गणेश शंकर 'विद्यार्थी'
गणेश शंकर 'विद्यार्थी' भारत के स्वतन्त्रता सेनानी एवं निर्भीक पत्रकार थे। वे एक ऐसे क्रांतिकारी पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाकर अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया। उन्होंने अपनी कलम से ब्रिटिश शासन की क्रूर नीतियों का विरोध किया और भारतीयों की पीड़ा को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने ‘प्रताप’ नामक अखबार की स्थापना की, जो जल्द ही स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों की आवाज बन गया। यह अखबार गरीबों, किसानों और मजदूरों की समस्याओं को उठाने वाला प्रमुख माध्यम बन गया।
विद्यार्थी जी की पत्रकारिता निर्भीक और निष्पक्ष थी। वे सत्ता के सामने कभी नहीं झुके और अन्याय के विरुद्ध लिखने के कारण कई बार जेल भी गए। उनके लेखों में समाज के दबे-कुचले लोगों की आवाज थी, जिनका शोषण अंग्रेजी शासन और जमींदारी प्रथा के तहत हो रहा था। वे मानते थे कि पत्रकारिता केवल सूचना देने का कार्य नहीं है, बल्कि यह जनता को जागरूक करने, उनकी चेतना को विकसित करने और अन्याय के खिलाफ खड़ा करने का माध्यम है।
उनकी पत्रकारिता के साथ-साथ, उनका स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण योगदान था। वे महात्मा गांधी और भगत सिंह दोनों के विचारों से प्रभावित थे। जहां एक ओर वे अहिंसक आंदोलनों में भाग लेते थे, वहीं दूसरी ओर वे क्रांतिकारियों के पक्ष में भी खड़े रहते थे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता की लड़ाई में हर विचारधारा का सम्मान किया जाना चाहिए। 1931 में, कानपुर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। विद्यार्थी जी, जाति और धर्म से ऊपर उठकर, घायलों की मदद के लिए सड़कों पर उतर आए। इसी दौरान, भीड़ ने उन्हें घेर लिया और वे हिंसा का शिकार हो गए। 25 मार्च 1931 को उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन उनकी शहादत भारतीय पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गई।
‘लोकसेवा’, ‘सार्वजनिक सदाचार’, ‘कर्मक्षेत्र’, ‘राष्ट्रीयता’, ‘सुगमता की माया’, ’धर्म की आड़' , ‘दरिद्रता का सामना’, ‘आगामी महाभारत’ आदि अनेक इसी प्रकार के महत्वपूर्ण निबन्ध हैं। ’धर्म की आड़' तथा ‘जिहाद की जरूरत’ निबंधों में उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों की धार्मिक रूढ़ियों, जड़ताओं, जहालत तथा अंधविश्वासों पर करारे प्रहार किए हैं।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- जो सिर स्वतन्त्रता देवी के सामने झुका, याद रखो, उसे अधिकार नहीं कि संसार की किसी शक्ति के सामने झुके। -- (नवम्बर 1913 को साप्ताहिक प्रताप के प्रथमांक में 'कर्मवीर महाराणा प्रताप' शीर्षक से लिखे गए लेख में)
- मानव स्वत्व मिला नहीं करते। उन्हें लेना पड़ता है। बल चाहिए, बल।
- मृत्यु के सान्निध्य में भेदभाव नहीं रहते। ऐसे समय तो गुण-स्मरण करना ही कर्त्तव्य है।
- कठिन समय, विपत्ति और घोर संग्राम, और कुछ नहीं, केवल प्रकृति की काट-छाँट हैं।
- अपने कर्तव्य से अनभिज्ञ मनुष्य कभी भी परोपकार-परायण या समाज-हितचिंतक नहीं कहा जा सकता। बिना इस विचार के मनुष्य अपने परिवार, नहीं नहीं अपने शरीर अथवा अपनी आत्मा तक का कोई उपकार नहीं कर सकता। कर्तव्य ज्ञान शुन्य मनुष्य को मनुष्य नहीं, पशु समझना चाहिए।
- ऊसर भूमि पुष्पों की जननी नहीं होती, और न उल्टे-सीधे डाल दिए जाने वाले बीज ही कभी पुष्पोद्यान का हाथ दिखा सकते हैं। पराजित देश किसी सभ्यता के मंदिर नहीं बनते, सरस्वती उन पर कृपा नहीं करती, लक्ष्मी उन पर दृष्टि नहीं डालती। -- (सन् 1915 ई0 में लिखा गया निबंध ‘राष्ट्र का निर्माण’)
- देश में जो स्वराज्य होगा, वह होगा किसी छोटे-मोटे समुदाय का नहीं, धनवानों और शिक्षितों का नहीं, वह होगा, साधारण से साधारण आदमी तक का। संसार भर की शासन पद्धति इस समय उलट-पलट रही हैं। व्यक्ति को समान अधिकार कागजों पर दिये गये हैं परन्तु कुलीनों, धनवानों और शिक्षितों के गुट करोड़ों आदमियों को दाबे बैठे हैं। -- ( 'प्रताप' में 14 जुलाई 1924 के 'स्वराज्य किसके लिए?' नामक लेख में )
- इस युग में, केवल भारतवर्ष के करोड़ों नर-नारियों के ललाट पर ये शब्द नहीं हैं कि जब सब आजाद होंगे तब तुम्हीं गुलाम बने रहोगे, तुम्हारी राह में रोड़े अटकाएंगे और तुम्हें अज्ञान और अंधकार में रखेंगे। यदि सचमुच इस देश के भाग्य में ही बदा है, तो हम यहीं कहेंगे, हमें स्वराज्य नहीं चाहिए। हमारे करोड़ों भाई, यदि गुलामी के बंधन में जकड़े हुए हैं, यदि वे अज्ञान और अंधकार में पड़े हैं, यदि उन्हें पेट भर खाने को नहीं मिलता और पहनने भर को कपड़ा, यदि उन्हें रहने के लिए जगह नहीं मिलती और चलने के लिए राह तो—उस दिशा की ओर जिधर हमारे इने-गिने आदमी सुख से समय बिताते हों और प्रभुता के अधिकारी बने हुए हों-उधर हम अपना मुंह भी नहीं करना चाहते। हम तो उसी ओर जाएंगे, उसी ओर रहेंगे-सड़ने, घुटने, और गुमनामी में मर जाने तक के लिए जिधर हमारे शरीर, हमारे हृदय, हमारे दीन-हीन और पीड़ित करोड़ों भाई होंगे। उस दुःख में एक शांति होगी, और उस सुख में करोड़ों के कंकाल पर भोगे जाने वाले थोड़े से आदमियों के उस सुख में- एक गहरी ग्लानि। -- ( 'प्रताप' में 14 जुलाई 1924 के 'स्वराज्य किसके लिए?' नामक लेख में )
