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क्षत्रचूडामणि

विकिसूक्ति से

'आचार्य वादीभसिंह' कृत ‘क्षत्रचूड़ामणि ग्रन्थ’ से संकलित

सम्पादक एवं अनुवादक- यशपाल जैन, जयपुर

  • अकुतोभीतिता भूमेर्भूपानामाज्ञयान्यथा ॥३/४२॥
राजाओं की आज्ञा से भूमण्डल पर कहीं से भी भय नहीं रहता।
  • अदोषोपहतोऽप्यर्थ: परोक्त्वा नैव दूष्यते ॥४/४६॥
निर्दोष पदार्थ किसी के कहने से ही दूषित नहीं हो जाता।
  • गुरुरेव हि देवता ॥१/१११॥
गुरु ही देवता है।
  • गुरुरेव हि देवता ॥१/१११॥
गुरु ही देवता है।
  • गुरुस्नेहो हि कामसूः ॥२/२॥
गुरु का प्रेम इच्छाओं को पूरा करनेवाला होता है।
  • चतुराणां स्वकार्योक्तिः स्वन्मुखान्न हि वर्तते ॥८/२३॥
चतुर पुरुष अपने अन्तरंग का अभिप्राय दूसरे के बहाने से ही प्रकट करते हैं।
  • चित्रं जैनी तपस्या हि स्वैराचारविरोधिनी ॥२/१५॥
जैनी तपस्या स्वेच्छाचार की विरोधी है।
  • चिरकाड्ंक्षितलाभे हि तृप्ति: स्यादतिशायिनी ॥११/१॥
चिरकांक्षित वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर अत्यधिक प्रसन्नता होती है।
  • चिरकाङ्गितसम्प्राप्त्या प्रसीदन्ति हि देहिनः ॥८/६८॥
चिरकाल से चाही हुई वस्तु के मिल जाने पर मनुष्य आनन्दित होते ही हैं।
  • चिरस्थाय्यन्धकारोऽपि प्रकाशे हि विनश्यति ॥११/७३॥
चिरकाल से व्याप्त अन्धकार भी प्रकाश के होने पर नष्ट हो जाता है।
  • जठरे सारमेयस्य सर्पिषो न हि सञ्जनम् ॥७/६०॥
कुत्ते के पेट में घी नहीं ठहरता।
  • जन्मान्तरानुबन्धौ हि रागद्वेषौन नश्यतः ॥९/३२॥
जन्म-जन्मान्तर से जीव के साथ सम्बन्ध रखनेवाले राग-द्वेष के परिणाम सहज नष्ट नहीं होते।
  • जलबुदबुद्नित्यत्वे चित्रीया न हि तत्क्षये ॥१/५९॥
पानी के बुलबुलों के देर तक ठहरने में आश्चर्य है, उनकेनाश होने में नहीं।
  • अदृष्टपूर्वदृष्टौ हि प्रायेणोत्कण्ठते मनः॥७/६२॥
मनुष्य का मन पहले नहीं देखी हुई वस्तु को देखने में प्रायः उत्कण्ठित रहता है।
  • जीवितात्तु पराधीनाज्जीवानांमरणं वरम् ॥१/४०॥
पराधीन रहकर जीवन जीने की अपेक्षा मरण ही श्रेष्ठ है।
  • जीवानां जननीस्नेहो न हान्यैः प्रतिहन्यते ॥८/४८॥
जीवों का मातृ-प्रेम किन्हीं भी कारणों से नष्ट नहीं होता।
  • तत्तन्मात्रकृतोत्साहैः साध्यते हि समीहितम् ॥७/६४॥
उत्साही तथा चतुर लोग अपना इच्छित कार्य सिद्ध कर लेते हैं।
  • तत्त्वज्ञानतिरोभावे रागादि हि निरङ्कुशम् ॥८/५३॥
तत्त्वज्ञान का तिरोभाव होने पर राग-द्वेषादि निरंकुश हो जाते हैं।
  • तत्वज्ञानजलं नो चेत् क्रोधाम्नि: केन शाम्यति ॥५/९॥
यदि तत्त्वज्ञानरूपी जल न हो तो क्रोधरूपी अग्नि किससे बुझेगी ?
  • तत्त्वज्ञानविहीनानां दुःखमेव हि शाश्वतम् ॥६/२॥
तत्त्वज्ञान से रहित जीवों का दु:ख शाश्वत होता है।
  • तत्त्वज्ञानं हि जागर्ति विदुषामार्तिसम्भवे ॥१/५७॥
पीड़ा होने पर भी विद्वानों का तत्त्वज्ञान स्थिर ही रहता है।
  • तत्त्वज्ञानं हि जीवानां लोकद्वयसुखावहम् ॥३/१८॥
तत्त्वज्ञान इहलोक और परलोक में जीवों के लिए सुख देनेवाला है।
  • तन्तवो न हि लूताया: कूपपातनिरोधिनः ॥१०/४८॥
मकड़ी के जाल के तन्तु कुएँ में गिरते हुए प्राणी को नहीं बचा सकते।
  • तप्यध्वं तत्तपो यूयं किं मुधा तुषखण्डनैः ॥६/२४॥
तुम सब सर्वज्ञ प्रणीत तप तपो, व्यर्थ में भूसा कूटने से क्या लाभ ?
  • अन्यैरशङ्कनीया हि वृत्तिर्नीतिज्ञगोचरा: ।९/१०॥
नीतिज्ञ लोगों के व्यवहार में दूसरों को शंका नहीं होती ।
  • तमो ह्यभेद्यं खद्योतैर्भानुना तु विभिद्यते ॥२/७१॥
जो अन्धकार जुगनुओं के लिए अभेद्य है, उसे सूर्य द्वारा नष्ट कर दिया जाता है।
  • तीरस्था: खलु जीवन्ति न हि रागाब्धिगाहिनः ॥८/१॥
रागरूपी समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग जीवित रहते हैं, उसमें गोते लगानेवाले नहीं।
  • दग्धभूम्युप्तबीजस्य न हाङ्कुरसमर्थता ॥१/६२॥
जली हुई भूमि में बोये गये बीज में अंकुर पैदा करने की सामर्थ्य नहीं होती।
  • दानपूजातप:शीलशालिनां किं न सिध्यति ॥१०/१९॥
दान, पूजा, तप और शील से सम्पन्न मनुष्य को क्या सिद्ध नहीं होता?
  • दीपनाशे तमोराशि: किमाह्वानमपेक्षते ॥१/५८॥
दीपक बुझ जाने पर अन्धकार का समूह क्या निमन्त्रणकी अपेक्षा रखता है?
  • दुःखचिंता हि तत्क्षणे ॥१/३२॥
दुःख की चिन्ता दु:ख के समय ही रहती है।
  • दुखस्यानन्तरं सौख्यं ततो दुःखं हि देहिनाम् ॥४/३६॥
l प्राणियों को दु:ख के बाद सुख और सुख के बाद दु:ख होता ही रहता है।
  • दुःखस्यानन्तरं सौख्यमतिमात्रं हि देहिनाम् ॥३/३५॥
प्राणियों को दु:ख के बाद का सुख अत्यधिक अच्छा लगता है।
  • दुःखार्थोऽपि सुखार्थो हि तत्त्वज्ञानधने सति ॥३/२१॥
तत्व ज्ञान रूपी धन के होने पर दु:खदायक पदार्थ भी सुख का हेतु होता है।
  • दुर्जनाग्रे हि सौजन्यं कर्दमे पतितं पयः ॥१०/१५॥
दुष्ट मनुष्य के सामने सज्जनता कीचड़ में दूध डालने के समान है।
  • अनवद्या सती विद्या फलमूकापि किं भवेत् ॥९/९॥
निर्दोष और समीचीन विद्या कभी भी निष्फल होती है क्या ?
  • दुर्जनेऽपि हि सौजन्यं सुजनैर्यदि सङ्गम: ।१०/१२॥
यदि सज्जनों की संगति होवे तो दुर्जन में भी सज्जनता आ जाती है।
  • दुर्बला हि बलिष्ठेन बाध्यन्ते हन्त संसृतौ ॥१०/३७॥
खेद है ! संसार में बलवान जीव दुर्बल के लिए बाधायें उत्पन्न करता है।
  • दुर्लभो हि वरो लोके योग्य भाग्यसमन्वितः ॥४/४४॥
लोक में भाग्यशाली एवं योग्य वर मिलने अत्यंत दुर्लभ है।
  • दैवतेनापि पूज्यन्ते धार्मिका: किं पुन: परैः ॥५/४१॥
धार्मिक पुरुष देवों के द्वारा भी पूज्य होते हैं; तो दूसरों की बात ही क्या ?
  • दोषं नार्थी हि पश्यति ॥१/५२॥
कार्य की सफलता का इच्छुक मनुष्य दोष को नहीं देखता।
  • धनाशा कस्य न भवेत् ॥३/२॥
धन की इच्छा किसके नहीं होती ?
  • धर्मो हि भुवि कामसू ॥११/७८॥
इस संसार में धर्म सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाला है।
  • धार्मिकाणां शरण्यं हि धार्मिक एव नापरे ॥२/१७॥
धर्मात्माओं के सहायक धर्मात्मा ही होते हैं; अन्य नहीं ।
  • ध्यातेऽपि हि पुरा दुःखे भृशं दु:खायते जनः ॥८/१३॥
पहले भोगे हुए दु:खों के स्मरण मात्र से मनुष्य अत्यधिक दु:खी होता है।
  • ध्यातो गरुड़बोधेन हि हन्ति विषं बक: ॥६/२३॥
गरुड़ मानकर बगुले का ध्यान करने से विष दूर नहीं होता।
  • अनवद्या सती विद्या लोके किं न प्रकाशते ॥४/१९॥
१. लोक में उत्तम एवं निर्दोष विद्या प्रसिद्ध नहीं होती है क्या ?
२. लोक में उत्तम एवं निर्दोष विद्या किसको प्रकाशित नहीं करती ?
