गृहस्थ
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गृहस्थ अर्थात चार आश्रमों में दूसरा आश्रम। मनु ने कहा है कि ‘‘जैसे सब जन्तु वायु के सहारे जीते है, वैसे ही सब प्राणी गृहस्थ आश्रम में जीवन धारण करते है" जैसे सब नदी-नद समुद्र में जाकर स्थित होते है वैसे ही तीनों आश्रम गृहस्थ आश्रम में स्थिति प्राप्त करते में है, उसी की सहायता से जीवित है अन्य आश्रमो का भरण-पोषण करने के कारण यह आश्रम ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- गृहस्थ्येव हि धर्माणि सर्वेषां मूलमुच्यते -- हर्षि व्यास
- गृहस्थाश्रम ही सर्व धर्मों का आधार है।
- धन्योगृहस्थाश्रमः
- चारो आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है। जिस तरह समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित है।
बृहद्दैवज्ञरञ्जन नामक ग्रन्थ के विवाहप्रकरण में गृहस्थ आश्रम की भूरि-भूरि प्रशंशा की गयी है। देखिये-
- अथ सर्वेषामाश्रमाणां गृहस्थाश्रमो मुख्यतरस्तस्य लक्षणमुक्तम् ।
- दया लज्जा क्षमा श्रद्धा प्रज्ञा कृतज्ञता ।
- गुणा यस्य भवंत्येते गृहस्थो मुख्य एव च ॥१॥
- शंखः –
- वानप्रस्थो ब्रह्मचारी यतिश्चैव तथा द्विजः ।
- गृहस्थस्य प्रसादेन जीवंत्येते यथाविधि ॥ २ ॥
- गृहस्थ एव यजते गृहस्थस्तप्यते तपः ।
- ददाति च गृहस्थश्च तस्माच्छ्रेयो गृहाश्रमी ॥ ३ ॥
- व्यासः –
- त्यागः गृहाश्रमात्परो धर्मो नास्ति नास्ति पुनः पुनः ॥ ४॥
- यज्ञेभिर्दक्षिणावद्भिर्वह्निशुश्रूषया तथा ।
- गृही स्वर्गमवाप्नोति तथा चातिथिपूजनात् ॥ ५ ॥[१]
- एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत् स्नातको द्विजः।
- वने वसेत् तु नियतो यथावद् विजितैन्द्रियः॥6.1॥
- इस प्रकार स्नातक द्विज विधिवत गृहधर्म का पालन करे, पश्चात जितेन्द्रिय होकर नियमपूर्वक धर्म का अनुष्ठान करता हुआ वन में निवास करे।
- गृहस्थस्तु यथा पश्येद् वलीपलितमात्मनः।
- अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत्॥6.2॥
- गृहस्थ जब देखे कि अपने शरीर पर झुर्रियाँ पद गई हैं, केश श्वेत हो गए है और पुत्र के भी पुत्र हो चुके हैं, तब वन में निवास करे।