चन्द्रकान्त राजू
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चन्द्रकान्त राजू (जन्म 7 मार्च 1954) भारत के कम्प्यूटर विज्ञानी, गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक एवं बहुज्ञ अनुसंधानकर्ता हैं। सम्प्रति वे नयी दिल्ली के सभ्यता अध्ययन केन्द्र (Centre for Studies in Civilizations) से जुड़े हुए हैं। भारत के प्रथम सुपरकम्प्यूटर 'परम' (1988-91) में उनका उल्लेखनीय एवं प्रमुख योगदान रहा।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- 'गणित', मैथमेटिक्स को सरल बना देता है। इससे विज्ञान का हित होता है।
- उपनिवेशवादियों ने हमे केवल पश्चिमी 'मैथेमटिक्स' पढ़ाया जो कि सार्वभौम नहीं है। भारतीय 'गणित' इससे भिन्न है। यह सदा से व्यावहारिक रहा है।
- मजहब और सियासत के मेल से इतिहास विकृत होता है। पश्चिम में सियासत के साथ मजहब का गठजोड़ 1700 साल पहले शुरू हुआ। इसका पश्चिम के इतिहास पर क्या असर हुआ, इसकी एक झलक विज्ञान के इतिहास लेखन में दिखती है। -- अपने लेख "क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?" में
- गणित और विज्ञान को व्यावहारिक उद्देश्यों से जोड़कर पश्चिमी धर्मशास्त्र से दूर रखना होगा और पश्चिमी सामाजिक स्वीकृति के मानदंड से खुद को अलग करना होगा। -- अपने लेख "क्या विज्ञान का जन्म पश्चिम में हुआ था?" में
- विज्ञान के पश्चिमी दर्शन, जिसमें समय और गणितीय प्रमाण की प्रकृति से संबंधित पहलू भी सम्मिलित हैं, की जड़ें रोमन कैथोलिक चर्च के ईश्वरवादी आवश्यकताओं में निहित हैं।[१]
- कहानी से तथ्यों पर ध्यान लाने के लिये मैंने एक लाख अस्सी हजार रुपये का पुरस्कार घोषित किया है। जो कोई भी "युक्लिड" के बारे में गम्भीर साक्ष्य देगा, वह इस पुरस्कार का अधिकारी होगा। अभी तक किसी ने भी इस पुरस्कार के लिये अपना दावा नहीं ठोका है। अब भी "युक्लिड" को स्कूली पुस्तकों में श्वेत पुरुष के रूप में चित्रित किया जा रहा है, जबकि वह सम्भवतः वह अफ्रीका का निवासी बताया जाता है।
- १९वीं शताब्दी के लन्दन के प्रोफेसर (डी मार्गन) को ऋणात्मक संख्याओं की समझ नहीं थी। [२]
- कम से कम १५०० ईसापूर्व, या इससे भी पूर्व, से ही भारतीयों और मिस्र के लोगों को भिन्नों की जानकारी थी। किन्तु यूरोप के लोगों को भिन्न की जानकारी १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक नहीं हो पायी थी।
- पश्चिम के लोग भारत से कैलकुलस चुराकर ले गये। किन्तु सभी ज्ञान-चोरों की तरह ही वे चुराये हुए इस ज्ञान को पूर्णतः आत्मसात करने में असफल रहे।
- तर्क का स्वरूप सभी संस्कृतियों में एक जैसा नहीं है। उदाहरण के लिये, बौद्धों का चतुष्कोटि या जैनों का स्यादवाद अर्ध-सत्य-कार्यकारी (quasi-truth-functional) है, न कि द्वि-मान वाले। इसी प्रकार, तर्क अनुभव की दृष्टि से 'निश्चित' (empirically certain) नहीं है, उदाहरण के लिये क्वाण्टम तर्क।
- योरप में
- १) प्राचीन काल में गणित को मैथेसिस (mathesis) माना जाता था और यह आत्मा को जागृत करने और लोगों को "धन्य जीवन" जीने के लिए गुणी बनाने वाला माना जाता था,
- २) अंधकार युग के दौरान यह बेकार हो गया,
- ३) मध्य युग के दौरान तर्क और प्रमाण के रूप में पुनर्जीवित हुआ; और
- ४) २०वीं शताब्दी के दौरान औपचारिक प्रतिनिधित्व में बदल गया।
- प्राचीन काल से ही भारत में गणित का विकास कृषि, व्यापार, निर्माण, नौकायन, और इंजीनियरी के व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के लिये तथा इसके द्वारा मानव जीवन को भौतिक एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने के लिये होता रहा है। [३]