  • नटायन्ते हि भूभुजः ॥१/१५॥
राजा नट के समान आचरण करते हैं।
  • न विद्यते हि विद्यायामगम्यं रम्यवस्तुषु ॥७/५५॥
विद्या के होने पर कोई भी सुन्दर वस्तु अलभ्य नहीं है।
  • न विभेति कुतो लोक आजीवनपरिक्षये ॥२/६५॥
आजीविका के साधन छिन जाने पर मनुष्य अत्यन्त भयभीत हो जाता है।
  • न हि कार्यपराचीनैर्मृग्यते भुवि कारणम् ॥६/१५॥
संसार में कार्य से विमुख पुरुष कारण की खोज नहीं करते।
  • , न हि खादापतन्ती चेद्रत्नवृष्टिनिवार्यते ।११/१७॥
यदि आकाश से रत्न वृष्टि हो रही हो तो उसे रोका नहीं जाता।
  • न हि तण्डुलपाकः स्यात्पावकादिपरिक्षये ॥११/६६॥
अग्नि आदिक न होने पर चावलों का पकना नहीं होता।
  • न हि तिष्ठति राजसम् ॥१/५५॥
क्षत्रिय तेज शांत नहीं रह पाता।
  • न हि नादेयतोयेन तोयधेरस्ति विक्रिया ।११/३॥
नदी के जल से समुद्र में विकार नहीं होता।
  • न हि नीचमनोवृत्तिरेकरूपास्थिता भवेत् ॥४/४५॥
नीच मनुष्यों की मनोवृत्ति सदैव एक-सी स्थिर नहीं रहती।
  • न हि प्रसादखेदाभ्यां विक्रियन्ते विवेकिनः ॥८/२५॥
विवेकी पुरुष हर्ष-विषाद से विकार को प्राप्त नहीं होते।
  • अनवद्या हि विद्या स्याल्लोकद्वयफलावहा ॥३/४५॥
निर्दोष विद्या इस लोक और परलोक में उत्तम फल देनेवाली होती है।
  • न हि प्राणवियोगेऽपि प्राज्ञैर्लप्राज्ञैर्लड्ंघ्यं गुरोर्वच: ॥५/१३॥
बुद्धिमान मरण उपस्थित होने पर भी गुरु के वचनों का उल्लंघन नहीं करते।
  • न हि भेद्यं मन: स्त्रिया: ॥ ४/२७॥
स्त्रियों का मन भेद्य नहीं है।
  • न हि मातुः सजीवेन सोढव्या स्याद्दुरासिका ॥८/६१॥
माता की दुखी अवस्था किसी भी सचेतन के लिए सह्य नहीं होती।
  • न हि मुग्धा सतां वाक्यं विश्वसन्ति कदाचन ॥७/२॥
भोले लोग सज्जनों की बात का कभी-कभी विश्वास नहीं करते ।
  • न हि रक्षितुमिच्छन्तो निर्दहन्ति फलद्रुमम् ॥१/२९॥
फल सहित वृक्ष के रक्षक उस वृक्ष को नहीं जलाते।
  • न हि वारणपर्याणं भर्तुं शक्तो वनायुजः ॥७/२०॥
शक्तिशाली घोड़ा हाथी जितना भार ढोने में समर्थ नहीं होता।
  • न हि वारयितुं शक्यं पौरुषेण पुराकृतम् ॥५/११॥
पूर्वकृत दुष्कर्म का पुरुषार्थ से निवारण करना सम्भव नहीं।
  • न हि वेद्यो विपत्क्षण: ॥३/१३॥
आपत्ति का समय अज्ञात होता है।
  • न हि शक्यं पदार्थानां भावनं च विनाशवत् ॥२/४९॥
पदार्थों के विनाश के समान उनका उत्पन्न करना सरल नहीं है।
  • न हि सन्तीह जन्तूनामपाये सति बान्धवाः ॥४/३०॥
दुनिया में आपत्ति आ जाने पर प्राणियों का कोई सहायक नहीं रहता।
  • अनपायादुपायाद्धि वाञ्छिताप्तिर्मनीषिणाम् ॥९/७॥
बुद्धिमानों को इच्छित वस्तु की प्राप्ति अमोघ उपायों से होती है।
  • न हि सोढव्यतां याति तिरश्चां वा तिरस्क्रिया ॥५/२॥
तिर्यञ्चों को भी अपना अपमान सह्य नहीं होता।
  • न हि स्थाल्यादिभिः साध्यमन्नमन्यैरतण्डुलैः ॥६/१८॥
चावल रूप उपादान कारण बिना मात्र बटलोई आदि निमित्त कारणों से साध्यभूत पका चावल प्राप्त नहीं हो सकता।
  • न हि स्ववीर्यगुप्तानां भीति: केसरिणामिव ॥५/३२॥
पराक्रमी सिंह के समान स्वपराक्रम से ही रक्षित पुरुषों को भय नहीं रहता।
  • न ह्यकालकृतं कर्म कार्यनिष्पादनक्षमम् ॥४/२३॥
असमय में किया गया परिश्रम कार्यकारी नहीं होता।
  • न ह्यङ्गलिरसाहाय्या स्वयं शब्दायतेतराम् ।१/६४॥
एक ही उंगली से चुटकी नहीं बजती॥
  • न ह्यत्र रोचते न्यायमीर्ष्यादूषितचेतसे ॥४/२५॥
ईर्ष्या से मलिन चित्तवाले व्यक्ति को सच्ची बात भी अच्छी नहीं लगती।
  • न ह्यनिष्टेष्टसंयोगवियोगाभमरुन्तुदम् ॥४/२८॥
अनिष्ट के संयोग और इष्ट के वियोग के समान और कोई पीड़ा देनेवाला नहीं।
  • न ह्यमन्त्रं विनिश्चेयं निश्चिते च न मन्त्रणम् ॥१०/१०॥
बिना विचार किये कोई भी कार्य निश्चित नहीं करना चाहिए तथा निश्चित हो जाने पर पुनः विचार नहीं करना चाहिए।
  • न ह्ययोग्ये स्पृहा सताम् ॥२/७४॥
सज्जन पुरुष की इच्छा अनुचित पदार्थ में नहीं होती।
  • न ह्यारोढुमधिश्रेणिं यौगपद्येन पार्यते ॥७/२१॥
ऊँची नसैनी पर एक ही साथ चढ़ने में कोई समर्थ नहीं है।
  • अनुनयो हि माहात्म्यं महतामुपबृंहयेत् ॥८/५२॥
विनय भाव महापुरुषों की महानता को बढ़ाता है।
  • न ह्मासक्त्या तु सापेक्षो भानु: पद्मविकासने ॥१०/४४॥
सूर्य कमलों को खिलाने के बाद अनासक्ति से अस्पताल की ओर जाता है।
  • न ह्यसत्यं सतां वचः ॥९/१६॥
सज्जनों के वचन असत्य नहीं होते।
  • न ह्यस्थानेऽपि रुट् सताम् ॥१०/५५॥
सज्जनों का क्रोध अनुचित स्थान में नहीं होता।
  • नादाने किन्तु दाने हि सतां तुष्यति मानसम् ॥७/३०॥
सज्जन पुरुष दान देने में प्रसन्न होते हैं, लेने में नहीं।
  • निरङ्कुशं हि जीवानामैहिकोपायचिन्तनम् ॥३/३॥
मनुष्यों के इस लोक सम्बन्धी आजीविका के उपाय का चिन्तन निराबाध ही हो जाता है।
  • निर्गमे चाप्रवेशे च धाराबन्धे कुतो जलम् ॥११/६४॥
सरोवर में से संचित जल के निकल जाने पर और नवीन जल के नहीं आने पर उसमें पानी कैसे रह सकता है?
  • निर्वाणपथपान्थानां पाथेयं तद्धि किं परैः ॥४/८॥
अधिक क्या कहें ! णमोकार मन्त्र मुक्तिपथ के पथिकों के लिए कलेवा है।
  • निर्विवादविधिननिर्विवादविधिर्नो चेन्नैपुण्यं नाम किं भवेत्॥४/२२॥
यदि निर्विवाद युक्ति न हो तो निपुणता किस बात की ?
  • निर्व्याजं सानुकम्पा हि सर्वाः सर्वेषु जन्तुषु ॥६/८॥
सर्वहितैषी सज्जन पुरुष समस्त प्राणियों पर निष्कपट दया करते हैं।
  • निश्चलादविसंवादाद्वस्तुनो हि विनिश्चयः ॥१/९४॥
निश्चल और विवादरहित वचनों से वस्तु का निश्चय होता है।
  • अनुरागकृदज्ञानां वशिनां हि विरक्तये ॥७/३६॥
मूर्खो को प्रिय लगनेवाली वस्तु जितेन्द्रिय पुरुषों को विराग के लिए होती है।
  • निष्प्रत्यूहा हि सामग्री नियतं कार्यकारिणी ॥२/५८॥
बाधारहित कारण-सामग्री नियम से कार्य को पूरा करनेवाली होती है।
  • निसर्गादिङ्गितज्ञानमङ्गनासु हि जायते ॥७/४४॥
शरीर की चेष्टा से मन के विचारों को जानने का इंगित/संकेत ज्ञान स्त्रियों में स्वभाव से ही होता है।
  • नि:स्पृहत्वं तु सौख्यम् ॥११/६७॥
इच्छा का अभाव ही सुख है।
  • निर्हेतुकान्यरक्षा हि सतां नैसर्गिको गुण: ॥५/४३॥
बिना कारण ही दूसरों की रक्षा करना सज्जन पुरुषों का स्वभाविक गुण है।
  • नीचत्वं नाम किं नु स्यादस्ति चेद् गुणगारिता॥५/५॥
यदि दूसरों के गुणों में प्रीति हो तो नीचता कैसे टिके ?
  • नैसर्गिकं हि नारीणां चेत: सम्मोहि चेष्टितम् ॥८/४॥
स्त्रियों की चेष्टाएँ स्वभाव से ही चित्त को मोहित करनेवाली होती हैं।
  • नो चेद्विवेकनीरौघो रागाग्रि: केन शाम्यति ॥४/३७॥
यदि विवेकरूपी जल-समूह न हो तो राग रूपी अग्नि कैसे शान्त होगी ?
  • पतन्तः स्वयमन्येषां न हि हस्तावलम्बनम् ॥६/२५॥
स्वयं गिरते हुए लोग दूसरों का सहारा नहीं हो सकते ।
  • प्रगन पय: पीतं विषस्यैव हि वर्धनम् ॥५/६॥
सर्प को पिलाया गया दूध विष की ही वृद्धि करता है।
  • पम्फुलीति हि निर्वेगो भव्यानां कालपाकतः ॥२/९॥
काल पक जाने पर भव्य जीवों को विशेषरूप से वैराग्य प्रकट होता है।
  • अनुसारप्रियो न स्यात्को वा लोके सचेतनः ॥७/७२॥
दुनिया में कौन प्राणी अपने अनुकूल व्यक्ति से प्रेम नहीं करता ?
  • पयो ह्यास्यगतं शक्यं पाननिष्ठीवनद्वये ।१/५४॥
मुँह में रखे हुए दूध अथवा जल की परिणति थूकने या पीने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हो सकती।
  • परस्परातिशायी हि मोहः पञ्चन्द्रियोद्भवः ॥९/२३॥
पाँचो इन्द्रियों के निमित्त से होनेवाला मोह एक-दूसरे की अपेक्षा अधिक होता है।
  • पराभवो न हि सोढव्योऽशक्तैः शक्तैस्तु किं पुनः॥८/२९॥
अपने तिरस्कार को असमर्थ जन भी सहन नहीं कर पाते तो फिर समर्थ पुरुष कैसे सहन करेंगे ?
  • पाके हि पुण्यपापानां भवेद्बाह्यं च कारणम् ॥११/१४॥
पाप और पुण्य के उदय आने में कोई न कोई बाह्य निमित्त कारण अवश्य मिल जाता है।
  • पाण्डित्यं हि पदार्थानां गुणदोषविनिश्चय: ॥४/२०॥
पदार्थों के गुण और दोषों का निर्णय करना पाण्डित्य है।
  • पाणौ कृतेन दीपेन किं कूपे पततां फलम् ।२/४५॥
हाथ में दीपक होने पर भी कुएँ में गिरनेवाले व्यक्ति को दीपक से क्या लाभ?
  • पात्रतां नीतमात्मानं स्वयं यान्ति हि संपदः ॥५/४८॥
सम्पत्ति स्वयं ही योग्य पुरुषों के पास जाती है।
  • पापात् बिभेति पण्डितः ॥१/८७॥
विद्वानों को पाप से डरना चाहिए।
  • पावका न हि पात: सादातपक्लेशशान्तये ॥१/३०॥
गर्मी से होनेवाले दु:ख को दूर करने के लिए अग्नि में कूदना उपाय नहीं है।
  • पावनानि हि जायन्ते स्थानान्यपि सदाश्रयात् ॥६/४॥
सत्पुरुषों के आश्रय से स्थान भी पवित्र हो जाते हैं।
  • अङ्गजायां हि सूत्यायामयोग्यं कालयापनम् ॥३/३८॥
कन्या के जवान हो जाने पर विवाह के बिना काल बिताना अनुचित है।
  • अन्तस्तत्त्वस्य याथात्म्ये न हि वेषो नियामकः ॥९/२१॥
बाह्य वेश अन्तर्मन की यथार्थता का नियामक नहीं है।
  • पित्तज्वरवत: क्षीरं तिक्तमेव हि भासते ॥१/५१॥
पित्तज्वरवाले मनुष्य को मीठा दूध कड़वा ही लगता है।
  • पीडायां तु भृशं जीवा अपेक्षन्ते हि रक्षकान् ॥८/२७॥
कष्ट/पीड़ा होने पर ही लोग रक्षकों की अपेक्षा करते हैं।
  • पीडायां तु भृशं जीवा अपेक्षन्ते हि रक्षकान् ॥८/२७॥
कष्ट/पीड़ा होने पर ही लोग रक्षकों की अपेक्षा करते हैं।
  • पीडा ह्यभिनवा नृणां प्रायो वैराग्यकारणम् ॥१/७१॥
नई पीड़ा प्राय: मनुष्यों के वैराग्य का कारण बनती है।
  • पीडा ह्यभिनवा नृणां प्रायो वैराग्यकारणम् ॥१/७१॥
नई पीड़ा प्राय: मनुष्यों के वैराग्य का कारण बनती है।
  • पुत्रमात्रं मुदे पित्रोविद्यापात्रं तु किं पुनः ॥७/७८॥
माता-पिता को पुत्र ही हर्ष का कारण होता है, फिर विद्वान पुत्र का तो कहना ही क्या?
  • पुत्रमात्रं मुदे पित्रोविद्यापात्रं तु किं पुनः ॥७/७८॥
माता-पिता को पुत्र ही हर्ष का कारण होता है, फिर विद्वान पुत्र का तो कहना ही क्या?
  • पुण्ये किंवा दुरासदम् ।१/८९॥
पुण्योदय होने पर क्या दुर्लभ है ?
  • पुण्ये किंवा दुरासदम् ।१/८९॥
पुण्योदय होने पर क्या दुर्लभ है ?
  • पूज्यत्वं नाम किम् नु स्यात्पूज्यपूजाव्यतिक्रमे ॥५/४५॥
पुज्य पुरूषों की पूजा का उल्लंघन होने पर पूज्यपना कैसे रह सकता है?
  • पूज्यत्वं नाम किम् नु स्यात्पूज्यपूजाव्यतिक्रमे ॥५/४५॥
पुज्य पुरूषों की पूजा का उल्लंघन होने पर पूज्यपना कैसे रह सकता है?
