काज़ी नज़रुल इस्लाम
दिखावट

काज़ी नजरुल इसलाम (কাজী নজরুল ইসলাম), (२४ मई १८९९ - २९ अगस्त १९७६ एक बांग्लादेशी कवि, लेखक, संगीतकार और देश के राष्ट्रीय कवि थे। नजरुल को बांग्ला साहित्य के सबसे महान कवियों में से एक माना जाता है। नजरुल के नाम से लोकप्रिय, उन्होंने कविता, संगीत, संदेश, उपन्यास, कहानियाँ आदि का एक बड़ा समूह तैयार किया, जिसमें समानता, न्याय, साम्राज्यवाद-विरोधी, मानवता, उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह और धार्मिक भक्ति शामिल थे।
कविता
[सम्पादित करें]- श्याम-सुन्दर-गिरिधारी।
- मानस मधु-वन में मधुमाधवी धुन पर, मुरली बजाओ बनचारी।
- मधुर रात में हे हृदयेश तुम, बनके माधवी चाँद आओ,
- हृदय में उठाओ भावों का ज्वार, रस-यमुना-बिहारी।।
- अंतर-मंदिर में प्रीत की सेज पर, विलास करो लीला-विलासी,
- अखियों का दीप जला सिहाने, जागूँगा श्याम, तव रूप-पियासी।
- जितने अरमाँ थे सब झड़ गए, पहन लो उन्हें तुम माला बनाकर;
- नूपुर करूँगा अर्पित चरणों में, आँखों का जल पिरोकर।।
- श्याम-सुन्दर-गिरिधारी
- पुआल की मूरत पूज रहा तू, माँ को तो तू पूजता नहीं!
- हर माँ में ही मूरत बैठी, (घर-घर में रे)
- हाय रे अंधे, तू समझता नहीं।।
- बरस-बरस तू मातृ-पूजा का, करता जाता बस अभिनय,
- कायर संतान को देख लाज से, माँ भी बन गई पाषाणमय।
- माँ को जीतने साधना-समर में, साधक को कोई बूझता नहीं!
- पुआल की मूरत
- जनम-जनम बीते बाट जोहते ही,
- मरु-मुसाफ़िर चले, अंत ना कहीं भी।
- बरस पे बरस आएँ, आके लौट जाएँ,
- अश्कों से प्यास अपनी, पी के हम बुझाएँ।
- दिखा कपट-ज्योति, बनके मृगतृष्णा,
- मरु-उपवन पुकारे, गीत गा के वही॥
- था ये मरुथल कभी, सागर का ही जल,
- देखूँ सपना उसी का, आज भी मैं पागल।
- डूबी थी जो कश्ती, सागर के तल में,
- ढूँढूँ उसी के साथी, मरु-पथ पे राही॥
- जनम जनम बीते
- आ जा देख आमेना अम्मी की गोद में
- भरी चाँदनी का वहाँ चाँद डोले
- जैसे सहर की गोद में (रंगा) सूरज डोले
- आ जा देख आमेना अम्मी की गोद में
- ज़बूर, तौरात, इंजील ने जिसकी आमद की बानी,
- घोषित की थी जुग-जुगांतर पहले, जन्नत से तानी।
- लाया पीड़ित मूक धरा की तपस्या आज उसे द्वार,
- व्यथित हृदय में रख कर चरण, अवतार आया इस बार।
- सकल काल के सकल ग्रंथ, किताब, योगी और ध्यानी,
- मुनि, ऋषि, औलिया, अंबिया, दरवेश महाज्ञानी;
- प्रचार किया जिसने आने का—आज मंथन-शेष,
- वेदना-सिंधु चीर कर आया, वो नबी अमृतेश!
- देखा प्राचीन धरा ने फिर से उदय अभ्युदय,
- सब-का-आख़िर त्राता आया, डर मत, गाओ जय!
