अस्पृश्यता
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अस्पृश्यता का शाब्दिक अर्थ है 'न छूने योग्य का विचार' । भारत के हिन्दुओं के सन्दर्भ में, यह वह विचार है कि कुछ लोग छूने के योग्य नहीं हैं या उन्हें छूना पाप है। हिन्दी में छुआछूत का अर्थ है- 'छूने और न छूने योग्य' का विचार। भारतीय समाज में यह कब और कैसे आयी, और कितनी मात्रा में प्रचलित थी, आज इसका सही-सही ज्ञान नहीं है। आधुनिक युग के ही नहीं, सभी कालों के उदारचरित लोग अस्पृश्यता को एक सामाजिक कुरीति मानते रहे हैं।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- अन्नमयादन्नमयमथवा चैतन्यमेव चैतन्यात् ।
- द्विजवर दूरीकर्तुं वाञ्छसि किं ब्रूहि गच्छ गच्छेति॥ -- चाण्डाल, आदि शंकर से
- हे आचार्य , 'हटो-हटो' कह कर आप किसे दूर हटाना चाहते हैं ? (मेरे) अन्नमय शरीर से (अपने) अन्नमय शरीर को दूर हटाना चाहते हैं अथवा शरीर में स्थित उस चैतन्य से चैतन्य को दूर करना चाहते हैं? इन शब्दों के द्वारा आप किसे दूर करना चाहते हैं?
- किं गंगाम्बुनि बिम्बितेऽम्बरमनौ चण्डालवाटीपयः
- पूरे वाऽतरमस्ति काञ्चनघटी मृत्कुम्भयोर्वाम्बरे ।
- प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरंगसहजानन्दावाबोधाम्बुधौ
- विप्रोऽयमं श्वपचोSयमित्यपि महान कोऽयं विभेदभ्रमः॥ -- चाण्डाल, आदि शंकर से
- भगवान् भास्कर का प्रतिबिम्ब पवित्र गंगाजल में दिखाई दे अथवा घाट पर एकत्रित दूषित जल में, मिट्टी के घड़े में या स्वर्ण कलश में, इन जड़ वस्तुओं के संयोग से भगवान सूर्य को कोई दोष कैसे स्पर्श कर सकता है ?हे द्विज श्रेष्ठ! जो प्रज्ञानघन है, तरंगों से रहित सिन्धु के समान विक्षेपों से सर्वथा रहित परमानंद स्वरुप है, उसमें चाण्डाल और ब्राह्मण का भेद कैसा ?
- जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुटतरा या संविदुज्जृम्भते
- या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुषु प्रोता जगत्साक्षिणी,
- सैवाहं न च दृश्य वस्त्विति दृढ प्रज्ञापि यस्यास्तिचे-
- च्चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम ॥ -- आदि शंकर, मनीषापञ्चकम् में
- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो चेतना अपने को अभिव्यक्त कर रही है , जो चेतना ब्रह्मा- विष्णु- शिव आदि देवताओं से लेकर चींटी आदि में भी स्फुरित हो रही है । मैं स्वयं उसी चेतना में ओतप्रोत हूँ ,जिस दृढबुद्धि पुरुष की दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है, वह चाहे ब्राह्मण हो अथवा चांडाल हो, वह गुरु है- यह मेरी मनीषा है ।
- हमारा धर्म रसोईघर में है। हमारा भगवान खाना पकाने के बर्तन में है और हमारा धर्म है— 'मुझे मत छुओ, मैं पवित्र हूँ'। यदि यही सिलसिला एक शताब्दी तक और चला, तो हम सबको पागलखाने में होना पड़ेगा। -- स्वामी विवेकानन्द के पत्र
- गर्व से कहो, 'अज्ञानी भारतीय, ब्राह्मण भारतीय, चांडाल (अछूत) भारतीय, सब मेरे भाई हैं।' ... ऊँचे स्वर में घोषणा करो: 'मैं भारतीय हूँ और प्रत्येक भारतीय मेरा भाई है'। -- स्वामी विवेकानन्द ग्रंथावली, खण्ड ४
- हमारे देश और समाज के माथे पर एक कलंक है – अस्पृश्यता । हिन्दू समाज के, धर्म के, राष्ट्र के करोड़ों हिन्दू बन्धु इससे अभिशप्त हैं। जब तक हम ऐसे बनाए हुए हैं, तब तक हमारे शत्रु हमें परस्पर लड़वाकर, विभाजित कर सफल होते रहेंगे। इस घातक बुराई को हमें त्यागना ही होगा।
- हम कुत्ते, भैंस, घोड़े, गधे जैसे पशुओं को छू सकते हैं। सर्प को दूध पिलाते हैं। प्रतिदिन चूहे का रक्त चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर खाते हैं। तो फिर, हे हिन्दुओं ! अपने ही जैसे इन मनुष्यों को, जो तेरे ही राम और देवताओं के उपासक हैं, अपने ही देशबंधुओं को छूने में तुम्हें किस बात की शर्म आती है?[१]
