जाता है। -- भगवती आराधना : १३६१
  • रोसेण रुद्दहिदओ, णारगसीलो णरो होदि।
क्रोध से मनुष्य का हृदय रौद्र बन जाता है। वह मनुष्य होने पर भी नारक (नरक के जीव) जैसा आचरण करने लगता है। -- भगवती आराधना : १३६६
  • दीवयसिहव्व महिला कज्जलमइलं घरं कुणइ॥
जैसे दीपक की शिखा उजले घर को काजल से काला बनाती है, स्नेह-तेल के होने पर तपती है, वैसे ही दीप शिखा की भाँति क्रोधी स्त्री भी घर के पवित्र वातावरण को भी दूषित करती है, स्नेह से परिपूर्ण व्यक्तियों को भी तपाती है। -- गाहारयण कोष : ८१८
  • जन्म मरणेन समं, सम्पद्यते यौवनं जरासहितम्।
लक्ष्मी: विनाशसहिता, इति सर्व भंगुरं जानीत॥
जन्म मरण के साथ जुड़ा है और यौवन वृद्धावस्था के साथ। लक्ष्मी चंचला है। इस प्रकार (संसार में) सब कुछ क्षणभंगुर है। -- समणसुत्त : ५०७
  • यदि किन्चित् प्रमादेन, न सुष्ठु यस्माभि: सह र्विततं मया पूर्वम्।
तद् युष्मान् क्षमयाम्यहं, नि:शल्यो निष्कषायश्च॥
अल्पतम प्रमादवश भी यदि मैंने आपके प्रति उचित व्यवहार नहीं किया हो तो मैं नि:शल्य और कषायरहित होकर आपसे क्षमा-याचना करता हूँ। -- समणसुत्त : ८७
  • कोहेण जो ण तप्पदि, सुर–णरतिरिएहि कीरमाणे वि।
उवसग्गे वि रउद्दे, तस्स खमा णिम्मला होदि॥
जो देव, मानव तथा तिर्यंच पशुओं के द्वारा घोर, भयानक उपसर्ग पहुंचाने पर भी क्रोध से तप्त नहीं होता, उसी के निर्मल क्षमा होती है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ३६४
  • विशेषक्षीणमोह:, स्फटिकामल-भाजनोदक-समचित्त:।
क्षीणकषायो भण्यते, निग्र्रंथो वीतरागै:॥
सम्पूर्ण मोह पूरी तरह नष्ट हो जाने से जिनका चित्त स्फटिकमणि के पात्र में रखे हुए स्वच्छ जल की तरह निर्मल हो जाता है, उन्हें वीतराग देव ने क्षीणकषाय निग्र्रन्थ कहा है। -- समणसुत्त : ५६१
  • नीचैर्वृत्तिरधर्मेण धर्मेणोच्चै: स्थितिं भजेत्।
तस्मादुच्चै: पदंं वांछन् नरो धर्मपरो भवेत्॥
अधर्म से मनुष्य की अधोगति होती है और धर्म से ऊध्र्वगति (ऊँची गति)। अत: जीवन में ऊध्र्वगति चाहने वाले को धर्म का आचरण करना चाहिए। -- आदिपुराण : १०-११९
  • रत्नत्रयमेव गण:, गच्छ: गमनस्य मोक्षमार्गस्य।
संघो गुणसंघात:, समय: खलु निर्मल: आत्मा॥
रत्नत्रय ही ‘गण’ है। मोक्षमार्ग में गमन ही ‘गच्छ’ है। गुण का समूह ही संघ है तथा निर्मल आत्मा ही समय है। -- समणसुत्त : २६
  • अत्यं यासइ अरहा सुत्तं गंथंति गणहरा निउणं। अर्थ (सिद्धान्त/भाव के प्रवक्ता सर्वज्ञ भगवान् अरिहंत होते हैं। उनके द्वारा कथित भावों को सूत्र/शास्त्र के रूप में गणधर प्रस्तुत करते हैं।
  • पथ्यं हृदयानिष्टमपि, भणमानस्य स्वगणवासिन:।
कटुकमिवौषधं तत् , मघुरविपावंâ भवति तस्य॥
अपने गणवासी (साथी) द्वारा कही हुई हितकर बात, भले ही मन को प्रिय न लगे, कटुक औषध की भाँति परिणाम में मधुर ही होती है। -- समणसुत्त : ९४
  • गुणानामाश्रयो द्रव्यं, एकद्रव्याश्रिता गुणा:।
लक्षणं पर्यवाणां तु, उभयोराश्रिता भवन्ति॥
द्रव्य गुणों का आश्रय या आधार है। जो एक द्रव्य के आश्रय रहते हैं वे गुण हैं। पर्यायों का लक्षण द्रव्य व गुण, दोनों के आश्रित रहना है। -- समणसुत्त : ६६१
  • णयरम्मि वण्णिदे जह ण वि, रण्णो वण्णणा कदा होदि।
देहगुणे थुव्वंते, ण केवलिगुणा थुदा होंति॥
जिस प्रकार नगर का वर्णन करने से राज्य का वर्णन नहीं होता, उसी प्रकार शरीर के गुणों का वर्णन करने से शुद्धात्म स्वरूप केवलज्ञानी के गुणों का वर्णन नहीं हो सकता। -- समयसार : ३०
  • दव्वेण विणा न गुणा, गुणेहि दव्वं विणा न संभवदि।
द्रव्य के बिना गुण नहीं होते हैं और गुण के बिना द्रव्य नहीं होते। -- पंचास्तिकाय : १३
  • नवं वयो न दोषाय, न गुणाय दशान्तरम्।
नवोऽपीन्दुर्जनाह्लादी, दहत्यग्निर्जरन्नपि॥
यह मानना ठीक नहीं है कि नई उम्र (जवानी) दोष से युक्त एवं वृद्ध अवस्था गुणों से भरपूर होती है। क्या नव चन्द्र लोगों के मन को प्रसन्न नहीं करता और क्या पुरानी अग्नि जलाती नहीं ? भाव है, वस्तु में गुण देखना चाहिए, नया-पुरानापन नहीं। -- आदिपुराण : १८-१२०
  • वरतरुणि सिहिण परिसंठियस्स हारस्स होइ जो सोहा।
सिप्पीपुडम्मि न तहा ठाणेसु गुणा विसट्टंति॥
मुक्ताहार की जो शोभा श्रेष्ठ तरुणियों की शिखा पर होती है, वह सीप के संपुट में नहीं। वैसे ही गुण भी उपयुक्त स्थान पर ही शोभित होते हैं। -- गाहारयणकोष : २७
  • मणहरवण्णं वि हु कण्णियार कुसुमं न एइ भमराली।
रूवेण विंâ व कीरइ ? गुणेण छेया हरिज्जंति॥
कर्णिकार (कणेर) पुष्प का रंग सुन्दर है फिर भी भ्रमर की पंक्तियाँ उसकी ओर आर्किषत नहीं होती। रूप से क्या प्रयोजन ? बुद्धिमान तो गुणों से ही आर्किषत होते हैं। -- गाहारयणकोष : ७२१
  • यैस्तु लक्ष्यन्ते, उदयादिषु सम्भवैर्भावै:।
जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टा: सर्वर्दिशभि:॥ मिथ्यात्वं सास्वादन: मिश्र:, अविरतसम्यक्त्व च देशविरतश्च।
विरत: प्रमत्त: इतर: अपूर्व: अनिवृत्ति: सूक्ष्मश्च॥ उपशान्त: क्षीणमोह: संयोगिकेवलिजिन: अयोगी च।
चतुर्दश गुणस्थानानि च, क्रमेण सिद्ध: च ज्ञातव्या॥
मोहनीय आदि कर्मों के उदय आदि (उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि) से होने वाले जिन परिणामों से युक्त जीव पहचाने जाते हैं, उनको सर्वदर्शी जिनेन्द्र देव ने ‘गुण’ या ‘गुणस्थान’ संज्ञा दी है अर्थात् सम्यक्त्व आदि की अपेक्षा जीवो की अवस्थाएँ श्रेणियाँ-भूमिकाएँ गुणस्थान कहलाती हैं। मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरत सम्यकद्रस्ति, देशविरत, प्रमत्तविरत, अप्रमत्तविरत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्म साम्पराय, उपशान्त मोह, क्षीणमोह, सयोगकेवलीजिन, अयोगकेवली जिन-ये क्रमश: चौदह जीवसमास या गुणस्थान हैं। सिद्ध जीव गुणस्थानातीत होते हैं। -- समणसुत्त : ५४६-५४८
  • सम्यक्त्वरत्नपवर्त -शिखरात्, मिथ्याभावसमभिमुख:।
नाशित सत्यक्त्व: स:, सास्वादननामा मन्तव्य:॥
सम्यक्त्व-रत्नरूपी पर्वत के शिखर से गिरकर जो जीव मिथ्यात्वभाव के अभिमुख हो गया है-मिथ्यात्व की ओर मुड़ गया है, परन्तु (सम्यक्त्व के नष्ट हो जाने पर भी) जिसने अभी साक्षात् रूपेण मिथ्यात्वभाव में प्रवेश नहीं किया है, उस मध्यवर्ती अवस्था को सासादन नामक गुणस्थान कहते हैं। -- समणसुत्त : ५५०
  • दधिगुडमिव व्यामिश्रं, पृथक्भावं नैव कर्तुं शक्यम्।
एवं मिश्रकभाव:, सम्यक्मिथ्यात्वमिति ज्ञातव्यम्॥
दही और गुड़ के मेल के स्वाद की तरह सम्यक्त्व और मिथ्यात्व का मिश्रित भाव या परिणाम, जिसे अलग नहीं किया जा सकता, सम्यक्-मिथ्यात्व या मिश्र गुणस्थान कहलाता है। -- समणसुत्त : ५५१
  • नो इन्द्रियेषु विरतो, नो जीवे स्थावरे त्रसे चापि।
य: श्रद्दधाति जिनोक्तं, सम्यक्दृष्टिविरत: स॥
जो न तो इन्द्रिय विषयों से विरत है और न त्रस-स्थावर जीवों की हिंसा से विरत है, लेकिन केवल जिनेन्द्र-प्ररूपित तत्त्वार्थ का श्रद्धान करता है, वह व्यक्ति अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थानवर्ती कहलाता है। -- समणसुत्त : ५५२
  • यस्त्रसवधाद्विरत:, नो विरत: अत्र स्थावरवधात्।
प्रतिसमयं स: जीवो, विरताविरतो जिनैकमति:॥
जो त्रस जीवों की हिंसा से तो विरत हो गया है, परन्तु एकेन्द्रिय स्थावर जीवों (वनस्पति,जल, भूमि, अग्नि, वायु) की हिंसा से विरत नहीं हुआ है तथा वह एकमात्र जिन भगवान में ही श्रद्धा रखता है, वह श्रावक देशविरत गुणस्थानवर्ती कहलाता है। -- समणसुत्त : ५५३
  • व्यक्ताव्यक्तप्रमादे, यो वसति प्रमत्तसंयतो भवति।
सकलगुणशीलकलितो, महाव्रती चित्रलाचरण:॥
जिसने महाव्रत धारण कर लिए हैं, सकल शील-गुण से समन्वित हो गया है, फिर भी अभी जिसमें व्यक्त-अव्यक्त रूप में प्रमाद शेष है, वह प्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्ती कहलाता है। इसका व्रताचरण किन्चित सदोष होता है। -- समणसुत्त : ५५४
  • नष्टशेषप्रमादो, व्रतगुणशीलावलिमण्डितो ज्ञानी।
अनुपशमक: अक्षपको, ध्यानविलीनो हि अप्रमत्त: स:॥
जिसका व्यक्त-अव्यक्त सम्पूर्ण प्रमाद नि:शेष हो गया है, जो ज्ञानी होने के साथ-साथ व्रत, गुण और शील की माला से सुशोभित है, फिर भी जो न तो मोहनीय कर्म का उपशमकरता है और न क्षय करता है-केवल आत्मध्यान में लीन रहता है, वह श्रमण अप्रमत्त संयत गुणस्थानवर्ती कहलाता है। (नोट: अप्रमत्तसंयम गुणस्थान से आगे दो श्रेणियां प्रारंभ होती हैं-उपशम और क्षपक। उपशम श्रेणी वाला तपस्वी मोहनीय कर्म का उपशम करते हुए ग्यारहवें गुणस्थान तक चढ़ने पर पुन: मोहनीय कर्म का उदय होने से नीचे गिर जाता है और दूसरा क्षपक श्रेणी वाला मोहनीय कर्म का समूल क्षय करते हुए आगे बढ़ता जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है।) -- समणसुत्त : ५५५
  • एतस्मिन् गुणस्थाने, विसदृशसमयस्थितैजीवै:।
पूर्वमप्राप्ता यस्मात् , भवन्ति अपूर्वा हि परिणामा:॥
इस आठवें गुणस्थान में विसदृश (विभिन्न) समयों में स्थित जीव ऐसे-ऐसे अपूर्व परिणामों (भावों) को धारण करते हैं जो पहले कभी नहीं हो पाए थे। इसीलिए इसका नाम अपूर्वकरण गुणस्थान है। -- समणसुत्त : ५५६
  • तादृशपरिणामस्थितजीवा:, हि जिनैर्गलिततिमिरै:।
मोहस्यापूर्वकरणा:, क्षपणोपशमनोद्यता: भणिता:॥
अज्ञानांधकार को दूर करने वाले (ज्ञान सूर्य) जिनेन्द्र देव ने उन अपूर्व-परिणामी जीवों को मोहनीय कर्म का क्षय या उपशम करने में तत्पर कहा है। (मोहनीय कर्म का क्षय या उपशम तो नौवें और दसवें गुणस्थानों में होता है किन्तु उसकी तैयारी इस अष्टम् गुणस्थान में ही शुरू हो जाती है।) -- समणसुत्त : ५५७
  • भवन्ति अनिर्वितनस्ते, प्रतिसमयं येषामेकपरिणामा:।
विमलतरध्यानहुतवह-शिखाभिर्निर्दग्धकर्मवना:॥
वे जीव अनिवृत्तिकरण गुणस्थान वाले होते हैं, जिनके प्रतिसमय (निरन्तर) एक ही परिणाम होता है। (इनके भाव अष्टम् गुणस्थान वालों की तरह विसदृश नहीं होते)। ये जीव निर्मलतर ध्यान रूपी शिखाओं से कर्म-वन को भस्म कर देते हैं। -- समणसुत्त : ५५८
  • लच्छीए विणा रयणायरस्स गम्भीरिमा तहज्जेव।
सा लच्छी तस्स विणा कस्स न गेहे परिब्भई॥
लक्ष्मी के बिना भी रत्नाकर की गंभीरता तो वैसी ही बनी हुई है, किन्तु सागर को छोड़कर चली गई लक्ष्मी को कहाँ-कहाँ नहीं भटकना पड़ता ? -- गाहारयणकोष : ४५
  • ठाणेसु गुणा पथड़ा ठाणाणि, गुणेहिं पायडिज्जंति।
सोहइ नयणेहिं मसी, मसीए सोहंति नयणाइं॥
गुणी में ही गुण शोभित होते हैं गौर गुणों से गुणी । जैसे आँखों में काजल शोभित होता है और काजल से आँख। -- गाहारयणकोष : २५
  • संरम्भे समारम्भे, आरम्भे च तथैव च।
वच: प्रवर्तमानं तु, निवर्तयेद् यतं यति:॥
यतना-सम्पन्न यति संरम्भ, समारम्भ व आरम्भ में प्रवत्र्तमान वचन को रोके-उसका गोपन करे। -- समणसुत्त : ४१३
  • क्षेत्रस्य वृत्तिर्नगरस्य, खातिकाऽथवा भवति प्राकारा:।
तथा पापस्य निरोध:, ता: गुप्तय: साधो:॥
जैसे खेत की रक्षा बाड़ और नगर की रक्षा खाई या प्राकार करते हैं, वैसे ही पाप-निरोधक गुप्तियाँ साधु के संयम की रक्षा करती हैं। -- समणसुत्त : ४१५
  • सं किं गुरु: पिता सुहृदा योऽभ्यसूययाऽर्भं बहुदोषम्,
बहुषु वा दोषं प्रकाशयति न शिक्षयति च॥
वे गुरु, पिता व मित्र निन्दनीय या शत्रु सदृश हैं, जो ईष्र्यावश अपने बहुदोषी शिष्य, पुत्र व मित्र के दोष दूसरों के समक्ष प्रकट करते हैं और उसे नैतिक शिक्षण नहीं देते। -- नीतिवाक्यामृत : ११-५३
  • न विना यानपात्रेण तरितुं शक्यतेऽर्णव:।
नर्ते गुरूपदेशाच्च सुतरोऽयं भवार्णव:॥
जैसे जहाज के बिना समुद्र को पार नहीं किया जा सकता, वैसे ही गुरु के मार्गदर्शन (गुरु की कृपा) के बिना संसार-सागर का पार पाना बहुत कठिन है। -- आदिपुराण : ९-१७५
  • यस्य गुरौ न भक्ति:, न च बहुमान: न गौरवं न भयम्। नापि लज्जा नापि स्नेह:, गुरुकुलवासेन किं तस्य ?
जिसमें गुरु के प्रति न भक्ति है, न बहुमान है, न गौरव है, न भय (अनुशासन) है, न लज्जा है तथा न स्नेह है, उसका गुरुकुलवास में रहने का क्या अर्थ है? -- समणसुत्त : २९
  • चारित्तं समभावो
समभाव ही चारित्र है। -- पंचास्तिकाय : १०७
  • असुहादो विणिवित्ती, सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं।
अशुभ से निवृत्ति और शुभ में प्रवृत्ति करना-इसे ही चारित्र समझना चाहिए। -- द्रवसंग्रह : ४५
  • थोवम्मि सिक्खिदे जिणइ, बहुसुदं जो चरित्तसंपुण्णो।
जो पुण चरित्तहीणो, िंक तस्स सुदेण बहुएण॥
चारित्रसम्पन्न का अल्पतम ज्ञान भी अधिक है और चारित्रहीन का बहुत अधिक शास्त्रज्ञान भी निष्फल है। -- मूलाचार : १०-६
  • ख्याति-पूजा-लाभं, सत्कारादि किमिच्छसि योगिन्। इच्छसि यदि परलोकम्, तै िंक तव परलोके ?