- जिस सिद्दीक़-ओ-अमीन को खोजा बाइबल और ईसा,
- तौरात ने दी बार-बार जिस मोहम्मद की दिशा।
- पपिया-कंठ दाऊद ने गाया जिसका अनागत गीत,
- जिस 'महामद' को अथर्व-वेद ने खोजा नित-प्रीत।
- वो अतिथि आया, कितने काल अरे—आज कितने काल बाद,
- ध्यान की मणी नयनों में आई, विश्व हुआ शाद।
- आलोक, पुलक, फूल-फल, रूप-रस, वर्ण और गंध से,
- ग्रह-तारे और पतित धरा आज पूजे पावन छंद से!
- आदि उपासनालय;
- उठ खड़े हुए फिर से नूतन भूत-प्रेत समुदाय।
- तीन सौ साठ विग्रह और मूर्तियाँ नूतन करी,
- बैठे सोने की वेदी पर, हाय अल्लाह का घर भरी!
- सह न सके ये दृश्य, इस स्रष्टा का अपमान,
- ध्यान में मुक्ति-राह खोजे नबी, रोए उनका प्रान।
- ख़दीजा से बोले—'अल्लाह की क़सम, काबा की ऐ,
- लात-उज़्ज़ा की न पूजा करूँगा, जानूँ न अल्लाह सिवाए।
- निज हाथ से जिसने किया सृजन खड़ और मिट्टी दे,
- कौन निर्बोध पूजेगा उसे, हाय स्रष्टा कह के!'
- साध्वी पतिव्रता ख़दीजा भी बोलीं स्वामी के संग,
- 'दूर करो इस लात-मनात को, पूजे जिसे सब जन।
- तव शुभ-वर से एकेश्वर उस ज्योतिर्मय की दिशा,
- पाई हूँ प्रभु, कट गई है मेरी ये अंधियारी निशा।'
- धीरे-धीरे सब क़ुरैश जान गए मोहम्मद अमीन—
- करे न पूजा काबा के भूतों की, मान के उनको हीन।
- मरु-भास्कर
- आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
- क्षमा कीजिए, हजरत
- भूल गया हूँ आपके आदर्श
- आपका दिखाया हुआ पथ
- क्षमा कीजिए, हजरत।
- विलास वैभव को रौंदा है पाँव तले
- धूल समान आपने प्रभु
- आपने नहीं चाहा कि हम बने
- बादशाह, नवाब कभू।
- इस धरणी की धन सम्पदा
- सभी का है उस पर समान अधिकार,
- आपने कहा था धरती पर हैं सब
- समान पुत्रवत
- क्षमा कीजिए, हजरत।
- आपके धर्म में नास्तिकों से
- आप घृणा नहीं करते,
- आपने उनकी की है सेवा
- आश्रय दिया उन्हें घर में
- भिन्न धर्मियों के पूजा मन्दिर
- तोड़ने का आदेश नहीं दिया, हे वीर !
- हम आजकल सहन
- नहीं कर पाते दूसरों का मत
- क्षमा कीजिए, हजरत।
- नहीं चाहा आपने कि हो धर्म के नाम पर
- ग्लानिकर हत्या — जीवन हानि
- तलवार आपने नहीं दी हाथ में
- दी है अमर वाणी
- हमने भूल कर आपकी उदारता
- बढ़ा ली है धर्मान्धता,
- जन्नत से नहीं झरती है अब
- तभी आपकी रहमत
- क्षमा कीजिए, हजरत।
- आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
- क्षमा कीजिए, हजरत
- भूल गया हूँ आपके आदर्श
- आपका दिखाया हुआ पथ
- क्षमा कीजिए, हजरत।
- क्षमा कीजिए हजरत: अनुवाद: सुलोचना वर्मा[१]
- अलगा करो गो ज़ुल्फ़ों का बंधन, दिल वही मेरा फँस गयी।
- रेशम बेनी के ज़र्रीं फ़ीते में, अंधा इश्क़ मेरा कस गयी॥
- तुम्हारे केश की ख़ुशबू कब,
- चुरा लाया लोभी मेरा मन तब,
- बेहोश होकर गिर पड़ी हाथ में, बाज़ू-बंद में बस गयी॥
- कान के झुमके ने प्राण बींधा जिया,
- आँख फेर लिया, चोरी कर निदिया,
- देह की देउढ़ी पे मिलने आकर, और नहीं वो वापस गयी॥
- अलगा करो गो ज़ुल्फ़ों का बंधन