  • प्रकृत्या स्यादकृत्ये धीर्दु:शिक्षायां तु किं पुनः ।३/५०॥
बुद्धि स्वभाव से ही खोटे कार्यों में प्रवृत्त होती है; फिर खोटी शिक्षा मिलने पर तो उसका कहना ही क्या?
  • प्रकृत्या स्यादकृत्ये धीर्दु:शिक्षायां तु किं पुनः ।३/५०॥
बुद्धि स्वभाव से ही खोटे कार्यों में प्रवृत्त होती है; फिर खोटी शिक्षा मिलने पर तो उसका कहना ही क्या?
  • प्रजानां जन्मवर्जं हि सर्वत्र पितरौ नृपाः ॥११/४॥
जन्म देने के अलावा सर्वत्र राजा ही प्रजा के माता-पिता हैं।
  • प्रजानां जन्मवर्जं हि सर्वत्र पितरौ नृपाः ॥११/४॥
जन्म देने के अलावा सर्वत्र राजा ही प्रजा के माता-पिता हैं।
  • प्रतारणविधौ स्त्रीणां बहुद्वारा हि दुर्मति: ॥७/४५॥
स्त्रियों की खोटी बुद्धि दूसरों को ठगने में अनेक प्रकार से चलती है।
  • प्रतारणविधौ स्त्रीणां बहुद्वारा हि दुर्मति: ॥७/४५॥
स्त्रियों की खोटी बुद्धि दूसरों को ठगने में अनेक प्रकार से चलती है।
  • प्रतिकर्तुं कथं नेच्छेदुपकर्तुः सचेतनः ॥४/१४॥
सचेतन प्राणी उपकार करनेवाले के प्रति प्रत्युपकार करने की भावना क्यों नहीं रखेगा?
  • प्रतिकर्तुं कथं नेच्छेदुपकर्तुः सचेतनः ॥४/१४॥
सचेतन प्राणी उपकार करनेवाले के प्रति प्रत्युपकार करने की भावना क्यों नहीं रखेगा?
  • अन्यरोधि न हि क्वापि वर्तते वशिनां मनः ॥९/२॥
जितेन्द्रिय पुरुषों का मन/विचार दूसरों से रुकने वाला नहीं होता।
  • प्रतिहन्तुं न हि प्राज्ञै: प्रारब्धं पार्यते परैः ॥६/३॥
बुद्धिमानों द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य दूसरों द्वारा रोका जाना सम्भव नहीं है।
  • प्रतिहन्तुं न हि प्राज्ञै: प्रारब्धं पार्यते परैः ॥६/३॥
बुद्धिमानों द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य दूसरों द्वारा रोका जाना सम्भव नहीं है।
  • प्रत्यक्षे च परोक्षे च सन्तो हि समवृत्तिका: ॥७/३२॥
सज्जन पुरुष सामने और पीछे समान व्यवहार करते हैं ।
  • प्रत्यक्षे च परोक्षे च सन्तो हि समवृत्तिका: ॥७/३२॥
सज्जन पुरुष सामने और पीछे समान व्यवहार करते हैं ।
  • प्रदीपैर्दीपिते देशे न ह्यस्ति तमसो गतिः ॥१/३१॥
दीपकों से प्रकाशित स्थान पर अन्धकार का आगमन ही नहीं होता।
  • प्रदीपैर्दीपिते देशे न ह्यस्ति तमसो गतिः ॥१/३१॥
दीपकों से प्रकाशित स्थान पर अन्धकार का आगमन ही नहीं होता।
  • प्रभूणां प्राभवं नाम प्रणतेष्वेकरूपता॥६/३९॥
विनयशील जनों के प्रति समान व्यवहार करना महापुरुषों की महानता है।
  • प्रभूणां प्राभवं नाम प्रणतेष्वेकरूपता॥६/३९॥
विनयशील जनों के प्रति समान व्यवहार करना महापुरुषों की महानता है।
  • प्रयत्नेन हि लब्धं स्यात्प्राय: स्नेहस्य कारणम् ॥५/१॥
परिश्रम से प्राप्त वस्तु प्राय: स्नेह का कारण होती है।
  • प्रयत्नेन हि लब्धं स्यात्प्राय: स्नेहस्य कारणम् ॥५/१॥
परिश्रम से प्राप्त वस्तु प्राय: स्नेह का कारण होती है।
  • प्राणप्रदायिनामन्या न ह्यस्ति प्रत्युपक्रिया।५/४४॥
प्राण रक्षा करनेवालों का दूसरा कोई प्रत्युपकार नहीं होता।
  • प्राणप्रदायिनामन्या न ह्यस्ति प्रत्युपक्रिया।५/४४॥
प्राण रक्षा करनेवालों का दूसरा कोई प्रत्युपकार नहीं होता।
  • प्राणप्रयाणवेलायां न हि लोके प्रतिक्रिया ॥२/५७॥
संसार में प्राण निकलने के समय में मृत्यु रोकने का कोई उपाय नहीं होता।
  • प्राणप्रयाणवेलायां न हि लोके प्रतिक्रिया ॥२/५७॥
संसार में प्राण निकलने के समय में मृत्यु रोकने का कोई उपाय नहीं होता।
  • प्राणवत्प्रीतये पुत्रा मृतोत्पन्नास्तु किं पुन: ॥१/९९॥
पुत्र तो प्राणों के समान प्रिय होते हैं, फिर जो मरकर पुनः जीवित हो जाए उसका तो कहना ही क्या ?
  • प्राणवत्प्रीतये पुत्रा मृतोत्पन्नास्तु किं पुन: ॥१/९९॥
पुत्र तो प्राणों के समान प्रिय होते हैं, फिर जो मरकर पुनः जीवित हो जाए उसका तो कहना ही क्या ?
  • प्राणाः पाणिगृहीतीनां प्राणनाथो हि नापरम् ।७/३॥
विवाहिता स्त्रियों के प्रति उनके पति ही होते हैं; और कोई नहीं।
  • प्राणाः पाणिगृहीतीनां प्राणनाथो हि नापरम् ।७/३॥
विवाहिता स्त्रियों के प्रति उनके पति ही होते हैं; और कोई नहीं।
  • प्राणेष्वपि प्रमाणं यत्तद्धि मित्रमितीष्यते ।३/३७॥
जो प्राणों से भी अधिक प्रामाणिक हो, वही सच्चा मित्र है।
  • प्राणेष्वपि प्रमाणं यत्तद्धि मित्रमितीष्यते ।३/३७॥
जो प्राणों से भी अधिक प्रामाणिक हो, वही सच्चा मित्र है।
  • अन्याभ्युदयखिन्नत्वं तद्धि दौर्जन्यलक्षणम् ॥३/४८॥
दूसरे की उन्नति में जलना ही दुर्जनता का लक्षण है।
  • प्रीतये हि सतां लोके स्वोदयाच्च परोदयः ॥६३०॥
सज्जन को अपनी उन्नति से भी दूसरों की उन्नति अधिक आनंददायी होती है।
  • प्रीतये हि सतां लोके स्वोदयाच्च परोदयः ॥६३०॥
सज्जन को अपनी उन्नति से भी दूसरों की उन्नति अधिक आनंददायी होती है।
  • प्रेक्षावन्तो वितन्वन्ति न ह्युपेक्षामपेक्षिते।४/४२॥
बुद्धिमान पुरुष अपेक्षित वस्तु की उपेक्षा नहीं करते।
  • प्रेक्षावन्तो वितन्वन्ति न ह्युपेक्षामपेक्षिते।४/४२॥
बुद्धिमान पुरुष अपेक्षित वस्तु की उपेक्षा नहीं करते।
  • फलमेव हि यच्छन्ति पनसा इन सज्जनाः ॥१०/४२॥
सज्जन मनुष्य कटहल के वृक्ष के समान फल को ही देते हैं।
  • फलमेव हि यच्छन्ति पनसा इन सज्जनाः ॥१०/४२॥
सज्जन मनुष्य कटहल के वृक्ष के समान फल को ही देते हैं।
  • बकायन्ते हि जिष्णवः ॥१०/१६॥
विजय पाने के इच्छुक लोग बगुले के समान आचरण करते हैं।
  • बकायन्ते हि जिष्णवः ॥१०/१६॥
विजय पाने के इच्छुक लोग बगुले के समान आचरण करते हैं।
  • बन्धोर्बन्धौ च बन्धो हि बन्धुता चेदवञ्चिता ॥८/२६॥
यदि निष्कपट बन्धुत्व का भाव हो तो सम्बन्धी के सम्बन्धियों में भी प्रेम हो जाता है।
  • बन्धोर्बन्धौ च बन्धो हि बन्धुता चेदवञ्चिता ॥८/२६॥
यदि निष्कपट बन्धुत्व का भाव हो तो सम्बन्धी के सम्बन्धियों में भी प्रेम हो जाता है।
  • बहुद्वारा हि जीवानां पराराधनदीनता ।९/४॥
प्राणियों दूसरों की सेवा से प्रकट होनेवाली दीनता बहुत प्रकार की होती है।
  • बहुद्वारा हि जीवानां पराराधनदीनता ।९/४॥
प्राणियों दूसरों की सेवा से प्रकट होनेवाली दीनता बहुत प्रकार की होती है।
  • , बहुयत्नोपलब्धस्य प्रच्यवो हि दुरुत्सहः ॥७/४॥
बहुत प्रयत्न पूर्वक प्राप्त हुई वस्तु का वियोग असह्य होता है
  • , बहुयत्नोपलब्धस्य प्रच्यवो हि दुरुत्सहः ॥७/४॥
बहुत प्रयत्न पूर्वक प्राप्त हुई वस्तु का वियोग असह्य होता है
  • बहुयत्नोपलब्धे हि प्रेमबन्धो विशिष्यते ॥१०/१॥
दुर्लभता से प्राप्त हुई वस्तु के प्रति विशेष प्रेम हुआ करता है।
  • बहुयत्नोपलब्धे हि प्रेमबन्धो विशिष्यते ॥१०/१॥
दुर्लभता से प्राप्त हुई वस्तु के प्रति विशेष प्रेम हुआ करता है।
  • बुद्धि:कर्मानुसारिणी।१/१९॥
बुद्धि कर्म के अनुसार चलती है।
  • बुद्धि:कर्मानुसारिणी।१/१९॥
बुद्धि कर्म के अनुसार चलती है।
  • भवितव्यानुकूलं हि सकलं कर्म देहिनाम् ।९/२०॥
प्राणियों के समस्त कार्य होनहार के अनुसार होते हैं।
  • भवितव्यानुकूलं हि सकलं कर्म देहिनाम् ।९/२०॥
प्राणियों के समस्त कार्य होनहार के अनुसार होते हैं।
  • अन्तिकं कृतपुण्यानां श्रीरन्विष्य हि गच्छति ॥३/४६॥
लक्ष्मी पुण्यवान पुरुषों को खोजती हुई स्वयं उनके पास चली जाती है।
  • भव्यो वा स्यान्न वा श्रोता पारायँ हि सतां मन: ।६/१०॥
श्रोता भव्य हो अथवा न हो, सज्जनों की भावना सबका उपकार करने की ही होती है।
  • भव्यो वा स्यान्न वा श्रोता पारायँ हि सतां मन: ।६/१०॥
श्रोता भव्य हो अथवा न हो, सज्जनों की भावना सबका उपकार करने की ही होती है।
  • भस्मने दहतो रत्नं मूढ: क: स्यात्परो जन: ॥११/७६॥
राख के लिए रत्न को जलानेवाले व्यक्ति से बढ़कर मूर्ख दसरा कौन है ?
  • भस्मने दहतो रत्नं मूढ: क: स्यात्परो जन: ॥११/७६॥
राख के लिए रत्न को जलानेवाले व्यक्ति से बढ़कर मूर्ख दसरा कौन है ?
  • भस्मने रत्नहारोऽयं पण्डितैर्न हि दहाते ॥११/१८॥
पण्डित लोग राख के लिए रत्नहार को नहीं जलाते ।
  • भस्मने रत्नहारोऽयं पण्डितैर्न हि दहाते ॥११/१८॥
पण्डित लोग राख के लिए रत्नहार को नहीं जलाते ।
  • भागधेयविधेया हि प्राणिनां तु प्रवृत्तयः ॥७/७॥
प्राणियों की प्रवृत्तियाँ भवितव्यानुसार ही होती हैं।
  • भागधेयविधेया हि प्राणिनां तु प्रवृत्तयः ॥७/७॥
प्राणियों की प्रवृत्तियाँ भवितव्यानुसार ही होती हैं।
  • भाग्ये जाग्रति का व्यथा ॥१/१०९॥
भाग्योदय होने पर कौन-सा दु:ख रहता है ?
  • भाग्ये जाग्रति का व्यथा ॥१/१०९॥
भाग्योदय होने पर कौन-सा दु:ख रहता है ?
  • भानुः किं न तमोहर: १०/२६॥
क्या सूर्य अंधकार को नष्ट नहीं कर पाता?