- अपनी मातृभूमि की सेवा प्रत्येक मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है तथा इतिहास का प्रचार-प्रसार भारत के उत्थान का सबसे बड़ा उपाय है। यह हमारा कर्तव्य है कि आस्था और विश्वास के अनुसार मातृभूमि की सेवा के लिए हमें अपना जीवन समर्पित करना चाहिए। -- ('हमारी आत्मोत्सर्गता' के अप्रकाशित प्रस्तावना में)
- प्राचीन कथाओं को ही सुन कर हिन्दूपति महाराणा प्रताप स्वतंत्रता देवी के स्वतंत्र आराधक हुए थे, महाभारत और रामायण की कथाओं ही ने परतंत्र पिता के परतंत्र पुत्र शिवाजी को महाराष्ट्र का छत्रपति राजा बनाया था। दूर क्यों जाइये, हमारे देश में बरसात के दिनों में देहाती आल्हा गाते हैं; गाते समय उनके जोश, उनके कहने का ढंग, उनके अंग-अंग से वीरता का दर्शना, इत्यादि देखने के योग्य होते हैं! सारांश यह कि इतिहास सोते हुए मनुष्य को जगा सकता है, जागे हुये को पैरों पर खड़ा कर सकता है और खड़े हुये की नसों में खून दौड़ा सकता है। मुरदे को जिन्दा करना, सूखे को हरा करना या तो अमृत (यदि अमृत कोई वस्तु है तो) का काम है या फिर इतिहास का। इतिहास के लाभों को न मानना हठधर्मी है। -- ('हमारी अत्मोत्सर्गता' की भूमिका में )
- देश के सजीव हृदयों में स्वराज्य की प्रबल आकांक्षा का उदय हो गया है। वे भली-भाँति समझ गये हैं कि जिस देश के निवासियों को अपने कानून आप अनाने का अधिकार न हो, जो अपनी रक्षा के लिए अस्त्र न बाँध सकें, जो देश की समृद्धि के लिए अपने व्यापार की रक्षा न कर सकें, जो अपने ही देश के ऊँचे पदों पर न पहुँच सकें और क्रूर नियमों और उन्नति में बाधा डालने वाली नीति में परिवर्तन न कर सकें, उस देश के निवासियों का जीवन अत्यंत दु:खमय है और इसीलिए उनके हृदय में इस विश्वास का जन्म हुआ है कि बिना स्वराज्य के देश का सच्चा कल्याण नहीं हो सकता। -- ('स्वराज्य की आकांक्षा' नामक लेख में)[१]
- ड्यूक ऑफ कनॉट के आगमन के साथ ही अवध में जलियांवाला बाग जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति शुरू हो गयी है, जिसमें जनता को कुछ भी न समझते हुए न केवल उसके अधिकारों और आत्मा को अत्यंत निरंकुशता के साथ पैरों तले रौंदा, बल्कि उसकी मान-मर्यादा का भी विध्वंस किया जा रहा है। डायर ने जलियांवाला बाग में जो कुछ भी किया था, रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने मुंशीगंज में उससे कुछ कम नहीं किया। वहां एक घिरा हुआ बाग था और सई नदी का किनारा तथा क्रूरता, निर्दयता और पशुता की मात्रा में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। -- 1921 में रायबरेली के किसानों के नरसंहार के विरोध में 13 जनवरी, 2021 के अंक में ‘डायरशाही और ओ डायरशाही’ शीर्षक अग्रलेख में)[२]
युवाओं पर
[सम्पादित करें]- युवक, युवक ही क्या, यदि उसमें उत्साह और ओज न हो। युवकत्व का सबसे बड़ा प्रमाण ही यह है कि भावनाओं का वह पुंज हो और अखिल उत्साह का स्रोत। -- ( ‘युवकों का विद्रोह’ नामक लेख में आजादी की लड़ाई में युवा क्रान्तिकारियों के योगदान को व्याख्यायित करते हुए)
- हिंसा और अहिंसा की विवेचना छोड़ दीजिए, विज्ञान ने वर्तमान रणशैली को बेहद भयंकर बना दिया है। उसमें वीरता नहीं रही, उसमें पशुता और हत्या का राज है, और उसके मुकाबले हमारे ऐसे शताब्दियों से निशस्त्र लोगों का खड़ा रह सकना असम्भव है। हमारे लिए तो अहिंसा ही परम अस्त्र है, उसी से हम दुनिया में किसी का मुकाबला कर सकते हैं। -- ( ‘युवकों का विद्रोह’ नामक लेख में हिंसा और अहिंसा के द्वन्द्व पर )
- देश की सच्ची संपत्ति है उसके वे युवक और युवतियाँ जिनके शरीर की आभा में प्रकृति का सबसे अधिक स्पष्ट दर्शन होता है और जिनके हृदय में उदारता और कर्मण्यता, सहिष्णुता और अदम्य साहस के स्रोत का प्रवाह पूरे ज़ोरों पर है।
- युवकत्व का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि वह भावनाओं का पुंज हो और अखिल उत्साह का स्रोत। द्वन्द तब भी था और आज भी है, नए-पुराने का संघर्षण सदियों से चला आ रहा है, और ये इसी तरह आगे भी चलता रहेगा। बुजुर्गों को ये घबराहट रहती है कि अपनी नासमझी में युवा देश को किसी खंदक में ढकेल देंगे। युवा विचार करते हैं कि बुज़ुर्ग अपनी मान्यताओं से चिपके रहना चाहते हैं और परिवर्तन उन्हें सहन नहीं होता।
- पुरानों की अपेक्षा नयों की अब अधिक बड़ी जिम्मेदारी है। समय उनकी प्रतीक्षा कर रहा है, सुविधाएँ उनके चरणों को पखारने के लिए तैयार है, किंतु ये तभी, जब वे केवल युवकत्व के नाम पर नहीं, केवल इसलिए नहीं कि वे पुनती विद्रोही हैं, जो इतिहास का निर्माण किया करते हैं, किंतु अपनी प्रगाढ़ आदर्शभक्ति और आदर्श की और बढ़ने वाले व्यक्ति के योग्य विनम्रता और कर्तव्यशीलता का अखंड परिचय देकर अपने लिए स्थान चाहेंगे। गालियों के देने, डींग मारने, आज़ादी की व्यर्थ की ओर रट लगाने और दूसरों पर धूल फेंकने से न कोई बड़ा होता है और न कोई बड़ा काम हुआ करता है।
- आगे बढ़ने वाले युवक सबसे विद्रोह करें; किन्तु वे एक भावना से विद्रोह करने की इच्छा को हृदय में न आने दें। उनके मन में ऊँचे चरित्र के प्रति कभी प्रताड़ना या उपेक्षा का भाव उदय न हो। वे स्वयं चरित्रवान हों, उनका सिर भी जब झुके तब चरित्रवान के लिए। यदि चरित्र के प्रति उनमें आदर भाव रहा तो उनका विद्रोह चाहे कितनी ही कटुता क्यों न धारण कर ले, देश के लिए अंत में, अमृत–फल ही सिद्ध होगा।
