छान्दोग्य उपनिषद
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छान्दोग्य उपनिषद सामवेदीय छान्दोग्य ब्राह्मण का औपनिषदिक भाग है जो प्राचीनतम दस उपनिषदों में नवम एवं सबसे बृहदाकार है। यह उपनिषद ब्रह्मज्ञान के लिये प्रसिद्ध है। संन्यासप्रधान इस उपनिषद् का विषय अपाप, जरा-मृत्यु-शोकरहित, विजिधित्स, पिपासारहित, सत्यकाम, सत्यसंकल्प आत्मा की खोज तथा सम्यक् ज्ञान है । इसमें तत्त्वज्ञान और उसके लिये उपयोगी कर्म तथा उपासनाओं का बड़ा विशद वर्णन है।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- तत्त्वमसि।
- (हे श्वेतकेतु), तू वही (वही ब्रह्म) है।
- सर्वं खल्विदं ब्रह्म
- (यह सारा जगत ब्रह्म ही है।)
- प्रथम प्रपाठक
- 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, इसकी ही उपासना करनी चाहिए । 'ॐ' ऐसा ही उदगान करता है । उस की ही व्याख्या की जाती है।
- इन भूतों का रस पृथ्वी है । पृथ्वी का रस जल है । जल का रस ओषधियाँ हैं, ओषधियों का रस पुरुष है, पुरुष का रस वाक् है, वाक् का रस ऋक् है । ऋक् का रस साम है और साम का रस उद्गीथ है।
- यह जो उद्गीथ है, वह सम्पूर्ण रसों में रसतम, उत्कृष्ट, पर का प्रतीक होने योग्य और पृथ्वी आदि रसों में आठवाँ है।
- वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और समरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन हैं ।