हे योगी ! यदि तू परलोक चाहता है तो ख्याति, लाभ, पूजा और सत्कार आदि क्यों चाहता है ? क्या इनसे तुझे परलोक का सुख मिलेगा ? -- समणसुत्त : २३५
  • चोरस्स णत्थि हियए दया च लज्जा दमो व विस्सासो।
चोर के अंतर में दया, लज्जा, संयम और विश्वास नहीं हुआ करते। -- भगवती आराधना : ८६२
  • पावदि चोरो सयमवि मरणं सव्वस्सहरणं वा।
चोर स्वयं शोक, मरण एवं सर्वस्वहरण (के दु:ख) प्राप्त किया करता है। -- भगवती आराधना : ८६७
  • गुणा गौणत्वमायाति याति विद्या विडम्बनाम्।
चौर्येणाकीर्तय: पुंसां शिरस्यादधते पदम्॥
चोरी करने से गुण छुप जाते हैं, विद्या निकम्मी हो जाती है और बदनामी सिर पर चढ़कर बोलती है। -- ज्ञानार्णव : १२८
  • स वोरिए परायिणति, अवीरिए परायिज्जति।
शक्तिशाली (वीर्यवान्) जीतता है और शक्तिहीन (निर्वीर्य) पराजित हो जाता है। -- भगवती सूत्र : १-८
  • सव्वायरेण रक्खह तं पुरिसं जत्थ जयसिरी वसइ।
अत्थमियम्मि मियंके तारेहिं न कीरए जोण्हा॥
जिस पुरुष में जयश्री निवास करती है, उसका सब प्रकार आदर के साथ रक्षण करो क्योंकि चन्द्र के अस्त होने पर तारों से प्रकाश नहीं होता। -- गाहारयण कोष : ७८०
  • सुच्चिय सूरो सो चेव, पंडिओ तं पसंसिमो निच्चं।
इंदियचोरेहिं सया, न लुंटिअं जस्स चरणधणं॥
वही सच्चा शूरवीर है, वही सच्चा पंडित है और उसी की हम नित्य प्रशंसा करते हैं जिसका चारित्र रूपी धन इन्द्रियों रूपी चोरों ने लूटा नहीं है, सदा सुरक्षित है। -- इन्द्रियपराजयशतक : १
  • गुणकारिआइं धणियं, घिइरज्जुनियंतिआइं तुह जीव।
निजयाइं इंदियाइं, बल्लिनिअत्ता तुरंगुव्व॥
वश किया हुआ बलिष्ठ घोड़ा जिस प्रकार बहुत लाभदायक है, उसी प्रकार धैर्य रूपी लगाम द्वारा वश में की हुई स्वयं की इन्द्रियाँ तुझे बहुत ही लाभदायक होंगी। अत: इन्द्रियों को वश में कर, उनका निग्रह कर। -- इन्द्रियपराजयशतक : ९४
  • नाणेण य झाणेण य, तवोबलेण य बला निरुंभंति।
इंदियविसयकसाया, धरिया तुरग व्व रज्जूहि॥
ज्ञान, ध्यान और तपोबल से इन्द्रिय-विषयों और कषायों को बलपूर्वक रोकना चाहिए, जैसे कि लगाम के द्वारा घोड़ों को बलपूर्वक रोका जाता है। -- मरणसमाधि : ६२१
  • केवलज्ञान -दिवाकर-किरण-कलाप-प्रणाशिताज्ञान:। नवकेवललब्ध्युद्गम-प्रापित-परमात्मव्यपदेश:। असहायज्ञानदर्शन-सहितोऽपि हि केवली हि योगेन।
युक्त इति सयोगिजिन:, अनादिनिधन आर्षे उक्त:॥
केवलज्ञान रूपी दिवाकर की किरणों के समूह से जिनका अज्ञान अंधकार सर्वथा नष्ट हो जाता है तथा नौ केवललब्धियों (सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतवीर्य, दान, लाभ, भोग व उपभोग) के प्रकट होने से जिन्हें परमात्मा की संज्ञा प्राप्त हो जाती है, वे इन्द्रियादि की सहायता की अपेक्षा न रखने वाले ज्ञान-दर्शन से युक्त होने के कारण सयोगी केवली (तथा घाति कर्मों के विजेता होने के कारण) जिन कहलाते हैं। ऐसा अनादि निधन जिनागम में कहा गया है। -- समणसुत्त : ५६२-५६३
  • जिनवचनमौषधमिदं, विषयसुखविरेचनम् अमृतभूतम्।
जरामरणव्याधिहरणं, क्षयकरणं सर्वदु:खानाम्॥
जिनवाणी वह अमृत समान औषधि है, जो विषय-सुखों का विरेचन करती है, जरा व मरण की व्याधि को दूर करती है और सभी दु:खों का क्षय करती है। -- समणसुत्त : १८
  • लब्धमलब्धपूव, जिनवचन-सुभाषितं अमृतभूतम्।
गृहीत: सुगतिमार्गो, नाहं मरणाद् बिभेमि॥
पहले कभी उपलब्ध न होने वाली अमृत समान सुभाषिव-रूप जिनवाणी मुझे उपलब्ध हो गई है। उससे सुगति का मार्ग मैंने ग्रहण कर लिया है। अब मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं। -- समणसुत्त : ७४९
  • मग्गो मग्गफलं ति य, दुविहं जिनसासणे समक्खादं।
जिनशासन (आगम) में सिर्फ दो ही बातें बताई गई हैं-मार्ग और मार्ग का फल। -- मूलाचार : २०२
  • जमल्लीणा जीवा, तरंति संसारसायरमणंतं।
तं सव्वजीवसरणं, णंद्दु जिणसासणं सुइरं॥
अनंत संसार-सागर को पार करने के लिए जीव जिसमें लीन होते हैं, जो सभी जीवों के लिए शरण है, ऐसा जिनशासन सदैव समृद्ध रहे। -- समणसुत्त : २-१७
  • य: पश्यति आत्मानमबद्धस्पृष्टमनन्यमविशेषम्।
अपदेशसूत्रमध्यं, पश्यति जिनशासनं सर्वम्॥
आत्मा को शरीर व कर्म से अतीव, अनन्य, विशेष से रहित और प्रारंभ-मध्य-अंत से रहित देखता है, वही सम्पूर्ण जिनशासन को देखता है। -- समणसुत्त : २५४
  • प्राणैश्चतुर्भिर्जीवति, जीविष्यति य खलु: जीवित: पूर्वम्।
स जीव:, प्राणा:, पुनर्बलमिन्द्रियमायुरुच्छ्वास:॥
जो चार प्राणों से वर्तमान में जीता है, भविष्य में जीयेगा और अतीत में जिया है, वह जीव द्रव्य है। प्राण चार हैं-बल, इन्द्रिय, आयु और उच्छ्वास। -- समणसुत्त : ६४५
  • अणुगुरुदेहप्रमाण: उपसंहारप्रसप्र्पत: चेतयिता।
असमवहत: व्यवहारात्, निश्चयनयत: असंख्यदेशो वा॥
व्यवहारनय की अपेक्षा समुद्घात अवस्था को छोड़कर संकोच-विस्तार की शक्ति के कारण जीव अपने छोटे या बड़े शरीर के बराबर परिमाण (आकार) का होता है। किन्तु निश्चयनय की अपेक्षा जीव असंख्यात प्रदेशी है। -- समणसुत्त : ६४६
  • यथा पद्मरागरत्नं, क्षिप्तं क्षीरे प्रभासयति क्षीरम्।
तथा देही देहस्थ:, स्वदेहमात्रं प्रभासयति॥
जैसे पद्मरागमणि दूध में डाल देने पर अपनी प्रभा से दूध को प्रभासित करती है-दुग्ध पात्र के बाहर किसी के पदार्थ को प्रकाशित नहीं करती, वैसे ही जीव शरीर में रहकर अपने शरीर मात्र को प्रभासित करता है-अन्य किसी बाह्य द्रव्य को नहीं। -- समणसुत्त : ६४७
  • जीव: अक्ष: अर्थव्यापन-भोजनगुणाविन्तो येन।
तं प्रति वर्तते ज्ञानं, यत् प्रत्यक्षं तत् त्रिविधम्॥
जीव का ‘अक्ष’ कहते हैं। यह शब्द ‘अशु व्याप्तौ’ धातु से बना है। जो ज्ञान रूप में समस्त पदार्थों में व्याप्त है, वह अक्ष अर्थात् जीव है। ‘अक्ष’ शब्द की व्युत्पत्ति भोजन के अर्थ में ‘अश्’ धातु से भी की जा सकती है। जो तीनों लोक की समस्त समृद्धि आदि को भोगता है, वह अक्ष अर्थात् जीव है। इस तरह दोनों व्युत्पत्तियों से (अर्थव्यापन व भोजनगुण से) जीव का अक्ष अर्थ सिद्ध होता है। उस अक्ष से होने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है। इसके तीन भेद हैं-अवधि, मन:पर्यय और केवल। -- समणसुत्त : ६८६
  • उत्तमगुणाण धामं, सव्वदव्वाण उत्तमं दव्वं।
तच्चाण परं तच्चं, जीवं जाणेह णिच्छयदो॥
तुम निश्चयपूर्वक यह जानो कि जीव उत्तम गुणों का आश्रय, सब द्रव्यों में उत्तम द्रव्य और सब तत्त्वों में परम तत्त्व है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : २०४
  • जह रयणं मयणसुगूहियं पि अंतो फूरंत कन्तितिल्लं।
इय कम्मरासि गूढो जीवो वि हु जाणए किन्चि॥
जैसे मोम में लिपटा हुआ रत्न मोम के भीतर भी प्रकाशमान होता है, वैसे ही कर्मावृत जीव कर्म के भीतर अपने ज्ञानादि गुणों से प्रकाशित होता रहता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जह दीवो वरभवणं तुंगं पिहु दीहरं पि दीवेइ।
मल्लयसंपुडछूढो तत्तियमेत्तं पयासेइ॥ तह जीवो लक्खसमूसियं पि देहं जणेइ सज्जीवं।
पुण कुन्थुदेहछूढो तत्तियमेत्तं संतुट्ठो॥
जिस तरह दीपक विशाल और ऊँचे प्रासाद को भी प्रकाशित करता है तथा छोटे से पात्र में रहकर उतने ही भाग को प्रकाशित करता है, उसी तरह से जीव भी लाखों श्वासों को लेने वाले बड़े देह को सजीव करता है और कुन्थु जैसे छोटे शरीर को भी प्रकाशित करता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जह वच्चइ को वि नरो निहरिउं जरघराऊ नवयम्मि।
जह जीवो चइऊणं जरदेहं जाइ देहम्मि॥
जैस कोई मनुष्य जीर्ण-शीर्ण घर छोड़कर नये घर में प्रवेश करता है, वैसे ही जीव जरा-जर्जरति देह को छोड़कर नये देह में जाता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जह गयणपले पवणो वच्चंतो नेव दीसइ जणेण।
तह जीवों वि भमंतो नयणेहि न घेप्पइ भवम्मि॥
जैसे आकाश में घूमता पवन आँखों को दिखाई नहीं देता है, वैसे ही भवभ्रमण करता हुआ जीव आँखों को दिखाई नहीं देता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जह किर तिलेसु तेल्लं अहवा कुसुमम्मि होइ सोरब्भं।
अन्नोन्नाणुगयं चिय एवं चिय देहजीवाणं॥
जैसे तिलों में तेल अथवा पुष्पों में सुगंध रहती है, वैसे ही देह और जीव का अन्योन्य सम्बन्ध है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जीवा संसारत्था णिव्वादा चेदणप्पगा दुविहा।
चेतन स्वभाव संपन्न जीव दो प्रकार के होते हैं-संसारी और निर्वाण-प्राप्त। -- पंचास्तिकाय : १०९
  • जीवो त्ति हवदि चेदा।
जीव चेतन हुआ करता है। -- पंचास्तिकाय : २७
  • ववहारणयो भासदि, जीवो देहो य हवदि खलु इक्को।
ण दु णिच्छयस्स जीवो, देहो य कदापि एकट्ठो॥
व्यवहार दृष्टि (नय) से जीव (आत्मा) और देह एक प्रतीत होते हैं किन्तु निश्चय दृष्टि से दोनों भिन्न हैं, कदापि एक नहीं। -- समयसार : २७
  • ण वि अत्थि अण्णवादो, ण वि तव्वाओ जिणोवएसम्मि।
जैन दर्शन में न एकान्त भेदवाद मान्य है और न एकान्त अभेदवाद। अत: जैन दर्शन भेदाभेदवादी दर्शन है। -- सन्मति तर्क् प्रकरण : ३-२६
  • ण हु सासणभत्ती-मेत्तएण सिद्धंतजाणओ होइ।
ण वि जाणओ वि णियमा, पण्णवणाणिच्छिओ णामं॥
मात्र आगम की भक्ति के बल पर ही कोई सिद्धान्त का ज्ञाता नहीं हो सकता और हर कोई सिद्धान्त का ज्ञाता भी निश्चित रूप से प्ररूपणा करने के योग्य प्रवक्ता नहीं हो सकता। -- सन्मति तर्क् प्रकरण : ३-२६
  • सुत्तं अत्थनिमेणं, न सुत्तमेत्तेण अत्थपडिवत्ती।
अत्थगई पुण णयवाय गहणलीणा दुरभिगम्मा॥
सूत्र (शब्द पाठ) अर्थ का स्थान अवश्य है, परन्तु मात्र सूत्र से अर्थ की प्रतिपत्ति नहीं हो सकती। अर्थ का ज्ञान तो गहन नयवाद पर आधारित होने से बड़ी कठिनता से हो पाता है। -- सन्मति तर्क् प्रकरण : ३-६४
  • सत्थं णाणं ण हवइ, जम्हा सत्थं ण याणए किन्चि।
तम्हा अण्णं णाणं, अण्णं सत्थं जिणा विंति॥
शास्त्र ज्ञान नहीं है, क्योंकि शास्त्र स्वयं में कुछ नहीं जानता है। इसलिए ज्ञान अन्य है और शास्त्र अन्य है। -- समयसार : ३९०
  • आदा णाणपमाणं, णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं।
णेयं लोयालोयं, तम्हा णाणं तु सव्वगयं॥
आत्मा ज्ञान प्रमाण (ज्ञान जितना) है, ज्ञान ज्ञेय प्रमाण (ज्ञेय जितना) है और ज्ञेय लोकालोक प्रमाण है, इस दृष्टि से ज्ञान सर्वव्यापी हो जाता है। -- प्रवचनसार : १-२३
  • णाणं अंकुसभूदं मत्तस्स हु चित्तहत्थिस्स।
मन रूपी उन्नमत्त हाथी को वश में करने के लिए ज्ञान अंकुश के समान है। -- भगवती आराधना : ७६०
  • कार्यं ज्ञानादिकम्, उत्सर्गापवादत: भवेत् सत्यम्।
तत् तथा समाचारन् तत् सफलं भवति सर्वमपि॥
ज्ञान आदि कार्य उत्सर्ग (सामान्य विधि) एवं अपवाद (विशेष-विधि) से सत्य होते हैं। वे इस तरह किए जाएँ कि सब कुछ सफल हो। -- समणसुत्त : ४
  • येन तत्त्वं विबुध्यते, येन चित्तं निरुध्यते।
येन आत्मा विशुध्यते, तज् ज्ञानं जिनशासने॥
जिससे तत्त्व का ज्ञान होता है, चित्त का निरोध होता है तथा आत्मा विशुद्ध होती है, उसी को जिनशासन में ज्ञान कहा गया है। -- समणसुत्त : २५२
  • अक्षस्य पुद्गलकृतानि यत् , द्रव्येन्द्रियमनांसि पराणि तेन।
तैस्तस्माद् यज्ज्ञानं, परोक्षमिह तदनुमानमिव॥
पौद्गलिक होने के कारण द्रव्येन्द्रियां और मन ‘अक्ष’ अर्थात् जीव से ‘पर’ भिन्न है। अत: उनसे होने वाला ज्ञान परोक्ष कहलाता है। जैसे अनुमान में धूम से अग्नि का ज्ञान होता है वैसे परोक्ष ज्ञान भी ‘पर’ के निमित्त से होता है। -- समणसुत्त : ६८७
  • भवत: परोक्षे मति-श्रुते, जीवस्य परनिमित्तात्।
पूर्वोपलब्धसम्बन्ध-स्मरणाद् वाऽनुमानमिव॥
जीव के मति और श्रुत-ज्ञान परनिमित्तक होने के कारण परोक्ष हैं। अथवा अनुमान की तरह पहले से उपलब्ध अर्थ के स्मरण द्वारा होने के कारण वे परनिमित्तक हैं। (परनिमित्तक · मन और इन्द्रियों की सहायता से होने वाला ज्ञान)। -- समणसुत्त : ६८८
  • एकान्तेन परोक्षं, लैंगिकमवध्यादिकम् च प्रत्यक्षम्।
इन्द्रियमनोभवं यत् , तत् संव्यवहारप्रत्यक्षम्॥
धूम आदि लिंग से होने वाला श्रुत ज्ञान तो एकान्त रूप से परोक्ष ही है। अवधि, मन:पर्यय और केवल, ये तीनों ज्ञान एकान्त रूप से प्रत्यक्ष ही हैं। किन्तु इन्द्रिय और मन से होने वाला मतिज्ञान लोकव्यवहार में प्रत्यक्ष माना जाता है। इसलिए वह सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहलाता है। -- समणसुत्त : ६८९
  • जण्णाणवसं किरिया, मोक्खणिमित्तं।
जो क्रिया ज्ञानपूर्वक होती है, वही मोक्ष का कारण होती है। -- बारस अणुवेक्खा : ५७
  • जेण तच्चं विबुज्झेज्ज, जेण चित्तं णिरुज्झति।
जेण अत्ता विसुज्झेज्ज, तं णाणं जिणसासणे॥
जिससे तत्त्व का बोध होता है, चित्त का निरोध होता है और आत्मा शुद्ध होती है, उसी को ज्ञान कहा गया है। -- मूलाचार : ५८५
  • येन रागाद्विरज्यते, येन श्रेयस्सु रज्यते।
येन मैत्री प्रभाव्येत, तज् ज्ञानं जिनशासने॥
जिनशासन के अनुसार ज्ञान वही है, जो जीव को रागादि से दूर करे, श्रेय से उसका स्नेह बढ़ाए और मैत्री भाव को प्रभावित/वर्धमान करे। -- समणसुत्त : २५३