- त्याग और तपस्या तुम्हारे मुख-मंडल पर अंकित हो और तत्परता और क्रियाशीलता तुम्हारे कामों पर।
- तुममें से कितने हैं, जिन्हें इस बात का बोध हो कि अर्वाचीन उन्नति के समय में, जबकि इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी तथा जापान जैसे देशों में 99 फीसदी पुरुष तथा स्त्रियाँ शिक्षित हैं, इस देश में 94 फीसदी पुरुष तथा स्त्रियाँ ऐसे हैं जो शिक्षा रूपी सूर्य के उजियाले से कोसों दूर हैं। तुम में से कितने हैं जिन्होंने इस भयंकर दारिद्रय तथा अज्ञानांधकार को यथाशक्ति दूर करने का बीड़ा उठाया हो? -- ('राष्ट्र की आशा' निबन्ध)
- यह आँधी सब जगह आई हुई है। रूस, जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, टर्की, चीन सब देशों के वन-उपवन उसके झोकों से कंपित हो उठे। प्रजातंत्र की यह आँधी कई देशों में आई और उसने जनता की छाती पर शताब्दियों से रुके हुए सिंहासनों को उखाड़कर फेंक दिया। जो राष्ट्र सुषुप्तावस्था में पड़े हुए थे, वे उन्निद्रत होकर अपनेपन को प्राप्त करने दौड़ पड़े। -- (‘माँ के अंचल में’ निबन्ध में वे देशवासियों को लोकतांत्रिक चेतना के प्रति जागरुक करते हुए)
- हम सशस्त्र क्रान्ति के उपासक नहीं हैं। हम भी उन पढ़े-लिखे मूर्खों में गिने जाते हैं, जो व्यावहारिकता को छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन हमारे हृदय में आदर और भक्ति है, उन आदर्श पुजारियों के प्रति जो देश-काल के बंधनों को काटकर फेंक देते हैं। उनका काम क्या रंग लाएगा, इसकी उन्हें चिन्ता नहीं। वे विद्रोह के पुतले हैं। वे भारतवर्ष की अन्तर-अग्नि की चिनगारियाँ हैं।.... उनका काम है देश को उन्नत और विशाल करना। -- ( काकोरी काण्ड के फैसले के बाद ‘वे दीवाने’ अग्रलेख लिखकर अहिंसावादियों की आलोचना करते हुए)
- हम लोग तो अंधे हैं। हम दूसरों की आँखों से देखते हैं। विदेशों के वीरों की चरितावली हम बड़े चाव से पढ़ते हैं, पर हमारे देशवासियों ने स्वतंत्रता के युद्ध में जिन कठिनाइयों का सामना किया और जो यंत्रणाएँ सहीं, उनका हमें पता तक नहीं। -- (‘हमारे वे मतवाले निर्वासित वीर’ आलेख में लाला हरदयाल जैसे निस्पृह, सत्यनिष्ठ, त्यागी महापुरुषों को याद करते हुए)
- एक महाशय बोले, चौरी चौरा काण्ड पर उपवास ही क्यों? माघ मेले में जिस प्रकार कीलदार पीढ़े पर साधू लोग बैठकर अपनी तपस्या की प्रदर्शनी किया करते हैं, वैसा ही एक पीढ़ा गाँधी जी पास भेज देना चाहिए, और वे उस पर बैठक तपस्या भी करें। -- (चौरी चौरा काण्ड के विरोध में गांधी के उपवास पर असहमति जताते हुए ‘जेल जीवन की झलक’ आलेख में वे लिखते हैं कि "सैकड़ों सत्याग्रही जो रोज जेल में महात्मा गाँधी की जय के नारे लगाते थे, उनके इस निर्णय से ऐसे कुम्हला गये जैसे तुषार से बतिया कुम्हला जाती है।")
पत्रकारिता
[सम्पादित करें]- आज अपने हृदय में नई-नई आशाओं को धारण करके और अपने आदर्शों पर पूर्ण विश्वास रखकर प्रताप कर्म क्षेत्र में आता है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परम उद्देश्य है और इस उद्देश्य की प्राप्ति कर एक बहुत बड़ा और बहुत जरूरी साधन हम भारतवर्ष की उन्नति समझते हैं। -- 'प्रताप' के पहले अंक में ‘प्रताप की नीति’ शीर्षक में [३]
- हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। हम अपने भाइयों और बहनों को उनके कर्तव्य और अधिकार समझाने का यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। (पत्रकारिता में अपने उद्देश्य स्पष्ट करते हुए)
- राजा और प्रजा में, एक जाति और दूसरी जाति में, एक संस्था और दूसरी संस्था में बैर और विरोध, अशांति और असंतोष न होने देना हम अपना परम कर्तव्य समझेंगे।" (पत्रकारिता में अपने उद्देश्य स्पष्ट करते हुए)
- पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है, वह अपने विवेक के अनुसार अपने पाठकों को ठीक मार्ग पर ले जाता है, वह जो कुछ लिखे प्रमाण और परिणाम का विचार रखकर लिखे, और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं है, लोक सेवा उसका ध्येय है। -- (१९३० में)
- जब किसी के बारे में लिखो तो यह समझकर लिखो कि वह तुम्हारे सामने ही बैठा है और तुमसे जवाब तलब कर सकता है।
भाषा एवं हिन्दी पर
[सम्पादित करें]- विजितों के मुंह से निकली हुई विजयीजनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी निशानी है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वाभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसीलिए, जो देश दुर्भाग्य से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते, अपनी भाषा की रक्षा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। -- (मार्च 1930 में गोरखपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन के १९वें अधिवेशन में ‘हिन्दी का गौरव’ नामक वक्तव्य में)
- सज्जनो! हिन्दी साहित्य के एक विशेष अंग पर मुझे अपना कुछ मत प्रकट करना आवश्यक जंचता है। इस समय 'घासलेटी साहित्य' की चर्चा बहुत जोरों से उठ रही है मुझे इस बात के बतलाने की आवश्यकता नहीं है कि घासलेटी साहित्य किस प्रकार के साहित्य को कहते हैं? जो साहित्य यथार्थ में सार्वजनिक कुरुचि की वृद्धि करने वाला है, वह निःसन्देह त्याज्य और भर्त्सनीय है। -- (मार्च 1930 में गोरखपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन के १९वें अधिवेशन में ‘हिन्दी का गौरव’ नामक वक्तव्य में)[४]