  • भानुः किं न तमोहर: १०/२६॥
क्या सूर्य अंधकार को नष्ट नहीं कर पाता?
  • भानुर्लोकं तपन्कुर्याद्विकासश्रियमम्बुजे ॥५/२५॥
संसार को संतप्त करनेवाला सूर्य कमल की कलियों को खिलाता है।
  • भानुर्लोकं तपन्कुर्याद्विकासश्रियमम्बुजे ॥५/२५॥
संसार को संतप्त करनेवाला सूर्य कमल की कलियों को खिलाता है।
  • भाव्यधीनं हि मानसम् ॥५/२९॥
मन भवितव्य अनुसार होता है।
  • भाव्यधीनं हि मानसम् ॥५/२९॥
मन भवितव्य अनुसार होता है।
  • भ्रातुर्विलोकनं प्रीत्यै विप्रयुक्तस्य किं पुनः ॥८/१०॥
भाई को देखना ही प्रसन्नता का कारण है, फिर बिछुड़े हुए भाई से मिलने पर तो कहना ही क्या ?
  • भ्रातुर्विलोकनं प्रीत्यै विप्रयुक्तस्य किं पुनः ॥८/१०॥
भाई को देखना ही प्रसन्नता का कारण है, फिर बिछुड़े हुए भाई से मिलने पर तो कहना ही क्या ?
  • भेजे शुभनिमित्तेन सनिमित्ता हि भाविन: ।1५/४२॥
भविष्य में होनेवाले उत्तम कार्य शुभ निमित्तपूर्वक होते हैं।
  • भेजे शुभनिमित्तेन सनिमित्ता हि भाविन: ।1५/४२॥
भविष्य में होनेवाले उत्तम कार्य शुभ निमित्तपूर्वक होते हैं।
  • अन्यैरशङ्कनीया हि वृत्तिर्नीतिज्ञगोचरा: ॥९/१०॥
नीतिज्ञ लोगों के व्यवहार में किन्हीं को भी शंका नहीं होती।
  • भेतव्यं खलु भेतव्यं प्राज्ञैरज्ञोचितात्परम् ॥७/४३॥
अज्ञानियों के उचित कार्यों से ज्ञानी मनुष्यों को भयभीत रहना चाहिए।
  • भेतव्यं खलु भेतव्यं प्राज्ञैरज्ञोचितात्परम् ॥७/४३॥
अज्ञानियों के उचित कार्यों से ज्ञानी मनुष्यों को भयभीत रहना चाहिए।
  • भाव्यवश्यं भवेदेव न हि केनापि रुध्यते ।१०/४९॥
भविष्य में जो कुछ होनेवाला है, वह होकर ही रहता है; किसी से भी टाला नहीं जा सकता ।
  • भाव्यवश्यं भवेदेव न हि केनापि रुध्यते ।१०/४९॥
भविष्य में जो कुछ होनेवाला है, वह होकर ही रहता है; किसी से भी टाला नहीं जा सकता ।
  • मत्सराणां हि नोदेति वस्तुयाथात्म्यचिन्तनम् ॥१०/३५॥
ईर्ष्यालु मनुष्यों के वस्तुस्वरूप का विचार नहीं होता।
  • मत्सराणां हि नोदेति वस्तुयाथात्म्यचिन्तनम् ॥१०/३५॥
ईर्ष्यालु मनुष्यों के वस्तुस्वरूप का विचार नहीं होता।
  • मध्ये मध्ये हि चापल्यमामोहादपि योगिनाम् ॥३/२६॥
मोह कर्म रहने तक बीच-बीच में योगियों के परिणामों में भी चंचलता रहती है।
  • मध्ये मध्ये हि चापल्यमामोहादपि योगिनाम् ॥३/२६॥
मोह कर्म रहने तक बीच-बीच में योगियों के परिणामों में भी चंचलता रहती है।
  • मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद्धि पापिनाम् ॥१/४३॥
पापियों के मन में कुछ होता है, वचन में कुछ अन्य तथा वे शरीर से कुछ दूसरा ही कार्य करते हैं।
  • मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद्धि पापिनाम् ॥१/४३॥
पापियों के मन में कुछ होता है, वचन में कुछ अन्य तथा वे शरीर से कुछ दूसरा ही कार्य करते हैं।
  • मनीषितानुकूलं हि प्रीणयेत्प्राणिनां मन: ।९/२९॥
मनोरथ के अनुकूल उपाय को दिखाना ही प्राणियों के मन को प्रसन्न करता है।
  • मनीषितानुकूलं हि प्रीणयेत्प्राणिनां मन: ।९/२९॥
मनोरथ के अनुकूल उपाय को दिखाना ही प्राणियों के मन को प्रसन्न करता है।
  • मनोरथेन तृप्तानां मूललब्धौ तु किं पुनः ॥९/३०॥
मनोरथ से सन्तुष्ट होनेवाले मनुष्यों को यदि मूल पदार्थ मिल जाए तो फिर कहना ही क्या है?
  • मनोरथेन तृप्तानां मूललब्धौ तु किं पुनः ॥९/३०॥
मनोरथ से सन्तुष्ट होनेवाले मनुष्यों को यदि मूल पदार्थ मिल जाए तो फिर कहना ही क्या है?
  • ममत्वधीकृतो मोहः सविशेषो हि देहिनाम् ॥८/६४॥
ममत्व बुद्धि से प्राणियों को मोह अधिक होता है।
  • ममत्वधीकृतो मोहः सविशेषो हि देहिनाम् ॥८/६४॥
ममत्व बुद्धि से प्राणियों को मोह अधिक होता है।
  • मरुत्सखे मसुद्धूते मह्यां किं वा न दह्यते॥१०/३३॥
हवा से प्रज्ज्वलित अग्नि के होने पर पृथ्वी पर कौन-कौनसी वस्तुएँ नहीं जल जाती।
  • मरुत्सखे मसुद्धूते मह्यां किं वा न दह्यते॥१०/३३॥
हवा से प्रज्ज्वलित अग्नि के होने पर पृथ्वी पर कौन-कौनसी वस्तुएँ नहीं जल जाती।
  • महिषैः क्षुभितं तोयं न हि सद्यः प्रसीदति ॥१०/५७॥
भैंसों द्वारा गन्दा किया गया जल शीघ्र स्वच्छ नहीं होता।
  • महिषैः क्षुभितं तोयं न हि सद्यः प्रसीदति ॥१०/५७॥
भैंसों द्वारा गन्दा किया गया जल शीघ्र स्वच्छ नहीं होता।
  • अपथघ्नी हि वाग्गुरोः ॥२/४०॥
गुरु के वचन कुमार्ग के नाशक होते हैं।
  • माणिक्यस्य हि लब्धस्य शुद्धेर्मोदो विशेषतः ॥२/२९॥
प्राप्त हुई मणि की उत्तमता के निर्णय से विशेष हर्ष होता है।
  • माणिक्यस्य हि लब्धस्य शुद्धेर्मोदो विशेषतः ॥२/२९॥
प्राप्त हुई मणि की उत्तमता के निर्णय से विशेष हर्ष होता है।
  • मात्सर्यात्किंन नश्यति ॥४/१७॥
ईर्ष्या भाव से क्या नष्ट नहीं होता?
  • मात्सर्यात्किंन नश्यति ॥४/१७॥
ईर्ष्या भाव से क्या नष्ट नहीं होता?
  • मायामयी हि नारीणां मनोवृत्तिर्निसर्गतः ॥७/४९॥
स्त्रियों की मनोवृत्ति स्वभाव से ही मायामयी होती है।
  • मायामयी हि नारीणां मनोवृत्तिर्निसर्गतः ॥७/४९॥
स्त्रियों की मनोवृत्ति स्वभाव से ही मायामयी होती है।
  • मित्रं धात्रीपतिं लोके कोऽपरः पश्यतः सुखी ॥३/३६॥
संसार में मित्रस्वरूप राजा को देखनेवाले की अपेक्षा दूसरा कौन सुखी हो सकता है ?
  • मित्रं धात्रीपतिं लोके कोऽपरः पश्यतः सुखी ॥३/३६॥
संसार में मित्रस्वरूप राजा को देखनेवाले की अपेक्षा दूसरा कौन सुखी हो सकता है ?
  • मुक्तिद्वारकवाटस्य भेदिना किं न भिद्यते ॥६/३६॥
मोक्ष के द्वार खोलनेवाले के द्वारा किसका भेदन नहीं किया जा सकता ?
  • मुक्तिद्वारकवाटस्य भेदिना किं न भिद्यते ॥६/३६॥
मोक्ष के द्वार खोलनेवाले के द्वारा किसका भेदन नहीं किया जा सकता ?
  • मुक्तिप्रदेन मन्त्रेण देवत्वं न हि दुर्लभम् ॥४/१३॥
मुक्ति-प्रदाता महामंत्र से देवपना प्राप्त होना दुर्लभ नहीं है।
  • मुक्तिप्रदेन मन्त्रेण देवत्वं न हि दुर्लभम् ॥४/१३॥
मुक्ति-प्रदाता महामंत्र से देवपना प्राप्त होना दुर्लभ नहीं है।
  • मुखदानं हि मुख्यानां लघूनामभिषेचनम् ।७/९॥
महापुरुषों का सामान्य व्यक्ति से प्रीतिपूर्वक बोलना उनके राज्याभिषेक के समान होता है।
  • मुखदानं हि मुख्यानां लघूनामभिषेचनम् ।७/९॥
महापुरुषों का सामान्य व्यक्ति से प्रीतिपूर्वक बोलना उनके राज्याभिषेक के समान होता है।
  • मुग्धा: श्रुतविनिश्चेया न हि युक्तिवितर्किण: ।८/५८॥
भोले मनुष्य सुनने से बात का निश्चय करनेवाले होते हैं; तर्क और युक्तियों से विचार करनेवाले नहीं।
  • मुग्धा: श्रुतविनिश्चेया न हि युक्तिवितर्किण: ।८/५८॥
भोले मनुष्य सुनने से बात का निश्चय करनेवाले होते हैं; तर्क और युक्तियों से विचार करनेवाले नहीं।
  • मुग्धेष्वतिविदग्धानां युक्तं हि बलकीर्तनम् ॥८/५७॥
बुद्धिमानों का भोले मनुष्यों के सामने बलादि गुणों की प्रशंसा करना उचित है।
  • मुग्धेष्वतिविदग्धानां युक्तं हि बलकीर्तनम् ॥८/५७॥
बुद्धिमानों का भोले मनुष्यों के सामने बलादि गुणों की प्रशंसा करना उचित है।
  • मूढानां हन्त कोपाग्निरस्थानेऽपि हि वर्धते ॥५/७॥
खेद है कि मूर्ख पुरुषों की क्रोधाग्नि अस्थान में भी बढ़ती है!
  • मूढानां हन्त कोपाग्निरस्थानेऽपि हि वर्धते ॥५/७॥
खेद है कि मूर्ख पुरुषों की क्रोधाग्नि अस्थान में भी बढ़ती है!
  • अपदानमशक्तानामद्भुताय हि जायते ॥७/६५॥
स्वयं के लिए अशक्य कार्य दूसरों द्वारा कर दिया जाना असमर्थ लोगों को आश्चर्य के लिए होता है।
  • अपदानमशक्तानामद्भुताय हि जायते ॥७/६५॥
स्वयं के लिए अशक्य कार्य दूसरों द्वारा कर दिया जाना असमर्थ लोगों को आश्चर्य के लिए होता है।
  • यदशोकः प्रतिक्रिया ॥२/६८॥
शोक नहीं करना ही शोक का प्रतिकार है।
  • यदशोकः प्रतिक्रिया ॥२/६८॥
शोक नहीं करना ही शोक का प्रतिकार है।
  • यदि रत्नेऽपि मालिन्यं न हि तत्कृच्छशोधनम् ॥११/२०॥
रत्न पर आई हुई मलिनता सरलता से दूर करने योग्य होती है।
  • यदि रत्नेऽपि मालिन्यं न हि तत्कृच्छशोधनम् ॥११/२०॥
रत्न पर आई हुई मलिनता सरलता से दूर करने योग्य होती है।
  • याञ्चायां फलमूकायां न हि जीवन्ति मानिनः ॥९/२६॥
याचना निष्फल हो जाने पर अभिमानी लोग जीवित नहीं रहते ।
  • याञ्चायां फलमूकायां न हि जीवन्ति मानिनः ॥९/२६॥
याचना निष्फल हो जाने पर अभिमानी लोग जीवित नहीं रहते ।
  • योग्यकालप्रतीक्षा हि प्रेक्षापूर्वविधायिनः ॥९/२२॥
विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मनुष्य उचित समय की प्रतीक्षा करने वाले होते हैं।
  • योग्यकालप्रतीक्षा हि प्रेक्षापूर्वविधायिनः ॥९/२२॥
विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मनुष्य उचित समय की प्रतीक्षा करने वाले होते हैं।
  • योग्यायोग्यविचारोऽयं रागान्धानां कुतो भवेत् ॥४/३८॥
रागान्ध मनुष्यों को उचित-अनुचित का विचार कहाँ से हो सकता है?