  • केवलसत्तिसहावो, सोहं इदि चिंतए णाणी। -- नियमसार : ९६
  • ‘मैं केवल-शक्ति स्वरूप हूँ’-ज्ञानी ऐसा िंचतन करे। जह कणयमग्गितवियं पि, कणयभावं ण तं परिच्चयइ।
तह कम्मोदयतविदो, ण जहदि णाणी दु णाणित्तं॥
जिस प्रकार स्वर्ण अग्नि से तप्त होने पर भी अपने स्वर्णत्व को नहीं छोड़ता, वैसे ही ज्ञानी भी कर्मोदय के कारण उत्तप्त होने पर भी अपने स्वरूप को नहीं छोड़ता। -- समयसार : १८४
  • लब्ध्या निधिमेकस्तस्य, फलमनुभवति सुजनत्वेन।
तथा ज्ञानी ज्ञाननिधिं, भुंक्ते त्यक्ता परितृप्तिम्॥
जैसे कोई व्यक्ति निधि प्राप्त होने पर उसका उपभोग स्वजनों के बीच करता है, वैसे ही ज्ञानीजन प्राप्त ज्ञान-निधि का उपभोग पर-द्रव्यों से विलग होकर अपने में ही करता है। -- समणसुत्त : २६१
  • यद् अज्ञानी कर्म, क्षपयति बहुकाभिर्वर्षकोटीभि:।
तद् ज्ञानी त्रिभिर्गुप्त:, क्षपयत्युच्छ्वासमात्रेण॥
अज्ञानी व्यक्ति तप के द्वारा करोड़ों जन्मों या वर्षों में जितने कर्मों का क्षय करता है, उतने कर्मों का नाश ज्ञानी व्यक्ति त्रिगुप्ति के द्वारा एक सांस में सहज कर डालता है। -- समणसुत्त : ६१२
  • जो अप्पाणं जाणदि, असुइ-सरीरादु तच्चदोभिन्नं।
जाणग रूव-सरूवं, सो सत्थं जाणदे सव्वं॥
जो आत्मा को इस अपवित्र देह से तत्त्वत: भिन्न और ज्ञायक भाव रूप जानता है, वही समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ४६५
  • सेवंतो वि ण सेवइ, असेवमाणो वि सेवगो कोई।
ज्ञानी आत्मा (अंतर में रागादि का अभाव होने के कारण) विषयों का सेवन करता हुआ भी सेवन नहीं करता। अज्ञानी आत्मा (अंतर में रागादि का भाव होने के कारण) विषयों का सेवन नहीं करता हुआ भी, सेवन करता है। -- समयसार : १९७
  • जस्स अणेसणमप्पा तं पि तवो तप्पडिच्छगा समणा।
अण्णं भिक्खमणेसणमध ते समणा अणाहारा॥
परवस्तु की आसक्ति से रहित होना ही, आत्मा का निराहाररूप वास्तविक तप है। अस्तु, जो श्रमण भिक्षा में दोषरहित शुद्ध आहार ग्रहण करता है, वह निश्चय दृष्टि से अनाहार (तपस्वी) ही है। -- प्रवचनसार : ३-२७
  • विषयकषायविनिग्रहभावं, कृत्वा ध्यानस्वाध्यायान्।
य: भावयति आत्मानं, तस्य तप: भवति नियमेन॥
इन्द्रिय-विषयों तथा कषायों का निग्रह कर ध्यान और स्वाध्याय के द्वारा जो आत्मा को भावित करता है, उसी के तप धर्म होता है। -- समणसुत्त : १०२
  • यत्र कषायनिरोधो, ब्रह्म जिनपूजनम् अनशनं च।
तत् सर्वं चैव तपो, विशेषत: मुग्धलोके॥
जहां कषायों का निरोध, ब्रह्मचर्य का पालन, जिनपूजन तथा अनशन (आत्मलाभ के लिए) किया जाता है, वह सब तप है। विशेषकर मुग्ध अर्थात् भक्तजन यही तप करते हैं। -- समणसुत्त : ४३९
  • ये प्रतनुभक्तपाना:, श्रुतहेतोस्ते तपस्विन: समये।
यच्च तप: श्रुतहीनं, बाह्य: स क्षुदाहार:॥
जो शास्त्राभ्यास (स्वाध्याय) के लिए अल्प–आहार करते हैं, वे ही आगम में तपस्वी माने गए हैं। श्रुतिविहीन अनशन तप तो केवल भूख का आहार करना है, भूखे मरना है। -- समणसुत्त : ४४३
  • तेषामपि तपो न शुद्धं, निष्क्रान्ता: ये महाकुला:।
यद् नैवाऽन्ये विजानन्ति, न श्लोकम् प्रवेदयेत्॥
उन महाकुल वालों का तप भी शुद्ध नहीं है, जो प्रव्रज्या धारण कर पूजा-सत्कार के लिए तप करते हैं। इसलिए कल्याणार्थी को इस तरह तप करना चाहिए कि दूसरे लोगों को पता तक न चले। अपने तप की किसी के समक्ष प्रशंसा भी नहीं करनी चाहिए। -- समणसुत्त : २८२
  • तं जइ इच्छसि गंतुं, तीरं भवसायरस्स घोरस्स।
तो तव संजमभंडं, सुविहिय ! गिण्हाहि तुरंतो॥
हे सुविहित ! यदि तू घोर भवसमुद्र के पार तट पर जाना चाहता है तो शीघ्र ही तप-संयम रूपी नौका को ग्रहण कर। -- मरण समाधि : २०२
  • नाऽपि तुण्डितेन श्रमण:, न ओंकारेण ब्राह्मण:।
न मुनिररण्यवासेन, कुशचीरेण न तापस:॥
केवल सिर मुंडाने से कोई श्रमण नहीं होता, ओम् का जप करने से कोई ब्राह्मण नहीं होता, अरण्य में रहने से कोई मुनि नहीं होता, कुश-चीवर धारण करने से कोई तपस्वी नहीं होता। -- समणसुत्त : ३४१
  • समतया श्रमणो भवति, ब्रह्मचर्येण ब्राह्मण:।
ज्ञानेन च मुनिर्भवति, तपसा भवति तापस:॥
(प्रत्युत) वह समता से श्रमण होता है, ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण होता है, ज्ञान से मुनि होता है और तप से तपस्वी होता है। -- समणसुत्त : ३४१
  • रत्नत्रयसंयुक्त: जीव: अपि, भवति उत्तमं तीर्थम्।
संसारं तरति यत:, रत्नत्रयदिव्यनावा॥
(वास्तव में) रत्नत्रय से सम्पन्न जीव ही उत्तम तीर्थ (तट) है, क्योंकि वह रत्नत्रयरूपी दिव्य नौका द्वारा संसार-सागर को पार करता है। -- समणसुत्त : ५१४
  • आत्मप्रशंसनकरणं, पूज्येषु अपि दोषग्रहणशीलत्वम्।
वैरधारणं च सुचिरं, तीव्रकषायाणां लिंगानि॥
अपनी प्रशंसा करना, पूज्य पुरुषों में भी दोष निकालने का स्वभाव होना, दीर्घकाल तक वैर की गाँठ को बांधे रखना-ये तीव्रकषाय वाले जीवों के लक्षण हैं। -- समणसुत्त : ६००
  • णहि णिरवेक्खो चागो, ण हवदि भिक्खुस्स आसयविसुदी।
अविसुद्धस्स हि चित्ते, कहं णु कम्मक्खओ होदि॥
जब तक निरपेक्ष त्याग नहीं होता है, तब तक साधक की चित्तशुद्धि नहीं होती है और जब तक चित्तशुद्धि (उपयोग की निर्मलता) नहीं होती है, तब तक कर्मक्षय वैसे हो सकता है ? -- प्रवचनसार : ३-२०
  • लोभमूलानि पापानि, रसमूलानि व्याधय:।
स्नेहमूलानि शोकानि, त्रीणि त्यक्त्वा सुखी भव॥
लोभ पापों का मूल है, रसासक्ति रोगों का मूल है और स्नेह, शोकों का मूल है। इन तीनों का त्याग कर सुखी बनो। -- उपदेशमाला
  • विरज्य संपद: सन्त:, त्यजन्ति किमिहाद्भुतम्।
नावमीत िंक जुगुप्सावान् सुभुक्तमपि भोजनम्॥
सम्पदाओं से विरक्त होकर यदि संत उन्हें छोड़ते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि ग्लानि होने पर सुभुक्त-भोजन का वमन हर एक ने किया है। -- आत्मानुशासन : १०३
  • णिव्वेदतियं भावइ, मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु।
जो तस्स हवे चागो, इदि भणिदं जिणवरिदेहिं॥
सब द्रव्यों में होने वाले मोह को त्यागकर जो त्रिविध निर्वेद से अर्थात् संसार, शरीर और भोगों के प्रति वैराग्य से अपनी आत्मा को भावित करता है, उसके त्याग धर्म होता है, ऐसा जिनेवश्वर ने कहा है। -- बारस अणुवेक्खा : ७८
  • दयामूलो भवेद्धर्मो दया प्राण्यनुकम्पनम्।
दयाया: परिरक्षार्थं गुणा: शेषा: प्रर्कीितता:॥
धर्म का मूल दया है। प्राणी पर अनुकम्पा करना दया है। दया की रक्षा के लिए ही सत्य, क्षमा शेष गुण बताए गए हैं। -- आदिपुराण : ५-२७
  • मा हससु परं दुहियं कुणसु दयं णिच्चमेव दीणम्मि।
दूसरे दु:खी लोगों पर मत हँसो, हमेशा ही दोनों पर दया करो। -- कुवलयमाला : ८५
  • यथा ते न प्रियं दुक्खं, ज्ञात्वैवमेव सर्वजीवानाम्।
सर्वादरमुपयुक्त:, आत्मौपम्येन कुरु दयाम्॥
तुमको जिस प्रकार दु:ख प्रिय नहीं, इसी प्रकार सभी जीवों को भी दु:ख प्रिय नहीं और सभी अपने जैसे ही हैं, यह जानकर समस्त आदर एवं सजगता का भाव रखते हुए सभी पर दया करो। -- समणसुत्त : १५०
  • जह उसरम्मि खित्ते पइण्णवीयं ण िंक पि रुहेइ।
फलवज्जियं वियाणह, अपत्तदिण्णं तहा दाणं॥
जिस प्रकार ऊसर खेत में बोया गया बीज कुछ भी नहीं उगाता है, उसी प्रकार अपात्र में दिया गया दान भी फलरहित-सा है। -- वसुनन्दि श्रावकाचार : २४२
  • साहूणं कप्पणिज्जं, जं न वि दिण्णं कहिं पि िंकचितहिं।
धीरो जहुत्तकारी, सुसावया तं न भुंजंति॥
जिस घर में साधुओं को उनके अनुकूल किंचित् भी दान नहीं दिया जाता, उस घर में शास्त्रोक्त आचरण करने वाले धीर तथा त्यागी सद्गृहस्थ भोजन नहीं करते। -- उपदेशमाला : २३९
  • जो पुण लच्छिं संचदि ण य भुंजदि णेय देदि पत्तेसु।
सो अप्पाणं वंचदि मणुयत्तं णिप्फलं तस्स॥
जो मनुष्य लक्ष्मी का केवल संचय करता है, दान नहीं देता, वह अपनी आत्मा को ठगता है और उसका मनुष्य जन्म लेना वृथा है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : १३
  • दिन्ति फलाइं जहिच्छं कप्पदुमा नेय िंकपि जंपंति।
धूमलियजलहरा पाणियं पि दाऊण गज्जंति॥
मन इच्छित भरपूर फल देकर भी कल्पवृक्ष कुछ भी नहीं बोलते और काले बादल सिर्पâ पानी देकर भी गर्जना करते रहते हैं। -- गाहारयण कोष : १३३
  • आहारौषध-शास्त्रानुभयभेदात् यत् चर्तुिवधम् दानम्।
तद् उच्यते दातव्यं र्नििदष्टम् उपासक-अध्ययने॥
आहार, औषधि, शास्त्र और अभय, ये दान के चार भेद हैं। उपासकाध्ययन के अनुसार ये चारों देने योग्य होते हैं। -- समणसुत्त : ३३१
  • दानं भोजनमात्रं, दीयते धन्यो भवति सागार:।
पात्रापात्रविशेषसंदर्शने िंक विचारेण॥
भोजनमात्र का दान करने से गृहस्थ धन्य हुआ करता है। यह दान करने में पात्र-अपात्र का क्या विचार करना। -- समणसुत्त : ३३२
  • तस्यैष मार्गो गुरुवृद्धसेवा, विवर्जना बालजनस्य दूरात्।
स्वाध्यायैकान्तनिवेशना च, सूत्रार्थसंचिन्तनता धृतिश्च॥
गुरु तथा वृद्धजनों की सेवा करना, अज्ञानी लोगों के सम्पर्क से दूर रहना, स्वाध्याय करना, एकान्तवास करना, सूत्र और अर्थ का सम्यक् चिन्तन करना तथा धैर्य रखना-(ये दु:खों से मुक्ति के) उपाय हैं। -- समणसुत्त : २९०
  • नाणेण य करणेण य दोहि वि दुक्खक्खयं होइ।
ज्ञान और तदनुसार क्रिया-इन दोनों की साधना से ही दु:ख का क्षय होता है। -- मरणसमाधि : १४७
  • आकाशकालजीवा:, धर्माधर्मौ च र्मूितपरिहीना:।
मूर्तं पुद्गलद्रव्यं, जीव: खलु चेतनस्तेषु॥
आकाश, काल, जीव, धर्म और अधर्म द्रव्य अर्मूितक हैं। पुद्गल द्रव्य र्मूितक है। इन सबमें केवल जीव द्रव्य ही चेतन है। -- समणसुत्त : ६२६
  • दव्वं सल्लक्खणयं उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं।
द्रव्य का लक्षण सत् है और वह सदा उत्पाद, व्यय एवं ध्रुवत्व भाव से युक्त होता है। -- पंचास्तिकाय : १०
  • आकाशकालपुद्गलधर्माधर्मेषु न सन्ति जीवगुणा:।
तेषामचेतनत्वं, भणितं जीवस्य चेतनता॥
आकाश, काल, पुद्गल, धर्म और अधर्म द्रव्यों में जीव के गुण नहीं होते, इसलिए उन्हें अजीव कहा गया है। जीव का गुण चेतनता है। -- समणसुत्त : ६२५
  • जीवा: पुद्गलकाया:, सह सक्रिया भवन्ति न च शेषा:।
पुद्गलकरणा: जीवा: स्कन्धा: खलु कालकरणास्तु॥
जीव और पुद्गलद्रव्य ये दो द्रव्य सक्रिय हैं। शेष सब द्रव्य निष्क्रिय हैं। जीव के सक्रिय होने का बाह्य साधन कर्म-नोकर्मरूप पुद्गल है और पुद्गल के सक्रिय होने का बाह्य साधन कालद्रव्य है। -- समणसुत्त : ६२७
  • धर्मोऽधर्म आकाशं, द्रव्यमेवैâकमाख्यातम्।
अनन्तानि च द्रव्याणि, काल: (समया:) पुद्गला जन्तव:॥
धर्म, अधर्म और आकाश-ये तीनों द्रव्य संख्या में एक-एक हैंं (व्यवहार) काल, पुद्गल और जीव-ये तीनों द्रव्य अनंतानंत हैं। -- समणसुत्त : ६२८
  • धर्माऽधर्मौ च द्वावप्येतौ, लोकमात्रौ व्याख्यातौ।
लोकेऽलोके च आकाश: समय: समयक्षेत्रिक:॥
धर्म और अधर्म-ये दोनों ही द्रव्य लोकप्रमाण हैं। आकाश, लोक और अलोक में व्याप्त है। (व्यवहार-काल समयक्षेत्र अर्थात् मनुष्य क्षेत्र में ही है।) -- समणसुत्त : ६२९
  • अन्योऽन्यं प्रविशन्त:, ददत्यवकाशमन्योऽन्यय।
मिलन्तोऽपि च नित्यं, स्वभावं स्वभावं न विजहति॥
ये सब द्रव्य परस्पर में प्रविष्ट हैं। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य को अवकाश देते हुए स्थित है। ये इसी प्रकार अनादिकाल से मिले हुए हैं, किन्तु अपना-अपना स्वभाव नहीं छोड़ते हैं। -- समणसुत्त : ६३०
  • द्रव्यं पर्यववियुतं, द्रव्य-वियुक्ताश्च पर्यवा: न सन्ति।
उत्पादस्थितिभंगा:, खलु द्रव्यलक्षणमेतत्॥
पर्याय के बिना द्रव्य नहीं और द्रव्य के बिना पर्याय नहीं। उत्पाद, स्थिति (ध्रुवता) और व्यय (नाश) द्रव्य का लक्षण है। अर्थात् द्रव्य उसे कहते हैं, जिसमें प्रतिसमय उत्पाद आदि तीनों घटित होते रहते हैं। -- समणसुत्त : ६६२
  • प्रादुर्भवति चान्य:, पर्याय: पर्यायो व्ययते अन्य:।
द्रव्यस्य तदपि द्रव्यं, नैव प्रनष्टं नैव उत्पन्नम्॥
द्रव्य की अन्य (उत्तरवर्ती) पर्याय उत्पन्न (प्रकट) होती है और अन्य (पूर्ववर्ती) पर्याय नष्ट (अदृश्य) हो जाती हैं। फिर भी द्रव्य न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है-द्रव्य के रूप में सदा ध्रुव (नित्य) रहता है। -देखें : गुण, उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य। -- समणसुत्त : ६६६
  • भारी पीलो चीकणो कनक, अनेक तरंग रे।
पर्याय दृष्टि न दीजिए, एकज कनक अभंग रे॥
स्वर्ण के साथ पर्याय रूप में तीन गुण निहित रहते हैं-भारीपन, पीलापन और चिकनापन अर्थात् सोना वजन में भारी, रंग से पीता और गुण से चिकना (स्निग्ध) ऐसे अनेक रूपों में दृष्टिगत होता है। इसी तरह स्वर्ण के हार, कगन कठी, कड़ा आदि विभिन्न आभूषण बनाए जाते हैं, किन्तु ये सब पर्याय-दृष्टि से देखने पर ही भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। यदि पर्याय-दृष्टि को गौण कर द्रव्यदृष्टि से देखा जाए तो सोना एक और अखण्ड-अभेद रूप ही रहता है। उसके भेद-प्रभेद नहीं हो सकते। -- आनन्दघन ग्रंथावली :: अरजिन स्तवन
  • सुरगिरिणो िंक तुंगत्तणेण ? िंक तस्स कणयरिद्धीए?