- हिंदी राष्ट्रभाषा बने, इसका यह अर्थ कदापी नहीं कि हिंदू हिंदू होने के नाते हिंदी सीखें। मेरे लिए तो हिंदी एक संस्कृति की प्रतीक है और केवल हिंदी के द्वारा ही बिखरे हुए भारत में एकत्व की भावना भरी जा सकती है और सबको एक सूत्र में आबद्ध करने का हिंदी एकमेव साधन है। -- (मार्च 1930 में गोरखपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन के १९वें अधिवेशन में ‘हिन्दी का गौरव’ नामक वक्तव्य में)
- राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। विजयी लोगों की विजय-गति विजित के जीवन के प्रत्येक विभाग पर अपनी श्रेष्ठता की छाप लगाने का सतत प्रयत्न करती है। स्वाभाविक ढंग से विजितों की भाषा पर उनका सबसे पहले वार होता है। भाषा जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता। विजितों के मुंह से निकली हुई विजयी जनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिह्नानी है- पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।
साम्प्रदायिकता
[सम्पादित करें]- अजां देने, शंख बजाने और नमाज पढ़ने का मतलब धर्म नहीं है। दूसरों की आजादी को रौंदने और उत्पात मचाने वाले धार्मिक लोगों की तुलना में वे ला-मजहब और नास्तिक आदमी कहीं अधिक अच्छे और ऊंचे दर्जे के हैं, जिनका आचरण अच्छा है।
- कुछ लोग हिंदू राष्ट्र चिल्लाते हैं। वह बड़ी भारी भूल कर रहे हैं और वह अभी तक राष्ट्र के अर्थ को नहीं समझते हैं।
- आज हमें जिहाद करना है, इस धर्म के ढोंग के ख़िलाफ़, इस धार्मिक तुनकमिज़ाजी के ख़िलाफ़।
- मुझे मानो या न मानो, तुम्हारे मानने ही से मेरा ईश्वरत्व क़ायम नहीं रहेगा। दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो। (धर्म की आड़ शीर्षक लेख में)
- शुभ होगा वह दिन तब इस देश के मुसलमान यह समझने लगेंगे कि हमारा नाता इस देश के हिंदुओं से तुर्कों और काबुलियों की अपेक्षा अधिक बड़ा और स्वाभाविक है, और जब वे उसी प्रकार जिस प्रकार रोम और ग्रीस के वर्तमान ईसाई, निवासी अपने गैर-ईसाई पूर्वजों की कीर्ति और कला को अपनाते हैं, भारतवर्ष की प्राचीन कीर्ति एवं कला को अपनाने लगेंगे।
धर्म की आड़
[सम्पादित करें]इस समय, देश में धर्म की धूम है। उत्पात किये जाते हैं, तो धर्म और ईमान के नाम पर और ज़िद की जाती है, तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुआ पासी और बुद्धू मियाँ धर्म और ईमान को जानें, या न जानें, परंतु उसके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़ने वाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह कुछ भी नहीं समझता-बूझता और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हैं, उधर जुत जाता है।
यथार्थ दोष है, कुछ चलते-पुरज़े, पढ़े-लिखे लोगों का—जो मूर्ख लोगों की शक्तियों और उत्साह का दुरुपयोग इसलिए कर रहे हैं कि इस प्रकार, जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्व और बड़प्पन क़ायम रहे। इसके लिए धर्म और ईमान की बुराइयों से काम लेना उन्हें सबसे सुगम मालूम पड़ता है। सुगम है भी।
साधारण-से-साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठी हुई कि धर्म और ईमान की रक्षा के लिए प्राण तक दे देना वाजिब है। बेचारा साधारण आदमी धर्म के तत्वों को क्या जाने? लकीर पीटते रहना ही वह अपना धर्म समझता है।
उसकी इस अवस्था से चालाक लोग इस समय बहुत बेजा फ़ायदा उठा रहे हैं।
पाश्चात्य देशों में, धनी लोग ग़रीब मज़दूरों के परिश्रम का बेजा लाभ उठाते हैं। उसी परिश्रम की बदौलत ग़रीब मज़दूर की झोंपड़ी का मज़ाक़ उड़ाती हुईं उनकी अट्टालिकाएँ आकाश से बातें करती है! ग़रीबों की कमाई ही से वे मोटे पड़ते हैं और उसी के बल से वे सदा इस बात का प्रयत्न करते हैं कि ग़रीब सदा चूसे जाते रहें। यह भयंकर अवस्था है! इसी के कारण, साम्यवाद, बोल्शेविज़्म आदि का जन्म हुआ। हमारे देश में इस समय, धनपतियों का इतना ज़ोर नहीं है। यहाँ, धर्म के नाम पर, कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए, करोड़ों आदमियों की शक्ति का दुरुपयोग किया करते हैं। ग़रीबों का धनाढ्यों द्वारा चूसा जाना इतना बुरा नहीं हैं, जितना बुरा यह है कि वह है धन की मार, यह है बुद्धि पर मार। वहाँ धन दिखाकर करोड़ों को वश में किया जाता है और फिर मनमाना धन पैदा करने के लिए जोत दिया जाता है। यहाँ है बुद्धि पर परदा डालकर पहले ईश्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना और फिर, धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए लोगों को लड़ाना-भिड़ाना। मूर्ख बेचारे धर्म की दुहाइयाँ देते और दीन-दीन चिल्लाते हैं, अपने प्राणों की बाज़ियाँ खेते और थोड़े-से अनियंत्रित और धूर्त आदमियों का आसन ऊँचा करते और उनका बल बढ़ाते हैं।
धर्म और ईमान के नाम पर किये जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ उद्योग होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक भारतवर्ष में नित्य-प्रति बढ़ते जाने वाले झगड़े कम न होंगे। धर्म की उपासना के मार्ग में कोई भी रुकावट न हो। जिसका मन जिस प्रकार चाहे, उसी प्रकार धर्म की भावना को अपने मन में जगावे। धर्म और ईमान, मन का सौदा हो, ईश्वर और आत्मा के बीच का सम्बन्ध हो, आत्मा को शुद्ध करने और ऊँचे उठाने का साधन हो। वह किसी दशा में भी, किसी दूसरे व्यक्ति की स्वाधीनता के छीनने या कुचलने का साधन न बने। आपका मन चाहे, उस तरह का धर्म आप मानें और दूसरे का मन चाहे, उस प्रकार का धर्म वह माने। दो भिन्न धर्मों के मानने वालों के टकरा जाने के लिए कोई भी स्थान न हो। यदि किसी धर्म के मानने वाले कहीं ज़बरदस्ती टाँग अड़ाते हों, तो उनका इस प्रकार का कार्य देश की स्वाधीनता के विरुद्ध समझा जाए।
देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निःसंदेह, अत्यंत बुरा था, जिस दिन, स्वाधीनता के क्षेत्र में, ख़िलाफ़त, मुल्ला, मौलवियों और धर्माचार्यों को स्थान दिया जाना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्र में, एक क़दम पीछे हटकर रखा था। अपने उसी पाप का फल आज हमें भोगना पड़ रहा है।
देश की स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचार्य को देश के सामने दूसरे रूप में पेश किया, उन्हें अधिक शक्तिशाली बना दिया और हमारे इस काम का फल यह हुआ है कि इस समय, हमारे हाथों ही से बढ़ायी इनकी और इनके-से लोगों की शक्तियाँ हमारी जड़ उखाड़ने में लगी हैं और देश में मज़हबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं।
महात्मा गांधी धर्म को सर्वत्र स्थान देते हैं। वे एक पग भी धर्म के बिना चलने के लिए तैयार नहीं। परंतु उनकी बात ले उड़ने के पहले, प्रत्येक आदमी का कर्तव्य यह है कि वह भली-भाँति समझ ले कि महात्मा जी के धर्म का स्वरूप क्या है? धर्म से महात्मा जी का मतलब धर्म के ऊँचे और उदार तत्वों ही का हुआ करता है। उनके मानने में किसे एतराज़ हो सकता है।
अज़ाँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाज़ पढ़ने का नाम धर्म नहीं है। शुद्धाचरण और सदाचार ही धर्म के स्पष्ट चिह्न हैं।
दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच-वक़्ता नमाज़ भी अदा कीजिए, परंतु ईश्वर को इस प्रकार की रिश्वत के दे चुकने के पश्चात्, यदि आप अपने को दिन-भर बेईमानी करने और दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने के लिए आज़ाद समझते हैं तो, इस धर्म को, अब आगे आने वाला समय कदापि नहीं टिकने देगा। अब तो, आपका पूजा-पाठ न देखा जाएगा, आपकी भलमसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगा। सबके कल्याण की दृष्टि से, आपको अपने आचरण को सुधारना पड़ेगा और यदि आप अपने आचरण को नहीं सुधारेंगे तो नमाज़ और रोज़े, पूजा और गायत्री आपको देश के अन्य लोगों की आज़ादी को रौंदने और देश-भर में उत्पातों का कीचड़ उठालने के लिए आज़ाद न छोड़ सकेगी। ऐसे धार्मिक और दीनदार आदमियों से तो, वे ला-मज़हब और नास्तिक आदमी कहीं अधिक अच्छे और ऊँचे हैं, जिनका आचरण अच्छा है, जो दूसरों के सुख-दुःख का ख़याल रखते हैं और जो मूर्खों को किसी स्वार्थ-सिद्धि के लिए उकसाना बहुत बुरा समझते हैं। ईश्वर इन नास्तिकों और ला-मज़हब लोगों को अधिक प्यार करेगा और वह अपने पवित्र नाम पर अपवित्र काम करने वालों से यही कहना पसंद करेगा, ‘मुझे मानो या न मानो, तुम्हारे मानने ही से मेरा ईश्वरत्व क़ायम नहीं रहेगा। दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो।’
- -- गणेशशंकर 'विद्यार्थी' की जेल डायरी
स्वराज्य की आकांक्षा
[सम्पादित करें]देश के सजीव हृदयों में स्वराज्य की प्रबल आकांक्षा का उदय हो गया है। वे भली-भाँति समझ गये हैं कि जिस देश के निवासियों को अपने कानून आप अनाने का अधिकार न हो, जो अपनी रक्षा के लिए अस्त्र न बाँध सकें, जो देश की समृद्धि के लिए अपने व्यापार की रक्षा न कर सकें, जो अपने ही देश के ऊँचे पदों पर न पहुँच सकें और क्रूर नियमों और उन्नति में बाधा डालने वाली नीति में परिवर्तन न कर सकें, उस देश के निवासियों का जीवन अत्यंत दु:खमय है और इसीलिए उनके हृदय में इस विश्वास का जन्म हुआ है कि बिना स्वराज्य के देश का सच्चा कल्याण नहीं हो सकता, परंतु दूसरी ओर ऐसे लोग हैं, जिनके हाथों में शक्तियाँ हैं या जो अपने को शक्तिधर समझते हैं, कि वे भारतवासियों की इस आकांक्षा की उपेक्षा करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। यद्यपि एक जाति या एक देश के विकास के लिए मार्ग दे देना, उस पर से अपना बोझ उठा देना एक बड़ा भारी पुण्य कार्य है और ऐसा बड़ा कि अपने करने वाले के यश और सद्गुणों को बहुत बढ़ा देता है। यद्यपि लार्ड हार्डिंग - ऐसे बड़े शासक ने भारतीयों की स्वराज्याकांक्षा को उचित बतलाते हुए सत्ताधारियों को चेतावनी दी थी कि समय आ रहा है कि भारतीयों को आगे बढ़ने के लिए उन्हें मार्ग देना और अपने कुछ अधिकारों से नमस्कार करना पड़ेगा, परंतु संसार में ऐसे आदमी बहुत ही थोड़े हैं जो किसी अच्छे-से-अच्छे काम के लिए अपने अधिकारों से विलग होने के लिए राजी हों और यही बात हमारे समाने भी है। इसीलिए विरोधी पक्ष इस बहाने को पेश करने के लिए विवश होता है कि हमारी यह आकांक्षा कृत्रिम है। हमारे विरोधी तो इस बात को सदैव कहते रहेंगे, क्योंकि इसके विरुद्ध बात कहने से उनके स्वार्थों को धक्का पहुँचता है। इसलिए हमें उनके सामने किसी सफाई के पेश करने की आवश्यकता नहीं, परंतु उन लोगों के सामने, जिन्होंने अपनी आत्माऔर उसकी शक्तियों पर विश्वास करना नहीं छोड़ दिया, या जिन्हें स्वार्थपरता ने न्याय-मार्ग से बिलकुल ही भटका नहीं दिया, देश की इस आकांक्षा की सत्यता और औचित्य पर कुछ बातें रखने की आवश्यकता है।
