आचार्य प्रशान्त
आचार्य प्रशान्त अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और जाने-माने मोटिवेशनल वक्ता हैं। वे आज के युवाओं के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक बनकर उभरे हैं जो जिंदगी की परेशानियों को न केवल आम भाषा में समझाते हैं बल्कि उसका उपाय भी बताते हैं।
आचार्य प्रशांत का मूल नाम प्रशांत त्रिपाठी है। 1978 में इनका जन्म उत्तर प्रदेश, आगरा में हुआ था। ये न केवल एक मेधावी छात्र थे बल्कि इन्होंने उच्च स्तर की डिग्रियां ली हैं। ये IIT दिल्ली और IIM अहमदाबाद से पढ़ चुके हैं। इसके अलावा इन्होंने IAS (प्रशासनिक अधिकारी) की परीक्षा भी उत्तीर्ण की है लेकिन अपनी स्वतंत्रता खोने के डर और किसी के नीचे हमेशा काम न करने की इच्छा के कारण इन्होंने वह नौकरी नहीं की।
विचार की स्वच्छंदता इन्हें प्रिय है और इसी को आधार बनाकर इन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरु की और लोगों को भी इसके प्रति जागरुक करना शुरु किया। इन्होंने कई वेदों और धर्म ग्रंथों का भी अध्ययन किया है, तो ये लोगों को न केवल मोटिवेट करते हैं बल्कि उन्हें धर्म का ज्ञान भी देते हैं।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- अगर डरे नहीं होते तुम, तो ज़िन्दगी कितनी अलग होती। सोचना!
- जो सच्चाई से मुँह चुराकर जी रहा है, वह तो दुनिया में ही बेवकूफ बना हुआ है, उसे दुनिया से मुक्ति क्या मिलेगी!
- जीवन की कोई भी खोज मृत्यु के बहुत करीब जाकर शुरू होती है। मृत्यु को समझना जीवन को समझना है।
- किसी व्यक्ति को उसकी ऊंची आवाज़ से नहीं, बल्कि उसके मौन की गहराई से जानें।
- शून्यता का मतलब है खुद से मुक्त होना और जहां शून्यता है वहां परमात्मा है।
- दुनिया की समझ इसलिये होनी चाहिये, ताकि तुम दुनिया में ही फंसकर न रह जाओ।
- आध्यात्मिकता जीवन का त्याग नहीं है, यह पूरी तरह जीने की कला है।
- जो अपने में स्थिर है, वही स्वस्थ्य है। बीमार वो है, जो अपने-आप से बाहर है या भीड़ का गुलाम हो गया है, जिसका 'स्व' खो गया है।
- मन की चंचलता कोई समस्या नहीं है... तुम स्थिर नहीं हो, ये समस्या है।
- ध्यान वह है जो शांति से उत्पन्न होता है और आपको वापस शांति की ओर ले जाता है।
- तुम्हारे साथ वही हो रहा है, जो तुमने तय किया है।
- बहुत सारी बातों से डरते हो, लेकिन जीवन के बेकार चले जाने से क्यूं नहीं डरते हो।
- अध्यात्म सबसे ऊँची कामना की बात है: "चाहेंगे, मगर जो उच्चतम है सिर्फ़ उसको !"
- औसत इच्छाओं में ही जीवन लगाना हो तो अध्यात्म में समय व्यर्थ न करें।
- "इश्क़ हो गया हैं" सच को भूल पाते नहीं, और जगत याद आता नहीं !!
- जिसे प्यास लगती है, पानी उसे उपलब्ध होना शुरू हो जाता है ;
- भौतिक जीवन में भले ऐसा न होता हो, पर अध्यात्म में ये जादू सदा होता है।
- " अध्यात्म पलायन नहीं " केवल अँधेरे और अज्ञान को त्यागना है, और कुछ नहीं।।
- आध्यात्मिकता, अनावश्यक को ख़त्म करने का अनुशासन है।
- तुम दुनिया को समझने लगो और दुनिया को तुम समझ में आना बंद हो जाओ ;
- तो जान लेना कि ज़िन्दगी सही दिशा में जा रही है।।!
- किसी भी कीमत पर एक सही जिंदगी जीना एक अभ्यास और आदत की बात होती है,
- एक बार आप को इसकी आदत लग गई फिर आप नीचे गिरना बर्दाश्त ही नहीं करते;
- फिर आप कहते है जान दे दूंगा लेकिन नीचे नही गिरूंगा।
- अगर सब कुछ गँवा कर भी एक खरा जीवन मिल जाए, तो सौदा मुनाफ़े का है ;
- अगर वो खरापन गँवा कर अथाह दौलत भी मिल जाए, तो आप लुट गए !!
- कोई कितना भी लुभाए, कुछ भी करे, अपनी जरूरतें कम-से-कम रखो।
- जो लोग दुनिया को समझने लगते हैं, फिर दुनिया को वो कम समझ में आते हैं।।
- हमारी भूल ये नहीं है कि हमें सही-गलत नहीं पता,
- हमारी भूल ये है कि हमें सब पता है उसके बावजूद हम पछ लेते हैं गलत का।!!
- बहुत जल्द किसी के हो मत जाया करो,
- ऐसे ही कहीं के हो मत जाया करो,
- तुम्हें तो पराया होना है,
- तुम्हें अपना ही नहीं होना है,
- किसी और के कैसे हो बैठे।।!!
- दुनिया कितनी भी रंगीन हो, उसका इस्तेमाल पुल की तरह ही करना
- पुल से गुजर जाते हैं, पुल पर घर नहीं बनाते।।
- जिसकी ख़ातिर दुनिया की हज़ार ठोकरें सहीं,
- आँख बंद करी तो पाया मुझे उसकी ज़रूरत नहीं।
- चाहा उसको जो चाहने लायक था,
- अब कौन परवाह करे कि मिला या नहीं मिला !!
- जब आप ही वो नहीं रहेंगे, जो आप हुआ करते थे,
- तो संसार आपके साथ वो कैसे कर लेगा जो किया करता था ?
- गुरु का काम है तुम्हें सारे ज्ञान से मुक्ति देना सारी बातें बोली इसलिए जाती है ताकि जिन बातों में तुम उलझे बैठे हो उनकी निरर्थकता तुम्हें दिख जाए ;
- कोई बात तुमको इसलिए नहीं बोली जाती कि तुम उसको पकड़ लो उसको सत्य समझ लो।।
- आप मुक्त होते जा रहे हो, इसका एक प्रमाण यह होगा कि आपको व्यर्थ बातों का संकलन करने में रूचि नहीं बचेगी ; कम होती जाएगी, कम होती जाएगी।।
- कोई आप को आ कर के फ़िज़ूल कि बातें बताना शुरू भी कर देगा तो आप को उबासी आने लगेगी, और आप उनकी फिजूल बातों की आंतरिक रूप से उपेक्षा करते रहेंगे।
- जिस दिन अपना कद शरीर की ऊंचाई से नहीं, बल्कि मन की गहराई से नापने लगो -
- -उस दिन समझ लेना-बड़े हो गए।
- दुःख जीवन में अनिवार्य नहीं है, तुम बेवकूफ़ बन रहे हो, और तुम बेवकूफ़ इसलिए बन रहे हो,
- क्योंकि तुम्हारे चारों ओर लोग ऐसे हैं, जिन्होंने जीवन व्यर्थ जगहों पर ही बिताया है।
- जो रिश्ते तुम्हारी बेहोशी और अंधेरे को और घना करते हैं, उन रिश्तों से बाहर आओ।
- जहाँ कहीं तुम्हें दुःख है, भय है, संशय है, जहाँ कहीं तुम्हारे जीवन में पचास तरह के उपद्रव हैं,
- उस तरफ़ को बढ़ना छोड़ो ; यही राह है।
- हमारे रिश्तों में बड़ी भूल रहती है, हमें कभी भी तुम नहीं चाहिए,
- हमें हमेशा तुमसे कुछ चाहिए !!
- और जिसे तुमसे कुछ चाहिए, वो तुम देना बंद कर दो, तो रिश्ता टुट जाता है,
- रिश्ता हमेशा ऐसा बनाना, जिसमें कोई मांग ना हो, कोई शर्त ना हो !!
- किसी भी कीमत पर एक सही जिंदगी जीना एक अभ्यास और आदत की बात होती है,
- एक बार आप को इसकी आदत लग गई फिर आप नीचे गिरना बर्दाश्त ही नहीं करते;
- फिर आप कहते है जान दे दुगा लेकिन नीचे नही गिरूंगा।।!!
- दिन ऐसा बिताओ कि रात को बिलकुल पड़ो और सो जाओ।
- खाली करो अपने आपको, हर दृष्टि से स्वस्थ रहोगे-शारीरिक दृष्टि से भी, क्योंकि श्रम किया,
- और मानसिक दृष्टि से भी, क्योंकि कोई बोझ नहीं बचाया अपने ऊपर।
- ज़रूरत तो तुम्हारी बहुत छोटी होती हैं, तुम्हें पैसा ज़रूरत के लिए नहीं चाहिए होता है !