पासे वि भमंतं मित्तमंडलं जस्स अत्थमिअं॥
मेरु पर्वत की ऊँचाई से क्या और उसकी स्वर्णऋद्धि से भी क्या, जिसके पास में ही भ्रमण करने वाले सूर्यमंडल अस्त हो जाते हैं ? ऐसे धनवान से क्या लाभ, जिसके रहते हुए मित्रमंडल की अधोगति होती है ? -- गाहारयण कोष : ७२७
  • धन धरती में गाडै बौरा, धूरि आप मुख लावे।
मूषक साँप होइगो आखर, तातै अलठि कहावै॥
मूढ़ मानव अपने धन का संरक्षण करने हेतु धन को जमीन में गाड़ता है और उस पर धूल डालता है किन्तु वस्तुत: वह धन के ऊपर धूल नहीं डाल रहा है, प्रत्युत अपने ऊपर ही धूल डाल रहा है। इसका कारण यह है कि धन के प्रति अत्यधिक मूच्र्छा होने से, वह मरकर उसी धन की रखवाली करने वाला सर्प, चूहा आदि बनता है। -- आनन्दघन ग्रंथावली : पद-४
  • आदा धम्मो मुणेदव्वो। -- प्रवचनसार : १-८
  • आत्मा ही धर्म है, अर्थात् धर्म आत्मा-स्वरूप होता है। किरिया हि णत्थि अफला, धम्मो जदि णिप्फलो परमो।
संसार की कोई भी मोहात्मक क्रिया निष्फल (बंधनरहित) नहीं है, एकमात्र धर्म ही निष्फल है, अर्थात् स्व-स्वभाव रूप होने से बंधन का हेतु नहीं है। -- प्रवचनसार : २-२४
  • धम्मो वत्थुसहावो।
वस्तु का अपना स्वभाव ही उसका धर्म है। -- कर्तिकेयानुप्रेक्षा : ४७८
  • धर्मो बंधुश्च मित्रञ्च धर्मोऽयं गुरुरंगिनाम्।
तस्माद् धर्मे मिंत धत्स्व स्वर्गमोक्षसुखदायिनि॥
धर्म ही मनुष्य का सच्चा बंधु है, मित्र है और गुरु है। इसलिए स्वर्ग एवं मोक्ष के सुख देने वाले धर्म में वृद्धि को स्थिर करना चाहिए। -- आदिपुराण : १०-१०९
  • स धर्मो यत्र नाधर्म: तत्सुखं यत्र नासुखम्।
तज् ज्ञानं यत्र नाऽज्ञानं, सा गतिर्यत्र नाऽगति:॥
धर्म वही है जिसमें अधर्म न हो। सुख वही है जिसमें असुख न हो। ज्ञान वही है जिसमें अज्ञान न हो और गति वही है जिसमें आगति अर्थात् लोटना न हो। -- आत्मानुशासन : १
  • संकल्प्य कल्पवृक्षस्य, चिन्त्यं चिन्तामणेरपि।
असंकल्प्यमसंचिन्त्यं, फलं धर्मादवाप्यते॥
कल्पवृक्ष से संकल्प किया हुआ और चिंतामणि से चिंतन किया हुआ पदार्थ प्राप्त होता है किन्तु धर्म से तो असंकल्प्य एवं अचिन्त्य फल मिलता है। -- आत्मानुशासन : २२
  • तव -नियमसुट्ठियाणं, कल्लाणं जीवियांपि मरणं पि।
जीवंतज्जंति गुणा, मया पुण सुग्गइं जंति॥
तप-नियम रूप धर्म में रहे हुए जीवों का जीना और मरना दोनों ही अच्छे हैं। जीवित रहकर तो वे गुणों का अर्जन करते हैं और मरने पर सद्गति को प्राप्त होते हैं। -- उपदेशमाला : ४४३
  • आत्मशुद्धिसाधनं धर्म:।
आत्मा की शुद्धि करने वाला साधन धर्म है। -- जैन सिद्धान्तदीपिका : ७२३
  • मानुष्यं विग्रहं लब्ध्वा, श्रुतिर्धर्मस्य दुर्लभा।
यं श्रुत्वा प्रतिपद्यन्ते, तप: क्षान्तिमिंहस्रताम्॥
(प्रथम तो चतुर्गतियों में भ्रमण करने वाले जीव को मनुष्य शरीर ही मिलना दुर्लभ है, फिर) मनुष्य-शरीर प्राप्त होने पर भी ऐसे धर्म का श्रवण तो और भी कठिन है, जिसे सुनकर तप, क्षमा और अिंहसा को प्राप्त किया जाए। -- समणसुत्त : ५२६
  • आहत्य श्रवणं लब्ध्वा, श्रद्धा परमदुर्लभा।
श्रुत्वा नैयायिकम् मार्गं, बहव: परिभ्रश्यन्ति॥
कदाचित् धर्म का श्रवण हो भी जाए, तो उस पर श्रद्धा होना महाकठिन है क्योंकि बहुत से लोग न्यायसंगत मोक्षमार्ग का श्रवण करके भी उससे विचलित हो जाते हैं। -- समणसुत्त : ५२७
  • धम्मविहीणो सोक्खं, तण्हाछेयं जलेण जह रहिदो।
जिस प्रकार मनुष्य जल के बिना प्यास नहीं बुझा सकता, उसी प्रकार मनुष्य धर्मविहीन सुख नहीं पा सकता। -- सन्मति प्रकरण : १-३
  • धम्मु ण पढियइं होइ धम्मु ण पोत्था पिच्छियइँ।
धम्मु ण मठिय-पएसि धम्मु ण मत्था लुंचियइँ॥ राय-दोस वे परिहरिवि जो अप्पाणि वसेइ।
सो धम्मु वि जिण उत्तिमउ जो पंचम-गइ णेइ॥
पढ़ लेने से धर्म नहीं होता, पुस्तक और पीछी से धर्म नहीं होता, किसी मठ में रहने से भी धर्म नहीं है और केशलुंचन से भी धर्म नहीं कहा जाता। जो राग और द्वेष, दोनों का परित्याग कर अपनी आत्मा में वास करता है, उसे ही अर्हन्त से उत्तम धर्म कहा है, जो मोक्ष प्रदायक है। -- योगसार : ४७-४८
  • तिक्खो वि खरो वि सलोहओ वि परपीडगो वि लहुओ वि।
लग्गो धम्मम्मि नरो सरोव्व गरुअं गुणं लहइ॥
क्रोधी, कठोर, लोभी, परपीड़क, क्षुद्र प्रकृति व्यक्ति भी यदि धर्म में संलग्न हो जाए तो वह भी बाण की तरह ऊध्र्व दिशा की ओर जाता है, गुणों को प्राप्त करता है। -- गाहारयण कोष : ७८५
  • एओ चेव सुभो णवरि सव्वसोक्खायरो धम्मो।
केवल एक धर्म ही शुभ है। वही सब सुख प्रदान करने वाला है। -- भगवती आराधना : १८१३
  • खंतीमद्दवअज्जवलाघवतवसंजमो अिंकचणदा।
तह होइ बम्हचेरं सच्चं चागो य दस धम्मा॥
क्षमा, मार्दव, आर्जव, शुद्धि, सत्य, संयम, तप, त्याग, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य; यह दस प्रकार का धर्म हुआ करता है। -- मूलाचार : ७५२
  • ध्यानोपरमेऽपि मुनि:, नित्यमनित्यादिभावनापरम:।
भवति सुभावितचित्त:, धर्मध्यानेन य: पूर्वम्॥
मोक्षार्थी मुनि सर्वप्रथम धर्मध्यान द्वारा अपने चित्त को सुभावित करे। बाद में धर्मध्यान से उपरत होने पर भी सदा अनित्य-अशरण आदि भावनाओं के चिंतवन में लीन रहे। -- समणसुत्त : ५०५
  • जरा यावत् न पीडयति, व्याधि: यावत् न वद्र्धते।
यावदिन्द्रियाणि न हीयन्ते, तावत् धर्मं समाचरेत्॥
जब तक बुढ़ापा नहीं सताता, जब तक व्याधियां (रोगादि) नहीं बढ़ती और इन्द्रियाँ अशक्त अक्षम) नहीं हो जातीं, तब तक (यथाशक्ति) धर्माचरण कर लेना चाहिए क्योंकि बाद में अशक्त एवं असमर्थ देहेन्द्रियों से धर्माचरण नहीं हो सकेगा। -- समणसुत्त : २९५
  • धर्मास्तिकायोऽरतो -ऽवर्णगन्धोऽशब्दोऽस्पर्श:।
लोकावगाढ: स्पृष्ट:, पृथुलोऽसंख्यातिकप्रदेश:॥
धर्मास्तिकाय रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है और शब्दरहित है। समस्त लोकाकाश में व्याप्त है, अखण्ड है और विशाल है तथा असंख्यातप्रदेशी है। -- समणसुत्त : ६३१
  • उदकम् यथा मत्स्यानां, गमनानुनुग्रहकरं भवति लोके। तथा जीवपुद्गलानां, धर्मद्रव्यं विजानीहि।
जैसे इस लोक में जल मछलियों के गमन में सहायक होता है वैसे ही धर्मद्रव्य जीवों तथा पुद्गलों के गमन में सहायक या निमित्त बनता है। -- समणसुत्त : ६३२
  • न च गच्छति धर्मास्तिकाय: गमनं न करोत्यन्यद्रव्यस्य।
भवति गते: स प्रसरो, जीवानां पुद्गलानां च॥
धर्मास्तिकाय स्वयं गमन नहीं करता और न अन्य द्रव्यों का गमन कराता है। वह तो जीवों और पुद्गलों की गति में उदासीन कारण है। यही धर्मास्तिकाय का लक्षण है। -- समणसुत्त : ६३३
  • विसयजलं मोहकलं, विलास बिव्वो अजलयराइन्नं।
मयमयरं उत्तिन्ना, तारुण्ण महन्नवं धीरा॥
जिसमें विषयरूपी जल है, मोह की गर्जना है, स्त्रियों की विलासभरी चेष्टा रूप मत्स्य आदि जलचर जीव हैं और मद रूपी जिसमें मगरमच्छ रहते हैं ऐसे तारुण्य रूपी समुद्र को धीर पुरुषों ने ही पार किया है। -- इन्द्रियपराजयशतक : ४३
  • जो विसमम्मि वि कज्जे कज्जारंभं न मुच्चए धीरो।
अहिसारियव्व लच्छी विनडइ वच्छत्थले तस्स॥
विषम कार्य के होने पर भी धीर पुरुष कार्यारम्भ करने पर उसको बीच में नहीं छोड़ते। अभिसारिका की तरह धीर व्यक्ति के वक्षस्थल पर लक्ष्मी स्वयं आ पड़ती है। -- गाहारयणकोष : १०७
  • मोक्ष: कर्मक्षयादेव, स चात्मज्ञानतो भवेत्।
ध्यानसाध्यं मतं तच्च, तद्ध्यानं हिममात्मन:॥
कर्म के क्षय से मोक्ष होता है, आत्मज्ञान से कर्म का क्षय होता है और ध्यान से आत्मज्ञान से कर्म का क्षय होता है और ध्यान से आत्मज्ञान प्राप्त होता है। अत: ध्यान आत्मा के लिए अत्यन्त हितकारी माना गया है। -- योगशास्त्र : ४-११३
  • वीतरागो विमुच्येत वीतरागं विचिन्तयन्।
वीतराग का ध्यान करता हुआ योगी स्वयं वीतराग होकर कर्मों से या वासनाओं से मुक्त हो जाता है। -- योगशास्त्र : ९-१३
  • झाणणिलीणो साहू, परिचागं कुणइ सव्वदोसाणं।
तम्हा दु झाणमेव हि, सव्वदिचारस्स पडिक्कमणं॥
ध्यान में लीन हुआ साधक सब दोषों का निवारण कर सकता है। इसलिए ध्यान ही समग्र अतिचारों-दोषों का प्रतिक्रमण है। -- नियमसार : ६३
  • ध्यायेत् पंच अपि गुरुन् , मंगल-चतु:शरणलोकपरिकरितान्।
नरसुरखेचरमहितान् , आराधनानायकान् वीरान्॥
मंगलस्वरूप चतु:शरणरूप अर्थात् लोकोत्तम, परम आराध्य एवं नर-सुर विद्याधरों द्वारा पूजित कर्मशत्रु के विजेता पंच गुरुओं (परमेष्ठी) का ध्यान करना चाहिए। -- समणसुत्त : ६
  • आहारासन-निद्राजयं, च कृत्वा जिनवरमतेन।
ध्यातव्य: निजात्मा, ज्ञात्वा गुरुप्रसादेन॥
जिनदेव के मतानुसार आसन तथा निद्रा पर विजय प्राप्त करके गुरुप्रसाद से ज्ञान प्राप्त कर निजात्मा का ध्यान करना चाहिए। -- समणसुत्त : २८८
  • ध्याननिलीन: साधु: परित्यागं करोति सर्वदोषाणाम्।
तस्मात् तु ध्यानमेव हि, सर्वातिचारस्य प्रतिक्रमणम्॥
ध्यान में लीन साधु सब दोषों का परित्याग करता है। इसलिए ध्यान ही समस्त अतिचारों (दोषों) का प्रतिक्रमण है। -- समणसुत्त : ४३५
  • निजभावं नापि मुंचति, परमभावं नैव गृह्णति कमपि।
जानाति पश्यति सर्वं, सोऽहम् इति चिन्तयेद् ज्ञानी॥
जो निजभाव को नहीं छोड़ता और किसी भी परभाव को ग्रहण नहीं करता तथा जो सबका ज्ञाता द्रष्टा है, वह (परम तत्त्व) ‘मैं’ ही हूँ। आत्मध्यान में लीन ज्ञानी ऐसा चिंतन करता है। -- समणसुत्त : ४५७
  • शीर्ष यथा शरीरस्य, यथा मूलं द्रुमस्य च।
सर्वस्य साधुधर्मस्य तथा ध्यानं विधीयते॥
जैसे मनुष्य-शरीर में सिर और वृक्ष में उसकी जड़ मुख्य है, वैसे ही साधु के समस्त धर्मों का मूल ध्यान है। -- समणसुत्त : ४८४
  • लवणमिव सलिलयोगे, ध्यानेन चित्तं विलोयते यस्य।
तस्य शुभाशुभदहनो, आत्मानल: प्रकाशयति॥
जैसे पानी का योग पाकर नमक विलीन हो जाता है, वैसे ही जिसका चित्त र्नििवकल्प समाधि में लीन हो जाता है, उसकी चिरसंचित शुभाशुभ कर्मों को भस्म करने वाली आत्मरूप अग्नि प्रकट होती है। -- समणसुत्त : ४८६
  • स्थिरकृतयोगानां पुन:, मुनीनां ध्याने सुनिश्चलमनसाम्।
ग्रामे जनाकीर्णे, शून्येरण्ये वा न विशेष:॥
जिन्होंने अपने योग अर्थात् मन-वचन-काय को स्थिर कर लिया है और जिनका ध्यान में चित्त पूरी तरह निश्चल हो गया है, उन मुनियों के ध्यान के लिए घनी आबादी के ग्राम अथवा अरण्य में कोई अंतर नहीं रह जाता। -- समणसुत्त : ४९१
  • ध्यानस्थितो खलु योगी, यदि नो संवेति निजात्मानम्।
स न लभते तं शुद्धं, भाग्यविहीनो यथा रत्नम्॥
ध्यान में स्थित योगी यदि अपनी आत्मा का संवेदन नहीं करता तो वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता जैसे कि भाग्यहीन व्यक्ति रत्न प्राप्त नहीं कर सकता। -- समणसुत्त : ४९७
  • मा चेष्टध्वम् मा जल्पत, मा चिन्तयत किमपि येन भवति स्थिर:।
आत्मा आत्मनि रत:, इदमेव परं भवेद् ध्यानम्॥
हे ध्याता ! तू न तो शरीर से कोई चेष्टा कर, न वाणी से कुछ बोल और न मन से कुछ चिन्तन कर, इस प्रकार त्रियोग का निरोध करने से तू स्थिर हो जाएगा-तेरी आत्मा आत्मरत हो जाएगी। यही परम ध्यान है। -- समणसुत्त : ५०१
  • न कषाय-समुत्थैश्च, बाध्यते मानसैर्दु:खै:।
ईष्र्या-विषाद-शोकादिभि:, ध्यानोपगतचित्त:॥
जिसका चित्त इस प्रकार के ध्यान में लीन है, वह आत्मध्यानी पुरुष कषाय से उत्पन्न ईष्र्या, विषाद, शोक आदि मानसिक दु:खों से बाधित (ग्रस्त या पीड़ित) नहीं होता। -- समणसुत्त : ५०२
  • ज्ञात्वा लोकसारं, नि:सारं दीर्घगमनसंसारम्।
लोकाग्रशिखरवासं, ध्याय प्रयत्नेन सुखवासम्॥
लोक को नि:सार तथा संसार को दीर्घ गमनरूप जानकर मुनि प्रयत्नपूर्वक लोक के सर्वोच्च अग्रभाग में स्थित मुक्तिपद का ध्यान करता है, जहाँ मुक्त (सिद्ध) जीव सुखपूर्वक सदा निवास करते हैं। -- समणसुत्त : ५२२
  • यथा राजकुलप्रसूतो, योग्यं नित्यमपि करोति परिकर्म्म।
तत: जितकरणो युद्धे, कर्मसमर्थो भविष्यति हि॥ एवं श्रामण्यं साधुरपि, करोति नित्यमपि योगपरिकर्म्म।
तत: जितकरण: मरणे, ध्यानसमर्थो भविष्यति॥
राजकुल में उत्पन्न राजपुत्र नित्य समुचित शास्त्राभ्यास करता रहता है तो उसमें दक्षता आ जाती है और वह युद्ध में विजय प्राप्त करने में समर्थ होता है। इसी प्रकार जो समभावी साधु नितय ध्यानाभ्यास करता है, उसका चित्त वश में हो जाता है और मरणकाल में ध्यान करने में समर्थ हो जाता है। -- समणसुत्त : ५८३-५८४
  • ज्झाणे जदि णियआदा णाणादो णावभासदे जस्स।
ज्झाणं होदि ण तं पुण जाण पमादो हु मोहमुच्छा वा॥
जिस साधक के ध्यान में यदि ज्ञान से निज-आत्मा का प्रतिभास नहीं होता है, तो वह ध्यान नहीं है। उसे प्रमाद, मोह अथवा मूच्र्छा ही जानना चाहिए। -- तिलोयपण्णत्ति : ९/४०
  • जह व णिरुद्धं असुहं सुहेण, सुहमवि तहेव सुद्धेण।
तम्हा एण कमेण य, जोई झाएउ णियआदं॥
आरम्भ में जिस प्रकार व्यवहार भूत शुभ प्रकृतियों के द्वारा अशुभ संस्कारों का निरोध हो जाता है, उसी प्रकार चित्त-शुद्धि हो जाने पर शुद्धोपयोग रूप समता के द्वारा उन शुभ संस्कारों का भी निरोध हो जात है। इस क्रम से योगी धीरे-धीरे आरोहण करता हुआ निजात्मा के ध्यान में सफल हो जाता है। -- नयचक्र : ३४८
  • जह डज्झइ तणकट्ठं जालामालाउलेण जलणेण।
तह जीवस्स वि डज्झइ कम्मरयं झाणजोएण॥
जिस तरह तृण या काष्ठ को अग्नि की ज्वाला जला डालती है, वैसे ही जीव ध्यान रूप अग्नि से कर्म रज को जलाता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • जह धाऊपत्थरम्मि समउप्पण्णम्मि जलणजोएहिं।
