ग्रहण
दिखावट
ग्रहण एक खगोलीय घटना है जो तब घटित होती है जब कोई खगोलीय पिण्ड अस्थायी रूप से द्रष्टा की दृष्टि से 'छिप' जाता है। यह 'छिपना' किसी पिण्ड के दूसरे किसी पिण्ड की छाया में आने से हो सकता है (जैसे चन्द्र ग्रहण में) या द्रष्टा और पिण्ड के बीच में किसी तीसरे पिण्ड के आने से हो सकता है (सूर्यग्रहण)।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूछाया ॥ -- आर्यभट, आर्यभटीय में
- चन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है (सूर्य ग्रहण के समय), और पृथ्वी की विशाल छाया चन्द्रमा को ढक लेती है (चन्द्र ग्रहण के समय)।
- भूग्रहभानां गोलार्धानि स्वच्छायया विवर्णानि ।
- अर्धानि यथासारं सूर्याभिमुखानि दीप्यन्ते ॥ -- आर्यभट
- पृथ्वी, ग्रहों और चन्द्रमा का आधा हिस्सा अपनी ही छाया के कारण अंधेरे में रहता है, जबकि दूसरा आधा हिस्सा जो सूर्य के सामने होता है, वह सूर्य के प्रकाश से चमकता है।
- भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रहे प्रविशतीन्दुः । -- वराहमिहिर
- चन्द्र ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा सूर्य (और पृथ्वी) के बीच में आ जाता है।
आचार्य वटेश्वर
[सम्पादित करें]- पर्वप्रतिक्रिधरणधिमाससकृतन्मेन्द्वानमानात् । ... ज्योतिर्विदा बहुमत्वमस्मात् ॥
- पर्व (ग्रहण), तिथि, और अधिमास आदि का निर्णय 'चान्द्रमान' (Lunar measure) के आधार पर किया जाना चाहिए।
- ग्रहण का भौतिक कारण
- छादकः शशिनो भासां भूच्छाया विबुधैः स्मृता ।
- भास्करं छादयेदिन्दुः सव्यतः सव्यमेव च ॥
- विद्वानों के अनुसार, चंद्रमा का आच्छादक (ढकने वाला) पृथ्वी की छाया है। जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है, तो चंद्र ग्रहण होता है। इसी प्रकार, जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है, तो वह सूर्य को ढक लेता है, जिससे सूर्य ग्रहण होता है।
- ग्रहण किस दशा में होता है?
- विक्षेपश्च यदा स्वल्पः शशिनः पर्वसंक्षये ।
- तदैव जायते नूनं ग्रहणं नान्यथा भवेत् ॥
- जब पर्व के अंत में (पूर्णिमा या अमावस्या पर) चंद्रमा का विक्षेप (Latitude) बहुत कम होता है, तभी निश्चित रूप से ग्रहण घटित होता है। यदि चंद्रमा अपनी कक्षा में राहु या केतु (पात) के बहुत निकट नहीं है, तो ग्रहण नहीं हो सकता।
- तमोविष्काम्भ (छाया का व्यास) की गणना
- भूबिम्बं रविणा विद्धं शशिनः पथि संस्थितम् ।
- छाया तमोमयी तत्र तद्विष्कम्भोऽत्र साध्यते ॥
- सूर्य की किरणों द्वारा पृथ्वी का जो बिम्ब चंद्रमा के मार्ग (कक्षा) पर पड़ता है, वह अंधकारमय छाया (तम) कहलाता है। उस छाया के व्यास को गणितीय विधि से सिद्ध किया जाता है ताकि ग्रहण की अवधि जानी जा सके।
- ग्रहण में 'वलन' (Deflection) की गणना
- अक्षजं वलनं तद्वदायनं चापि कल्पयेत् ।
- द्वयोः संयोगवियोगौ स्फुटीकरणहेतवे ॥
- अक्ष-वलन और अयन-वलन की कल्पना (गणना) करनी चाहिए। इन दोनों का योग (Addition) या वियोग (Subtraction) करने पर स्पष्ट वलन प्राप्त होता है, जो ग्रहण के ग्रास (Eclipsed portion) की सही दिशा निर्धारित करने के लिए आवश्यक है।
- लम्बन (Parallax in Solar Eclipses)
- लम्बनं दृश्यते सूर्ये न विधौ भूवियोगतः ।
- तस्मात् तत्साधनं कार्यं सूर्यपर्वणि धीमता ॥
- पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी के कारण सूर्य ग्रहण में लम्बन (Parallax) दिखाई देता है, लेकिन चंद्र ग्रहण में नहीं। इसलिए, बुद्धिमान गणितज्ञ को सूर्य ग्रहण की गणना करते समय लम्बन का संस्कार (Correction) अवश्य करना चाहिए।