- तुम्हें पैसा चाहिए होता है, सामाजिक रुतबा बनाने में।
- ज़्यादातर लोग जिन्हें भविष्य की बड़ी चिंता होती है, वो वही लोग हैं जिनका वर्तमान उखड़ा हुआ होता है।
- जब भी कभी कोई बहुत हावी हो रहा हो आपके ऊपर,
- कोई परिस्थिति, कोई व्यक्ति, कोई विचार, या कुछ भी, तो उससे लड़िए मत।
- अपने मन को तलाशिए, उसमें ऐसा क्या है ; जिसका उपयोग करके वो व्यक्ति आपको नचा रहा है ?
- तुमने बहुत कुछ अच्छा-अच्छा किया, ठीक-ठीक किया।
- पर जो कुछ भी तुम कर रहे थे, उसको करने से पहले भी, करने के दौरान भी,
और करने के बाद भी रह गए तुम पहले जैसा ही !
- तो जो कुछ भी किया सब बेकार है।
- यह मत पूछो कि गुस्सा आने पर क्या करें ?
- पूछो कि जीवन कैसा हो जिसमें कुंठा और क्रोध के बीज ही न हों।
- जब भी निर्णय की घड़ी आए, जो कि लगातार आती ही रहती है; यही सवाल पूछिए,
- चैन किधर है ? किधर को जाऊँ तो शांति है ? हर निर्णय अपने आप हो जायेगा।
- तुम दाम चुका-चुका के बेचैनी उठाते है, कोई बैचेनी ऐसी नहीं है, जो मुफ़्त मिलती हो !
- चैन तो मुफ़्त है, बैचेनी के बड़े दाम हैं !!
- जाने हुए को जीना ही ज्ञान कहलाता है और ज्ञान को जीना तकलीफ़ नहीं शांति देता है ;
तुम्हारा डर तुमसे झूठ बोल रहा है।
- जब तुम ध्यान से जीवन जीना शुरू करते हो, सिर्फ़ तब पहली बार पता चलता है कि तुम कितनी झूठी दुनिया में आज तक जी रहे थे।
- कुछ पारलौकिक नहीं जानना है, ये जो सामने का संसार, उसी को साफ़ साफ़ नजरों से पूरा देखना है।
- तुम जितने ऊँचे उठते जाओगे दुनिया को देखने का तुम्हारा नजरिया उतना ही साफ़ होता जाएगा।
- जो स्वयं शांत हो जाता है, वो बिलकुल समझ जाता है कि, बाहर क्या- क्या अशांति चल रही है।
- जब तुम्हें कुछ पता ही ना हो, और तुम्हारे साथ बहुत कुछ हो रहा हो वही बेहोशी है।
- शांति बहुत बड़ी चीज़ होती है, उसके लिए जितना झुकना पड़े झुक जाना।
- जीवन तुम्हारा ऐसा हो कि दूसरों के मन में तुम पर हावी होने का ख़्याल ही ना आए।
- " ख़ुद जानो ख़ुद समझो "-और फ़िर उससे एक सुंदर व्यवस्था निकलेगी उस पर जियो !
- किसी तलाश है ? यही नहीं पता तो, सिर्फ भटकते ही रहोगे !!
- दुनिया को भी अगर बारीकी से देख लिया तो, अपने आप को भी समझ जाओगे।
- कहीं हमारे पहुँचने से पहले देर न हो जाये, और हम पूरी जिंदगी पछतायें।।
- सही चुनाव कर लो, उसके बाद ताक़त जहाँ से आनी होगी, आएगी।।
- दूर बैठ कर ताली बजाना आसान है, पास आकर साथ देना मुश्किल !
- आपकी तकलीफें आपसे दूर नहीं हो सकती आप अपनी तकलीफों से दूर हो सकते हैं।
- दुनिया की समझ इसलिये होनी चाहिये ताकि तुम दुनिया में ही फंस कर न रह जाओ।
- कुछ चीजें छोड़ी इसलिए जाती हैं, ताकि उससे बेहतर कुछ पाया जा सके।
- जो अपने दुःख के मूल में पहुंच जाता है, मात्र वही अपने दुःख से मुक्त हो पाता है।
- चीजों को कीमत देते- देते हम ज़िंदगी को कीमत देना भूल जाते हैं।
- नया जानकर तुम पुरानी ज़िंदगी में वापस कैसे चले जाते हो ?
- न सुख की आशा, न दुख का डर जो सही है वो चुपचाप कर।।
- जिसने अपने खर्चे बढ़ा लिए, उसे तो ग़ुलाम होना ही पड़ेगा...
- खुद जग जाओ, नहीं तो ज़िन्दगी पीट कर जगाती है।
- मज़े के ख़िलाफ़ नहीं हूँ मैं, छोटे मज़े के ख़िलाफ़ हूँ।।
- कोई भी निर्णय हो पैमाना एक ही होना चाहिए ।।
- जागे हुए आदमी का जिंदगी स्वयं साथ देती है।
- वाकई दुखी होते हम, तो दुख छोड़ न देते ?
- " तुम गलत राहों को ठुकरा कर तो देखो "
- बातें आज़ादी की और मोह कटघरे से ?
- आज़ादी उनके लिए है जिनमे ज़िद है।
- संसार नहीं किसी को हराने आता है, तुम्हारी आंतरिक दुर्बलताएँ हराती हैं तुमको।
- दुख हमे संसार ने नही दिये है, हमारे दुख हमारे अज्ञान का अंजाम है।
- न अच्छा है न बुरा है संसार, समझ गए तो रास्ता न समझे तो दीवार।
- चाँद की तरह शीतल होना हो तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो।।
- ख़ुद जितना साफ़ रहोगे दूसरे को भी उतना कम गन्दा करोगे।
- जग को साफ़ जानने के लिए मन साफ़ करो।
- साधना माने सफाई जीवन से कचरा बाहर करो।
- साहसी मन समस्या को नहीं, स्वयं को सुलझाता है।
- समाधान समस्या में ही छुपा होता है।
- इतना गंभीर मत बनो, कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है।
- ज्ञान बहुतों को मिलता है, काम किसी-किसी के आता है।
- ज्ञान आजादी देता है।
- सच्चाई के साथ चलने के लिए जो भी कीमत लगती हो लगा देना,
- क्योंकि अगर नहीं चलोगे, तो और ज़्यादा बड़ी कीमत देनी पड़ेगी।।!!
- जब सच्चाई कभी हार नहीं सकती तो तुम्हारी आँखों में इतनी मजबूरी क्यों है ?
- अड़े ही रहते हैं जो सच के दीवाने हैं, जो गिरना चाहते हैं उनके सौ बहाने हैं।।
- उसका दुर्भाग्य कम है, जिसको कोई मिला ही नहीं ऐसा जो उसे राह दिखा सके और सच बता सके !
- पर जिसको कोई मिले ऐसा जो राह दिखा सके और सच बता सके, और वो उसको घर के दरवाज़े पर ही रोक दे,
- उससे बड़ा अभागा कोई दूसरा नहीं होगा।
- उन गलतियों की कोई माफ़ी नहीं है,
- जहाँ आप जानते हैं क्या सही क्या गलत लेकिन जानते-बूझते गलत को चुनें।।
- लोगों को अपने जीवन में केवल उस सत्य के संदर्भ में मूल्य दें जो वे आपके जीवन में लाते हैं।
- संसार जो दुःख देता है, तुम उसको चुनोगे, तो वो दुःख क्रमशः बढ़ता ही जाएगा,
और वो तुम्हें अपनी गिरफ़्त में और लेता जाएगा।
- सच्चाई तुम्हें जो दुःख देती है, उसको चुनोगे, तो धीरे-धीरे दुःख कम होता जाएगा,
दुःख से मुक्त होते जाओगे।
- खाओ पीओ, ऐश करो ! ऐसा बोलने वाले क्या ऐश कर रहे है ?
- जो ईमानदार हैं, वो तो बता देते हैं अपना दुख।।
- पर जो महा बेईमान हैं वो खुद भले ही तड़प रहे हों लेकिन सुख का मुखौटा ओढ़े रहते हैं ताकि दूसरे उनके सुख को देख कर तड़पें !
- खा पी के, भोग विलास से आनंद कभी नहीं मिलता,
- आनंद मिलता हैं बंधनों और बेड़ियों को काटने से, मुक्ति से
- दुख तुम्हारी ओर फेंकने वाले, हज़ारों लोग हो सकते हैं
- और सैकड़ों स्थितियाँ हो सकतीं हैं,
- पर दुख तुम स्वीकार करोगे या नहीं करोगे, इसमें अंतत; चुनाव तुम्हारा ही होता है।
- तुम सच की परवाह कर लो सच तुम्हारी परवाह कर लेगा
- अगर जीवन तुम्हारा साथ नहीं दे रहा है तो तुमने ज़रूर कहीं सच का साथ छोड़ा है
- तुम सच के हो जाओ जीवन तुम्हारा हो जाएगा
- सत्य से प्रेम है तो सत्य खुद बता देता है, उस तक कैसे पहुंचना है।
- सच में जीना हल्की बात नहीं होती, कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है।
- " सच सस्ता होता तो सभी सच में जी रहे होते "
- तुम्हारा जन्म दूसरों से अपनी तुलना करने के लिए नहीं हुआ है,
- तुम्हारा जन्म अपनी सच्चाई को अभिव्यक्ति देने के लिए हुआ है।
- सच और इंसान का वही नाता है जो पानी और मछली का।
- वो तुम्हें ललचाएँगे, पर तुम बाहर मत आना।
- मछली तो पानी बिन जान दे देती है।
- कैसा है इंसान जो सच बिना जिए जाता है !