डहिऊण पत्थरमलं कीरइ अह निम्मलं कणयं॥ तह जीवकम्मयाणं अणाइकालम्मि झाणजोएण।
निज्जरिय कम्मकिट्टो जीवो अह कीरए विमलो॥
जिस तरह धातु और पत्थर का एक साथ जन्म हुआ है। धातु के कीट को अग्नि द्वारा जलाकर शुद्ध किया जाता है, उसी तरह जीव और कर्म का अनादिकालीन सम्बन्ध है। ध्यानाग्नि द्वारा कर्म रूपी कीट को जलाकर जीव को निर्मल किया जाता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • पुरुषाकार आत्मा, योगी वरज्ञानदर्शनसमग्र;।
य: ध्यायति स: योगी, पापहर: भवति निद्र्वन्द्व:॥
उत्तम अर्थात् केवल ज्ञान-दर्शन से परिपूर्ण पुरुषाकार आत्मा का ध्यान करने वाला योगी होता है और योगी जो होता है, वह अपने पापकर्मों को नष्ट कर निद्र्वन्द्व हो जाता है। -- समणसुत्त : ४९४
  • देहविविक्तं प्रेक्षते आत्मानं तथा च सर्वसंयोगान्।
देहोपधिव्युत्सर्गं, निस्संग: सर्वथा करोति॥
ध्यान करने वाला योगी अपनी आत्मा को शरीर और अन्य सभी संयोगों से अलग देखता है। वह शरीर और उपधि का त्याग करते हुए निस्संग हो जाया करता है। -- समणसुत्त : ४९५
  • नाहं भवामि परेषां, न मे परे सन्ति ज्ञानमहमेक:।
इति यो ध्यायति ध्याने, स आत्मा भवति ध्याता॥
ध्याता वही आत्मा होती है, जो ध्यान से यह ध्यान किया करती है कि ‘न मैं किसी का हूँ, न कोई मेरा है। मैं एक हूँ। ज्ञानमय हूँ। शुद्ध-बुद्ध हूँ।’ -- समणसुत्त : ४९६
  • किंदि रिंता वि नमंति मग्गणत्थं धरंति जे जोयं।
ताण धणूण व पुरिसाण कह णु मा होउ टंकारो॥
करोड़ों का धन देकर भी जो नम्र है और जो याचकों के लिए ही जीवन धारण करता है, ऐसा धनुष और पुरुष क्यों नहीं टंकार करेगा ? -- गाहारयण कोष : १२९
  • तह ववहारेण विणा, परमत्थुवएसणमसक्कम्।
व्यवहार (नय) के बिना परमार्थ (शुद्ध आत्मतत्त्व) का उपदेश करना अशक्य है। -- समयसार : ८
  • स्वाश्रितो निश्चय:।
स्व अर्थात् उस ही एक द्रव्य के आश्रय से जो बोध है, वह निश्चय-नय है। -- अध्यात्म सूत्र : १-८
  • पराश्रितो व्यवहार:।
पर अर्थ के आश्रय से जो बोध अथवा निरूपण है, वह व्यवहार-नय है। -- अध्यात्म सूत्र : १-९
  • यो ज्ञानिनां विकल्प:, श्रुतभेदो वस्त्वंशसंग्रहणम्।
स इह नय: प्रयुक्त:, ज्ञानी पुनस्तेन ज्ञानेन॥
श्रुतज्ञान के आश्रय से युक्त वस्तु के अंश को ग्रहण करने वाले ज्ञानी के विकल्प को ‘नय’ कहते हैं। उस ज्ञान से जो युक्त है, वह ज्ञानी है। -- समणसुत्त : ६९०
  • यस्मात् न नयेन विना, भवति नरस्य स्याद्वादप्रतिपत्ति:।
तस्मात् स बोद्धव्य:, एकान्तं हन्तुकामेन॥
नय के बिना मनुष्य को स्याद्वाद का बोध नहीं होता। अत: जो एकान्त का या एकान्त आग्रह का परिहार करना चाहता है, उसे नय को अवश्य जानना चाहिए। -- समणसुत्त : ६९१
  • धर्म्मविहीन: सौख्यं, तृष्णाच्छेदं जलेन यथा रहित:।
तथेह वांछति मूढो, नयरहितो द्रव्यनिश्चती॥
जैसे धर्म-विहीन मनुष्य सुख चाहता है या कोई जल के बिना अपनी प्यास बुझाना चाहता है, वैसे ही मूढ़जन नय के बिना द्रव्य के स्वरूप का निश्चय करना चाहते हैं। -- समणसुत्त : ६९२
  • परस्परसापेक्षो नयविषयोऽथ प्रमाणविषयो वा।
तत् सापेक्षं भणितं, निरपेक्षं तर्योिवपरीतम्॥
नय का विषय हो या प्रमाण का, परस्पर-सापेक्ष विषय को ही सापेक्ष कहा जाता है और इससे विपरीत को निरपेक्ष। (प्रमाण का विषय सर्व नयों की अपेक्षा रखता है और नय का विषय प्रमाण की तथा अन्य विरोधी नयों की अपेक्षा रखता है, तभी वह विषय-सापेक्ष कहलाता है।) -- समणसुत्त : ७१४
  • यावन्तो वचनपथास्तावन्तो वा नया: ‘अपि’ शब्दात्।
त एव च परसमया: सम्यक्त्वं समुदिता: सर्वे॥
(वास्तव में देखा जाए तो लोक में) जितने वचन-पन्थ हैं, उतने ही नय हैं, क्योंकि सभी वचन वक्ता के किसी न किसी अभिप्राय या अर्थ को सूचित करते हैं और ऐसे वचनों में वस्तु के किसी एक धर्म की ही मुख्यता होती है। अत: जितने नय सावधारण (हठग्राही) हैं, वे सब पर-समय हैं, मिथ्या हैं और अवधारणरहित (सापेक्ष सत्यग्राही) तथा स्यात् पद से युक्त समुदित सभी नय सम्यक् होते हैं। -- समणसुत्त : ७२६
  • परसमयैकनयमतं, तत्प्रतिपक्षनयतो निवर्तयेत्।
समये वा परिगृहीतं, परेण यद् दोष-बुद्धया॥
नय-विधि के ज्ञाता को पर समय रूप (एकान्त या आग्रहपूर्ण) अनित्यत्व आदि के प्रतिपादक ऋजुसूत्र आदि नयों के अनुसार लोक में प्रचलित मतों का निवर्तन या परिहार नित्यादि का कथन करने वाले द्रव्र्यािथक नय से करना चाहिए। तथा स्वसमय रूप जिन-सिद्धांत में भी अज्ञान या द्वेष आदि दोषों से युक्त किसी व्यक्ति से दोषबुद्धि से कोई निरपेक्ष पक्ष अपना लिया हो तो उसका भी निवर्तन (निवारण) करना चाहिए। -- समणसुत्त : ७२७
  • जह रससिद्धो वाई हेमं काऊण भुंजये भोगं।
तह णयसिद्धों जोई अप्पा अणुहवउ अणवरयं॥
जैसे रससिद्ध वैद्य सोना बनाकर भोगों को भोगता है, वैसे ही नयसिद्ध योगी सतत आत्मा का अनुभव करता है। -- नयचक्र
  • जम्मं मरणेण समं, संपज्जइ जुव्वणं जरासहियं।
लच्छी विणससहिया, इय सव्वं भंगुरं मुणह॥
जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, लक्ष्मी के साथ विनाश निरंतर लगा हुआ है। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु को नश्वर समझना चाहिए। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ५
  • युक्ति-सुयुक्तमार्गे, यत् चतुर्भेदेन भवति खलु स्थापनम्।
कार्ये सति नामादिषु, स निक्षेपो भवेत् समये॥
युक्तिपूर्वक उपयुक्त मार्ग में प्रयोजनवश नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव में पदार्थ की स्थापना को आगम में निक्षेप कहा गया है। -- समणसुत्त : ७३७
  • द्रव्यं खलु भवति द्विविधं, आगमनोआगमाभ्याम् यथा भणितम्।
अर्हत्-शास्त्रज्ञायक: अनुपयुक्तो द्रव्यार्हन्॥ नो आगम: अपि त्रिविध:, देहो ज्ञानिनो भाविकर्म च।
ज्ञानिशरीरं त्रिविधं, च्युतं त्यक्तं च्यावितम् च इति॥
जहाँ वस्तु की वर्तमान अवस्था का उल्लंघन कर उसका भूतकालीन या भावी स्वरूपानुसार व्यवहार किया जाता है, वहाँ द्रव्य-निक्षेप होता है। उसके दो भेद हैं-आगम और नोआगम। अर्हत्कथित शास्त्र का जानकार जिस समय उस शास्त्र में अपना उपयोग नहीं लगाता, उस समय वह आगम द्रव्य निक्षेप से अर्हत् है। नोआगम द्रव्यनिक्षेप के तीन भेद हैं-ज्ञायक शरीर, भावी और कर्म। जहाँ वस्तु के ज्ञाता के शरीर को उस वस्तुरूप माना जाए वहाँ ज्ञायक शरीर नोआगम द्रव्य निक्षेप है। जैसे राजनीतिज्ञ के मृत शरीर को देखकर कहना कि राजनीति मर गई। -- समणसुत्त : ७४१-७४२
  • अगणियत्या यो मोक्षमुखं, करोति निदानमसारसुखहेतो:।
स काचमणिकृते, वैडूर्यमणिं प्रणाशयति॥
जो व्रती मोक्ष-सुख की उपेक्षा या अवगणन करके (परभव में) असार सुख की प्राप्ति के लिए निदान या अभिलाषा करता है, वह कांच के टुकड़े के लिए वैडूर्यमणि को गंवाता है। -- समणसुत्त : ३६६
  • छेत्तूण य कप्पूरं कुणइ वइं कोद्दवस्स सो मूढो।
आचुण्णिऊण रयणं अविसेसो गेण्हए दोरो॥ दहिऊण य गोसीसं गेण्हइ छारं तु सो अबुद्धीओ।
जो चरिय तवं घरं मरइ य सनियाणमरणेणं॥
जो तपश्चरण करके निदानयुक्त मरण से मरता है, वह मूर्ख मानो कपूर के पेड़ को काटकर कोदों की खेती करना चाहता है, रत्न को पीसकर वह अविवेकी डोरा लेना चाहता है, वह अज्ञानी गोशीर्ष चंदन को जलाकर उसकी राख ग्रहण करता है। -- पउमचरिउ : ५४५
  • मा कस्स वि कुण णिंदं होज्जसु गुण-गेण्हजुज्जओ णिययं।
किसी की निन्दा मत करो, गुणों को ग्रहण करने में उद्यम करो। -- कुवलयमाला : ८५
  • जो ण य कुव्वदि गव्वं, पुत्तकलत्ताइसव्वअत्थेसु।
उवसमभावे भवदि, अप्पाणं मुणदि तिणमेत्तं॥
जो पुत्र-कलत्रादि किसी का भी गर्व नहीं करता और अपने को तृण के समान मानता है, उसे उपशम-भाव होता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ३१३
  • रिद्धीसु होह पणंवा जइ इच्छह अत्तणो लच्छी।
यदि अपनी शोभा चाहते हो तो सम्पत्ति प्राप्त होने पर नम्र बनो। -- कुवलयमाला : ८५
  • जइया मणु णिग्गंथ जिय, तइया तुहु णिग्गंथु।
जइया तुह णिग्गंथ जिय, तो लब्भइ सिव पंथु॥
हे जीव ! जब तेरा मन निग्र्रंथ (रागमुक्त) हो जाएगा, तभी तू सच्चा निग्र्रंथ बनेगा, और जब सच्चा निर्ग्रन्थ बनेगा तभी शिवपंथ मिलेगा। -- योगसार : ७३
  • बंधपदेशग्गलणं निज्जरणं इदि जिणेहिं पण्णत्तं।
जेण हवे संवरणं तेण दुणिज्जरणमिदि जाणे॥
बंधे हुए कर्म-प्रदेशों के क्षरण को निर्जरा कहा जाता है। जिन कारणों से संवर होता है, उन्हीं कारणों से निर्जरा होती है। -- वारस अणुवेसवा : ६६
  • यथा महातडागस्य, सन्निरुद्धे जलागमे।
उत्सिंचनया तपनया, क्रमेण शोषणा भवेत्॥ एवं तु संयतस्यापि, पापकर्म निरास्रवे।
भवकोटिसंचितं कर्म, तपसा निर्जीर्यते॥
जैसे किसी बड़े तालाब का जल, जल के मार्ग को बंद करने से, पहले के जल को उलीचने से तथा सूर्य के ताप से क्रमश: सूख जाता है, वैसे ही संयमी का करोड़ों भवों का संचित कर्म पापकर्म के प्रवेशमार्ग को रोक देने पर तथा तप से निर्जरा को प्राप्त होता है-नष्ट होता है। -- समणसुत्त : ६०९-६१०
  • चरदि जदं जदि णिच्चं, कमलं व जले णिरुवलेवो।
यदि साधक प्रत्येक कार्य यतना से करता है, तो वह जल में कमल की भाँति निर्लेप रहता है। -- प्रवचनसार : ३-१८
  • जाइ -जर-मरणरहियं परमं कम्मट्ठवज्जियं सुद्धं।
णाणाइचउसहावं अक्खयमविणासमच्छेयं॥
निर्वाण की स्थिति जन्म, जरा व मरण से रहित होती है। वह आठ कर्मों से रहित, उत्कृष्ट एवं शुद्ध है। वह अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख व अनंत वीर्य-इन चार आत्मिक स्वभावों से युक्त है, वह अक्षय, अविनाशी व अच्छेद्य है। -- नियमसार : १७७
  • नापि दु:खं नापि सौख्यं, नापि पीडा नैव विद्यते बाधा।
नापि मरणं नापि जननं, तत्रैव च भवति निर्वाणम्॥
निर्वाण वहीं होता है, जहाँ न दु:ख है, न सुख; न पीड़ा है, न बाधा; न मरण है, न जन्म। -- समणसुत्त : ६१७
  • नापि इन्द्रियाणि उपसर्गा:, नापि मोहो विस्मयो न निद्रा च।
न च तृष्णा नैव क्षुधा, तत्रैव च भवति निर्वाणम्॥
निर्वाण वहीं होता है, जहाँ न इन्द्रियाँ हैं, न उपसर्ग, न मोह है, न विस्मय; न निद्रा है, न तृष्णा और न ही क्षुधा। -- समणसुत्त : ६१८
  • नापि कम्मं नोकम्मं, नापि चिन्ता नैवार्तरौद्रे।
नापि धर्म्मशुक्लध्याने, तत्रैव च भवति निर्वाणम्॥
निर्वाण वहीं होता है, जहाँ न कर्म हैं, न नोकर्म; न चिन्ता है, न आत्र्त-रौद्र ध्यान; न धर्म ध्यान है और न ही शुक्ल ध्यान। -- समणसुत्त : ६१९
  • निर्वाणमित्यबाधमिति, सिद्धिलोकाग्रमेव च।
क्षेमं शिवमनाबाधं, यत् चरन्ति महर्षय:॥
निर्वाण अबाध है, सिद्धि है, लोकाग्र है, क्षेम है, शिव है, अनाबाध है और वह अवस्था है, जिसे मर्हिष पाया करते हैं। -- समणसुत्त : ६२१
  • समीक्ष्य पण्डितस्तस्मात् , पाशजातिपथान् बहून्।
आत्मना सत्यमेषयेत् , मैत्री भूतेषु कल्पयेत्॥
इसलिए पंडित पुरुष अनेकविध पाश या बंधनरूपी स्त्री, पुत्रादि के सम्बन्धों की, जो कि जन्म-मरण के कारण हैं, समीक्षा करके स्वयं सत्य की खोज करे और सब प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव रखे। -- समणसुत्त : ५८९
  • णत्थि विणा परिणामं, अत्थो अत्थं विणेह परिणामो।
कोई भी पदार्थ बिना परिणमन के नहीं रहता है और परिणमन भी बिना पदार्थ के नहीं होता है। -- प्रवचनसार : १-१०
  • उप्पज्जंति वियंति य, भावा नियमेण पज्जवनयस्स।
दव्वट्ठियस्स सव्वं, सया अणुप्पन्नमविणट्ठं॥
पर्यायदृष्टि से सभी पदार्थ नियमेन उत्पन्न भी होते हैं और नष्ट भी, परन्तु द्रव्य दृष्टि से सभी पदार्थ उत्पत्ति और विनाश से रहित तथा सदा काल ध्रुव हैं। -- समणसुत्त : १-११
  • किच्चा परस्स णिंदं, जो अप्पाणं ठवेदुमिच्छेज्ज।
सो इच्छदि आरोग्गं, परम्मि कडुओसहे पीए॥
जो दूसरों की निंदा करके अपने को गुणवान प्रस्थापित करना चाहता है, वह व्यक्ति दूसरों को कड़वी औषधि पिलाकर स्वयं रोगरहित होने की इच्छा करता है। -- भगवती आराधना : ३७१
  • एगो मे सासदो अप्पा, णाणदंसणलक्खणो।
ऐसा मे बाहिरा भावा, सव्वे संजोगलक्खणा॥
ज्ञान-दर्शन स्वरूप मेरा आत्मा ही शाश्वत तत्त्व है, इसमें भिन्न जितने भी (रागद्वेष, कर्म, शरीर आदि) भाव हैं, वे सब संयोगजन्य बाह्य भाव हैं, अत: वे मेरे नहीं है। -- नियमसार : १०२
  • अन्त्यादिमध्यहीनम् अप्रदेशम् इन्द्रियैर्न खलु ग्राह्यम्।
यद् द्रव्यम् अविभक्तम् तं परमाणुं कथयन्ति जिना:॥
जो आदि, मध्य और अन्त से रहित है, जो केवल एकप्रदेशी है-जिसके दो आदि प्रदेश नहीं हैं और जिसे इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, वह विभागविहीन द्रव्य परमाणु है। -- समणसुत्त : ६४३
  • वर्णरसगन्धस्पर्शे पूरणगलनानि सर्वकाले।
स्कन्धा इव कुर्वन्त: परमाणव: पुद्गला: तस्मात्॥
जिसमें पूरण-गलन की क्रिया होती है अर्थात् जो टूटता–जुड़ता रहता है, वह पुद्गल है। स्वंâध की भाँति परमाणु के भी स्पर्श, रस, गंध, वर्ण गुणों में सदा पूरण-गलन क्रिया होती रहती है, इसलिए परमाणु भी पुद्गल है। -- समणसुत्त : ६४४
  • अप्रदेश: परमाणु: प्रदेशमात्रश्च स्वयमशब्दो य:।
स्निग्धो व रुक्षो वा, द्विप्रदेशादित्वमनुभवति॥