देश में नवीन आकांक्षाओं का जन्म उसके पाश्चात्य सभ्यता के संसर्ग में आने का फल है। इस बात को नि:संकोच स्वीकार करने में किसी भी विस्तृत दृष्टि रखने वाले भारतवासी को कोई हिचकिचाहट नहीं हो सकती कि उसने पाश्चात्य् भावों के संसर्ग में आकर राष्ट्रीय उन्नति के विचारों को ग्रहण किया है। पाश्चात् साहित्य के प्रकाश ने उन पगडंडियों पर चलने का अवसर दिया जो हमें संसार के प्रशस्त मार्ग पर पहुँचाती हैं और जिन पर चलना हम चिरकाल से बिल्कुल भूल गये थे। पश्चिम के राजनैतिक दार्शनिकों ने हमें राष्ट्रीय स्वाधीनता का संदेश दिया और उदार अंग्रेज राजनीतिज्ञों के ये शब्द हमारे कानों में बारंबार गूँजे, 'स्वाधीनता हमारी जीवन-श्वास है। हम स्वाधीनता के लिए कमर कसे खड़े हैं, हमारी नीति स्वाधीनता की नीति है।' इन भावों से हमारी कल्पना-शक्ति को बहुत उत्तेजना मिली। इस उत्तेजना से कांग्रेस का जन्म हुआ और उसने, यद्यपि आज तक वह प्रस्तावों ही को पास करती रही है, देश के लाखों पढ़े-लिखे आदमियों के हृदय एक विशेष प्रकार के भाव से भर दिये और उनके प्रकट करने के अवसर दिये। कांग्रेस अवश्विास का शिकार बनी, उस पर तीव्र दृष्टि पड़ती रही, उसके काम करने वालों के मार्ग में बाधाएँ डाली गयीं, परंतु उसका काम नहीं रुका। बाधाओं ने उसके भक्तों को मजबूत किया और अंत में समय ने उसका साथ दिया। निराशा के अंधकार में प्रकाश की ज्योति दीख पड़ने लगी। पतित पूर्वी देशों में भी जागृति की देवी का स्वागत हुआ। संसार ने उस समय आश्चर्य से नेत्र मले, जब जापान ने रूस ऐसे विशाल साम्राज्य को सरे-मैदान पछाड़ दिया। पूर्वीय देशों की नसों में जीवन-रक्त दौड़ उठा। चीन की जागृति ने भी इस चैतन्यता को बल पहुँचाया। निराश हृदयों तक में आशा की लहर हिलोरें मार उठी। चीन और जापान के प्राचीन शिक्षक भारत ने उलट-फेरों को बड़ी उत्सुकता से निरखा। वर्तमान आकांक्षाओं का उस उत्सुकता से बड़ा घनिष्ठ संबंध है। भारतीय हृदय अधिक उत्साह और उज्ज्वल भविष्य के विश्वास के साथ अग्रसर होने लगे। 1914 में यह महासंग्राम आरंभ हुआ। भारतीय वीरों ने अंग्रेजी साम्राज्य की सेवा में अपना रक्त बहाकर भयानक संकट के समय को टाला और भारतीय वीरता का सिक्का संसार-भर के हृदय पर जमा दिया। भारतीय सहायता ने बड़े-बड़ों को पिघला दिया। नये दृष्टिकोण (New angle of vision) की बात का जन्म हुआ। विरुद्ध पक्ष तक ने हमारी आकांक्षाओं के औचित्य को स्वीकार किया। इंग्लैंड की गति बड़ी ही संतोषप्रद रही, क्योंकि अपने ही कथनानुसार वह केवल छोटे-छोटे राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा के लिए लड़ रहा है। महासंग्राम ने छोटे और पतित देशों की स्वाधीनता को भी मूल्यवान बना दिया। इंग्लैंड अपने लाखों आदमियों और अरबों रुपयों को बेल्जियम की स्वाधीनता के लिए नष्ट कर रहा है और पोलैंड की स्वाधीनता की भेरी हर ओर से बज रही है। क्या ये बातें हमारे हृदय को बढ़ाने वाली नहीं हैं? हमारा हृदय पत्थर की भाँति जड़ पदार्थ होता, यदि वह संसार की इन घटनाओं से प्रभावित न होता। फिर स्वाधीनता प्रिय इंग्लैंड से स्वाधीनता और स्वराज्य के नाम पर अपील करना किस प्रकार कृत्रिम हैं?
हमारी वर्तमान अवस्था ऐसी नहीं है जो हमें संसार के बराबर चलने की उत्सुकता रखते हुए भी चुप बैठे रहने दे। अंग्रेजी शासन की बरकतों से कोई इंकार नहीं, परंतु उसके कारण देश में बहुत-सी ऐसी बातों का जन्म भी हुआ है, जो देश को अवनति की ओर ले जाने वाली हैं। नि:संदेह लार्ड मोरले के कथनानुसार किसी भी शासन में सब कुछ-भला ही भला नहीं हो सकता, परंतु अच्छे शासन में भलाई का हिस्सा बहुत अधिक होना चाहिए। हमारा विश्वास है कि वर्तमान शासन में यह बात नहीं है और वह हो भी नहीं सकती, क्योंकि सात समुद्र पार से आने वाला अंग्रेज हाकिम देश की रीति-नीति और उसके कल्याणकारी उपायों को भली-भाँति नहीं जान सकता और बहुत-सी हालतों में वह देश-कलयाण की दृष्टि ही से काम भी नहीं कर सकता। यदि बातें ऐसी न हों तो आज 60 वर्ष के पूरे शासन के पश्चात् भी हमें देश के शासन में अविश्वास और बाधाओं की गहरी पुट नजर न आती। देश की खुशहाली शिक्षा-प्रचार बिना नहीं बढ़ सकती, परंतु शिक्षा-प्रचार का क्या हाल है? 40 वर्ष में जापान में एक भी अनपढ़ बच्चा नहीं रहा, परंतु भारत पर अविद्या और इसीलिए अज्ञान की घोर घटा छायी हुई है। इंग्लैंड अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा मुफ्त और अनिवार्य रूप से दे, परंतु बड़ों में प्रति बच्चे पर शिक्षा में साढ़े छह आने खर्च होते हुए भी भारत सरकार केवल एक आना प्रति छात्र ही खर्च करना यथेष्ट समझे और जब किफायत की आवश्यकता पड़े, तब शिक्षा-खर्च में ही कतरब्योंत करने के लिए तैयार हो! किसानों की सहायत की हालत दिन-ब-दिन बुरी होती जाती है। 