- जो सही है, उसको ज़िन्दगी में लेकर आइए !
- ये मत कहिए कि मेरे पास समय नहीं है, या मेर मजबूरियाँ हैं, सीमाएं हैं !!
- अपनी सीमाओं के बीच में ही एक छोटी- सी शुरुआत कीजिए,, आज ही !!!
- जिस चीज को भूलना चाहोगे, वो और याद आएगी।
- जिसे भूलना हो, उससे बड़ी किसी चीज़ को लगातार याद रखो।।
- छोटी चीज अपने आप भूल जाओगे
- कभी रंग कभी धूप कभी धूमिल मैदान है,
- बदलते मौसमों में भी आसमान तो आसमान है।।
- दूर, जितनी भी दूर तुम देख सकते हो,
- हमेशा याद रखना उसके आगे भी मंज़िलें हैं।।
- सही को वजह की जरुरत नहीं पड़ती,
- और गलत को कोई वजह जायज़ नहीं कर सकती !
- तुमने जन्म इसलिए नहीं लिया था कि
- घड़ियाँ खरीदो, शर्ट खरीदो, व्यवसाय बढ़ाओ, नाम करो, परिवार करो !
- समय की रेत पर ये घरौंदे खड़े करने के लिए नहीं जन्म हुआ था तुम्हारा !
- तुम्हारा जन्म हुआ था ताकि जन्म सार्थक कर सको फिर और जन्म न लेना पड़े।
- तैरना आता है तो यही पानी पार लगा देगा
- तैरना नहीं आता तो यही पानी जान ले लेगा,
- पानी न अच्छा है न बुरा ज़िन्दगी की धारा को दोष मत दो-" तैरना सीखो "
- जितनी बार उचित दिशा में क़दम उठाओगे, आगे की राह और आसान हो जाएगी।
- तुम्हारा हर क़दम निर्धारित कर रहा है कि अगला क़दम आसान पड़ेगा या मुश्किल।
- हर कदम तुम्हें बदल देता है अगले कदम पर तुम तुम नहीं रहोगे।, इसीलिए आगे के क़दमों की कल्पना या चिंता करना व्यर्थ है
- तुम बस अभी जहाँ हो वहाँ से उठते एक कदम की सुध लो।
- अगर रोशनी की तरफ चल रहे हो तो, हर कदम के साथ उजाला बढता जायेगा,
- तो हर कदम से अगले कदम की हिम्मत मिलेगी, तुम कदम तो बढाओ।
- कल का क्या होगा, ये कल पर छोड़ दो।
- अगर अभी जो है सामने उसे ठीक कर लिया, तो कल अपने-आप ठीक हो जाएगा।
- तुम्हें एक क्षण नहीं लगेगा नकली को नकली जान लेने में, अगर तुम असली हो गए।
- जिसने अपने आपको धोखा देना बंद कर दिया, अब संसार उसे धोखा नहीं दे पाएगा।
- जो दूसरों से धोखा खाना न चाहते हों, वो सबसे पहले अपने आपको धोखा देना बंद करें।
- सच जानना है यदि दुनिया का तो सीधा तरीका है, " तुम सच्चे हो जाओ "
- जो सच्चा है वो तुम्हारे साथ चल देगा जो झूठा है, वो अपने आप बिदक जाएगा।
- " शरीर की उम्र नहीं, चेतना का स्तर देखो " और इससे निर्णय करो कि
- कौन है जिसकी बात सुननी है, कौन है जिसकी बात नहीं सुननी है।
- सच्चा दोस्त तुम्हें तुम्हारे करीब ले आता है,
- नकली दोस्त तुम्हें तुमसे दूर ले जाता है।
- साथ चलने वाला राह दिखा भी सकता है, और राह भटका भी सकता है ;
- साथी संभल के चुनना, भाई !
- अपने स्वयं के जीवन का निरीछण करें, फिर आप सत्य को पहचान पाएंगे।
- जीवन को ऊँचे से ऊँचा लछ्य दीजिए, मन को सार्थक काम से भर दीजिए,
- मन में कचरे के लिए जगह बचेगी ही नहीं।
- काम ध्यान से चुनो और ये हिम्मत रखो कि जो काम चुनने लायक नहीं है,
- उसे ठुकरा दो।
- काम किसके लिए कर रहे हो, अगर यह पता है तो काम कैसे करना है
- यह अपने-आप सीख जाओगे।
- छोटे काम पर तो छोटी निराशा भी हावी हो जाती है,
- बड़े काम पर कोई छोटी निराशा हावी नहीं हो सकती।
- जो छोटी बातों में खो गया, वो छोटा ही हो गया,
- बड़ा याद हो जिसको, छोटे की चिंता नहीं उसको।
- जिसको चाहिए होती है उसको ऊँचाई मिल जाती है,
- तुम्हें मिली नहीं क्योंकि तुम्हें चाहिए नहीं थी।
- जिन्हें ऊपर उठना है, वो ऊपर उठने का बहाना ढूँढ लेते हैं,
- जिन्हें ऊपर नहीं उठना उन्हें हिमालय की ऊँचाइयों पर भी गन्दगी दिख जाती है।
- जिसके पास कुछ बड़ा नहीं होगा, ये उसकी सज़ा है
- वो हर छोटी चीज़ को बहुत बड़ी समस्या बना लेगा।
- तुम्हारी समस्या ये नहीं है कि कुछ सुलझता नहीं, सुलझ तो सौ बार जाता है।
- तुम मुझे ये बताओ, सुलझी चीजों को उलझाते क्यों हो सौ बार ?
- क्यों उठे हो आज सुबह -
- पिछला दिन दोहराने के लिए, या नया दिन लाने के लिए ?
- बरसाती कीड़े का- सा है आदमी का जीवन, ऐसे चुटकी बजाते बीत जाता है
- और हम इसी भ्रम में हैं कि अभी समय बहुत है हमारे पास।।
- यही कर्तव्य है आपका-कि जब दस लोग मूर्खता कर रहे हों, तो उनके साथ आप मूर्खता न करें।
- आप उनके दबाव में उनके जैसे न बन जाऍं, तो उनके सुधरने की भी संभावना बढ़ जाती है।
- जो अपनी जिंदगी में संतुष्ट नहीं है, वही दूसरों की जिंदगी में ताक झाँक करता है।
- जीने का मजा तब आता है, जब एक बहुत उंचा मकसद तुम्हारी जिंदगी पर छा जाता है।
- ज़िंदगी की सबसे बड़ी बर्बादी है, छोटी-छोटी बातों में फँस जाना।
- शून्यता का मतलब है खुद से मुक्त होना, और जहां शून्यता है वहां परमात्मा है।
- लड़ो स्थिर होकर, शांत होकर, मौन होकर, लड़ो ;
- दुनिया को ऐसे लड़कों की बहुत ज़रूरत है।।!!
- कितना कुछ बोलती हैं ये चुप्पियाँ !
- पर किसी की चुप सुनने के लिए तुम चुप होने को तैयार भी हो ?
- बोलने लायक हो कुछ तो ही बोलो, नहीं तो मौन बहुत सुंदर है।
- त्याग की यही परिभाषा है : जो बैचैन करता हो " छोड़ो "
- तड़पते हुए मन को शान्ति मिले यही एकमात्र धर्म है।
- तुम्हारा हर काम कैसा होता है ? जैसे तुम होते हो।
- हमारे कष्ट ही प्रमाण हैं हमारे भ्रमित होने का।
- ज़रा सीधा होकर जीना है, ज़रा सरल, ज़रा भोला रहकर जीना है, होशियारी थोड़ी कम !
- सीधे रहो, सरल रहो सिर्फ़ चालाक आदमी ही चालाकी का शिकार बनता है।
- तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है ; जो सरल है वो स्वतंत्र है।
- चालाकी का जवाब, चालाकी नहीं, समझदारी है।
- उसने कहा तो कहा, तुमने सुना क्यों ! दूसरों से प्रभावित क्यों हो जाते हो ?