  • योग्यायोग्यविचारोऽयं रागान्धानां कुतो भवेत् ॥४/३८॥
रागान्ध मनुष्यों को उचित-अनुचित का विचार कहाँ से हो सकता है?
  • रक्तेन दूषितं वस्त्र नहि रक्तेन शुध्यति ॥६/१७॥
खून से मलिन हुआ वस्त्र खून से ही धोने पर निर्मल नहीं होता।
  • रक्तेन दूषितं वस्त्र नहि रक्तेन शुध्यति ॥६/१७॥
खून से मलिन हुआ वस्त्र खून से ही धोने पर निर्मल नहीं होता।
  • रागद्वेषादि तेनैव बलिष्ठेन हि बाध्यते ॥८/५०॥
अति बलवान रागादि से ही सामान्य राग-द्वेष आदि बाधित होते हैं।
  • रागद्वेषादि तेनैव बलिष्ठेन हि बाध्यते ॥८/५०॥
अति बलवान रागादि से ही सामान्य राग-द्वेष आदि बाधित होते हैं।
  • रागान्धानां वसन्तो हि बन्धुरग्नेरिवानिल: ।४/२॥
राग से अन्धे पुरुषों के लिए वसन्त ऋतु अग्नि को प्रज्ज्वलित करने में पवन की तरह मित्र है।
  • रागान्धानां वसन्तो हि बन्धुरग्नेरिवानिल: ।४/२॥
राग से अन्धे पुरुषों के लिए वसन्त ऋतु अग्नि को प्रज्ज्वलित करने में पवन की तरह मित्र है।
  • रागान्धे हि न जागर्ति याञ्चादैन्यवितर्कणम् ॥९/२८॥
प्रेम से अन्धे प्राणी में दीनता का विचार भी नहीं रहता।
  • रागान्धे हि न जागर्ति याञ्चादैन्यवितर्कणम् ॥९/२८॥
प्रेम से अन्धे प्राणी में दीनता का विचार भी नहीं रहता।
  • राजवन्ती सती भूमिः कुतो वा न सुखायते ॥१०/५४॥
उत्तम राजा से युक्त भूमि सुख कैसे नहीं देती ?
  • राजवन्ती सती भूमिः कुतो वा न सुखायते ॥१०/५४॥
उत्तम राजा से युक्त भूमि सुख कैसे नहीं देती ?
  • अपदोषानुषङ्गा ही करुणा कृति सम्भवा ॥७/३४॥
विद्वानों की करुणा निर्दोष होती है।
  • अपदोषानुषङ्गा ही करुणा कृति सम्भवा ॥७/३४॥
विद्वानों की करुणा निर्दोष होती है।
  • राज्यभ्रष्टोऽपि तुष्टः स्याल्लब्धप्राणो हि जन्तुक: I३/२०॥
राज्य से भ्रष्ट हो जाने पर भी यदि प्राणों की रक्षा हो जाती है तो मनुष्य आनन्दित होता है।
  • राज्यभ्रष्टोऽपि तुष्टः स्याल्लब्धप्राणो हि जन्तुक: I३/२०॥
राज्य से भ्रष्ट हो जाने पर भी यदि प्राणों की रक्षा हो जाती है तो मनुष्य आनन्दित होता है।
  • रोचते न हि शौण्डाय परपिण्डादिदीनता ॥३/४॥
उद्यमशील मनुष्य के लिए दूसरे से उपार्जित धन द्वारा निर्वाह से उत्पन्न दीनता अच्छी नहीं लगती।
  • रोचते न हि शौण्डाय परपिण्डादिदीनता ॥३/४॥
उद्यमशील मनुष्य के लिए दूसरे से उपार्जित धन द्वारा निर्वाह से उत्पन्न दीनता अच्छी नहीं लगती।
  • लवणाब्धिगतं हि स्यान्नादेयं विफलं जलम् ॥३/१०॥
नदी का मीठा जल भी लवण समुद्र में जाकर बेकार हो जाता है।
  • लवणाब्धिगतं हि स्यान्नादेयं विफलं जलम् ॥३/१०॥
नदी का मीठा जल भी लवण समुद्र में जाकर बेकार हो जाता है।
  • लाभं लाभमभीच्छा स्यान्न हि तृप्तिः कदाचन ।८/५५॥
एक वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर दूसरी वस्तु प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है; सन्तोष कभी भी नहीं होता।
  • लाभं लाभमभीच्छा स्यान्न हि तृप्तिः कदाचन ।८/५५॥
एक वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर दूसरी वस्तु प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है; सन्तोष कभी भी नहीं होता।
  • लोकद्वयहितध्वंसोर्न हि तृष्णारुषोर्भिदा ॥३/२२॥
लोकद्वय सम्बन्धी हित के नाशक तृष्णा और क्रोध में कुछ भी अन्तर नहीं है।
  • लोकद्वयहितध्वंसोर्न हि तृष्णारुषोर्भिदा ॥३/२२॥
लोकद्वय सम्बन्धी हित के नाशक तृष्णा और क्रोध में कुछ भी अन्तर नहीं है।
  • लोकमालोकसात्कुर्वन्न हि विस्मयते रविः ॥६/३७॥
संसार को प्रकाशमय करता हुआ सूर्य गर्वान्वित नहीं होता।
  • लोकमालोकसात्कुर्वन्न हि विस्मयते रविः ॥६/३७॥
संसार को प्रकाशमय करता हुआ सूर्य गर्वान्वित नहीं होता।
  • लोको ह्यभिनवप्रिय:।४/३॥
लोग नई वस्तु से प्रेम करनेवाले होते हैं।
  • वक्त्रं वक्ति ही मानसम् ॥१/२७॥
मुख की आकृति मन के भाव को प्रकट कर देती है।
  • वचनीयाद्धि भीरूत्वं महतां महनीयता॥७/५३॥
निंदाजनक कार्यों में भीरूता होना महापुरुषों की महानता है ।
  • वत्सलेषु च मोहः स्याद्वात्सल्यं हि मनोहरम् ॥८/२॥
स्नेहीजनों पर प्रेमभाव हो ही जाता है, क्योंकि प्रेमभाव मनोहर होता है।
  • अपश्चिमफलं वक्तुं निश्चितं हि हितार्थीनः ॥७/५४॥
दूसरों का हित चाहनेवाले सज्जन पुरुष निश्चित रूप से सर्वोत्तम फलदायक बात (तत्वज्ञान) ही कहना चाहते है।
  • अपश्चिमफलं वक्तुं निश्चितं हि हितार्थीनः ॥७/५४॥
दूसरों का हित चाहनेवाले सज्जन पुरुष निश्चित रूप से सर्वोत्तम फलदायक बात (तत्वज्ञान) ही कहना चाहते है।
  • वत्सलै: सह संवासे वत्सरो हि क्षणायते ॥८/३॥
प्रियजनों के साथ रहने पर वर्ष भी क्षण के समान लगता है।
  • वपुर्वक्ति हि माहात्म्यं दौरात्म्यमपि तद्विदाम् ॥५/४७॥
शरीर के लक्षणों को जाननेवाले शरीर को देखकर ही मनुष्य की सज्जनता और दुर्जनता का निर्णय कर लेते हैं।
  • वपुर्वक्ति हि सुव्यक्तमनुभावमनक्षरम् ॥७/७३॥
शब्दोच्चारण के बिना ही शरीर की बनावट मनुष्य के प्रभाव को बताती है।
  • वशिनां हि मनोवृत्ति: स्थान एव हि जायते ॥८/६६॥
जितेन्द्रिय पुरुषों के मन की प्रवृत्ति उचित स्थान में ही होती है।
  • व्यवस्था हि सतां शैली साहाय्येऽप्यत्र किं पुनः ॥११/८१॥
महापुरुषों की शैली व्यवस्थित होती है, इसमें सहायता मिल जाए तो फिर कहना ही क्या ?
  • वाञ्छितार्थेऽपि कातर्यं वशिनां न हि दृश्यते ॥८/७२॥
जितेन्द्रिय मनुष्य इच्छित पदार्थ को पाने में भी अधीर नहीं होते।
  • वाञ्छिता यदि वाञ्छेयुः ससारैव हि संसृति: ॥९/१॥
जिनको हम चाहते हैं, यदि वे भी हमें चाहें तो संसार भी सारभूत भासित होने लगता है।
  • वार्धिमेव धनार्थी किं गाहते पार्थिवानपि ॥३/११॥
धन का इच्छुक मनुष्य समुद्र की ही यात्रा करता है क्या ? अरे वह तो द्वीप द्वीपान्तरों और राजा-महाराजाओं को भी प्राप्त करता है ।
  • विक्रिया हि विमूढानां सम्पदापल्लवादपि ॥५/३३॥
मूर्ख को ही अत्यल्प संपत्ति और विपत्ति में हर्ष-विषाद हुआ करते हैं।
  • विचाररूढकृत्यानां व्यभिचार: कुतो भवेत्।९/३१॥
विचारपूर्वक कार्य करने वालों के कार्य में हानि कैसे हो सकती है ?
  • अपुष्कला हि विद्या स्यादवज्ञैकफला क्वचित् ॥३/४४॥
अपूर्ण ज्ञान अपमान का फल देनेवाला होता है।
  • अपुष्कला हि विद्या स्यादवज्ञैकफला क्वचित् ॥३/४४॥
अपूर्ण ज्ञान अपमान का फल देनेवाला होता है।
  • विचार्यैवेतरै: कार्यं कार्यं स्यात्कार्यवेदिभिः ॥८/६०॥
कार्यकुशल मनुष्य को दूसरों के साथ विचार करके ही कार्य करना चाहिए।
  • विधित्सिते ह्यनुत्पन्ने विरमन्ति न पण्डिताः ॥१०/६॥
जबतक इच्छित कार्य नहीं होता, तबतक बुद्धिमान पुरुष विराम नहीं लेते।
  • विधिर्घटयतीष्टार्थैः स्वयमेव हि देहिनः ॥७/७१॥
कर्म इष्ट पदार्थों का प्राणियों से सम्बन्ध स्वयमेव करा देता है।
  • विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥२/२६॥
विद्वान सब जगह पूजा जाता है।
  • विद्वेष: पक्षपातश्च प्रतिपात्रं च भिद्यते ॥८/२४॥
प्रत्येक वस्तु सम्बन्धी राग और द्वेषभाव भिन्न-भिन्न होता है।
  • विनय: खलु विद्यानां दोग्ध्री सुरभिरञ्जसा ॥७/७७॥
गुरु की सच्ची विनय विद्याओं को देनेवाली कामधेनु है।
  • विपच्च सम्पदे हि स्याद्भाग्यं यदि पचेलिमम् ॥८/१९॥
यदि पुण्य का उदय हो तो विपत्ति भी सम्पत्ति का कारण बन जाती है।
  • विपदोऽपि हि तद्धीतिर्मूढानां हन्त बाधिका ॥४/२९॥
मूर्ख मनुष्यों को विपत्ति का भय विपत्ति से भी अधिक दुःखदायक होता है।
  • विपदो वीतपुण्यानां तिष्ठन्त्येव हि पृष्ठतः ॥१०/३४॥
पुण्यहीन मनुष्यों के पीछे विपत्तियां लगी ही रहती हैं।
  • विपाके हि सतां वाक्यं विश्वसन्त्यविवेकिनः ॥१/३५॥
अविवेकी व्यक्ति संकट आने पर सज्जनों की बात का विश्वास करते हैं।
  • अङ्गार सदृशी नारी नवनीत समा नराः ॥७/४१॥
स्त्री अंगारे के समान तथा पुरुष मक्खन के समान हैं।
  • अप्राप्ते हि रुचि: स्त्रीणां न तु प्राप्ते कदाचन ॥७/२५॥
स्त्रियों की रुचि अप्राप्त पुरुष में होती है, सहज प्राप्त पति में नहीं।
  • अप्राप्ते हि रुचि: स्त्रीणां न तु प्राप्ते कदाचन ॥७/२५॥
स्त्रियों की रुचि अप्राप्त पुरुष में होती है, सहज प्राप्त पति में नहीं।
  • विवेकभूषितानां हि भूषा दोषाय कल्पते ।७/५॥
विवेक से शोभायमान विवेकीजनों के आभूषण दोष रूप ही प्रतीत होते हैं।
  • विशेते हि विशेषज्ञो विशेषाकारवीक्षणात् ॥८/३४॥
विशेषज्ञ पुरुष विशेषताओं को देखकर सन्देह करने लगते हैं।
  • विशेषज्ञा हि बुध्यन्ते सदसन्तौ कुतश्चन ॥९/२४॥
बुद्धिमान किसी न किसी कारण से सत्य-असत्य को जान लेते हैं।
  • विशृङ्खला न हि क्वापि तिष्ठन्तीन्द्रियदन्तिनः ॥८/६३॥
बन्धनरहित इन्द्रियरूपी हाथी किसी भी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते।
  • विस्फुलिङ्गेन किं शक्यं दग्धुमार्द्रमपीन्धनम् ॥२/१२॥
क्या अग्नि की चिंगारी मात्र से गीले ईन्धन को जलाया जा सकता है?
