घर
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(गृह से अनुप्रेषित)
गृह या घर ।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना। -- विश्वकर्मप्रकाश
- गृहस्थ की सभी क्रियाएँ घर के बिना सिद्ध नहीं होतीं।
- न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते
- घर को घर नहीं कहते बल्कि गृहिणी (घर वाली) को घर कहते हैं।
- अस्माभिर्निर्मिता नीडास्तृणमात्रैः सुखावहः ।
- हस्तपादादिसंयुक्तो यूयं किमवसीदथ ॥ -- हितोपदेश
- हमने तो केवल तिनकों की मदद से ये सुखदायक घोंसले (घर) बना लिए हैं। तुम तो हाथ, पैर और अंगों से संपन्न (शक्तिशाली) हो, फिर भी तुम क्यों कष्ट पा रहे हो (या घर क्यों नहीं बनाते)?
- यत्र पादत्रयं न्यस्तं तद् गृहं विद्धि भारत
- हे भारत (अर्जुन)! जहाँ भी तुम्हारे तीन कदम टिक जाएँ (जहाँ तुम्हें स्थिरता और शांति मिल जाए), उसी को अपना घर समझो।
- वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां
- गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः ।
- अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते
- निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥
- आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है। घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना ही तप है। जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है।
- जिसके घर माता अथवा प्रियवादिनी पत्नी नहीं है, उसे वन में चला जाना चाहिए क्योंकि उसके लिए जैसा वन, वैसा ही घर। -- विष्णु शर्मा
- जो पुत्रहीन है उसका घर सूना प्रतीत होता है। जिसका हार्दिक मित्र नहीं है उसका घर सदा से सूना है। मूर्खों के लिए दसों दिशाएँ सूनी हैं। निर्धन के लिए तो सब कुछ सूना है। -- शूद्रक