- " जीवन एक रंगमंच है " इसमें अपना किरदार समझदारी से निभायें।
- जिन्हें आगे बढ़ना हो, वो वापस लौटने के रास्ते बंद करें।
- जो उचित है वो करो, अंजाम की परवाह छोड़ो।
- जब निगाह में मंज़िल बसी हो, तब रास्ते में जो मिलता है, तुम उसका सम्यक उपयोग कर ही लेते हो।
- मंज़िल से अगर प्यार हो, तो अनजाने रास्ते भी अपने हो जाते हैं।
- मंज़िल से प्यार हो तो रास्ता प्यारा हो जाता है।
- सही मार्ग जाना है तो खतरा उठाना है।
- एक जिंदगी है दबे- दबे जीने मे क्या मजा है।
- न चिंता न चाहत, तुम्हारा स्वभाव है " बादशाहत "
- जिसे पाने का लालच नहीं, उसे छिनने का डर भी नहीं।
- जब भीतर गहराई रहती है, तो मन में लहरें कम उठती हैं।
- चोट शब्दो से नहीं, उम्मीदों से लगती है।
- उम्मीद छोड़ो, काबिलियत बढाओ।
- सही काम चुनिये, डूब के करिये।
- आकर्षक तो बहुत चीजें लगती हैं, बात आकर्षण की नहीं अंजाम की है।
- सही काम के लिए जो भी युक्ति करनी पड़े, जितना भी श्रम करना पड़े कम है।
- इतनी मेहनत से लड़ो, इतनी मेहनत से खेलो, कि नतीजे से फ़र्क ही न पड़े।
- ढलान पर तो पत्थर भी लुढ़क लेता है, ऊंचाई पर जाने के लिए मेहनत चाहिए।
- तुम्हारी दिशा ठीक होनी चाहिये, लोग साथ दें तो ठीक, ना दें तो ठीक।
- करिए, कर डालिये ! काम यदि सही है तो हिचक कैसी ? समझ कर भी सोचते रहना ईमानदारी नहीं।।
- जब सीने मे सच्चाई रहती है तो छाती खुद ही चौड़ी रहती है।
- किसी को मत बताओ तुम्हे करना क्या है, उसे कर के दिखाओ।
- अभी को साधो, कल अपने आप ठीक हो जायेगा।
- पुराने रास्तो पर चलते हुए, नयी मंजिल पर कैसे पहुंच जाओगे !
- कुछ सफर ऐसे होते हैं, जिनमे सिर्फ रास्ता ही हमसफर हो सकता है।
- जब दूसरे का हित, अपने सुख से अधिक कीमती लगे, तब सुख शुद्ध होकर आनंद कहलाता है।
- दुख के न होने में आनंद नहीं है, दुख से न हारने में आनंद है।
- आनंद है दुख और सुख-दोनों के तनाव से मुक्ति।।
- तुम्हारे साथ हो वही रहा है, जो तुमने तय किया है।
- कोई भी कीमती चीज़ मुफ़्त नहीं मिलती, पात्रता दर्शानी पड़ती है।
- हार हो जाये कोइ बात नहीं, हौशला नहीं टूटना चाहिए।
- हार के भी जिसका कुछ न बिगड़े, सिर्फ़ उसी की जीत है।
- खेल तो चलता रहेगा, लेकिन खेल कौन रहा, जीवन तुमसे या तुम जीवन से।
- बहुत सारी बातो से डरते हो, लेकिन जीवन के बेकार चले जाने से क्यू नही डरते हो।
- समय डर कर बीता दिया, तुमने अपना क्या बचा लिया।
- कायर, तुम मरने के लिए तैयार हो, लेकिन जीने के लिए नहीं।।
- मनुष्य जीना ही तब शुरु करता है, जब वो डरा हुआ नही होता है।
- हम डरे हुये है की हमारा कुछ बुरा न हो जाये, पर डर से बुरा और क्या होगा।
- न डरना है न डूबना है नदिया बीच गुज़रकर नदिया पार उतरना है।
- अगर परेशान रहते हो तो पक्का है कि, जीवन जीने के तरीके में कोइ भूल है।
- दुख से बचने के लिये जिसकी तरफ भाग रहे हो, वो और भी बड़ा दुख है।
- मन की चंचलता कोइ समस्या नही है, तुम स्थिर नही हो ये समस्या है।
- अगर अपने मर्जी से ही चल रहे हो, तो रुक कर दिखाओ।
- जब दुख परेशान करे तो दुख से कहो, सुख तो टिका नही, तु क्या टिकेगा।
- मुझे मत बताओ की तुम्हे पता क्या है, मुझे दिखाओ तुम जी कैसे रहे हो।
- देने वाला तो दे ही रहा है, जिन्हें न मिल रहा हो वो पुछे,मेरी नियत है क्या।।
- जिसने आफतो मे मजा लेना सीख लिया है, वही इस जन्म का आनंद उठा पाता है।
- प्रेम मे वादों की कोइ किमत नहीं, प्रेम में वे वादे भी निभ जाते हैं, जो किये ही नहीं।
- दूसरों की ओर देखना बंद करो, प्रेम तुम्हारी आन्तरिक पूर्णता है।
- प्रेम का नियम है : चाहे मिला हो, न मिला हो, बाँटना पड़ेगा।
- मन की बैचेनी का चैन के प्रति खिंचाव ही प्रेम है।
- प्रेम का अर्थ ये नहीं होता कि मेरे तुम्हारे विचार मिलते हैं,
- प्रेम का अर्थ होता है कि मैं तुम्हारे हित के लिए उत्सुक हूँ, आतुर हूँ !
- लोग कहते हैं, सच्चा प्यार मिलता नहीं ;
- मैं कहता हूँ, सच्चा प्यार तुमसे बर्दाश्त होता नहीं।
- आज मौका है जग जाओ, एक दिन ऐसा आएगा, जब आप चाह कर भी नही जग पायेंगे।
- भटकना तुम्हारी नियति नही, तुम्हारा चुनाव है।
- जब कोइ गलती करो तो उसे स्वीकारो " गलती से तो आजाद हो जाओगे "
- नही तो वही गलती फिर दोहराओगे।
- उन गलतियों की कोई माफ़ी नहीं है जहाँ आप जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत लेकिन जानते-बूझते गलत को चुनें।
- फैसले की घड़ी कुछ देर की चुनौती होती है, लालच-डर-वासना ये उस समय ज़ोरदार हमला करते हैं,
- इनका वार बस उस एक घड़ी बर्दाश्त कर जाओ तो लंबे समय चैन से जियोगे।
- जब मन में लालच और डर होता है, तो वो चीज़ें जिनकी कोई कीमत नहीं, कोई हैसियत नहीं,
- वो भी तुम पर हावी हो जाती है।
- अपने लिए क्या जीना ? अपने लिए क्या लिखना ?
- तुम्हारे लिए लिखता हूँ, तुम पढ़ोगे या नहीं-न जानता हूँ न जानना है।
- किसको तुम ना कहते हो, किसको तुम हाँ कहते हो,
- इसी से तुम्हारी जिंदगी तय होती है।
- जिगर चाहिए, हौसला चाहिए, भीतर ज़रा आग चाहिए
- किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए " तुमसे फालतू बात करने की "
- तुम्हारे अलावा कौन है जो तुम्हें हरा सके ?
- किसी और से कभी कहाँ हारे हो तुम !
- मन जहाँ जाता हो उसे जाने दो, क्योंकि
- मन से लडाई करके आजतक, ना तो कोई जीता है ना जीत सकता है।
- वो दूसरा नहीं, वो तुम हो, जब दूसरों सी ज़िन्दगी बिता रहे हो, तो अंजाम भी तुम्हारा दूसरों सा ही होगा।
- जिन्हें अपना अंजाम बदलना हो, वो अपनी ज़िन्दगी बदलें।।
- निंदा के लायक शायद बहुत लोग हैं, पर निंदा करना अपना ही समय ख़राब करना है न ?
- जितनी देर बुराई करी उतनी देर में कुछ सार्थक ही कर लिया होता,
- कुछ सुंदर ही कर लिया होता, तो तुम्हारा दिन कितना अलग होता कभी सोचना !
- पानी को मथ कर घी निकालने की कोशिश कर रहे हो ?
- प्रयास न करने से भी घातक है गलत जगह पर बार बार प्रयास करना।
- हम कीचड़ में लोटने का लुत्फ़ उठाते हैं, और फिर अपनी भद्दी शक्ल का इल्ज़ाम
- रो कर, चिल्ला कर औरों पर लगाते हैं " अजीब हैं हम ! "
- घोर संघर्ष के बीच यदि चैन नहीं, तो कहीं नहीं ; संघर्षों के खत्म होने की प्रतीछा मत करो,
- संघर्ष कभी खत्म नहीं होते-- संघर्षों के मध्य ही चैन सीखो
- ज़िन्दगी का तो मतलब ही है कठिनाई सही कठिनाई चुनो, सही कष्ट चुनो।
- परिपक्व आदमी का पहला लछण है-- अकेले चल पाने से डर ना लगना।
- किसी की मदद करने में जितना प्रेम चाहिए, उतनी ही सावधानी भी। आपका दायित्व है कि उसे शीघ्रतिशीघ्र इस क़ाबिल बना दें कि उसे आपकी मदद की ज़रूरत रहे ही नहीं।
- मददगार की तरह किसी के जीवन में बने ही न रहें। देखें कि कितनी जल्दी आप स्वयं को अनावश्यक बना सकते हैं। यही असली मदद है।
- इससे पहले कि तुम्हें किसी दूसरे का सहारा न लेना पड़े, तुम्हें जो उचित है, उसका सहारा लेना पड़ेगा।
- उचित सहारा कौन-सा है ?