(लोक में व्याप्त) पुद्गल परमाणु एकप्रदेशी है-दो आदि प्रदेशी नहीं है, तथा वह शब्दरूप नहीं है, फिर भी उसमें स्निग्ध व रुक्ष स्पर्श का ऐसा गुण है कि एक परमाणु दूसरे परमाणुओं से बंधने या जुड़ने या मिलने पर दो प्रदेशी आदि स्कन्ध का रूप धारण कर लेते हैं। -- समणसुत्त : ६५२
  • अत्तादि अत्तमज्झं अत्तंतं णेव इंदिये गेज्झं।
अविभागी जं दव्वं परमाणू तं वियाणाहि॥
परमाणु उस द्रव्य को जानें, जिसका खंडित होना संभव नहीं। वह अपना प्रारंभ, मध्य और अंत स्वयं हुआ करता है। उसे इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। -- नियमसार : २६
  • जीवा: भवन्ति त्रिविधा:, बहिरात्मा तथा च अन्तरात्मा च।
परमात्मान: अपि च द्विविधा:, अर्हन्त: तथा च सिद्धा च॥
जीव तीन प्रकार के होते हैं : बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा। परमात्मा के दो रूप हैं-अरिहंत और सिद्ध। -- समणसुत्त : १७८
  • निग्गहिए मणपसरे, अप्पा परमप्पा हवइ।
मन के विकल्पों को रोक देने पर आत्मा, परमात्मा बन जाता है। -- आराधनासार : ७४
  • प्राणसंदेह -जननं परमं वैरकारणम्।
लोकद्वयविरुद्धं च, परस्त्रीगमनं त्यजेत्॥
परस्त्रीगमन प्राण-नाश के संदेह को उत्पन्न करने वाला है। परम वैर का कारण है और इहलोक और परलोक-दोनों लोकों को नष्ट करने वाला है, अत: परस्त्रीगमन को त्याग देना चाहिए। -- योगशास्त्र : २-९७
  • सर्वस्वहरणं बन्धं, शरीरावयवच्छिदाम्।
मृतश्च नरकं घोरं, लभते पारदारिक:॥
परस्त्रीगामी पुरुष को यहाँ सर्व धन का नाश, जेल आदि का बंधन एवं शरीर के अवयवों को छेदन प्राप्त होता है और वह मरकर घोर नरक में जाता है। -- योगशास्त्र : २-९८
  • अत्थो मूलं अणत्थाणं।
अर्थ अनर्थों का मूल है। -- मरणसमाधि : ६०३
  • किं किंचनमिति तर्क:, अपुनर्भवकामिनोऽथ देहेऽपि।
संग इति जिनवेरन्द्रा:, निष्प्रतिकर्मत्वमुद्दिष्टवन्त:॥
जब अरहंत भगवान ने मोक्षाभिलाषी को ‘शरीर भी परिग्रह है’ कहकर देह की उपेक्षा करने का उपदेश दिया है, तब अन्य परिग्रह की बात ही क्या है ? -- समणसुत्त : ३७६
  • न स: परिग्रह उक्तो, ज्ञातपुत्रेण तायिना।
मूर्च्छा परिग्रह उक्त:, इति उक्तं मर्हिषणा॥
ज्ञातपुत्र भगवान महावीर ने (वस्तुगत) परिग्रह को परिग्रह नहीं कहा है। उन मर्हिष ने मूच्र्छा को ही परिग्रह कहा है। -- समणसुत्त : ३७९
  • जो संचिऊण लच्छिं धरणियले संठवेदि अइदूरे।
सो पुरिसो तं लच्छिं पाहाण सामाणियं कुणदि॥
जो मनुष्य लक्ष्मी का संचय करके पृथ्वी के तल में उसे गाड़ देता है, वह मनुष्य उस लक्ष्मी को पत्थर के तुल्य कर देता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : १४
  • बाहिरसंगा खेत्तं वत्थं धणधण्णकुप्पभंडाणि।
दुपयचउप्पय जाणाणि चेव सयणासणे य तहा॥
क्षेत्र (खेत या जमीन), वास्तु (मकान), धन, धान्य, वस्त्र, मसाले, दोपाये (नौकर-चाकर), चौपाये (पशु-धन) वाहन और शयन-आसन (सोने-बैठने के साधन), ये दस बाहरी परिग्रह हुआ करते हैं। -- भगवती आराधना : १११९
  • मिच्छत्तवेदरागा तहेव हासादिया य छद्दोसा।
चत्तारि तह कसाया चउदस अब्भंतरा गंथा॥
मिथ्यात्व, वेदों (स्त्री, पुरुष, नपुंसक की अनुभूति) में राग, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा और चार कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ), ये चौदह आंतरिक परिग्रह हुआ करते हैं। -- भगवती आराधना : १११८
  • चित्तवन्तमचित्तं वा, परिगृह्य कृशमपि।
अन्यं वा अनुजानाति, एवं दु:खात् न मुच्यते॥
सजीव या निर्जीव स्वल्प वस्तु का भी जो परिग्रह रखता है अथवा दूसरे को उसकी अनुज्ञा देता है, वह दु:ख से मुक्त नहीं होता। -- समणसुत्त : १४१
  • पुरुषे पुरुषशब्दो, जन्मादि-मरणकालपर्यन्त:।
तस्य तु बालादिका: पर्यययोग्या बहुविकल्पा:॥
पुरुष में पुरुष शब्द का व्यवहार जन्म से लेकर मरण तक होता रहता है। परन्तु इसी बीच बचपन-बुढ़ापा आदि अनेक पर्यायें उत्पन्न हो-होकर नष्ट होती जाती हैं। -- समणसुत्त : ६६७
  • तस्माद् वस्तूनामेव, ये सदृश: पर्यव: स सामान्यम्।
यो विसदृशो विशेष:, स मतोऽनर्थान्तरं तत:॥
अत: वस्तुओं की जो सदृश पर्याय है-दीर्घकाल तक बनी रहने वाली समान पर्याय है, वही सामान्य है और उनकी जो विसदृश पर्याय है, वह विशेष है। ये दोनों सामान्य तथा विशेष पर्यायें उस वस्तु से अभिन्न (कथंचित्) मानी गई हैं। -- समणसुत्त : ६६८
  • जो जत्तियस्स अत्थस्स भायणं सो उ तेत्तियं लहइ।
वुट्ठे वि दोणमेहे न डुंगरे पाणियं ढाइ॥
जो जितने अर्थ का पात्र होता है उसको उतना ही मिलता है (उससे अधिक नहीं), जैसे द्रोण मेघ के बरसने पर भी पहाड़ पर पानी नहीं ठहरता। -- गाहारयणकोष : २
  • चरिया पमादबहुला, कालुस्सं लोलदा य विसयेयु।
परपरितावपवादो, पावस्स य आसवं कुणदि॥
प्रमादबहुल चर्या, मन की कलुषता, विषयों के प्रति लोलुपता, परपरिताप (परपीड़ा) और परिंनदा-इनसे पाप का आस्रव (आगमन) होता है। -- पंचास्तिकाय : १३९
  • न हु पावं हवइ हिय, विसं जहा जीवियत्थिस्स।
जैसे कि जीवितार्थी के लिए विषय हितकर नहीं, वैसे ही कल्याणार्थी के लिए पाप हितकर नहीं। -- मरणसमाधि : ६१३
  • त्रीणि पातकानि सद्य: फलन्ति, स्वामिद्रोह: स्त्रीवधो बालवधश्चेति।
स्वामी-वध, स्त्री-वध और बच्चे का वध–ये तीन महापाप है, जिनका कुफल मनुष्य को इसी लोक में तत्काल भोगना पड़ता है। -- नीतिवाक्यामृत : २७-६५
  • खर पवनाइद्धं विसमं पत्तं परिभमइ गिरि णिउंजम्मि।
इय पाव-पवन-परिहट्टिओ वि जीवो परिब्भमइ॥
जिस तरह प्रचंड पवन से उड़ा हुआ पत्ता पहाड़ की खोह में इधर-उधर भटकता रहता है, वैसे ही पाप रूपी पवन से प्रेरित हुआ जीव चारों गति में भटकता रहता है। -- कुवलयमाला : ६६
  • रागो जस्स पसत्थो, अणुकंपासंसिदो य परिणामो।
चित्तम्हि णत्थि कलुसं, पुण्णं जीवस्स आसवदि॥
जिसका राग प्रशस्त है, अंतर में अनुकंपा की वृत्ति है और मन में कलुष भाव नहीं है, उस जीव को पुण्य का आस्रव होता है। -- पंचास्तिकाय : १३५
  • पुण्यमपि य: समिच्छति, संसार; तेन ईहितो भवति।
पुण्यं सुगतिहेतु:, पुण्यक्षयेण एव निर्वाणम्॥
जो पुण्य की इच्छा करता है, वह संसार की ही इच्छा करता है। पुण्य सुगति का हेतु (अवश्य) है, किन्तु निर्वाण तो पुण्य के क्षय से ही होता है। -- समणसुत्त : १९९
  • वरं व्रततपोभि: स्वर्ग:, मा दु:खं भवतु निरये इतरै:।
छायाऽऽतपस्थितानां, प्रतिपालयतां गुरुभेद:॥
(तथापि) व्रत व तपादि के द्वारा स्वर्ग की प्राप्ति उत्तम है। इनके न करने पर नरकादि के दु:ख उठाना ठीक नहीं है क्योंकि कष्ट सहते हुए धूप में खड़े रहने की अपेक्षा छाया में खड़े रहना ही अच्छा है। (इसी न्याय से लोक में पुण्य की सर्वथा उपेक्षा उचित नहीं।) -- समणसुत्त : २०३
  • समत्तेण सुदेण य विरदीए सकायणिग्गहगुणेहिं जो परिणदो सो पुण्णो।
सम्यक्त्व, श्रुतज्ञान, व्रतरूप परिणाम तथा कषाय-निग्रह रूप गुणों से परिणत आत्मा पुण्य पुरुष है। -- मूलाचार : २३४
  • तम्हा मंद-कसाया हेऊ पुण्णस्स ण हि वंछा।
पुण्य की इच्छा करने से नहीं बल्कि कषायों के क्षीण (भावों के शुद्ध) होने से पुण्य अर्जित हुआ करता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ४१३
  • सुहपरिणामो पुण्णं, असुहो पावं ति हवदि जीवस्स।
आत्मा का शुभ परिणाम (भाव) पुण्य है और अशुभ परिणाम पाप है। -- पंचास्तिकाय : १३२
  • उपभुंजिऊण न सक्कइ रिद्धिपत्तो वि पुन्नपरिहीणो।
पउरं पि जलं तिसिओ वि मंडलो लिहइ जीहाए॥
पुण्यहीन विपुल सामग्री प्राप्त करने पर भी उसका उपभोग नहीं कर सकता। जैसे विशाल जलराशि के होने पर और बहुत प्यास लगने पर भी सांप तो जीभ से ही पानी को चाटता है। -- गाहारयणकोष : २३
  • अणुस्कन्धविकल्पेन तु, पुद्गलद्रव्यं भवति द्विविकल्पम्।
स्कन्धा: खलु षट्प्रकारा:, परमाणुश्चैव द्विविकल्प:॥
अणु और स्कन्ध के रूप में पुद्गल-द्रव्य दो प्रकार का है। स्कन्ध छ: प्रकार का है और परमाणु दो प्रकार का है-कारण-परमाणु और कार्य-परमाणु। -- समणसुत्त : ६४०
  • अतितस्थूलस्थूला: स्थूला: स्थूलसूक्ष्माश्च सुक्ष्मस्थूलाश्च।
सूक्ष्मा अतिसूक्ष्मा इति, धरादयो भवन्ति षड्भेदा:॥
स्कन्ध पुद्गल के छह प्रकार हैं–अतिस्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म। पृथ्वी आदि इनके छह दृष्टान्त हैं। -- समणसुत्त : ६४१
  • पृथ्वी जलं च छाया, चतुरिन्द्रियविषय-कर्म-परमाणव:।
षड्विधभेदं भणितं, पुद्गलद्रव्यं जिनवरै:॥
पृथ्वी, जल, छाया तथा नेत्र शेष चार इन्द्रियों के विषय, कर्म व परमाणु-इस प्रकार जिनदेव ने स्कन्ध पुद्गल के छह दृष्टान्त कहे हैं। (पृथ्वी अतिस्थूल का, जल स्थूल का, छाया-प्रकाश आदि नेत्र इन्द्रिय-विषय सूक्ष्म-स्थूल का कार्मण-स्कन्ध सूक्ष्म तथा परमाणु अतिसूक्ष्म का दृष्टान्त है। -- समणसुत्त : ६४२
  • धम्महं अत्थहं कम्महं वि एयहं सयलहं मोक्खु।
उत्तमु पभणहिं णाणि जिय अण्णे जेण ण सोक्खु॥
ज्ञानी पुरुष धर्म पुरुषार्थ, अर्थ पुरुषार्थ, काम पुरुषार्थ और मोक्ष पुरुषार्थ में से मोक्ष पुरुषार्थ को उत्तम कहते हैं क्योंकि अन्य पुरुषार्थों में परम सुख नहीं है। -- परमात्म-प्रकाश : २-३
  • आलसड्ढो णिरुच्छाहो फलं किंचि ण भुंजदे।
थणक्खीरादिपाणं वा पउरुसेण विणा ण हि॥
जो व्यक्ति आलस्य युक्त होकर उद्यम-उत्साह से रहित हो जाता है, वह किसी भी फल को प्राप्त नहीं कर सकता। पुरुषार्थ से ही सिद्धि है, जैसे स्तन का दूध उद्यम करने पर ही पिया जा सकता है। -- गोम्मटसार-कर्मकांड : ८९०
  • मूलाहिंतो साहाण संभवो होइ सयलवच्छाणं।
साहाहि मूलबंधो जेहिं कओ ते तरू विरला॥
सभी वृक्षों के मूल से ही शाखा होती है, किन्तु शाखाओं से मूल (जड़) को मजबूत करते हैं, ऐसे वृक्ष तो विरले ही होते हैं। (जगत् के प्रवाह में बहने वाले तो सभी होते हैं, किन्तु जगत् को अपने प्रवाह में बहाने वाला तो विरला ही होता है।) -- गाहारयणकोष : ७०९
  • निब्वडिय पुरिसयारे असच्च संभावना वि संभवइ।
एक्काणणे वि सीहे जाया पंचाणणपसिद्धी॥
पुरुषार्थ प्रकट करने पर असम्भव कार्य भी सम्भव लगने लगते हैं। अपने पुरुषार्थ के बल पर ही एकानन सिंह भी पंचानन कहलाता है। -- गाहारयणकोष : १९
  • वचोविग्रह-संकोचो द्रव्यपूजा निगद्यते।
तत्र मानस-संकोचो, भावपूजा पुरातनै:॥
वचन और शरीर का संकोच करना द्रव्य पूजा है एवं मन का संकोच करना भाव पूजा है। -- अमितगति श्रावकाचार
  • रागद्वेष -प्रमत्त:, इन्द्रियवशग: करोति कर्माणि।
आस्रवद्वारैरविगूहितैस्त्रिविधेन करणेन॥
रागद्वेष से प्रमत्त बना जीव इन्द्रियाधीन होता है। उसके आस्रव-द्वार बराबर खुले रहने के कारण मन-वचन-काय के द्वारा निरन्तर कर्म करता रहता है। -- समणसुत्त : ६०१
  • भणितं खलु तत् प्रमाणं, प्रत्यक्षपरोक्षभेदाभ्याम्।
जो ज्ञान वस्तु-स्वभाव के यथार्थ स्वरूप को सम्यक् रूप से जाना है, उसे प्रमाण कहते हैं। इसके दो भेद हैं-प्रत्यक्ष और परोक्ष। -- समणसुत्त : ६८५
  • यो न प्रमाण-नयाभ्याम् , निक्षेपेण निरीक्षते अर्थम्।
तस्यायुक्तं युक्तं, युक्तमयुक्तं च प्रतिभाति॥
जो प्रमाण, नय और निक्षेप के द्वारा अर्थ का बोध नहीं करता, उसे अयुक्त, युक्त तथा युक्त, अयुक्त प्रतीत होता है। -- समणसुत्त : ३२
  • ज्ञानं भवति प्रमाणं, नयोऽपि ज्ञातु: हृदयभावार्थ:।
निक्षेपोऽपि उपाय:, युक्त्या अर्थ-प्रतिग्रहणम्॥
ज्ञान प्रमाण है। ज्ञाता का हृदयगत अभिप्राय नय है, जानने के उपायों को निक्षेप कहते हैं। इस तरह युक्तिपूर्वक अर्थ ग्रहण करना चाहिए। -- समणसुत्त : ३३
  • तस्मात् सर्वेऽपि नया:, मिथ्यादृष्टय: स्वपक्षप्रतिबद्धा।
अन्योन्यनिश्रिता: पुन:, भवन्ति सम्यक्त्वसद्भावा:॥
अत: समझना चाहिए कि अपने-अपने पक्ष का आग्रह रखने वाले सभी नय मिथ्या हैं और परस्पर सापेक्ष होने से वे सम्यक् भाव को प्राप्त हो जाते हैं। -- समणसुत्त : ४३
  • पमायमूलो बंधो भवति
कर्मबंध का मूल प्रमाद है। -- निशीथ र्चूिण : ६६८९
  • नाऽऽलस्येन समं सौख्यं, न विद्या सह निद्रया।
न वैराग्यं ममत्वेन, नारम्भेण दयालुता॥
आलसी सुखी नहीं हो सकता, निद्रालु विद्याभ्यासी नहीं हो सकता, ममत्व रखने वाला वैराग्यवान नहीं हो सकता और हिंसक दयालु नहीं हो सकता। -- समणसुत्त : १६७
  • ईर्याभाषैषणाऽऽदाने-उच्चारे समितय इति।
मनोगुप्तिर्वचोगुप्ति:, कायगुप्तिश्चाष्टमी॥
  • एता अष्ट प्रवचनमातर: ज्ञानदर्शनचारित्राणि।
रक्षन्ति सदा मुनीन्, मातर: पुत्रमिव प्रयता:॥
ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और उच्चार (मल-मूत्रादि विसर्जन)-ये पांच समितियाँ हैं। मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति-ये तीन गुप्तियाँ हैं। ये पाठ प्रवचनमाताएं हैं। जैसे सावधान माता पुत्र का रक्षण करती है, वैसे ही सावधानीपूर्वक पालन की गई ये आठों माताएं मुनि के सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यग्चारित्र का रक्षण करती हैं। -- समणसुत्त : ३८४-३८५
  • हिययनिवेसियवडवानलो वि विसकुलहरं पि जलरासी।
रयणायरु त्ति लंभइ पेच्छ पसिद्धीए माहप्पं॥
हृदय में वडवानल को धारण कर भी, विष का कुलधन (उत्पत्ति-स्थान) होकर भी समुद्र ने रत्नाकर नाम धारण किया है। यह सब प्रसिद्धि का ही माहात्म्य है। (प्रसिद्धि को पाने के बाद अनेक दोष भी उसमें छिप जाते हैं।) -- गाहारयणकोष : २५६
  • अवरगुणेणं जाणं मउप्फरो ताण नाम को गव्वो ? वाउवसारुठन-हंगयाण धूलीण को महिमा ?