22 करोड़ भारतीय किसानों में से 10 करोड़ से अधिक केवल एक समय रूखा-सूखा भोजन करते हैं। देश का व्यापार-धंधा अत्यंत शिथिल है। विदेशी उसके लाभ उठाते हैं, परंतु देश की सरकार उसकी रक्षा तक नहीं कर सकती। देश पर ऋण बढ़ता चला आ रहा है और विदेशी उसके देने वाले हैं, इसलिए उनको सूद के रूप में और पेंशन पाने वाले अपने हाकिमों और सैनिकों को होम चार्जेज के रूप में इस गरीब देश को अपनी जेब से प्रति वर्ष कभी न लौटने के लिए करोड़ों रुपया निकाल देना पड़ता है। हाकिमों को बहुत बड़ी तनख्वाहें मिलती हैं और देश की संतानों के लिए ऊँचे पदों और सेना के दरवाजे बंद हैं। सरस्वती के मंदिर तक में भेदभाव की लकीरें खिंची हुई हैं। विदेशों में हमारा जो घोर अपमान होता है, उसकी कथाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। देशोन्नति में बाधा डालने वाले अनेक कानून-कायदे बनते जाते हैं। प्रेस ऐक्ट ने समाचार-पत्रों की स्वाधीनता का गला घोंट दिया और अन्य कितने ही ऐक्टों ने हमारे बोलने-चालने और काम करने की आजादी छीन ली है। यदि देश के शासन में देशवासियों का यथेष्ट हाथ होता तो ये बातें कदापि न हो पातीं, क्योंकि वे सिी भी काम के करने के पहले इस बात पर विचार के लिए सदा तैयार होते कि उससे देश की उन्नति या हमारे संसार के साथ पग से पग मिलाकर चलने में कोई बाधा तो उपस्थित नहीं होती! हमारे हकिमों में भारतीय भी हैं, परंतु कितने? सिविल सर्विस में 1319 आदमी हैं, जिनमें केवल 46 भारतीय है और ये भी महत्व के स्थानों पर नहीं। अपने ही देश के शासन में भारतीयों का कितना कम हाथ है, यह बात इन दो अंकों से पूर्णतया स्पष्ट है। हमारी वर्तमान अवस्था हमें घोर निद्रा में मग्न नहीं रहने दे सकती। आकांक्षाएँ उत्पन्न हुए बिना नहीं रह सकतीं और जो लोग हमारी इन आकांक्षाओं को कृत्रिम कहते हैं, उनमें सहानुभूति और उदारता से किसी बात के समझने की शक्ति ही नहीं।
हमारे विरोधियों का एक दल हमें स्वराज्य के अयोग्य सिद्ध करते नहीं थकता। माँ के पेट से योग्यता साथ लेकर कोई नहीं जन्मता। अभ्यास आदमी को योग्य बनाता है। हमें अभ्यास का अवसर नहीं मिलता, इसलिए अपनी त्रुटियों के लिए हम बहुत अधिक दोषी नहीं हैं। अंग्रेजी राज्य के पहले भी देश में सुशासन के तत्व समझे-बुझे जाते थे और हमें विश्वास है कि हम अभी तक इतने अयोग्य नहीं हो गये कि अपने पूर्वजों के उन गुणों को बिल्कुल ही खो बैठे हों। अपनी बात के प्रमाणस्वरूप हम बड़ौदा, मैसूर, ग्वालियर, कोचीन, ट्रावनकोर आदि देशी राज्यों की ओर संकेत कर सकते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि स्वराज्य आंदोलन के लिए यह ठीक समय नहीं, युद्ध के पश्चात् जो चाहे सो करना और कुछ हमारे शांतिप्रिय भाई भी तेज चाल से घबड़ाते हैं। वे फूँक-फूँक कर और गिन-गिन कर कदम रखने के कायल हैं और वैसा ही करने की सलाहें देते हैं, नहीं तो उनकी भविष्यवाणी है कि ठोकर खाओगे और गिर पड़ोगे। स्वराज्य आंदोलन अंग्रेजी सत्ता की जड़ उखाड़ फेंकने वाला नहीं है, इसलिए वह युद्ध के समय भी हो सकता है और उसका इस समय करना इसलिए और भी आवश्यक है कि कहीं युद्ध के पश्चात् भारतवर्ष इंग्लैंड के सिवा अंग्रेजी उपनिवेशों की मातहती में न दे दिया जाये, जैसा कि एक बार चर्चा चल चुकी है। भारतवर्ष इस बात में अपना अपमान समझता है और इसलिए इस आंदोलन द्वारा उसके बच्चे यह सीखना चाहते हैं कि भारतवर्ष उपनिवेशों का सेवक कभी न होगा, वह उनकी बराबरी का बनेगा। फूँक-फूँक कर कदम रखने की सलाह व्यर्थ है। स्वराज्यवादी बगावत नहीं करता और यदि उसकी साधारण तेज-कदमी उसके सामने कुछ क्षणिक विपत्तियाँ ला देती है, तो क्या हर्ज़ है, बिना विपत्तियों के कोई बड़ा काम नहीं होता। मंद गति वालों ने वर्षों की याचना के पश्चात् कोई भी संपदा प्राप्त नहीं की है और इसलिए उनकी सलाह कैसे मूल्यवान समझी जाय? बोलने पर हम अपराधी समझे जाते हैं, पर न बोलने पर हम मातृभूमि के बंधनों की वृद्धि कर पाप के भागी बनते हैं, क्योंकि समय पड़ने पर हमारा अधिकारी वर्ग अपने सुशासन का बखान करता हुआ कहेगा कि भारत अत्यंत संतुष्ट है, उसे कुछ भी न चाहिए और यह सब हमारे सुशासन से!
हम स्वराज्य-पथ में पग रखकर एक बड़े भारी काम को आरंभ कर रहे हैं। यह परमावश्यक है कि हम अपने काम का निश्चित रूप का सदा ध्यान रखें, अन्यथा पथ से भटकाने वाले लोग हमारे उद्देश्य की अस्पष्टता से लाभ उठायेंगे और उसके उलटे-सीधे अर्थ निकाल कर हमारे दल को गहरा धक्का मारने का यत्न करेंगे। स्वराज्य से हमारा यह मतलब नहीं है कि हम अपने देश से अंग्रेजों को निकाल देना चाहते हैं या हम अंग्रेजी सत्ता को मिटाने के लिए तैयार हैं। हम स्वराज्यवादी सम्राट जार्ज की वैसी ही नम्र और सच्ची प्रजा हैं, जैसे कि इंग्लैंड में उत्पन्न एक अंग्रेज, परंतु अपने देश के कल्याण की दृष्टि से, अपने देशवासियों के गुणों के विकास और उनके पथ की रुकावटों को दूर करने के लिए हम इस बात को परमावश्यक समझते हैं कि देश के वर्तमान शासन में गहरा परिवर्तन हो और देशवासियों को देश के भीतरी मामलों में बिल्कुल स्वाधीनता प्राप्त हो। देश वालों को अधिकार मिलने से अंग्रेजों का अधकार बल कम अवश्य हो जायेगा, परंतु कहीं भी यह डर होना ही न चाहिए कि स्वराज्य से उनके लिए देश में कोई स्थान ही न रहेगा, क्योंकि महारानी विक्टोरिया के शब्दों के अनुसार तब इस देश में रंग, धर्म, जाति के भेद बिना, केवल योग्यता ही की दृष्टि से सबको देश के शासन में भाग मिलेगा।