- उचित सहारा वो होता है, जो शनैः शनैः तुम्हें ऐसा बना दे, कि तुम्हें फिर किसी सहारे की आवश्यकता न रहे।
- जितना ज़रूरी है कमज़ोर को सुरक्षा देना, उतना ही ज़रूरी है उसको सुरक्षा न देना जो कमज़ोर नहीं है।
- क्योंकि जो कमज़ोर नहीं है अगर तुमने उसे सुरक्षा दे दी, तो वो कमज़ोर हो जाएगा।
- सही जगह पर जितना समय गुज़ारोगे, अशांत जगह पर वक़्त गुज़ारना उतना मुश्किल होने लगेगा तुम्हारे लिए ।।
- तुम जहाँ भी समय लगा रहे हो, चलो लगा दो। हम तो बस एक ही सवाल पूछेंगे,
- वो समय जहाँ लगाया, वहाँ शांति मिली या नहीं मिली ?
- डर, लालच, बेचैनी सभी देखने में अलग-अलग लगते हैं लेकिन इनकी जड़ एक ही है ;
- यदि आप किसी एक को अपने जीवन से निकाल पाएँ तो बाक़ी अपनेआप चले जाएँगे !
- कोई भी चीज़ इस संसार की इतनी कीमती नहीं कि उसके लिए अपनी आत्यंतिक शांति को दाँव पर लगा दें।
- दुःख का असर तुम पर होता है, लेकिन तुम्हारा एक कोना ऐसा है जहाँ दुःख नहीं पहुँच सकता।
- " उस कोने को याद रखो बस "
- न रुतबे न ताकत न महलो-मकान के लिए, तुम्हारे भीतर है कोई तड़पता
- पंख और उड़ान के लिए मुट्ठी भर आसमान के लिए।।
- " ऊँचे लोगों की संगति हमेशा नहीं मिलती " अगर उनके सामने नहीं बैठ सकते,
- तो उनके शब्दों के साथ बैठ लो " संगति ही सबकुछ है "
- सारी ज़िंदगी, सारी किस्मत, तुम्हारी इसी बात से तय हो जाती है कि
- तुमने किसको अपना आदर्श बना लिया और किसकी संगति स्वीकार कर ली।
- " जितने अँधेरे में तुम जीओगे, उतने तुम्हारे पास सपने होंगे " ज़रा प्रकाश तो जलाओ, हक़ीक़त देखो
- फिर बताना मुझे कि क्या मन अभी-भी इधर-उधर भटकता है।
- व्यक्ति भी वही भला है, जिसकी संगति में तुम मौन हो सको। जान लो कि कौन तुम्हारा मित्र है, कौन नहीं ।
- जिसकी संगति में तुम मौन हो सको, वो तुम्हारा दोस्त । और जिसकी संगति में तुम अशांत हो जाओ, वो तुम्हारा दुश्मन है।
- -- सावधानी से चाहना, क्योंकि जिसे चाहोगे वैसे ही हो जाओगे। --
- समझ से जियो, नहीं तो जीवन निर्दयता से समझाता है !!
- अधिकांश परिवार हिंसा भरा, बेहोशी भरा जीवन जीते हैं और सोचते हैं मौज तो है !
- जब बिना अध्यात्म के पैसा बढ़ता जा रहा है, मौज, अय्याशी, विलासिता बढ़ती जा रही है तो सत्य की जरुरत क्या है ?
- ऐसी सोच के परिवारों में दो खोट हैं, पहला बाहरी खुशियों से अंदर कोई ख़ुशी नहीं मिलती !
- दूसरा ऐसे परिवारों के नजदीक जाओगे तो पाओगे कि उनके अंदर रोग हैं, समस्याएं हैं !!
- मुझसे अगर कुछ सीखना चाहते हो, तो यही सीखो कि जीवन में बड़े विवेक से और बड़ी निष्कामना से सही लक्ष्य बनाना है, और फिर उसमें आकंठ डूब जाना है।
- मेहनत अपने-आप हो जाती है, गिननी नहीं पड़ती।
- ठीक वैसे ही जैसे बैडमिंटन खेलो तो स्कोर गिनते हो, कैलोरी तो नहीं न ? कैलोरी अपने-आप घट जाती है। इधर स्कोर बढ़ रहा है, उधर कैलोरी घट रही है।
- पीछे-पीछे जो होना है वो चुपचाप हो रहा है, वैसा ही जीवन होना चाहिए।
- तुम वो करो जो आवश्यक है, उससे तुम्हारा जो लाभ होना है वो पीछे-पीछे चुपचाप हो जाएगा; तुम्हें वो लाभ गिनना नहीं पड़ेगा।
- " ऐसे जियो कि जैसे खेल हो, जान लो की खेल है, फिर जान लगाकर खेलो ? "
- उम्मीद मत रखो, सिर झुका कर चुपचाप काम करो,
- अच्छा परिणाम आ जाए, बहुत अच्छी बात है ।।
- सही निर्णय ही सही जीवन का आधार होते हैं।
- निरन्तर सत्य को चुनने का कोई विकल्प नहीं होता।
- अगर जीवन को सरल, सहज, शांत बनाना है, तो हर कदम, जो सही है उसे चुनना होगा।
- मन डरेगा ... आलस रोकेगा, लेकिन हिम्मत कर, सही निर्णय लेना होगा।।
- जो पाने पर जितना खुश होता है वो छिनने पर उतना दुखी होगा।
- मिलना हो कि बिछड़ना, पाना हो कि गँवाना, एक से रहो।
- मानो खेल हो, जीते तो बस हल्के से मुस्कुरा दिए और हारे तो भी बस मुस्कुरा दिए, बात खत्म !
- जो उत्तेजित बहुत होते हैं वही फिर अवसाद में जाते हैं।
- हम उतने ज़रूरी नहीं हैं जितना हमने अपने-आपको बना रखा है,
- आपसे पहले भी दुनिया थी, आपके बाद भी दुनिया रहेगी
- " किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ना है "
- सही नियत से जीवन जीना ही ईमानदारी भी है, और सफलता भी ;
- ईमानदारी से सफलता नहीं मिलेगी, ईमानदारी ही सफलता है।
- सही काम के लिए मौका मिलता नहीं, जीवन से छीनना पड़ता है।
- छीनने का बल दिखाएं " यही शक्ति है "
- मन में, या जीवन में, जो कुछ भी चल रहा है, उसे समझने पर ज़ोर दो ;
- पसंद-नापसंद बाद में देखी जाएगी।
- कुछ नया लाना है, कुछ बेहतर बनाना है,
- कल अच्छा था या बुरा था, उस पर नहीं रुक जाना है,
- यात्रा को ही जन्म लेते हैं, यात्री को चलते जाना है
- मेहनत से कल बनाया था, मेहनत से आज बनाना है,
- मंज़िल आई बीत गयी, अब आगे कदम बढ़ाना है।
- उदास होते हो तो दूसरों की वजह से,
- उत्तेजित होते हो तो दूसरों की वजह से,
- ऊबते हो तो दूसरों की वजह से,
- आकांछा है तो दूसरों की,
- और डर है तो दूसरों से,
- " सब कुछ तो दूसरों का ही है "
- नज़र साफ़ होने लगी हो, बेहतर दिखाई देने लगा हो,
तो जान लो कि रोशनी की तरफ बढ़ रहे हो।
- जो बातें पहले उलझी-उलझी थीं, अगर वो अब सरल और सुलझी हुई हो गई हैं,
तो जान लो कि रोशनी की तरफ़ बढ़ रहे हो।
- और उलझनें यदि यथावत हैं, तो जान लो कि अँधेरा कायम है।
- आचार्य जी, मन का माहौल बढ़िया कैसे रखें ?
- मन का माहौल बढ़िया रखने का एक ही तरीका है
- मन को किसी ऊँचे-से-ऊँचे कार्य में लगा दीजिए।
- मन का मौसम उतना ही सुहाना रहेगा,
- जितना सुहाना मन का लक्ष्य।
- मन का लक्ष्य ही अगर सुंदर नहीं है,
- तो मन की हालत सुंदर नहीं हो सकती।
- मन का लक्ष्य अगर होगा—नोट और सिक्के।
- तो मन भी वैसा ही होगा सिक्के जैसा, नोट जैसा।
- फाड़ो तो फट जाए और गिराओ तो टन-टन-टन-टन करे !