दूसरों के गुणों से यदि व्यक्ति प्रकाशित होता है (प्रसिद्धि को पाता है) तो उसमें गर्व करने जैसा क्या है ? हवा के संसर्ग से आकाश में घूमने वाले रजकणों की क्या महिमा ? -- गाहारयणकोष : २५४
  • अनन्तानन्तभवेन, सर्मिजत-शुभाशुभकम्र्मसन्दोह:।
तपश्चरणेन विनश्यति, प्रायश्चित्तं तपस्तस्मात्॥
अनन्तानन्त भवों में उपार्जित शुभाशुभ कर्मों के समूह का नाश तपश्चरण से होता है। अत: तपश्चरण करना प्रायश्चितत है। -- समणसुत्त : ४५९
  • पिम्मं तं चिय जायंति जत्थ दोसा वि नणु गुणच्चेय।
सिद्धरसो सो किर जत्थ हुंति लोहाइं वि सुवण्णं॥
जहाँ प्रेम होता है वहाँ दोष भी गुण बन जाते हैं। जैसे सिद्ध रस के संसर्ग से लोहा भी स्वर्ण बन जाता है। -- गाहारयणकोष : ७०
  • लच्छिं वंछेइ णरो णेव सुधम्मेसु आयरं कुणइ।
बीएण विणा कुत्थ वि किं दीसदि सस्सणिप्पत्ति॥
यह जीव लक्ष्मी को चाहता है पर अच्छे-श्रेष्ठ धर्म में आदर-बुद्धि नहीं करता। क्या बीज के बिना भी कहीं धान्य की उत्पत्ति दिखाई देती है ? -- द्वादश अनुप्रेक्षा : ४२८
  • स्वकं स्वकं प्रशंसन्त:, गर्हयन्त: परं वच:।
ये तु तत्र विद्वस्यन्ते, संसारं ते व्युच्छ्रिता:॥
जो पुरुष केवल अपने मत की ही प्रशंसा करते हैं तथा दूसरे के वचनों की निन्दा करते हैं और इस तरह अपना पांडित्य प्रदर्शन करते हैं, वे संसार में मजबूती से जकड़े हुए हैं, दृढ़ रूप में आबद्ध हैं। -- समणसुत्त : ७३४
  • यो विद्याविनीतमति: स बुद्धिमान्।
जो ज्ञान एवं नम्रता से युक्त है, वह बुद्धिमान है। -- नीतिवाक्यामृत : ५-३२
  • जीवो बंभा जीवम्मि चेव चरिया, हविज्ज जा जदिणो।
तं जाण बंभचेरं, विमुक्कपरदेहतित्तिस्स॥
ब्रह्म का अर्थ है-आत्मा। आत्मा में चर्या-रमण करना ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचारी की परदेह में प्रवृत्ति और तृप्ति नहीं होती। -- भगवती आराधना : ८७८
  • मातृसुताभगिनीमिव च, दृष्ट्वा स्त्रीत्रिकं च प्रतिरूपम्।
स्त्रीकथादिनिवृत्ति-स्त्रिलोकपूज्यं भवेद् ब्रह्म॥
बालिका, युवती, वृद्धा-स्त्री के तीनों रूपों को पुत्री, बहिन, माता के रूपों में देखना और स्त्री-कथा (काम-भोगों की बातचीत) को त्याग देना तीनों लोकों में पूज्य ब्रह्मचर्य होता है। -- समणसुत्त : ३७४
  • भक्ति: श्रेयाऽनुबंधिनी।
भक्ति कल्याण करने वाली है। -- आदिपुराण : ७-२७९
  • जयति श्रुतानां प्रभव:, तीर्थंकराणामपश्चिमो जयति।
जयति गुरुर्लोकानां, जयति महात्मा महावीर:॥
श्रुत ज्ञान के उदय की जय हो, तीर्थंकरों में अंतिम तीर्थंकर की जय हो, लोकों के गुरु की जय हो और महान् आत्मा (भगवान्) महावीर की जय हो। -- समणसुत्त : ७५६
  • व्याधिजरामरणमकरो, निरन्तरोत्पत्ति-नीर निकुरुम्ब:।
परिणामदारुणदु:ख:, अहो ! दुरन्तो भवसमुद्र:॥
अहो ! यह भवसमुद्र दुरन्त है-इसका अन्त बड़े कष्ट से होता है। इसमें व्याधि तथा जरा-मरण रूपी अनेक मगरमच्छ हैं, निरन्तर उत्पत्ति या जन्म ही जलराशि है। इसका परिणाम दारुण दु:ख है। -- समणसुत्त : ५१३
  • य: धार्मिकेषु भक्त:, अनुचरणं करोति परमश्रद्धया।
प्रियवचनं जल्पन् , वात्सल्यं तस्य भव्यस्य॥
जो धार्मिकजनों में भक्ति (अनुराग) रखता है, परम श्रद्धापूर्वक उनका अनुसरण करता है तथा प्रियवचन बोलता है, उस भव्य सम्यग्दृष्टि के वात्सल्य होता है। -- समणसुत्त : २४२
  • सुद्धं तु वियाणंतो, सुद्धं चेवप्पयं लहइ जीवो।
जाणंतो दु असुद्धं, असुद्धमेवप्पयं लहइ॥
जो अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करता है वह शुद्ध भाव को प्राप्त करता है और जो अशुद्ध रूप का अनुभव करता है, वह अशुभ भाव को प्राप्त होता है। -- समयसार : १८३
  • भावो हि प्रथमलिंगं, न द्रव्यलिंगं च जानीहि परमार्थम्।
भाव: कारणभूत:, गुणदोषाणं जिना ब्रुवन्ति॥
(वास्तव में) भाव ही प्रथम या मुख्य लिंग है। द्र्व्यलिंग परमार्थ नहीं है, क्योंकि भाव को ही जिनदेव गुण-दोषों का कारण कहते हैं। -- समणसुत्त : ३६०
  • भावविशुद्धिनिमित्तं, बाह्यग्रन्थस्य क्रियते त्याग:।
बाह्यत्याग: विफल:, अभ्यन्तरग्रंथयुक्तस्य॥
भावों की विशुद्धि के लिए ही बाह्य परिग्रह का त्याग किया जाता है। जिसके भीतर परिग्रह की वासना है, उसका बाह्य त्याग निष्फल है। -- समणसुत्त : ३६१
  • भावस्स णत्थि णासो, णत्थि अभावस्स चेव उप्पादो।
भाव (सत्) का कभी नाश नहीं होता और अभाव (असत्) का कभी उत्पाद (जन्म) नहीं होता। -- पंचास्तिकाय : १५
  • मदमानमायालोभ -विर्विजतभावस्तु भावशुद्धिरिति।
परिकथितं भव्यानां, लोकालोकप्रर्दिषभि:॥
लोक और अलोक को देखने तथा जानने वाले सर्वज्ञ प्रभु की भव्य जीवों के लिए यही देशना है कि मद, मान, माया और लोभ से रहित भाव ही भावशुद्धि है। -- समणसुत्त : २८२
  • न सत्कृतिमिच्छति न पूजां, नोऽपि न वन्दनकं कुत: प्रशंसाम्।
स संयत: सुव्रतस्तपस्वी, सहित आत्मगवेषक: स भिक्षु:॥
जो सत्कार, पूजा और वन्दना तक नहीं चाहता, वह किसी से प्रशंसा की अपेक्षा कैसे करेगा ? (वास्तव में) जो संयत है, सुव्रती है, तपस्वी है और आत्मगवेषी है, वही भिक्षु है। -- समणसुत्त : २३४
  • अल्लो सुक्को य दो छूठा, गोलया मट्टियामया।
दो वि आवडिया कूडे, जो अल्लो सो विलग्गइ॥ एवं लग्गंति दुम्मेहा, जे नरा काम लालसा।
विरत्ता उ न लग्गंत्ति, जहा सुक्के अ गोलए॥
जिस प्रकार गीली और सूखी मिट्टी के दो गोले दीवार पर पेंâकने पर एक चिपक जाता है तो दूसरा वापस नीचे गिर जाता है, इसी प्रकार जो मनुष्य विषयों की लालसा वाले होते हैं, वे गीली मिट्टी के गोलेवत् विषयों में लिपट जाते हैं, परन्तु सूखी मिट्टी के गोलेवत् अभोगी-विरक्त मनुष्य विषयों में लिपटते नहीं हैं। -- इन्द्रिय-पराजय शतक : १९-२०
  • विसए अवइक्खंता, पडंति संसारसायरे घोरे।
विसएसु निराविक्खा तरंति संसारकंतारे॥
विषयों की अपेक्षा रखने वाले भयंकर संसार-समुद्र में गिरते हैं और विषयों में निरपेक्ष मनुष्य संसार रूपी अटवी को पार कर जाते हैं। -- इन्द्रिय-पराजय शतक : २८
  • सत्थादिमज्झ अवसाणएसु जिणतोत्त मंगलुच्चारो।
णासइ णिस्सेसाइं विग्घाइं रवि व्व तिमिराइं॥
शास्त्र के आदि, मध्य और अंत में किया गया जिनस्तोत्र रूप मंगल का उच्चारण सम्पूर्ण विघ्नों को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य अंधकार को। -- तिलोयपण्णत्ति : १-३१
  • अर्हन्तो भगवंत इन्द्र-महिता:, सिद्धाश्च सिद्धि-स्थिता:।
आचार्या जिनशासनोन्नतिकरा:, पूज्या उपाध्यायका:॥ श्री सिद्धान्त-सुपाठका मुनिवरा, रत्न-त्रयाराधका:।
पंचैते परमेष्ठिन: प्रतिदिनं, कुर्वन्तु नो मंगलम्॥
इन्द्रों से जो पूजित हैं, वे अरिहंत भगवान् , मुक्ति में विराजमान सिद्ध भगवान्, जिनशासन की उन्नति करने वाले आचार्य देव, जैन सिद्धान्त के वाचक-पाठक पूज्य उपाध्याय देव एवं रत्नत्रय के आराधक मुनिवर; ये पंच परमेष्ठी प्रतिदिन हमारा मंगल करें। -- जैन मंगल विधान : १-२/१
  • सर्वत्र अपि प्रियवचनं, दुर्वचने दुर्जने अपि क्षमाकरणम्।
सर्वेषां गुणग्रहणम् , मन्दकषायाणां दृष्टान्ता:॥
सर्वत्र ही प्रिय वचन बोलना, दुर्वचन बोलने वाले दुर्जन को भी क्षमा करना तथा सबके गुणों को ग्रहण करना- ये मंदकषायी जीवों के लक्षण हैं। -- समणसुत्त : ५९९
  • जावइया वयणपहा, तावइया चेव होंति णयवाया।
जितने वचन विकल्प हैं, उतने ही नयवाद हैं, और जितने भी नयवाद हैं, संसार में उतने ही पर-समय हैं, अर्थात् मत-मतान्तर हैं। -- सन्मति तर्क प्रकरण : ३/४७
  • विसयरसासवमत्तो, जुत्ताजुत्तं न याणई जीवो।
विषयरस रूप मदिरा से मदोन्मत्त बना मनुष्य उचित-अनुचित को नहीं जान सकता है। -- इन्द्रियपराजय शतक : १०
  • मद्येन नर: अवश: करोति कर्माणि निन्दनीयानि।
इहलोके परलोके अनुभवति अनन्तकं दु:खम्॥
मद्यपान करने से मनुष्य का अपने पर नियंत्रण नहीं रहता। फिर वह निन्दनीय कर्म किया करता है। (परिणाम यह होा है कि) इहलोक और परलोक में उसे अनन्त दु:खों का अनुभव होता है। -- समणसुत्त : ३०६
  • विमलम्मि दप्पणे जह, पिडिबिंबइ पासवत्ति वत्थुगणो, मज्झत्थे तह मणुए, संकमइ समग्ग धम्मगुणो। मज्झत्था दोसं उज्झिऊण गिण्हंति वत्थु घेतव्वं,
निय-निउणयाए हंसव्व नीरचागेण खीरलवं॥
निर्मल दर्पण में जैसे पाश्र्ववर्ती वस्तु का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही मध्यस्थ प्रकृति वाले व्यक्ति में उसकी अपनी निपुण बुद्धि से समस्त धर्म गुणों का संक्रमण होता है। मध्यस्थ व्यक्ति दोषों का त्याग करके ग्रहण करने योग्य वस्तु को ग्रहण करते हैं जैसे हंस पानी को छोड़ता है और दूध को ग्रहण करता है। -- कहारयणकोष : १५७
  • त्यक्ता महामोहं, विषयान् ज्ञात्वा भंगुरान् सर्वान्।
निर्विषयं कुरुत मन:, येन सुखमुत्तमं लभध्वम्॥
महामोह को तजकर तथा सब इन्द्रिय-विषयों को क्षणभंगुर जानकर मन को निर्विषय बनाओ, ताकि उत्तम सुख प्राप्त हो। -- समणसुत्त
  • मण्णंति जदा णिच्चं मणेण णिउणा जदो दु ये जीवा।
मण उक्कडा य जम्हा तम्हा ते माणुसा भणिया॥
वे मनुष्य कहलाते हैं जो मन के द्वारा नित्य ही हेय-उपादेय, तत्त्व-अतत्त्व तथा धर्म-अधर्म का विचार करते हैं, कार्य करने में निपुण हैं और उत्कृष्ट मन के धारक हैं। -- पंचसंग्रह : १-६२
  • ममता खट परै रगे, ओनीदे दिन रात।
लेनो न देनो इन कथा, भोरे ही आपत जात॥
ममता नारी में यदि कोई गुण है तो वह है मोहित करने का। किन्तु वह स्वर्ण-कटार किस काम की, जिसका स्पर्श-मात्र प्राणान्त का कारण बन जाता है। इसी तरह यह मोहिनी ममता भी आरम्भ में चेतन को संसार में आसक्त कर देती है और अन्त में उसे दुर्गति में ले जाती है। -- आनन्दघन ग्रंथावली :: पद : ३५
  • एकं पण्डितमरणं, छिनत्ति जातिशतानि बहुकानि।
तद्मरणे मत्र्तव्यं, न मृत: सुमृत: भवति॥
एक पंडित मरण (ज्ञानपूर्वक मरण) सैकड़ों जन्मों का नाश कर देता है। अत: इस तरह मरना चाहिए, जिससे मरण सुमरण हो जाए। -- समणसुत्त : ५७०
  • एकं पण्डितमरणं, प्रतिपद्यते सुपुरुष: असम्भ्रान्त:।
क्षिप्रं स मरणानां, करिष्यति अन्तम् अनन्तानाम्॥
असम्भ्रान्त (निर्भय) सत्पुरुष एक पण्डित मरण को प्राप्त होता है और शीघ्र ही अनन्त मरण का बार-बार के मरण का अन्त कर देता है। -- समणसुत्त : ५७१
  • मिथ्यादर्शनरक्ता: सनिदाना:, कृष्णलेश्यामवगाढा:।
इति ये म्रियन्ते जीवास्तेषां, दुर्लभा भवेद् बोधि:॥
इस संसार में जो जीव मिथ्यादर्शन में अनुरक्त होकर निदानपूर्वक तथा प्रगाढ़ कृष्ण लेश्या सहित मरण को प्राप्त होते हैं, उनके लिए बोधि-लाभ दुर्लभ है। -- समणसुत्त : ५८०
  • सम्यग्दर्शनरक्ता: अनिदाना:, शुक्ललेश्यामवगाढ़ा।
इति मे म्रियन्ते जीवास्तेषां, सुलभा भवेद् बोधि:॥
जो जीव सम्यग्दर्शन के अनुरागी होकर निदानरहित तथा शुक्ल लेश्यापूर्वक मरण को प्राप्त होते हैं, उनके लिए बोधि की प्राप्ति सुलभ होती है। -- समणसुत्त : ५८१
  • आराधनाया: कार्ये, परिकर्म सर्वदा अति कर्त्तव्यम्।
परिकर्मभावितस्य खलु, सुखसाध्या आराधना भवति॥
(इसलिए मरणकाल में रत्नत्रय की सिद्धि या सम्प्राप्ति के अभिलाषी साधक को चाहिए कि वह) पहले से ही निरन्तर परिकर्म अर्थात् सम्यक्त्वादि का अनुष्ठान या आराधना करता रहे, क्योंकि परिकर्म या अभ्यास करते रहने वाले की आराधना सुखपूर्वक होती है। -- समणसुत्त : ५८२
  • आउक्खयेण मरणं।
मरण आयुष्य (कर्म) के क्षय से हुआ करता है। -- समयसार : २४८
  • अहिंसा सत्यं चास्तेनवंâ च, ततश्चाब्रह्मापरिग्रहं च।
प्रतिपद्य पंचमहाव्रतानि, चरति धर्मं जिनदेशितं विद:॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ये पांच महाव्रत ग्रहण कर श्रमण जिनदेशना के अनुसार धर्म का आचरण करे। -- समणसुत्त : ३६४
  • मांसाशनेन वर्धते दर्प: दर्पेण मद्यम् अभिलषति।
द्युतम् अपि रमते तत: तद् अपि र्विणतान् प्राप्तनोति दोषान्॥
मांसाहार से दर्प बढ़ता है। दर्प से मद्यपान की इच्छा जागती है। इससे जुआ खेलने में भी मन रमता है। अत: अकेले मांसाहार के दोष से यहां बताए गए सारे दोष भी मनुष्य में आ जाते हैं। -- समणसुत्त : ३०४
  • योऽपमानकरणं दोषं, परिहरति नित्यमायुक्त:।
सो नाम भवति मानी, न गुणत्यक्तेन मानेन॥
जो दूसरे को अपमानित करने के दोष का सदा सावधानीपूर्वक परिहार करता है, वही यथार्थ में मानी है। गुणशल्य अभिमान करने से कोई मानी नहीं होता। -- समणसुत्त : ८९
  • सच्चाण सहस्साण वि, माया एक्कावि णासेदि।
एक माया हजारों सत्यों का नाश कर डालती है। -- भगवती आराधना : १३८४
  • माया तैर्यग्योनस्य।
माया तिर्यंच योनि को देने वाली है। (तिर्यंच माया के कारण ही बांके होकर चलते हैं।) -- तत्त्वार्थ सूत्र : ६-२७
  • कुलरूवजादिबुद्धिसु, तवसुदसीलेसु गारवं किंचि।
जो णवि कुव्वदि समणो, मद्दवधम्मं हवे तस्स॥
कुल, रूप, जाति, बुद्धि, तप, श्रुत और शील का जो श्रमण थोड़ा-सा भी गर्व नहीं करता, वह मार्दव धर्म से संपन्न हुआ करता है। -- समणसुत्त : ८८
  • सोसउ मा सोसउ च्चिय सलिलं रयणायरस्स बडवऽग्गी।
जं लहइ जले जलणो तेण च्चिय किं न पज्जत्तं॥
हे बडवाग्नि ! तू समुद्र के जल को सोख या न सोख, पानी में तुझे जो आग मिलती है अर्थात् दुश्मन के घर में अपना मित्र मिलता है, क्या वह पर्याप्त नहीं है ? -- गाहारयण कोष : ४०
  • दिंतो जलं पि जलओ स वल्लहो होइ सयललोयाणं।
निच्चपसारियकरो करेइ मित्तो वि संतावं॥
बादल सतत जल का दान देने से समस्त लोगों का प्रिय बन गया है। नित्य हाथ (कर: किरण) पैâलाने वाला मित्र (सूर्य) संताप ही देता है। -- गाहारयण कोष : १३२
  • मिथ्यात्वं वेदयन् जीवो विपरीतदर्शनो भवति।
न च धर्म रोचते हि, मधुरं रसं यथा ज्वरित:॥
जो जीव मिथ्यात्व से ग्रस्त होता है, उसकी दृष्टि विपरीत हो जाती है। उसे धर्म भी रुचिकर नहीं लगता, जैसे ज्वरग्रस्त मनुष्य को मीठा रस भी अच्छा नहीं लगता। -- समणसुत्त : ६८
  • यो यथावादं न करोति, मिथ्यादृष्टि: तत: खलु क: अन्य:।
वर्धते च मिथ्यात्वं, परस्य शंकां जनयमान:॥
जो तत्त्व-विचार के अनुसार नहीं चलता, उससे बड़ा मिथ्यादृष्टि और दूसरा कौन हो सकता है ? वह दूसरों को शंकाशील बताकर अपने मिथ्यात्व को बढ़ाता रहता है। -- समणसुत्त : ७०