  • विषयासक्तचित्तानां गुण: को वा न नश्यति ॥१/१०॥
विषय में आसक्त पुरुषों के कौन-से गुण नष्ट नहीं होते ?
  • विस्मृतं हि चिरं भुक्तं दुःखं स्यात्सुखलाभतः ॥८/११॥
बहुत काल तक भोगा गया महादुःख सुख की प्राप्ति होते ही विस्मृत होजाता है।
  • वीरेण हि मही भोग्या योग्यतायां च किं पुनः ॥१०/३०॥
यह पृथ्वी वीर पुरुषों द्वारा ही भोगने योग्य है और यदि उनमें विशेष योग्यता हो तो फिर कहना ही क्या ?
  • वृषला: किं न तुष्यन्ति शालेये बीजवापिनः ॥११/५॥
खेत में बीज बोनेवाले किसान क्या सन्तुष्ट नहीं होते ?
  • शरण्यं सर्वजीवानां पुण्यमेव हि नापरम् ॥७/३३॥
जीवों का रक्षक एकमात्र पूर्वबद्ध पुण्यही है; और कोई नहीं।
  • अमित्रो हि कलत्रं च क्षत्रियाणां किमन्यत् ॥८/५९॥
क्षत्रियों (राजाओं) के लिए अपनी स्त्री ही शत्रु हो जाती है तो अन्य लोगों की तो बात ही क्या ?
  • अमित्रो हि कलत्रं च क्षत्रियाणां किमन्यत् ॥८/५९॥
क्षत्रियों (राजाओं) के लिए अपनी स्त्री ही शत्रु हो जाती है तो अन्य लोगों की तो बात ही क्या ?
  • शस्तं वस्तु हि भूभुजाम् ॥३/४९॥
राज्य की सर्वोत्तम वस्तु राजाओं की ही होती है।
  • शैत्ये जाग्रति किं नु स्यादातपार्ति: कदाचन ॥२/६०॥
शीत के जागृत होने पर क्या कभी गर्मी का दु:ख होता है ?
  • शोच्याः कथं न रागान्धाये तुवाच्यान्न बिभ्यति ॥७/५०॥
जो रागान्ध पुरुष अपवाद एवं निन्दा से नहीं डरते, उनकी दशा शोचनीय क्यों न होवे ?
  • श्रेयांसि बहुविघ्नानीत्येतन्नाधुनाभवत् ॥२/१३॥
कल्याणकारक कार्यों में विघ्न बहुत आते हैं - यह नियम आज का नहीं, अनादि का है।
  • सचेतनः कथं नु स्यादकुर्वन्प्रत्युपक्रियाम् ॥५/१४॥
प्रत्युपकार नहीं करनेवाला सचेतन कैसे हो सकता है ?
  • सत्यामप्यभिषङ्गासत्यामप्यभिषङ्गार्तौ जागर्त्येव हि पौरुषम्॥१/२८॥
अकस्मात् दैवादिजन्य पीड़ा होने पर पुरुषार्थ जगता ही है।
  • सत्यायुषि हि जायेत प्राणिनां प्राणरक्षणम् ॥३/१९॥
आयुकर्म शेष रहने पर प्राणियों के प्राणों की रक्षा हो ही जाती है।
  • सतां हि प्रह्वतां शान्त्यै खलानां दर्पकारणम् ॥५/१२॥
सज्जनों की शान्ति का कारण होनेवाली नम्रता दुर्जनों के लिए घमण्ड का कारण बनती है ।
  • सतां हि प्रहृतां शास्ति शालीनामिव पक्वताम् ॥६/४८॥
धान्यों के समान महापुरुषों की विनम्रता उनकी योग्यता का परिचय देती है।
  • सति हेतौ विकारस्य तदभावो हिधीरता।२/४०॥
विकार के कारण विद्यमान होने पर भी विकारी न होना ही धीरता है।
  • अमूलस्य कुत: सुखम् ॥१/१७॥
मूल हेतु के बिना सुख कैसे हो सकता है?
  • अमूलस्य कुत: सुखम् ॥१/१७॥
मूल हेतु के बिना सुख कैसे हो सकता है?
  • सदसत्वं हि वस्तूनां संसर्गादेव दृश्यते ॥५/३९॥
वस्तुओं का अच्छा-बुरापना, अच्छे-बुरे पदार्थों के संसग से ही होता है।
  • सन्निधावपि दीपस्य किं तमिस्र गुहामुखम् ॥१०/६०॥
दीपक की समीपता होने पर भी क्या गुफा का मुख अन्धकार से युक्त रह सकता है ?
  • सन्निधाने समर्थानां वराको हि परो जनः ॥७/६६॥
समर्थ व्यक्ति के सामने अन्य व्यक्ति दीन हो जाता है।
  • सन्निधौ हि स्वबन्धूनां दु:खमुन्मस्तकं भवेत् ॥१/९०॥
हितचिन्तकों का सामीप्य होने पर दु:ख बढ़ ही जाता है।
  • सर्पशङ्काविभीताः किं सर्पास्ये करदायिनः ॥३/१६॥
सर्प से भयभीत लोग क्या सर्प के मुँह में हाथ डालते हैं ?
  • सर्पिष्पातेन सप्तार्चिरुदर्चिः सुतरां भवेत् ॥५/३॥
अग्नि में घी डालने से अग्नि भड़क उठती है।
  • सभयस्नेहसामर्थ्या: स्वाम्यधीना हि किड्कंरा: ॥९/१९॥
नौकर अपने स्वामी से डरते हैं और उनसे स्नेह की भावना भी रखते हैं।
  • सभयस्नेहसामर्थ्या: स्वाम्यधीना हि किड्कंरा: ॥९/१९॥
नौकर अपने स्वामी से डरते हैं और उनसे स्नेह की भावना भी रखते हैं।
  • सम्पदामापदां चाप्तिर्व्याजेनैव हि केनचित् ॥८/६५॥
सम्पत्ति और विपत्ति की प्राप्ति किसी न किसी बहाने से ही होती है।
  • सम्पदामापदां चाप्तिर्व्याजेनैव हि केनचित् ॥८/६५॥
सम्पत्ति और विपत्ति की प्राप्ति किसी न किसी बहाने से ही होती है।
  • समीहितार्थसंसिद्धौ मनः कस्य न तुष्यति ॥१/१०१॥
इच्छित कार्य सिद्ध होने पर किसका मन सन्तुष्ट नहीं होता ?
  • समीहितार्थसंसिद्धौ मनः कस्य न तुष्यति ॥१/१०१॥
इच्छित कार्य सिद्ध होने पर किसका मन सन्तुष्ट नहीं होता ?
  • समीहितेऽपि साहाय्ये प्रयत्नो हि प्रकृष्यते ॥६/४०॥
कार्य में सहायक मिलने पर उत्साह बढ़ जाता है।
  • समीहितेऽपि साहाय्ये प्रयत्नो हि प्रकृष्यते ॥६/४०॥
कार्य में सहायक मिलने पर उत्साह बढ़ जाता है।
  • अमूलस्य कुत: स्थितिः ॥२/३३॥
जड़रहित वृक्ष की स्थिति कैसे सम्भव है?
  • अमूलस्य कुत: स्थितिः ॥२/३३॥
जड़रहित वृक्ष की स्थिति कैसे सम्भव है?
  • समौ हि नाट्यसभ्यानां सम्पदां च लयोदयौ ॥१०/४०॥
रंगमंच पर होनेवाली हानि-लाभ का अच्छा-बुरा प्रभाव दर्शकों पर होता ही नहीं।
  • सर्वथा दग्धबीजाभाः कुतो जीवन्ति निर्घृणाः ॥९/१८॥
जले हुए बीज के समान कान्तिवाले सर्वथा दयारहित जीव कैसे जी सकते हैं ?
  • सर्वथा दग्धबीजाभाः कुतो जीवन्ति निर्घृणाः ॥९/१८॥
जले हुए बीज के समान कान्तिवाले सर्वथा दयारहित जीव कैसे जी सकते हैं ?
  • सर्वदा भुज्यमानो हि पर्वतोऽपि परिक्षयी ॥३/५॥
हमेशा भोगा जाने वाला पर्वत भी नष्ट हो जाता है।
  • सर्वदा भुज्यमानो हि पर्वतोऽपि परिक्षयी ॥३/५॥
हमेशा भोगा जाने वाला पर्वत भी नष्ट हो जाता है।
  • संसारविषये सद्यः स्वतो: हि मनसो गतिः ॥८/८॥
संसार के विषयों में मन की प्रवृत्ति स्वयमेव होती है।
  • संसारविषये सद्यः स्वतो: हि मनसो गतिः ॥८/८॥
संसार के विषयों में मन की प्रवृत्ति स्वयमेव होती है।
  • संसारेऽपि यथा योग्याद्भोग्यान्नु सुखी जन: ।४/१॥
संसार में अनुकूल भोग-सामग्री से मनुष्य सुखी होता है।
  • संसारेऽपि यथा योग्याद्भोग्यान्नु सुखी जन: ।४/१॥
संसार में अनुकूल भोग-सामग्री से मनुष्य सुखी होता है।
  • संसारोऽपि हि सारः स्याद्दम्पत्योरेककण्ठयोः ॥९/३५॥
पति-पत्नी के मतैक्य से संसार भी सारभूत लगता है।
  • संसारोऽपि हि सारः स्याद्दम्पत्योरेककण्ठयोः ॥९/३५॥
पति-पत्नी के मतैक्य से संसार भी सारभूत लगता है।
  • संसृतौ व्यवहारस्तु न हि मायविवर्जितः ॥३/२७॥
संसार में मायाचार रहित व्यवहार नहीं होता।
  • संसृतौ व्यवहारस्तु न हि मायविवर्जितः ॥३/२७॥
संसार में मायाचार रहित व्यवहार नहीं होता।
  • सामग्रीविकलं कार्यं न हि लोके विलोकितम् ॥८/५६॥
संसार में आवश्यक सामग्री के बिना कार्य नहीं देखा जाता।
  • सामग्रीविकलं कार्यं न हि लोके विलोकितम् ॥८/५६॥
संसार में आवश्यक सामग्री के बिना कार्य नहीं देखा जाता।
  • सुकृतिनामहो वाञ्छा सफलैव हि जायते ॥५/३६॥
पुण्यशाली जीवों की इच्छा सफल ही होती है।
  • सुकृतिनामहो वाञ्छा सफलैव हि जायते ॥५/३६॥
पुण्यशाली जीवों की इच्छा सफल ही होती है।
  • सुजनेतरलोकोऽयमधुनान हि जायते ॥१०/३६॥
संसार में कुछ मनुष्य सज्जनों के और कुछ मनुष्य दुर्जनों के पक्षपाती सदा से हैं।
  • अम्बामदृष्टपूर्वां च द्रष्टुं को नाम नेच्छति ॥८/४९॥
ऐसा कौन व्यक्ति है जो पूर्व में न देखी गई माँ को देखने की इच्छा नहीं करता?
  • अम्बामदृष्टपूर्वां च द्रष्टुं को नाम नेच्छति ॥८/४९॥
ऐसा कौन व्यक्ति है जो पूर्व में न देखी गई माँ को देखने की इच्छा नहीं करता?
  • सुतप्राणा हि मातरः ॥८/५४॥
माताओं के प्राण पुत्र ही होते हैं।
  • सुतप्राणा हि मातरः ॥८/५४॥
माताओं के प्राण पुत्र ही होते हैं।
  • सुधासूते: सुधोत्पत्तिरपि लोके किमद्भुतम् ॥३/५२॥
चन्द्रमा से अमृत की उत्पत्ति होती है, क्या इसमें किसी को आश्चर्य है ?
  • सुधासूते: सुधोत्पत्तिरपि लोके किमद्भुतम् ॥३/५२॥
चन्द्रमा से अमृत की उत्पत्ति होती है, क्या इसमें किसी को आश्चर्य है ?