- मन का लक्ष्य होगा अगर बड़ी-बड़ी इमारतें
- और घर और फैक्ट्रियाँ,
- तो मन भी फिर ईंट-पत्थर जैसा होगा।
- खुरदुरा, शुष्क, रुखा और टूटने को तैयार
- कि ईंट पटक दी और टूट गई।
- मन भी ऐसा ही होगा खट से टूट गया।
- मन का जैसा लक्ष्य मन की वैसी हालत।
- मन कमज़ोर लगता हो अगर, तो जान लीजिए
- मन ने लक्ष्य ही कमज़ोर बना रखे हैं।
- जीवन में, जो भी आप की परिस्थितियों में,
- उच्चतम लक्ष्य संभव हो उसको रखिए
- और आगे, और आगे बढ़ते जाइए,
- जीवन इसीलिए है।
- छोटी-छोटी चीज़ों में उलझे रहेंगे, तो मन भी छोटा हो जाएगा।
- मन चंगा रखिए, जीवन अपनेआप चंगा रहेगा !
- बुढापा हो या जवानी,
- हम सबकी एक पटकथा, एक कहानी
- जब आपने ख़ुद रोशनी देखी नहीं,
- जब आपको ख़ुद पता नहीं कि जीवन क्यों है?
- और कैसे जिए जाना चाहिए ?
- तो आप बस यही करते हो कि
- जो बंधे-बंधाए तरीके हैं-
- उनका अनुकरण करते चलो!
- जीने का कोई बड़ा कारण हम जानते नहीं।
- बचपन से यही देखा है,
- ऐसे ही जिए हैं कि- अपने सुख के लिए जियो !
- पढ़ाई कर रहे हो किस लिए?
- अपने अंक बढ़ जाएँगे।
- नौकरी कर रहे हो किस लिए?
- अपना आदर-सम्मान होने लगेगा,
- अपनी आय आने लगेगी।
- अगर तुम्हारे पास जीने के लिए कोई सार्थक ध्येय नहीं है
- तो सत्तर-अस्सी साल की जिंदगी
- बहुत लंबी हो जाती है, काटे नहीं कटती।
- हमारे जीवन में कुछ ऊंचा क्यों नहीं है ?
- हमारे जीवन में सब छुद्र छोटी-छोटी चीज़ों
- के लिए ही जगह क्यों है?
- बड़े का आगमन बहुत सारी
- छोटी समस्याओं को यूँ ही हटा देता है।
- कुछ तो तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा हो
- जिसको तुम पूरी तरह से समर्पित हो जाओ।
- सीखा बहुत कम है, तालीम है अधूरी _ इस घने जंगल में आदमजात चाहता हूँ॥
- मुझे बात करने से रोकते हो तुम, _ तुम बात कर सको यही बात चाहता हूँ ॥
प्रश्नोत्तर रूप में विचार
[सम्पादित करें]- प्रश्नकर्ता - मैं एक घरेलू महिला हूॅं और दिनभर काम करते वक़्त दिमाग में विचार घूमते रहते हैं, इन पर काबू कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: कभी भी ये ना कहिएगा कि मेरे विचार मेरे विचार है। बंदर को याद रखियेगा। आपके विचार आपके विचार नहीं है। आपको जो चाहो वो सुचवाया जा सकता है तुरंत। सारे विचार वातावरण के कारण पैदा हो जाते हैं, आप सोचते हैं मेरा है। आपका है ही नहीं और आप उसके पीछे-पीछे चल देते हैं। विचार आया, "चलो, चाट खाएं", चल दिए। ये समझ में ही नहीं आया कि चाट खाने का विचार ही इसलिए आया क्योंकि चाट की खुशबू नथुनों में पड़ी।
चाट वाला भी होशियार होता है। वो आवाज करता है टन-टन-टन, सुना है? और अपने तवे पर घी डालेगा, और उसमें से गंध उठेगी, आपकी नाक में पड़ेगी, और आपको विचार आ जाएगा कि चाट खाना है। आप कहते हो, "ये तो मेरा विचार है"। आपका विचार थोड़े ही है। वो विचार किसका है वास्तव में? वो चाट वाले का है। चाट वाला होशियार है, आप बुद्धू बन गए। और कोई आपको रोके कि चाट नहीं खानी, तो आपको बहुत क्रोध आ जाएगा। आप कहोगे, "मेरा विचार था, और तुम मेरे विचार में बाधा बन रहे हो"। आप समझे ही नहीं कि आपका विचार आपका है ही नहीं। दुनिया आपकी मालिक बन गई है, आप गुलाम हैं।
सारे विचार ऐसे ही होते हैं। सारी भावनाएं ऐसी ही होती हैं। अभी आपने विचारों पर प्रयोग किया था, अब भावनाओं पर प्रयोग करना चाहेंगे? जिन घटनाओं को आप अपने जीवन की सुंदर घटनाएं बोलते हैं, ज़रा 15-20 सेकंड उनका स्मरण करिए। जो आपके जीवन की सबसे तथाकथित खुशनुमा घटनाएं हैं या कि जो सबसे ज़्यादा गौरवशाली घटनाएं हैं, उनका स्मरण करिये।
मन कैसा हो गया? प्रसन्न हो गया। आप भली-भांति जानते हो कि आप खुद चेष्ठा करके किसी सुखदाई घटना को याद कर रहे हो लेकिन अपनी ही चेष्ठा से मन की भावना आहाहा हो गई। अब आपके जीवन में जो सबसे दुख के क्षण रहे हो, उनको याद कर लीजिए।
थम जाइए। एक 2 मिनट आगे बढ़े, तो रोने लगेंगे। फिल्मों में जब रोने के दृश्य होते हैं, तो बहुत सारे अभिनेता-अभिनेत्री ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं करते। वो खुद ही याद करने लग जाते हैं कि उन्होंने कौन-कौन से दुख झेले हैं अतीत में, उनको आंसू आ जाते हैं। आप जानबूझकर अपने आपको आंसू दिला सकते हो, ऐसी होती हैं भावनाएं।
भावनाएं भी आपकी अपनी नहीं हैं। उनका भी निर्धारण बाहर से हो जाता है। आप यहां बैठे हो, अभी कोई गमगीन गाना बजने लग जाए, कोई बड़ी बात नहीं होगी कि एक-दो लोग रो पड़े। कोई भी गाना सुनाकर आपकी भावनाएं उत्तेजित कर देगा, आपकी भावनाओं को नियंत्रित कर लेगा। पर हम कहते हैं, "मेरी भावनाएं हैं।" आपके विचारों को कोई चोट पहुंचाए, आप फिर भी बर्दाश्त कर लो, आपकी भावनाओं पर चोट पहुंचा दें, तो आपका जानी दुश्मन है वो। आप कहते हो, "इसने मेरी भावनाएं आहत करी है, इसको तो बिल्कुल नहीं छोडूंगा"। आपकी है भावनाएं? सब उधार की भावनाएं हैं, सब बाहर के विचार।
- प्रश्न - हम प्रार्थना करने से डरते क्यों हैं?
आचार्य जी : चुप खड़े हो जाया करिए, जितनी ज़्यादा देर तक चुप खड़े हो सके। उससे ज्यादा सच्ची प्रार्थना और नहीं है। अपने मौन में लंबाई और गहराई दोनों लाइए। गहरा मौन हो और जितनी देर तक मौन खड़े रह सके।
कोई देव प्रतिमा मिल जाए, अच्छी बात है, उसके सामने मौन हो जाएं। कुछ नहीं मिल रहा, तो आकाश है। आकाश को परमात्मा जानिए, मौन हो जाइए। जितनी देर तक मौन हो जाएं, जहां भी मौन हो जाएं—भीड़-भाड़ में मौन हो जाएं, दफ्तर में मौन हो जाएं, दुकान में मौन हो जाएं—प्रार्थना वही है। और मौन होने के अवसर तो दिन में बहुत आते हैं। चूकिए ही मत, मानिए कि ये वरदान मिल गया। चार मिनट खाली मिले हैं, आंख बंद। आंख बंद नहीं भी कर सकते हैं—मान लीजिए ड्राइविंग कर रहे हैं—तो भी ड्राइविंग करते वक्त चुप, मौन। ये प्रार्थना हो गई।
- प्रश्न - आचार्य जी, यदि हम सामान्य जीवन में सहजतापूर्वक स्वयं के अनुसार उचित कर्म कर रहे हैं, तो क्या यही उचित जीवनशैली है?
आचार्य जी: आप चैन में हो तो सब सही है, और आप चैन में नहीं है तो अच्छे से अच्छा काम भी गलत है। जिस जीवन में आपको चैन हो, वो जीवन गलत हो ही नहीं सकता। अन्यथा जीवन देखने में कितना भी ठीक लगे, अगर बेचैनी दे रहा है, तो सही कैसे हैं?
- प्रश्न - बेचैनी का कारण खोजना चाहिए?