  • तं मिच्छत्तं जमसद्दहणं, तच्चाण होदि अत्थाणं।
तत्त्वार्थ के प्रति श्रद्धा का अभाव ही मिथ्यात्व है। -- पंचसंग्रह : १-७
  • जो ण पमाणणयेहिं, णिक्खेवेणं णिरिक्खदे अत्थं।
तस्साजुत्तं जुत्तं, जुत्तमजुत्तं च पडिहादि॥
जो प्रमाण, नय और निक्षेप के द्वारा अर्थ का बोध नहीं करता, उसे अयुक्त युक्त और युक्त अयुक्त प्रतीत होता है। -- तिलोयपण्णत्ति : १-८२
  • मिच्छत्तपरिणदप्पा, तिव्वकसाएण सुट्ठु आविट्ठो।
जीवं देहं एक्कं, मण्णंतो होदि बहिरप्पा॥
मिथ्यात्व से ग्रस्त होने वाला जीव तीव्र कषायों से आविष्ट होकर आत्मा और शरीर को एक ही माना करता है। वह बहिरात्मा होता है। -- समणसुत्त : ६९
  • जह पंकलेवरहिओ जलोविंर ठाइ लाउसो सहसा।
तह सयलकम्ममुक्को लोगग्गे ठाइ जीवो वि॥
जैसे कीचड़ के लेप से रहित होते ही तूंबा जल पर सहसा तैरने लग जाता है, वैसे ही जीव कर्ममल से मुक्त होकर लोकाग्र पर स्थित हो जाता है। -- कुवलयमाला : १७९
  • सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:।
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र-यही मोक्ष का मार्ग है। -- तत्त्वार्थ सूत्र : १-१
  • दुर्लभा तु मुधादायिन:, मुधाजीविनोऽपि दुर्लभा:।
मुधादायिन: मुधाजीविन:, द्वावपि गच्छत: सुगतिम्॥
मुधादायी-निष्प्रयोजन देने वाले दुर्लभ हैं और मुधाजीवी-भिक्षा पर जीवनयापन करने वाले भी दुर्लभ हैं। मुधादायी और मुधाजीवी, दोनों ही साक्षात् या परम्परा से सुगति या मोक्ष प्राप्त करते हैं। -- समणसुत्त : ४०४
  • मिच्छत्तासवदारं रुंभइ सम्मत्तदिढकवाडेण।
हिंसादिदुवाराणि वि, दिढवयफलिहेहिं रुंभति॥
मुमुक्षु जीव सम्यक्त्व रूपी दृढ़ कपाटों से मिथ्यात्व रूपी आस्रव द्वार को रोकता है तथा दृढ़ व्रत रूपी कपाटों से हिंसा आदि द्वारों को रोकता है। -- जयधवला : १-१०-५५
  • सीहस्स कमे पडिदं, सारंगं जह ण रक्खदे को वि।
तह मिच्चुणा य गहिदं जीवं पि ण रक्खदे को वि॥
जैसे सिंह के पैर के नीचे पड़े हुए हिरण की कोई भी रक्षा करने वाला नहीं होता, वैसे ही मृत्यु के द्वारा ग्रहण किए हुए जीव की कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। -- द्वादशानुप्रेक्षा : २४
  • कम्प: स्वेद: श्रमो मूच्र्छा, भ्रमिग्र्लानिर्मलक्षय:।
राजयक्ष्मादिरोगाश्च, भवेयुर्मैथुनोत्थिता:॥
मैथुन से कंपकंपी, स्वेद-पसीना, श्रम-थकावट, मूर्छा-मोह, भ्रमि-चक्कर आना, ग्लानि-अंगों का टूटना, शक्ति का विनाश, राज्यक्ष्मा-क्षय रोग तथा अन्य खांसी, श्वास आदि रोगों की उत्पत्ति होती है। -- योगशास्त्र : २-७८
  • दर्शनज्ञानचारित्राणि, मोक्षमार्ग इति सेवितव्यानि।
साधुभिरिदं भणितं, तैस्तु बन्धो वा मोक्षो वा॥
जिनेन्द्र देव ने कहा है कि (सम्यक्) दर्शन, ज्ञान, चारित्र मोक्ष का मार्ग है। साधुओं को इनका आचरण करना चाहिए। यदि वे स्वाश्रित होते हैं तो इनसे मोक्ष होता है और पराश्रित होने से बंध होता है। -- समणसुत्त : १९३
  • धर्मादिश्रद्धानं, सम्यक्त्वं ज्ञानमंगपूर्वगतम्।
चेष्टा तपसि चर्या, व्यवहारो मोक्षमार्ग इति॥
धर्म आदि तत्त्वों पर श्रद्धा रखना सम्यक् दर्शन है। अंगों व पूर्वों में निहित जिनवाणी का ज्ञान सम्यक््â ज्ञान है और तपाराधना में प्रयत्नशील रहना सम्यक् चारित्र है। यह व्यवहार अथवा आचरण ही मोक्ष का मार्ग है। -- समणसुत्त : २०८
  • सेनापति निहते, यथा सेना प्रणश्यति।
एवं कर्माणि नश्यन्ति, मोहनीये क्षयंगते॥
जैसे सेनापति के मारे जाने पर सेना नष्ट हो जाती है, वैसे ही एक मोहनीय कर्म के क्षय होने पर समस्त कर्म सहज ही नष्ट हो जाते हैं। -- समणसुत्त : ६१३
  • णिस्सेसखीणमोहा, फलिहामलभायणुदयसमचित्तो।
जिसने सम्पूर्ण मोह को पूरी तरह नष्ट कर दिया है, उस निर्मोही का चित्त स्फटिक मणि के पात्र में रखे हुए स्वच्छ जल की भाँति निर्मल हो जाता है। -- पंचसंग्रह : १-१५
  • ते ते कर्मत्वगता: पुद्गलकाया: पुनरपि जीवस्य।
संजायन्ते देहा: देहान्तरसंक्रमं प्राप्य॥
इस प्रकार कर्मों के रूप में परिणत वे पुद्गल-पिण्ड देह से देहान्तर को-नवीन शरीर रूप परिवर्तन को-प्राप्त होते रहते हैं। अर्थात् पूर्वबद्ध कर्म के फलरूप में नया शरीर बनता है और नये शरीर में नवीन कर्म का बंध होता है। इस तरह जीव निरन्तर विविध योनियों में परिभ्रमण करता रहता है। -- समणसुत्त : ६५९
  • सम्यक्त्व -रत्नसारं, मोक्षमहावृक्षमूलमिति भणितम्।
तज्ज्ञायते निश्चय-व्यवहारस्वरूपद्विभेदम्॥ जीवादीनां श्रद्धानं, सम्यक्त्वं जिनवरै: प्रज्ञप्तम्।
व्यवहारात् निश्चयत:, आत्मा ननु भवति सम्यक्त्वम्॥
रत्नत्रय में सम्यग्दर्शन ही श्रेष्ठ है और इसी को मोक्षरूपी महावृक्ष का मूल कहा गया है। यह निश्चय और व्यवहार के रूप में दो प्रकार का है। व्यवहार से जीवादि तत्त्वों के श्रद्धान को जिनदेव ने सम्यक्त्व कहा है। निश्चय से तो आत्मा ही सम्यग्दर्शन है। -- समणसुत्त : २१९-२२०
  • सम्मद्दंसंण-णाणं चरणं मुक्खस्स कारणं जाणे।
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यग्चारित्र-यही रत्नत्रय मोक्ष का साधन है। -- द्रव्यसंग्रह : ३९
  • तत्त्वरुचि: सम्यक्त्वं, तत्त्व-प्रख्यापकं भवेत् ज्ञानम्।
पापक्रियानिवृत्तिश्चारित्रमुक्तं जिनेन्द्रेण॥
जिनेन्द्र भगवान ने तत्त्वविषयक रुचि को सम्यग्दर्शन, तत्त्वविषयक ज्ञान को सम्यग्ज्ञान और पापमय क्रिया से निवृत्ति को सम्यक् चारित्र कहा है। -- ज्ञानार्णव : ९१
  • रत्तो बंधदि कम्मं, मुंचदि जीवो विरागसंपन्नो।
जीव रागयुक्त होकर कर्म बांधता है और विरक्त होकर कर्मों से मुक्त होता है। -- समयसार : १५३
  • असुहो मोह–पदोसो, सुहो व असुहो हवदि रागो।
मोह और द्वेष अशुभ ही होते हैं। राग शुभ और अशुभ, दोनों होता है। -- प्रवचनसार : २-८८
  • तं न कुणइ जं कुविओ, कुणंति रागाइणो देहे॥
शत्रु, विष, पिशाच, वेताल, प्रज्जवलित अग्नि-ये सब एक साथ कोपायमान होने पर भी शरीर में उतना अपकार-अवगुण नहीं करते जितना अपकार कुपित राग-द्वेष रूप अंतरंग शत्रु करते हैं। -- इन्द्रियपराजय शतक : ८६
  • जो रागाईण वसे, वसंमि सो सयल दुक्खलक्खाणं।
जस्स वसे रागाई, तस्स वसे सयलसुक्खाइं॥
जो रागद्वेषादि के वश में है, वह वस्तुत: लाखों दु:खों के वशीभूत है और जिसने रागद्वेष को वश में कर लिया है। उसने वस्तुत: सब सुखों को वश में कर लिया है। -- इन्द्रियपराजय शतक : ८७
  • रागो द्वेष: च द्वौ पापौ, पापकर्मप्रवर्तकौ।
यो भिक्षु: रुणद्धि नित्यं, स न आस्ते मण्डले॥
राग और द्वेष, ये दो पाप सभी पाप कर्मों के प्रवर्तक हैं। इनको नित्य रोकने वाला भिक्षु संसार में नहीं ठहरा करता। (मुक्ति पा लिया करता है।) -- समणसुत्त : १३०
  • योगप्रवृत्तिर्लेश्या, कषायोदयानुरंजिता भवति।
तत: द्वयो: कार्यं, बन्धचतुषक् समुद्दिष्टम्॥
कषाय के उदय से अनुरंजित मन-वचन-काय की योग प्रवृत्ति को लेश्या कहते हैं। इन दोनों अर्थात् कषाय और योग का कार्य है चार प्रकार का कर्म-बन्ध। कषाय से कर्मों की स्थिति और अनुभाग बन्ध होते हैं, योग से प्रकृति और प्रदेश-बन्ध। -- समणसुत्त : ५३२
  • पथिका: ये षट्पुरुषा:, परिभ्रष्टा अरण्यमध्यदेशे।
फलभरितवृक्षमेकं, प्रेक्ष्य ते विचिन्तयन्ति॥ निर्मूलस्कन्धशाखोपशाखां छित्वा चित्वा पतितानि।
खादितुं फलानि इति, यन्मनसा वचनं भवेत् कर्म॥
छह पथिक थे। जंगल के बीच जाने पर भटक गए। भूख सताने लगी। कुछ देर बाद उन्हें फलों से लदा एक वृक्ष दिखाई दिया। उनकी फल खाने की इच्छा हुई। वे मन ही मन विचार करने लगे। एक ने सोचा कि पेड़ को जड़-मूल से काटकर इसके फल खाए जाएँ। दूसरे ने सोचा कि केवल स्कन्ध ही काटा जाए। तीसरे ने सोचा कि शाखा ही तोड़ना ठीक होगा। चौथा सोचने लगा कि उपशाखा (छोटी डाली) ही तोड़ ली जाए। पाँचवाँ चाहता था कि फल ही तोड़े जाएँ। छठे ने सोचा कि वृक्ष से टपक कर नीचे गिरे हुए पके फल ही चुनकर क्यों न खाए जाएँ। इन छहों पथिकों के विचार, वाणी तथा कर्म क्रमश: छहों लेश्याओं के उदाहरण हैं। -- समणसुत्त : ५३७-५३८
  • लेश्याशुद्धि: अध्यवसानविशुद्धया भवति जीवस्य।
अध्यवसानविशुद्धि:, मन्दकषायस्य ज्ञातव्या॥
जीवात्मा के भावों में शुद्धि होने पर लेश्या होती है और जीवात्मा के भावों में शुद्धि होती है कषायों के मंद होने से। -- समणसुत्त : ५४५
  • लोगो वादपदिट्ठो।
लोक वायु के आधार पर प्रतिष्ठित है। -- षट्खण्डागम : जीवस्थान : १,२,३
  • सुवर्णरूप्यस्स च पर्वता भवेयु:, स्यात् खलु कैलाससमा असंख्यका:।
नरस्य लुब्धस्य न तै: किंचित्, इच्छा खलु आकाशसमा अनन्तिका॥
कदाचित् सोने और चाँदी के कैलास के समान असंख्य पर्वत हो जाएं, तो भी लोभी पुरुष को उनसे तृप्ति नहीं होती, क्योंकि इच्छा आकाश के समान अनन्त है। -- समणसुत्त : ९८
  • सो सद्दो तं धवलत्तणं च रयणायरम्मि उप्पत्ती।
संखस्स हिययकुडिलत्तणेण सव्वं पि पब्भट्ठं॥
वही शब्द (ध्वनि), वही शुभ्र ताप और रत्नाकर में उत्पत्ति। यह सब कुछ होते हुए भी शंख अपने हृदय की वक्रता के कारण सर्वत्र भ्रष्ट होता है। व्यक्ति घर, धन, परिवार से महान होने पर भी अपनी वक्रता से सर्वत्र दु:खी होता है। -- गाहारयणकोष : ११३
  • पुव्विं बुद्धीए पासेत्ता, तत्तो वक्कमुदाहरे।
अचक्खुओ व नेयारं, बुद्धिमन्नेसाए गिरा॥
पहले बुद्धि से परखकर फिर बोलना चाहिए। अंधा व्यक्ति जिस प्रकार पथ-प्रदर्शक की अपेक्षा रखता है, उसी प्रकार वाणी बुद्धि की अपेक्षा रखती है। -- व्यवहारभाष्य पीठिका : ७६
  • हिदमिदवयणं भासदि, संतोषकरं तु सव्वजीवाणं।
साधक दूसरों को संतोष देने वाला हितकारी और मित-संक्षिप्त वचन बोलता है। -- कार्तिकेयानुप्रेक्षा : ३३४
  • मा कडुयं भणह जणे महुरं, पडिमणह कडुयभणिया वि।
जइ गेण्हिऊण इच्छह लोए सुहयत्तण-पडायं॥
यदि संसार में अच्छेपन की ध्वजा लेकर चलना चाहते हो तो लोगों को कडुवा मत बोलो और उनके द्वारा कडुवा बोले जाने पर भी मधुर वचन बोलो। -- कुवलयमाला : ८५
  • हासेण वि मा भण्णउ, णयरं जं मम्मवेहणं वयणं।
हँसी-मजाक के द्वारा भी मर्मवेधक और व्यर्थ के वचन मत बोलो। -- कुवलयमाला : ८५
  • जल -चंदण-ससि-मुत्ता-चंदमणी तह णरस्स णिव्वाणं।
ण करंति कुणइ ज अत्थज्जुयं हिय-मधुर-मिद-वयणं॥
जल, चंदन, चंद्रमा, मुक्ताफल, चन्द्रमणि आदि मनुष्य को उस प्रकार सुखी नहीं करते, जिस प्रकार अर्थयुक्त, हितकारी मधुर और संयत वचन सुखी करते हैं। -- अर्हत् प्रवचन : १२-१२
  • सम्यगाराधिता विद्यादेवता कामदायिनी।
विद्या देवता की सम्यग्-सही विधि से आराधना करने पर वह समस्त इच्छित फल प्रदान करती है। -- आदिपुराण : १६-९९
  • सयणस्स जणस्स पिओ, णरो अमाणी सदा हवदि लोए।
णाणं जसं च अत्थं, लभदि सकज्जं च साहेदि॥
निरभिमानी मनुष्य जन और स्वजन, सभी को सदा प्रिय लगता है। वह ज्ञान, यश और संपत्ति प्राप्त करता है तथा अपना प्रत्येक कार्य सिद्ध कर सकता है। -- भगवती आराधना : १३७९
  • अनाशातना बहुमानकरणं च विनय;।
आशातना नहीं करना एवं योग्य व्यक्तियों का बहुमान करना विनय है। -- जैन सिद्धांतदीपिका : ५-२५
  • व्रत-विद्या-वयोऽधिकेषु नीचैराचरणं विनय:।
व्रत विद्या एवं उम्र में बड़ों के सामने नम्र आचरण करना विनय है। -- नीतिवाक्यामृत : ११-६
  • तस्मात् सर्वप्रयत्नेन, विनीतत्वं मा कदाचित् छर्दयेत्।
अल्पश्रुतोऽपि च पुरुष:, क्षपयति कर्माणि विनयेन॥
इसलिए सब प्रकार का प्रयत्न करके विनय को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अल्पश्रुत का अभ्यासी पुरुष भी विनय के द्वारा कर्मों का नाश करता है। -- समणसुत्त : ४७२
  • शत्रु: अपि मित्रभावम् यस्माद् उपयाति विनयशीलस्य।
विनय: त्रिविधेन तत: कर्त्तव्य: देशविरतेन॥
विनयशील होने पर मनुष्य का शत्रु भी मित्र हो जाता है। अत: अणुव्रती श्रावक का कत्र्तव्य है कि वह मन, वचन और काया, तीनों विधियों से गुण-संपन्नों व गुणों की विनय करें। -- समणसुत्त : ३०८
  • अभ्युत्थानमंजलिकरणं, तथैवासनदानम्।
गुरुभक्तिभावशुश्रूषा, विनय एष व्याख्यात:॥
गुरु तथा गुरुवत् जनों के सम्मान में उठने, हाथ जोड़ने, उपयुक्त आसन देने और भावों से उनकी सेवा-भक्ति करने को विनय कहा गया है। -- समणसुत्त : ४६६
  • विनयो मोक्षद्वारं, विनयात् संयमस्तपो ज्ञानम्।
विनयेनाराध्यते, आचार्य: सर्वसंघश्च॥
विनय मुक्ति का द्वार है। विनय से संयम, तप और ज्ञान होता है। विनय की आराधना से आचार्य तथा संपूर्ण संघ की आराधना हुआ करती है। -- समणसुत्त : ४७०
  • भावे विरक्तो मनुजो विशोक:, एतया दु:खौघ-परम्परया।
न लिप्यते भवमध्येऽपि सन् , जलेनेव पुष्करिणीपलाशम्॥
भाव से विरक्त मनुष्य शोक-मुक्त बन जाता है। जैसे कमलिनी का पत्र जल में लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह संसार में रहकर भी अनेक दु:खों की परम्परा से लिप्त नहीं होता। -- समणसुत्त : ८१
  • नो छादयेन्नापि च लूषयेद् , मानं न सेवेत प्रकाशनं च।
न चापि प्राज्ञ: परिहासं कुर्यात् , न चाप्याशीर्वादं व्यागृणीयात्॥
(अमूढ़दृष्टि या विवेकी) किसी के प्रश्न का उत्तर देते समय न तो शास्त्र के अर्थ को छिपाए और न अपसिद्धान्त के द्वारा शास्त्र की विराधना करे। न मान करे और न अपने बड़प्पन का प्रदर्शन करे। न किसी विद्वान का परिहास करे और न किसी को आशीर्वाद दे। -- समणसुत्त : २३९
  • खेलम्मि पडिअमप्पं जह न तरइ मच्छिआवि मोएऊं।
तह विसयखेलपडिअं न तरइ, अप्पंपि कामंधो॥
जिस तरह श्लेष्म में पड़ी हुई मक्खी श्लेष्म से बाहर निकलने में असमर्थ होती है, वैसे ही विषयरूपी श्लेष्म में पड़ा हुआ व्यक्ति अपने आपको विषय से अलग करने में असमर्थ पाता है। -- इन्द्रियपराजय शतक : ४६
  • अंधादयं महानन्धो विषयान्धीकृतेक्षण:।
विषयांध व्यक्ति अंधों में सबसे बड़ा अंधा है। -- आत्मानुशासन : ३५
  • यत्सुखं वीतरागस्य मुने: प्रशमपूर्वकम्।
न तस्यानन्तभागोऽपि प्राप्यते त्रिदशेश्वरै:॥
वीतराग मुनि को प्रशम भाव सहित जो सुख प्राप्त होता है, उसका अनन्तवां भाग भी देवेन्द्रों को प्राप्त नहीं होता (अर्थात् इन्द्र के प्राप्त होने वाले सुख से अनंतगुना-अक्षय सुख वीतराग मुनि को प्राप्त होता है)।