  • सौगन्धिकस्य सौगन्ध्यं शपथात्किं प्रतीयते ॥६/४७॥
सुगन्धित नीलकमल की सुगन्ध के लिए शपथ खाने की जरूरत नहीं होती।
  • सौभाग्यं हि सुदुर्लभम् ॥१/८॥
सद्भाग्य की प्राप्ति होना दुर्लभ है।
  • सौभाग्यं हि सुदुर्लभम् ॥१/८॥
सद्भाग्य की प्राप्ति होना दुर्लभ है।
  • सौभ्रात्रं हि दुरासदम् ॥१/१०७॥
सच्चा भाई मिलना बहुत कठिन है।
  • सौभ्रात्रं हि दुरासदम् ॥१/१०७॥
सच्चा भाई मिलना बहुत कठिन है।
  • स्त्रीणामेव हि दुर्मति: ॥३/४०॥
स्त्रियों के दुर्बुद्धि ही होती है।
  • स्त्रीणामेव हि दुर्मति: ॥३/४०॥
स्त्रियों के दुर्बुद्धि ही होती है।
  • स्त्रीणां मौढ़य्ं ही भूषणम् ॥९/३३॥
मूर्खता स्त्रियों का आभूषण है।
  • स्त्रीणां मौढ़य्ं ही भूषणम् ॥९/३३॥
मूर्खता स्त्रियों का आभूषण है।
  • स्रीरागेणात्र के नाम जगत्यांन प्रतारिताः ॥३/४३॥
संसार में ऐसे कौन पुरुष हैं, जो स्त्रियों के राग से नहीं ठगाये गये हैं?
  • स्त्रीष्ववज्ञा हि दुःसहा ॥१/५६॥
स्त्रियों की अवज्ञा पुरुषों के लिए असह्य होती है।
  • स्त्रीष्ववज्ञा हि दुःसहा ॥१/५६॥
स्त्रियों की अवज्ञा पुरुषों के लिए असह्य होती है।
  • स्थाने हि कृतिनां गिरः ॥१०/२७॥
बुद्धिमान पुरुष उचित स्थान में/समय पर ही बोलते हैं।
  • स्थाने हि कृतिनां गिरः ॥१०/२७॥
बुद्धिमान पुरुष उचित स्थान में/समय पर ही बोलते हैं।
  • अयुक्तं खलु दुष्टं श्रुतं वा विस्मयावहम् ॥८/७॥
जब मनुष्य अनहोनी/असम्भव जैसी वस्तु को देखता है या सुनता है, तब उसे आश्चर्य होता है।
  • अयुक्तं खलु दुष्टं श्रुतं वा विस्मयावहम् ॥८/७॥
जब मनुष्य अनहोनी/असम्भव जैसी वस्तु को देखता है या सुनता है, तब उसे आश्चर्य होता है।
  • स्थाने हि बीजवद्दत्तमेकं चापि सहस्रधा ॥७/६॥
अच्छे स्थान में बोया गया एक ही बीज सहस्रगुना फल देता है।
  • स्थाने हि बीजवद्दत्तमेकं चापि सहस्रधा ॥७/६॥
अच्छे स्थान में बोया गया एक ही बीज सहस्रगुना फल देता है।
  • स्नेहपाशो हि जीवानामासंसारं न मुञ्चति ॥८/२२॥
जबतक संसार है, तबतक प्राणियों का स्नेहरूपी बन्धन नहीं छूटता।
  • स्नेहपाशो हि जीवानामासंसारं न मुञ्चति ॥८/२२॥
जबतक संसार है, तबतक प्राणियों का स्नेहरूपी बन्धन नहीं छूटता।
  • स्वदेशे हि शशप्रायो बलिष्ठः कुञ्जरादपि ॥२/६४॥
अपने स्थान पर खरगोश जैसा तुच्छ पशु भी हाथी से भी बलवान होता है।
  • स्वदेशे हि शशप्रायो बलिष्ठः कुञ्जरादपि ॥२/६४॥
अपने स्थान पर खरगोश जैसा तुच्छ पशु भी हाथी से भी बलवान होता है।
  • स्वकार्येषु हि तात्पर्यं स्वभावादेव देहिनाम् ॥९/२५॥
मनुष्य को अपने कार्यों में तत्परता स्वभाव से ही हुआ करती है।
  • स्वकार्येषु हि तात्पर्यं स्वभावादेव देहिनाम् ॥९/२५॥
मनुष्य को अपने कार्यों में तत्परता स्वभाव से ही हुआ करती है।
  • स्वभावो न हि वार्यते ॥१०/५१॥
। स्वभाव कभी भी बदला नहीं जा सकता।
  • स्वभावो न हि वार्यते ॥१०/५१॥
। स्वभाव कभी भी बदला नहीं जा सकता।
  • स्वमनीषितनिष्पत्तौ किं न तुष्यन्ति जन्तवः ॥६/३८॥
चिर प्रतीक्षित कार्य की सफलता पर क्या प्राणी आनन्दित नहीं होते?
  • स्वमनीषितनिष्पत्तौ किं न तुष्यन्ति जन्तवः ॥६/३८॥
चिर प्रतीक्षित कार्य की सफलता पर क्या प्राणी आनन्दित नहीं होते?
  • स्वामीच्छाप्रतिकूलत्वं कुलजानां कुतो भवेत् ॥१०/२॥
कुलीन स्त्रियां अपने पति की इच्छा के विरुद्ध प्रवृत्ती नहीं करती।
  • स्वामीच्छाप्रतिकूलत्वं कुलजानां कुतो भवेत् ॥१०/२॥
कुलीन स्त्रियां अपने पति की इच्छा के विरुद्ध प्रवृत्ती नहीं करती।
  • स्वयं देया सती विद्या प्रार्थनायां तु किं पुनः ॥७/७५॥
निर्दोष विद्या बिना माँगे ही दूसरों को देना चाहिए; फिर याचना करने पर तो देना ही चाहिए।
  • स्वयं नाशी ही नाशकः ॥१०/५०॥
दूसरे का नाश करनेवाला अपना ही नाश करता है।
  • स्वयं नाशी ही नाशकः ॥१०/५०॥
दूसरे का नाश करनेवाला अपना ही नाश करता है।
  • स्वयं परिणतो दन्ती प्रेरितोऽन्येन किं पुनः ॥१०/९॥
हाथी स्वभाव: वृक्ष आदि उखाड़ने में तत्पर रहता है, फिर यदि कोई उसे उत्तेजित करे तो फिर उसका कहना ही क्या ?
  • अलङ्घयं हि पितुर्वाक्यमपत्यैः पथ्यकांक्षिभिः ॥५/१०॥
अपना हित चाहनेवाले पुत्र पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते।
  • अलङ्घयं हि पितुर्वाक्यमपत्यैः पथ्यकांक्षिभिः ॥५/१०॥
अपना हित चाहनेवाले पुत्र पिता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते।
  • स्वस्यैव सफलो यत्न: प्रीतये हि विशेषतः ॥४/४३॥
स्वयं का सफल प्रयत्न विशेष रूप से आनन्दकारी होता है।
  • स्वस्यैव सफलो यत्न: प्रीतये हि विशेषतः ॥४/४३॥
स्वयं का सफल प्रयत्न विशेष रूप से आनन्दकारी होता है।
  • स्वयं वृण्वन्ति हि स्त्रिय: ।१/११० ॥ स्त्रियाँ अच्छे वर के स्वयंवर लेती हैं।
  • स्वयं वृण्वन्ति हि स्त्रिय: ।१/११० ॥ स्त्रियाँ अच्छे वर के स्वयंवर लेती हैं।
  • स्ववधाय हि मूढात्मा कृत्योत्थापनमिच्छति ॥१०/३२॥
मूर्ख व्यक्ति स्वयं अपने नाश के लिए बेताल को जगाने की इच्छा करता है।
  • स्ववधाय हि मूढात्मा कृत्योत्थापनमिच्छति ॥१०/३२॥
मूर्ख व्यक्ति स्वयं अपने नाश के लिए बेताल को जगाने की इच्छा करता है।
  • स्वास्थ्ये ह्यदृष्टिपूर्वाश्च कल्पयन्त्येव बन्धुताम् ॥४/२५॥
पहले न देखे हुए मनुष्य सुख के समय भ्रातृत्व जताने लगते हैं।
  • स्वास्थ्ये ह्यदृष्टिपूर्वाश्च कल्पयन्त्येव बन्धुताम् ॥४/२५॥
पहले न देखे हुए मनुष्य सुख के समय भ्रातृत्व जताने लगते हैं।
  • हन्त कापटिका लोके बुधायन्ते हि मायया ॥१०/२१॥
खेद है कि कपटी मनुष्य छल-कपट से विद्वानों के समान व्यवहार करते हैं!
  • हन्त कापटिका लोके बुधायन्ते हि मायया ॥१०/२१॥
खेद है कि कपटी मनुष्य छल-कपट से विद्वानों के समान व्यवहार करते हैं!
  • हन्त क्रूरतमो विधि: ॥१/६३॥
खेद है कि भाग्य बहुत कठोर होता है।
  • हन्त क्रूरतमो विधि: ॥१/६३॥
खेद है कि भाग्य बहुत कठोर होता है।
  • हस्तस्थेप्यमृते को वा तिक्तसेवापरायणः ॥११/८२॥
हाथ में अमृत आ जाने पर कड़वी वस्तु के सेवन की चाह कौन करता है?
  • हन्तात्मानमपि घ्नन्तः क्रुद्धाः किं किं न कुर्वते ॥२/३८॥
अपने आप को भी नष्ट कर देनेवाले क्रोधी जन क्या-क्या नहीं कर डालते?
  • हितकृत्वं हि मित्रता।५/३१॥
मित्र के प्रति हित बुद्धि ही मित्रता है।
  • हितकृत्वं हि मित्रता।५/३१॥
मित्र के प्रति हित बुद्धि ही मित्रता है।
  • हेतुच्छलोपलम्भेन जृम्भते हि दुराग्रहः ॥९/९॥
कोई बहाना/निमित्त मिल जाने से मनुष्य का दुराग्रह बढ़ ही जाता है।
  • हेतुच्छलोपलम्भेन जृम्भते हि दुराग्रहः ॥९/९॥
कोई बहाना/निमित्त मिल जाने से मनुष्य का दुराग्रह बढ़ ही जाता है।
  • अलं काकसहस्रेभ्य एकैव हि दृषद् भवेत् ॥३/५१॥
। हजारों कौओं को उड़ाने के लिए एक ही पत्थर पर्याप्त होता है।
  • अलं काकसहस्रेभ्य एकैव हि दृषद् भवेत् ॥३/५१॥
। हजारों कौओं को उड़ाने के लिए एक ही पत्थर पर्याप्त होता है।
  • त्रिकालज्ञा हि निर्जरा: ॥५/३०॥
देवगति के देव भूत-भविष्य सम्बन्धी घटनाओं को अवधिज्ञान द्वारा जानते हैं।
  • त्रिकालज्ञा हि निर्जरा: ॥५/३०॥
देवगति के देव भूत-भविष्य सम्बन्धी घटनाओं को अवधिज्ञान द्वारा जानते हैं।
  • त्रिलोकी मूल्यरत्नेन दुर्लभ: किं तुषोत्कर: ॥२/३२॥
जो रत्न तीन लोक की सम्पदा खरीदने में समर्थ है, उस रत्न से क्या भूसे का ढेर नहीं खरीदा जा सकता?