आचार्य जी: बेचैनी का कारण ढूंढिए और जीवन के जो हिस्से सुकून से भरे हुए हैं, उनको बढ़ाइए। ये तो आपका भी अनुभव होगा कि बेचैनी सदा एक-सी नहीं रहती, घटती-बढ़ती है। जहां पर आप पाएं कि न्यूनतम बेचैनी है, उस दिशा में आगे बढ़ें। और जहां-जहां आप पाएं कि बेचैनी अधिकतम है, उन चीज़ों को जीवन से त्यागें। यही सही त्याग है।
- त्याग की यही सही परिभाषा है: जो बैचैन करता हो, छोड़ो।
- प्रश्न - 'मैं' शब्द को जीवन से कैसे हटाएं?
आचार्य जी: सुंदर शब्द है, क्यों हटाना है? उसे पूरा होने दीजिए। उसको हटाना क्यों है? पूरा होने दीजिए ना। अभी कहती है "ये मेरा बच्चा", वैसे ही कहिए, "वो मेरा बच्चा"। अधूरा है मैं, उसको पूरा होने दीजिए। हटा तो पाएंगी नहीं। जब तक शरीर है तब तक हटा नहीं पाएंगी। हटाने की कोशिश व्यर्थ जाए, उससे अच्छा है कि उसे आप पुष्पित होने दें, पूर्णता दें। जैसे इस बच्चे को कहती हैं, "ये मेरा है", वैसे ही बहुत बच्चे हैं। मातृत्व को सीमित क्यों कर रखा है? (सभी ओर इशारा करते हुए) मेरा, मेरा, मेरा—बढ़िया बात है ना।
- प्रश्न - पर इंसान हमेशा मेरा-मेरा ही करता रहता है ना।
आचार्य जी: आदमी कभी नहीं कहता है, "ये भी मेरा, वो भी मेरा"; आदमी कहता है, "ये मेरा, वो पराया"। गौर कर लीजिएगा, कोई मिला है ऐसा जो पूरे ज़माने को कहे, "ये मेरा"? आप तो ये कहते हो कि "ये मेरा और वो पराया"। परायेपन को हटाइए, 'मैं' को नहीं—'मैं' तो रहेगा। विशुद्ध रूप से मैं माने आत्मा, कैसे हटा देंगी उसको? आत्म का अर्थ ही होता है 'मैं', उसको हटा कैसे देंगे?
- प्रश्न - आचार्य जी, खड़े होकर प्रार्थना करने में शरीर दर्द होता है, तो क्या बैठकर प्रार्थना करने में कुछ अनुचित है?
आचार्य जी: आप बैठ के कर लो। शरीर की तो देखिए अपनी विधा होती है, अपनी चाल होती है। आप बूढ़ी हो जाएंगी, घुटने खराब हो जाएंगे, फिर आप कहें कि मुझे तो खड़े होकर ही करनी है तो थोड़े ही हो पाएंगी। आप बैठ के कर लो, कोई बात नहीं। वो बहुत बड़ा है। उसे कोई तकलीफ नहीं होती अगर उसके सामने कोई बैठ जाए कि खड़ा हो जाए कि कुछ हो जाए। परमात्मा थोड़े ही अहंकारी है कि उसको बुरा लग जाए कि "अरे, खड़े होकर नहीं करी, बैठकर प्रार्थना कर ली"। तुम बैठ कर कर लो।
- प्रश्न - पर शरीर साथ नहीं देता है!
आचार्य जी: तो शरीर नहीं खड़ा रहता ना, आप शरीर को गिरने दीजिए। शरीर बैठ गया, ठीक है, बैठ जाए।
अब आप कहीं जाए, और मंदिरों में घंटे लगे होते हैं, आप कहे, "घंटा बजाना है"। घंटा इतना ऊंचा लगा। आपका कद नहीं इतना, तो इसमें कोई ग्लानि की बात थोड़े ही है। शरीर का कद नहीं है ना, कोई बात नहीं। किसी से कह दीजिए कि तुम मेरे लिए घंटा बजा दो, वो बजा देगा। शरीर नहीं है वैसा, तो नहीं है। किसी का शरीर लंबा होता है, आपका नहीं है। बात ख़त्म।
- प्रश्न - आचार्य जी भावनाएं कहां से आती है और कैसे इतनी हावी हो जाती हैं? मन ऐसा क्यों है?
आचार्य जी: कोई फायदा नहीं है ये पूछ कर कि क्यों है। पहले ही सत्र में हमने बात करी थी कि माया अनादि है पर उसका अंत है। वो कहां से आई है, ये पूछोगे तो पूछते रह जाओगे। बस उसका अंत कर दो। तुमको कोई वायरस लग जाता है, तो तुम ये पता करते हो क्या कि कहां-कहां से चलकर आया है ये? या सीधे दवाई लेकर बस उसको खत्म कर देते हो? बोलो। या पता करोगे कि किधर से आया, पहले इसको लगा, फिर उसको उससे लगा, उसको उससे लगा। क्या करना है ये पता करके? बस ये देख लो कि ये जब उठती है, तो मेरे साथ क्या कर जाती है। बस ये देख लो कि इनका उद्भव कैसे हो जाता है। वो पूरी प्रक्रिया समझ लो, ये बहुत है।
भावनाओं से खबरदार रहना। खासतौर पर स्त्रियों के लिए बड़े से बड़ा झंझट होती है भावनाएं। बात-बात पर आंसू निकल पड़े, भावनाओं पर कोई समझ ही नहीं, कोई बस ही नहीं। फिर इसीलिए स्त्रियां गुलाम हो जाती है। आपकी भावनाएं बहका कर कोई भी आपको नियंत्रित कर लेता है, गाय बना देता है।
- प्रश्न - मुझे भी ऐसा ही लगता है।
आचार्य जी: तो वो तो है ही, आप दुनिया को देखिए ना। बेचारी स्त्रियां किसी क्षेत्र में अग्रणी नहीं हो पाई। राजनीति में देखिए, नहीं दिखाई देंगी; कला में देखिए, कम दिखाई देंगी; विज्ञान में देखिए, कम दिखाई देंगी। वो घरों में बस दिखाई देती हैं, और इसमें बहुत बड़ा योगदान भावनाओं का है। वो भावुक ही पड़ी रह जाती हैं, और कुछ नहीं कर पाती जिंदगी में।
- अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
- आंचल में है दूध और आंखों में पानी।
इन दो चीज़ों के अलावा स्त्रियों के पास कुछ होता ही नहीं: दूध और आंसू।
- प्रश्न - आंसुओं से बाहर कैसे निकला जाए और स्वयं को मज़बूत कैसे किया जाए?
आचार्य जी: ये देखिए तो कि आप उन्हीं के साथ अटकी हुई हैं। अटकी इसलिए हुई हैं क्योंकि उन भावनाओं को ही अपना बल मानती हैं। भावनाओं को बल ना माने, तो भावनाओं को पोषण क्यों दें? महत्व भी देते हैं, दर्शाते भी हैं, उन्हीं का उपयोग करके अपना काम भी बनाते हैं।
- प्रश्न - और वास्तव में भावना के माध्यम से खुद को प्रताड़ित भी करते हैं।
आचार्य जी: बिल्कुल। काम कितने बनते हैं भावना दिखा दिखा कर! मैं रूठ गई, मैं गुस्से में हूं, या मैं दुख में हूं, काम बन जाता है।
- प्रश्न - आज सुबह ही आपका एक वीडियो देखा जिसमें आपने पूरी स्पष्टता से समझाया है कि किस तरह पुरुष, स्त्री को वस्तु मात्र समझते रहे हैं।
आचार्य जी: औरतों से मुझे जितनी शिकायत है, उतना ही उनको लेकर दुख भी है। उनको देखता हूं, बहुत दुख लगता है, और शिकायत इस बात की है कि वो अपने दुख का कारण स्वयं है। औरतों की जो खराब हालत है, उसका कारण वो खुद है। भावना को वो अपना हथियार समझती हैं, देह को वो अपनी पूंजी समझती हैं। देह सजाएंगी, संवारेंगी, भावनाओं पर चलेंगी, और सोचती है कि हमने ये बड़ा तीर मार दिया।
इन्हीं दो चीजों के कारण—देह, माने 'तन' और भावना, माने 'मन'—वो इतिहास में लगातार पीछे रही है, गुलाम रही हैं। जबकि स्त्री को प्रकृतिगत कुछ विशेषताएं मिली हुई हैं जो पुरुषों के पास नहीं होती। धैर्य स्त्री में ज्यादा है, महत्वाकांक्षा स्त्री में कम होती है। ये बड़े गुण हैं। अगर स्त्री संयत रहे, तो खुलकर उड़ सकती है, आसमान छू सकती है। पर वो इन्हीं दो की बंधक बन कर रह जाती है: तन की और मन की। "आंचल में है दूध" मने तन और "आंखों में है पानी" मने मन, भावनाएं। बस इन्हीं दो की बंधक है वो। यही दो काम करने हैं उसको: दूध और पानी, दूध और पानी। उसी को मैंने उस लेख में लिखा है कि औरत दो ही जगह पाई जाती है: बेडरूम और रसोई। बेडरूम मने दूध और रसोई मने पानी। और इसी को वो अपना फिर बड़ा बल समझती है।
वास्तव में स्त्री में जो एक विशेष गुण होता है, वो उसे पुरुषों से बहुत आगे ले जाए। वो गुण उसमें होता है समर्पण का। औरत, पुरुष की अपेक्षा थोड़ी भोली होती है। एक बार वो समर्पित हो गई किसी चीज के प्रति, तो समर्पित रहती हैं। ये बड़ी बात है। इस गुण के कारण वो किसी भी काम में बहुत आगे जा सकती हैं क्योंकि निष्ठा से करती है काम, मैंने देखा है। जितनी निष्ठा से एक लड़की काम करती हो, उतनी निष्ठा से लड़के को करना मुश्किल पड़ता है। लेकिन फिर वही—आंचल का दूध और आंखों का पानी—आड़े आ जाते हैं और फिर सब खत्म, बर्बाद।
- प्रश्न - यही होता है ना कि हम चाहते हुए भी सांसारिक उलझनों से निकल नहीं पाते।
आचार्य जी: सब निकल जाएंगी। लेकिन बीच-बीच में आपको भावनाओं से फायदा मिल जाता है ना, तो आप बहक जाती हैं। आपको लगता है भावना तो बढ़िया चीज़ है, अभी फायदा मिला तो। रोए, तो नया हार मिल गया। अब काहे को रोना बंद हो? तन दिखाया, तन सजाया, तो बड़ा सम्मान मिल गया। जमाने ने कहा, "वाह-वाह, क्या सुंदर है"। पति पीछे-पीछे आ गया जैसे ही मैंने ज़रा तन को आकर्षक बनाया। तो फिर बिल्कुल बहक जाता है मन स्त्री का।
- प्रश्न - पर मुझे लगता है कि मैं औरों से इस मामले में आगे हूं।
आचार्य जी: अब आदत बन गई ना, पुरानी आदत है। आदत को बनने ही नहीं देना चाहिए। छोटी बच्चियों में सजावट की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए। मांओं को मैं देखता हूं, छोटी बच्चियों को ही परियां बना रही होती हैं। वो इतनी-सी बच्ची है, उसको परी बना कर घुमाएंगी। और वो छोटी बच्ची टीवी पर भी यही देख रही है कि परी, परी। अब वो अभी से सजने संवरने लग गई, वो कहां बचेगी? मैं देख रहा हूं 6-6 साल की लड़कियां लिपस्टिक लगाकर घूम रही हैं। बर्बाद!
