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चंद्रगुप्त मौर्य

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चंद्रगुप्त मौर्य

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चंद्रगुप्त मौर्य (ईसा पूर्व 340 – ईसा पूर्व 297) भारत के पहले मौर्य सम्राट थे, जिन्होंने मगध राज्य से नंद वंश का अंत करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। वे चाणक्य (कौटिल्य) के शिष्य थे और मौर्य शासन की नींव कूटनीति, सैन्य शक्ति और सुशासन पर रखी।

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रसिद्ध उद्धरण

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  • "किस्मत उन्हीं की बदलती है जो साहस से समय का सामना करते हैं।"
  • "राज्य वही सफल होता है जहाँ नीति, पराक्रम और प्रजा एकसाथ चलते हैं।"
  • "मेरे सिंहासन की ताकत मेरी प्रजा का विश्वास है, न कि तलवार की धार।"
  • "चाणक्य जैसे गुरु हों तो असंभव भी संभव हो जाता है।"
  • "स्वराज की प्राप्ति के लिए त्याग और तपस्या दोनों चाहिए।"
  • "एक राजा का कर्तव्य युद्ध जीतना नहीं, प्रजा का मन जीतना है।"
  • "शासक वही जो अपनी शक्तियों को जनहित में लगाए।"
  • "जो नीति के साथ चलता है, इतिहास उसी का गीत गाता है।"
  • "एकलव्य की भाँति मैंने भी गुरु की छाया में साम्राज्य बनाना सीखा।"
  • "युद्ध की विजय अंतिम नहीं होती, शासन की सफलता ही स्थायी होती है।"
  • "शक्ति से साम्राज्य बनता है, लेकिन न्याय से वह टिकता है।"
  • "मेरे शासन में राजा सबसे पहले सेवक होता है।"
  • "संगठन शक्ति है – और वही मेरे साम्राज्य का आधार है।"


संदर्भ व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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  • चंद्रगुप्त मौर्य का उल्लेख विशाखदत्त के 'मुद्राराक्षस', चाणक्य नीति, जैन ग्रंथों, तथा ग्रीक यात्रियों (मगस्थनीज) के विवरण में मिलता है।
  • उन्होंने चाणक्य की सहायता से पहले नंद वंश का अंत किया और फिर सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्यूकस को हराया।
  • बाद के जीवन में वे जैन धर्म अपना कर श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चले गए, जहाँ उन्होंने संयमित जीवन बिताया।

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