  • अवश्यं हानुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥१/१०४॥
पूर्व में बाँधा हुआ शुभाशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है।
  • अवश्यं हानुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥१/१०४॥
पूर्व में बाँधा हुआ शुभाशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है।
  • अविचारितरम्यं हि रागान्धानां विचेष्टितम् ॥१/१३॥
राग से अन्धे पुरुषों की चेष्टायें बिना विचार के ही अच्छी लगती हैं।
  • अविचारितरम्यं हि रागान्धानां विचेष्टितम् ॥१/१३॥
राग से अन्धे पुरुषों की चेष्टायें बिना विचार के ही अच्छी लगती हैं।
  • अजलाशयसम्भूतममृतं हि सतां वचः ॥२/५१॥
सज्जनों के वचन जलाशय के बिना ही उत्पन्न हुए अमृत के समान हैं।
  • अविवेकिजनानां हि सतां वाक्यमसङ्गतम् ॥९/१७॥
अविवेकी लोगों के लिए सज्जनों के वचन असंगत लगते हैं।
  • अविवेकिजनानां हि सतां वाक्यमसङ्गतम् ॥९/१७॥
अविवेकी लोगों के लिए सज्जनों के वचन असंगत लगते हैं।
  • अविशेषपरिज्ञाने न हि लोकोऽनुरज्यते ॥१०/५८॥
छोटे-बड़े सभी को समान मानने पर जनसमुदाय सन्तुष्ट नहीं हो सकता।
  • अशक्तैः कर्तुमारब्धं सुकरं किं न दुष्करम् ॥७/६३॥
असमर्थ मनुष्य को सरल काम भी कठिन लगता है।
  • अशक्तैः कर्तुमारब्धं सुकरं किं न दुष्करम् ॥७/६३॥
असमर्थ मनुष्य को सरल काम भी कठिन लगता है।
  • असतां हि विनम्रत्वं धनुषामिव भीषणम् ॥१०/१४॥
दुर्जनों की नम्रता धनुष की तरह भयंकर होती है।
  • असतां हि विनम्रत्वं धनुषामिव भीषणम् ॥१०/१४॥
दुर्जनों की नम्रता धनुष की तरह भयंकर होती है।
  • असमानकृतावज्ञा पूज्यानां हि सुदुःसहा ॥२/६३॥
छोटे लोगों द्वारा किया गया अपमान बड़े लोगों को असह्य होता है।
  • असुमतामसुभ्योऽपि गरीयो हि भृशं धनम्॥२/७२॥
मनुष्यों को धन अपने प्राणों से भी प्यारा होता है।
  • अस्वप्नपूर्वं हि जीवानां न हि जातु शुभाशुभम् ॥१/२१॥
मनुष्यों को स्वप्न देखे बिना शुभ और अशुभ कार्य नहीं होता।
  • अहो पुण्यस्य वैभवम् ॥२/२२॥
पुण्य का वैभव आश्चर्यजनक होता है।
  • आत्मदुर्लभमन्येन सुलभं हि विलोचनम् ।१०/३॥
अपने लिए दुष्प्राप्य वस्तु दूसरे को सहजता से मिल जाए तो मनुष्य को आश्चर्य होता है।
  • आत्मनीने विनात्मनमञ्जसा न हि कश्चन ॥१०/३१॥
वास्तव में अपने को छोड़कर अन्य कोई अपना हित करनेवाला नहीं है।
  • अञ्जसा कृत पुण्यानां न हि वाञ्छामि वञ्चिता ॥८/६७॥
सच्चे पुण्यवान पुरुषों की इच्छा भी विफल नहीं होती।
  • आमोहो देहिनामास्थामस्थानेऽपि हि पातयेत् ॥१०/२४॥
जबतक मोह है, तबतक वह जीवों को अस्थान में भी प्रवृत्ति कराता है।
  • आराधनैकसम्पाद्या विद्या न ह्यन्यसाधना ॥७/७४॥
विद्या, गुरु की आराधना करने से ही प्राप्त होती है; अन्य साधनों से नहीं ।
  • आलोच्यात्मरिकृत्यानां प्राबल्यं हि मतो विधि:॥१०/१८॥
शत्रु को अपने से अधिक बलवान जानकर ही युद्ध की तैयारी करना चाहिए।
  • आवश्यकेऽपि बन्धूनां प्रातिकूल्यं हि शल्यकृत् ॥८/५१॥
आवश्यक कार्य होने पर इष्टजनों की प्रतिकूलता काटें के समान चुभती है।
  • आशाब्धि: केन पूर्यते॥२/२० ॥ आशारूपी समुद्र को कौन भर सकता है?
  • आश्रयन्तीं श्रियं को वा पादेन भुवि ताडयेत् ॥६/५०॥
अपने आप प्राप्त होती हुई लक्ष्मी को कौन लात मारता है ?
  • आसमाहितनिष्पत्तेराराध्या: खलु वैरिण: ॥७/२२॥
अपने अभीष्ट की सिद्धि तक शत्रु भी आराध्य होते हैं।
  • आस्थायां हि विना यत्नमस्ति वाक्कायचेष्टितम् ॥८/९॥
प्रेम होने पर प्रयत्न किये बिना ही वचन और शरीर की प्रवृत्ति होती है।
  • आस्था सतां यश:काये न हास्थायिशरीरके॥१/३७॥
सज्जन पुरुषों की श्रद्धा यशरूपी शरीर में होती है, नश्वर शरीर में नहीं।
  • इष्टस्थाने सती वृष्टिस्तुष्टये हि विशेषतः ॥४/४१॥
इष्ट स्थान में होनेवाली वर्षा विशेष आनन्द देनेवाली होती है।
  • अतर्क्यं खलु जीवानामर्थसञ्चय कारणम् ॥३/१२॥
मनुष्यों के धन संचय का कारण कल्पनातीत है।
  • ईर्ष्या ही स्त्रीसमुद्भवा ॥४/२६॥
ईर्ष्या स्त्रियों से उत्पन्न हुई है।
  • उक्तिचातुर्यतो दाढच्र्यमुक्तार्थे हि विशेषतः ॥९/२७॥
कथन की चतुराई से कहे हुए विषय में विशेष दृढ़ता आती है।
  • उत्पथस्थे प्रबुद्धानामनुकम्पा हि युज्यते ॥७/६१॥
मिथ्यामार्ग पर चलनेवाले मनुष्यों पर बुद्धिमानों की कृपा उचित ही है।
  • उदात्तानां हि लोकोऽयमखिलो हि कुटुम्बकम् ॥२/७०॥
उदार चरित्रवालों को सम्पूर्ण विश्व कुटुम्ब के समान है।
  • उदाराः खलु मन्यन्ते तृणायेदं जगत्रयम् ॥७/८२॥
उदारचित्त महापुरुष तीन लोक की संपत्ति को त्रण के समान तुच्छ मानते हैं।
  • उपायपृष्ठरूढा हि कार्यनिष्ठानिरड्कुंशाः ॥१०/२३॥
उत्तम उपाय में तत्पर पुरुष कार्य को नियम से सिद्ध करते हैं।
  • एककण्ठेषु जाता हि बन्धुता ह्यवतिष्ठते ॥८/३५॥
एकसमान व्यवहार करनेवालों में ही मित्रता स्थिर रहती है।
  • एककोटिगतस्नेहो जडानां खलु चेष्टितम् ॥८/३१॥
इकतरफा प्रीति करना मूर्खो की चेष्टा है।
  • एकार्थस्पृहया स्पर्धा न वर्धेतात्र कस्य वा ॥४/१६॥
एक ही पदार्थ की इच्छा होने से किसके स्पर्धा नहीं बढ़ती ?
  • एतादृशेन लिङ्गेन परलोको हि साध्यते ॥४/३९॥
प्रशंसात्मक बातों से अन्य मनुष्य वश में किये जाते हैं।
  • अतर्क्यसम्पदापद्भ्यां विस्मयो हि विशेषतः ॥१०/४६॥
अकस्मात् सम्पत्ति और विपत्ति के आने से विशेषरूप से आश्चर्य होता है।
  • एधोगवेषिभिर्भाग्ये रत्नं चापि हि लभ्यते ॥८/३०॥
भाग्योदय होने पर लकड़हारे को भी रत्न की प्राप्ति हो जाती है।
  • एधोन्वेषिजनैर्दृष्ट: किं वान प्रीतये मणिः ॥१/९६॥
ईधन तलाशनेवाले मनुष्यों द्वारा देखी गई माणिक्य प्रसन्नता के लिए नहीं होती ?
  • ऐहिकातिशयप्रीतिरतिमात्रा हि देहिनाम् ॥९/३॥
मनुष्य को सांसारिक उत्कर्ष में ही अधिक प्रेम होता है।
  • कः कदा कीदृशो न स्याद्भाग्ये सति पचेलिमे ॥७/२९॥
भाग्य को उदय होने पर कौन, कब और कैसा मकान बनेगा - यह कह नहीं सकते।
  • कणिशोद्गमवैधुर्ये केदारादिगुणेन किम् ॥११/७५॥
पौधों में अन्नोत्पत्ति की सामर्थ्य न होने पर खेत आदि सामग्री अच्छी होने से भी क्या प्रयोजन ?
  • करुणामात्रपात्रं हि बाला वृद्धाश्च देहिनाम् ।९/८॥
बालक तथा वृद्ध मात्र दया के पात्र होते हैं।
  • काकार्थफलनिम्बोऽपि श्लाघ्यते न हि चूतवत् ॥३/९॥
कौए के लिए नीम का वृक्ष आम के वृक्ष के समान प्रशंसनीय नहीं होता।
  • काचो हि याति वैगुण्यं गुण्यतां हारगो मणि:॥११/२॥
हार में स्थित मणि ही शोभा को प्राप्त होती है, काँच नहीं।
  • कारणे जृम्भमाणेऽपि न हि कार्यपरिक्षयः ॥११/७२॥
कारण के विद्यमान रहने पर कार्य का विनाश नहीं होता।
  • कालातिपातमात्रेण कर्तव्यं हि विनश्यति।११/७॥
कार्य करने का उचित समय निकल जाने पर कार्य बिगड़ जाता है।
  • अत्यक्तं मरणं प्राणैः प्राणिनां हि दरिद्रता ॥३/६॥
दरिद्रता मनुष्य के लिए प्राणों के निकले बिना ही जीवित मरण है।
  • कालायसं हि कल्याणं कल्पते रसयोगतः ॥४/९॥
रसायन के प्रभाव से लोहा भी सोना बन जाता है।
  • किं पुष्पावचयः शक्यः फलकाले समागते ॥१/३६॥
फलोत्पत्ति का काल आने पर क्या फूलों की प्राप्ति सम्भव है?
  • किं न मुञ्चन्ति रागिणि ॥१/७२॥
विषयासक्त मनुष्य क्या-क्या नहीं छोड़ देते हैं ?
  • किं गोष्पदजलक्षोभी क्षोभयेज्जलधेर्जलम् ॥२/५३॥
क्या खुर-प्रमाण जल को तरंगित करनेवाला छोटा-सा मेंढक क्या समुद्र के जल को तरंगित कर सकता है ?
  • किं स्यात्किं कृतं इत्येवं चिन्तयति हि पीडिता:॥२/६६॥
कौन-सा कार्य किस फल के लिए होगा - पीड़ित लोग यही विचार करते हैं।
  • कुत्सितं कर्म किं किं वा मत्सरिभ्यो न रोचते ॥४/१८॥
ईर्ष्या करने वालों को कौन-कौन से खोटे कार्य अच्छे नहीं लगते ?
  • कूपे पिपतिषुर्बालो न हि केनाऽप्युपेक्षते ॥६/९॥
कुएँ में गिरते हुए बालक की कोई भी उपेक्षा नहीं करता।
  • क्रूराः किं किं न कुर्वन्ति कर्म धर्मपराङ्गखा: ॥४/४॥
धर्म से परांगमुख क्रूर पुरुष क्या-क्या खोटे कार्य नहीं करते ?
  • कृतार्थानां हि पारार्थ्यमैहिकार्थपराङ्गुखम्॥७/७६॥
परोपकारी पुरुषों का परोपकार इस लोक सम्बन्धी प्रयोजनों से रहित होता है।
  • कृतिनोऽपि न गण्या हि वीतस्फीतपरिच्छदाः ॥८/३२॥
पुण्यवान पुरुषों को समृद्धि-परिवार आदि से रहित नहीं समझना चाहिए।
  • अत्युत्कटो हि रत्नांशुस्तज्ज्ञवेकटकर्मणा ॥११/८४॥
चमकदार रत्न को शाण पर चढ़ाकर उसे और घिसने से वह और अधिक चमकदार हो जाता है।
  • कृत्याकृत्यविमूढा हि गाढस्नेहान्धजन्तवः ॥२/७३॥
अति स्नेह से अन्धे पुरुष कर्तव्य-अकर्तव्य के विचार से रहित होते हैं।
  • कोऽनन्धो लङ्घयेद्गुरुम् ॥२/३९॥
कौन ज्ञानवान शिष्य गुरु के आदेश का उल्लंघन करेगा?
  • क्वचित्किमपि सौजन्यं नो चेल्लोकः कुतो भवेत् ॥४/३४॥
यदि संसार में कहीं पर भी सज्जनता न रहे तो संसार कैसे चलेगा ?
  • क्व विद्या पारगामिनी ॥१०/२५॥
विरले व्यक्ति ही परिपूर्ण विद्या के धारी होते हैं।
  • खाताऽपि हि नदी दत्ते पानीयं न पयोनिधि: ॥१०/५३॥
सूख जाने पर भी खोदी हुई नदी ही प्यासों को मीठा जल देती है, समुद्र नहीं।
  • गतेर्वार्ता हि पूर्वगा ॥१०/१७॥
समाचारों की गति अति तेज होती है, वे मनुष्य के पहुँचने के पूर्व ही दूर तक पहुँच जाते हैं।
  • गत्यधीनं हि मानसम् ॥१/६५॥
मन के विचार भविष्य में होनेवाली गति के अनुसार ही होते हैं।
  • गर्भाधानक्रियामात्रन्यूनौ हि पितरौ गुरुः ॥२/५९॥
मात्र गर्भाधान क्रिया को छोड़कर गुरु ही शिष्य के लिए माता-पिता हैं।
  • गात्रमात्रेण भिन्नं हि मित्रत्वं मित्रता भवेत् ॥२/७५॥
शरीर मात्र से भिन्न मित्रपना ही मित्रता कहलाती है।
  • गुणज्ञो लोक इत्येषा किम्वदन्ती हि सुतम् ॥५/१५॥
यह कहावत सत्य है कि मनुष्य गुणग्राही होते हैं।