और पुरुष का स्वार्थ रहा है कि औरत को शरीर ही बना रहने दो, तो वो तारीफ भी खूब करेगा। औरत अगर सरल, साधारण, संयमित रहे देह से, तो पुरुष उसकी कोई तारीफ नहीं करता, और यहीं एक सजी-संवरी, छैल-छबीली निकल जाए, तो जितने पुरुष होंगे सब तालियां बजाएंगे, वाह-वाह करेंगे"। उस औरत को लगता है हमारी तो बड़ी इज्जत बढ़ गई, हमारा तो बड़ा मान, बड़ा मूल्य बढ़ गया। वो पागल है, वो जानती भी नहीं कि उसका शोषण किया जा रहा है।
- प्रश्न - (सभा में मौजूद पत्नी की और इशारा करते हुए) तैयार होते समय ये पोशाक के चुनने तक पर मेरी राय चाहती हैं और हल्का जवाब देने पर नाराज़ हो जाती हैं।
प्र (पत्नी) : अटेंशन नहीं है।
आचार्य जी: ये हंसने की बात नहीं है, ये बहुत खतरनाक बात है। आपको अपनी बनावट पर अटेंशन चाहिए? हां, डांट दीजिए उनको कि क्यों पोल खोल रहे हो।
- प्रश्न - पर वास्तव में हममें से अधिकांश महिलाएं सजती ही इसी असुरक्षा की भावना से है कि कहीं हमारे पति का हमारे प्रति आकर्षण कम ना हो जाए।
आचार्य जी: अरे तो भाई, आपके पास देह के अलावा और कोई गुण नहीं है क्या? ये आप समझ रहे हो आप क्या कर रहे हो? आप कह रहे हो, "मेरे पास और तो कोई गुण है नहीं कि पति मुझे देखें—और तो ना मुझे कोई कला आती, ना ज्ञान है, ना मैं किसी काबिल हूं—तो मेरे पास एक ही पूंजी है, क्या? शरीर। तो मैं शरीर के ही बल पर फिर पति को आकर्षित करती हूं। ये कितनी ज़लील बात है ना। हज़ार तरीके हो सकते हैं अपना मूल्य बढ़ाने के। अरे, कोई कला सीख लीजिए, किसी नई चीज का निर्माण करिए, स्थापना करिए, अपने व्यक्तित्व में ऐसी रोशनी लाइए कि दुनिया को आपकी ओर देखना पड़े। उसकी जगह आप कह रहे हैं कि मुझे तो दुनिया में अपना स्थान बनाने का एक ही तरीका आता है, क्या? शरीर।
और ये करके आप और कुछ नहीं करते, पतियों में भी कामवासना का संचार करते हो। फिर पति पशु बनकर झपट्टा मारे, तो कहते हो, "ये देखो दरिंदा, जब देखो तब एक ही बात सुझती है इसको।" और उसको बहका कौन रहा है? उसको उत्तेजित कौन कर रहा है? ये सब पतिजन सहमत है। सत्संग में पहली बार जान आई है। कह रहे हैं इतनी देर में गुरुजी ने असली बात बोली। (सब हंसते है)
हम नहीं जानते शिकारी कौन है और शिकार कौन है। शिकार करने की चेष्टा मत करिए, शिकार हो जाएंगी। आप स्थूल रूप से शिकार हो जाती हैं क्योंकि सूक्ष्म रूप से शिकार करने की आप की भी मंशा होती है। इस बात को स्वीकारिए। हां, स्त्री सूक्ष्म रूप से शिकार करती है, तो किसी को दिखाई नहीं देता। पुरुष स्थूल रूप से शिकार कर लेता है, तो पता चल जाता है। जिसे शिकार ना बनना हो, वो शिकारी भी ना बने। ये खेल ऐसा है जिसमें शिकारी का ही शिकार हो जाता है।
- प्रश्न - फिर तो टीवी इत्यादि पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी बंद होना चाहिए।
आचार्य जी: उसमें बहुत कुछ अच्छा भी है, मैं भी हूं वहां पर। आइए, मिलिए। आप क्यों जाती हैं सब अंड-बंड पेज और प्रोफाइल देखने?
- प्रश्न - पर टेलीविजन ऑन करने पर उसमें अपने आप ही कुछ ना कुछ चालू हो जाता है।
आचार्य जी: अरे, अपने आप कैसे चालू हो जाता है?
- प्रश्न - वास्तव में दुनिया में जो अच्छाई है, हमें उसको लेकर अधिक खोजी होना होगा।
आचार्य जी: तभी तो मैं स्वीकार नहीं करता जब कोई कहता है कि पूरा संसार ही बुरा है। मैं कहता हूं तुम बुरे हो इसीलिए बुराई खोज लेते हो। इंटरनेट पर बहुत कुछ है जो बहुत सुंदर है, पवित्र है। तुम उसकी ओर क्यों नहीं जाते?
- प्रश्न - आचार्य जी, गुस्सा क्यों आता है और नियंत्रण कैसे करें?
आचार्य जी: क्यों नियंत्रित करना है? अपने ऊपर करिए गुस्सा कि मैं ऐसी क्यों हूं। बात फिर ये नहीं है कि गुस्सा क्यों आता है, बात ये है कि गुस्से किसको आता है। सात्विक मन को गुस्सा आएगा अगर उससे सत्य छिन रहा हो। ऐसा गुस्सा आना चाहिए। तामसिक मन को गुस्सा आएगा अगर उससे उसकी बेहोशी छिन रही हो। ये गुस्सा नाजायज़ है। तो कौन सा गुस्सा है आपका? सही गुस्सा करिए। कोई दिक्कत नहीं है गुस्से में।
- प्रश्न - पर सामने वाला तो ये बात नहीं समझ पाएगा।
आचार्य जी: अरे, सामने वाले की बात ही नहीं है ना। आप सारी बात तो सामने वाले की करती हैं, अपनी बात कब करेंगी?
- प्रश्न - पर मैं सबके बीच ही रहती हूं।
आचार्य जी: अभी सब के बीच में आप हैं कि मैं हूं? सबके बीच में कौन है? मैं हूं, और मैं सामने वाले की बात ही नहीं कर रहा। आप बीच में भी नहीं हैं, आप परिधि पर हैं, और आप बात करे जा रही हैं सामने वाले की, सामने वाले की।
बीच में सब रहते हैं। मैं भी बीच में रहता हूं। बीच में रहने से ये निर्धारित नहीं हो जाता कि दृष्टि लगातार बहिर्मुखी की रहेगी। मन की कमजोरी के कारण दृष्टि बहिर्मुखी हो जाती है, बीच में रहने से नहीं बहिर्मुखी हो जाती।