देश के लिए स्वराज्य प्राप्त करना अत्यंत कठिन काम है। देश के युवको! तुम्हें इस महान कार्य के लिए तैयार होना चाहिए। मार्ग में बड़े-बड़े कष्टों का सामना करना पड़ेगा, परंतु मातृभूमि के कल्याण के नाम पर तुम अपने उद्देश्य से कभी दृष्टि हटाने का विचार भी मत करो। अपना परम सौभाग्य समझो कि तुम ऐसे समय में उत्पन्न हुए हो, जबकि माता को तुम्हारी सेवा की परमावश्यकता है। कठिन समय की सेवा हृदय को विकसित करेगी और तुम्हारा विपत्तियों पर न्योछावर हो जाना एक ऐसे महावृक्ष के जन्म का पूर्वसंदेश होगा, जिसे नीचे आगामी भारतीय संतानें खड़ी होकर गदगद हृदय से तुम्हारा नाम लेंगी। महान कार्य अपने कर्ता को संयमी होने का संदेश भेजते हैं और देश के युवको, यह संदेश तुम्हाने सामने है। अपनी इच्छाओं को वश में करो और शरीर को सुदृढ़ बनाओ। ईर्ष्या और द्वेष को छोड़कर उदारता से लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो जाओ और यदि विरोधी टेढ़ी चालें चलते हैं तो देश के भावी कल्याण के नाम पर तुम उस मार्ग का अवलंबन कदापि मत करो! इतने सचेत रहो कि उन चालों से बच सको, परंतु चालों का उत्तर चालों में मत दो। उद्देश्य पर दृष्टि रखते हुए किसी की भृकुटि के तनाव से मत डरो और किसी की मुस्कराहट की भी परवाह मत करो। अपने ऊपर विश्वास करो और अपने देश के भविष्य पर विश्वास करो। मत मानो कि तुम अयोग्य हो, तुम भीरु हो और तुम्हारा देश इसी दशा में शताब्दियों तक पड़ा रहेगा। मत मानो कि कुरीतियों के आगार हैं और तुम्हें असंभव कायाकल्प की आवश्यकता है। भुलावा देने के लिए हमारे 'हितैषी' बहुधा ऐसी बातें कहा करते हैं। कौन-सा देश ऐसा है, जिसमें कुरीतियाँ नहीं है या जिसमें किसी विषय में अयोग्यता न हो! आम सुधार से दृष्टि हटा लेने की आवश्यकता नहीं, परंतु अधिकार प्राप्त होने पर ही देश की कुरीतियाँ और अयोग्यता, आजकल के प्रयत्नों की अपेक्षा, शीघ्र दूर हो सकेंगी और सांसरिक अधिकारों की प्राप्ति का स्वराज्य ही एक ऐसा साधन है। इसलिए स्वराज्य के नाम पर की गयी घोषणा देश की कुटी-कुटी तक में कर दे! जागृति की ज्योति देश में सब कहीं पहुँच जाये और राष्ट्र-जीवन-भास्कर के प्रकाश में हम देखें कि हमारी भूमि पर स्वाधीनता का राज्य है और हम उतने ही स्वाधीन हैं, जितना एक अंग्रेज इंग्लैंड में। हमारे ही आदमी देश के शासक और कानून के रचने वाले हैं। स्वाधीन व्यक्ति की तरह हम हथियार बाँध सकते हैं और सेनाएँ रख सकते हैं और टैक्स लगा सकते हैं और देशी व्यापार की रक्षा कर सकते हैं-संक्षेप में साम्राज्य के अंतर्गत बिल्कुल एक स्वाधीन राष्ट्र की भाँति विचार कर सकते हैं। परमात्मा करे, हममें उद्योग की तीव्र स्फूर्ति बढ़े और वह हमें स्वराज्य-दिवस शीघ्र दिखावे।
- 'स्वराज्य की आकांक्षा' नामक लेख
गणेश शंकर विद्यार्थी पर अन्य महापुरुषों के विचार
[सम्पादित करें]- उनके उग्र लेख देखकर मैं कभी-कभी कांप उठता था। -- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था।
- 'प्रताप' के लिए पत्रकारिता व्यवसायपरक नहीं लोक-कल्याणार्थ थी। इसीलिए आर्थिक प्रलोभनों से मुक्त रहते हुए अन्याय-अत्याचार के खिलाफ सब तरह के बलिदान के लिए वह तैयार रहा। फलत: कई रियासतों में उस पर प्रतिबंध लगे, तरह- तरह की धमकियां दी गईं और मुकदमे भी चले। साथ ही अर्थ प्रलोभन भी उसके सामने आए। पर वह बिना झुके और बगैर प्रलोभन में आए अपने रास्ते चलता रहा; यहां तक कि उन लोगों पर हुए अन्याय के विरुद्ध भी उसने अपनी आवाज उठाई जिनके अन्याय के खिलाफ वह लड़ रहा था और खुद जिनके अन्याय का शिकार था। -- प्रसिद्ध पत्रकार रहे मुकुटबिहारी वर्मा, गणेश शंकर विद्यार्थी जी की गौरवपूर्ण राष्ट्रपरक विशद् विचार दृष्टि पर
- आज उस दीनबंधु के लिए किसान रो रहे हैं। कौन उनकी उद्गार-ज्वाला को शांत करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा? मजदूर पछता रहे हैं, कौन उन पीड़ितों का संगठन करेगा, मवेशीखाने से भी बदतर देशी राज्यों के निवासी अश्रुपात कर रहे हैं, कौन उनका दुखड़ा सुनेगा और सुनाएगा? राजनीतिक कार्यकता रो रहे हैं, कौन उन्हें आश्रय देकर स्वयं आफत में फंसेगा? कौन उनके कंधे से कंधा मिलाकर स्वातंत्र्य संग्राम में चलेगा? और एक कोने में पड़े हुए उनके पत्रकार बंधु भी अपने को निराश्रित पाकर चुपचाप चार आंसू बहा रहे हैं। आपातकाल में कौन उन्हें सहारा देगा, किससे वे दिल खोलकर बात कहेंगे, किसे वे अपना बड़ा भाई समझेंगे, और कौन छुटभइयों का इतना खयाल करेगा? -- ( विद्यार्थी जी की हत्या के बाद एक श्रद्धांजलि सभा में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी)
- कठिनाइयों में उन दिनों संकटों की अपेक्षा संन्यास अधिक यशस्वी होता था। गणेश जी ने इस प्रवाह को सीधा संकटों की ओर घुमा दिया। जमानतें, तलाशियां, मुकदमे, सजा-दंड देकर शासक सुखी होते, दंड पाकर गणेश गर्वीले होते क्योंकि गणेश जी संकटों में चाहे जो सोचते, किंतु सहस्र-सहस्र हिंदी भाषी, गणेश जी और 'प्रताप' के संकटों के साथ सोचते और सेवा के लिए प्रस्तुत रहते। पत्रकार-कला के हिंदी स्वरूप के 'प्रताप' नामक राष्ट्र मंच से गणेशी जी ने कायरों को, देश-घातकों को, महलों को, मुकुटों को, अत्याचारियों को और स्वार्थियों को लगातार चुनौतियां दीं और परिणाम में तलाशियां, अपमान, अर्थ हानि और कारागर सहे। -- (गणेश शंकर विद्यार्थी जी के अनन्य सहयोगी-मित्र दादा माखनलाल चतुर्वेदी, 'कर्मवीर' में 28 मार्च 1935 को उनका स्मरण करते हुए)
- उनकी मृत्यु एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए हुई है कि ऐसी मृत्यु से मुझे ईर्ष्या हो रही है। ऐसी मौत तो बहुत ही गर्व की बात है और मुझे भी ऐसी ही मौत मिले। -- गणेश शंकर विद्यार्थी के बलिदान पर गांधीजी का वक्तव्य