- वैदिक काल में, और उसके बाद शताब्दियों तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं मिलता है। इसका उद्गम बहुत बाद में हुआ और इसका सम्बन्ध बौद्ध धर्म के बाद परिवर्तनों से पैदा हुई परिस्थितियों से है। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बौद्ध धर्म ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। देश की जनता और सारा व्यापारी वर्ग बौद्ध धर्म में चला गया था। ब्राह्मणवाद का पतन हो गया था, जो शताब्दियों से राज कर रहा था। बुद्ध ने तीन शिक्षाएं दीं– सामाजिक समानता की, वर्ण व्यवस्था के उन्मूलन की और अहिंसा के सिद्धान्त की, जिसमें धर्म के नाम पर पशु बलि वर्जित थी। उस समय तक ब्राह्मण शाकाहारी नहीं हुए थे, वे गौओं और अन्य पशुओं की बलि देते थे और उनका मांस खाते थे। जब बुद्ध ने बलि का निषेध किया और गाय को कृषि और दूध के लिये उपयोगी पशु बताते हुए उसकी सुरक्षा की शिक्षा दी, तो जनता ने उसे अपना लिया। तब, ब्राह्मणों के सामने शाकाहारी बनने के सिवा कोई चारा नहीं था। अब गाय पवित्र हो गयी थी और उसकी बलि देने की प्रथा समाप्त हो गयी थी। बहुत सारी बुद्ध शिक्षाएं हिंदू धर्म में समाहित कर लीं गयी थीं। जो जनता बौद्ध धर्म में चली गयी थी, वह भी धीरे–धीरे वापिस आने लगी थी। बुद्ध की जो सबसे बड़ी शिक्षा ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं की, वह थी समानता और वर्ण व्यवस्था का उन्मूलन। न तो बुद्ध ने और न ब्राह्मणों ने मृतक पशु के मांस को खाने पर रोक लगायी थी। रोक केवल जीवित गाय का वध करने पर थी। पर, आज के अछूतों का एक बड़ा अपराध यह है कि वे गरीबों में सबसे गरीब और सामाजिक रूप से सबसे निचले स्तर के होने के कारण बौद्ध धर्म में लम्बे समय तक बने रहे और मृतक पशु का मांस खाते रहे। उनको सुधारने के लिये एक बड़ी शक्ति की जरूरत थी, जो उनके लिये लम्बे समय तक काम करती। पर ऐसा कोई काम तो नहीं हुआ, उलटे, सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता उन पर लागू कर दी गयी। -- 'दि बाम्बे क्रानिकल’ को दिए गये साक्षात्कार में जो 24 फरवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुआ।
- ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति से दुखी हो यह चिल्ला कर अपना जी हल्का करते फिरते हैं कि 'हमें अस्पृश्यों के लिए कुछ करना चाहिए।' लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह कहता हो कि 'हमें स्पृश्य हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।' यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अस्पृश्यों का ही होना है। अगर कुछ किया जाना है तो वह अस्पृश्यों के प्रति किया जाना है और अगर अस्पृश्यों को सुधार दिया जाए, तब अस्पृश्यता की भावना मिट जाएगी। सवर्णों के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएँ, आचार- विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट नहीं है। क्या यह धारणा उचित है? यह धारणा उचित हो या अनुचित, लेकिन हिंदू इसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते? उन्हें इस धारणा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि वे अस्पृश्यों की समस्या के लिए बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं हैं। -- अस्पृश्यता : उसका स्रोत नामक लेख में[२]
- अस्पृश्यता सौ सिरों वाला दैत्य है।
- अस्पृश्यता बुद्धि और सदाचार की विरोधी है।
- अस्पृश्यता, हिन्दू धर्म पर एक कलंक है।
- अस्पृश्यता मानवता के विरुद्ध एक जधन्य अपराध है।
- अस्पृश्यता हिन्दू धर्म के सुन्दर उपवन में उग आये अवांछित घास-पात की तरह है, जो इस तरह फैलती जा रही है कि इसके कारण इस उपवन के सुन्दर फूलों के मुरजाने का खतरा पैदा हो गया है।
- अस्पृश्यता के कारण ही अन्त्यजों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। इन्हें पेट के बल चलना, गांव से बाहर रखना, जूठा भोजन देना, भूमिहिन रखना और मंदिर प्रवेश जैसे कार्यो से वंचित किया जाता रहा है। इसलिए ऐसा धर्म हिन्दू कदापि नहीं हो सकता।
- अस्पृश्यता हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग नहीं है।
- एक स्वस्थ प्रकार की अस्पृश्यता सभी धर्मो में पाई जाती है, वह है स्वच्छता एवं सफाई का नियम । लेकिन भारत में आज जैसी अस्पृश्यता मानी जाती है उसका हिन्दू शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं है।
- अस्पृश्यता की उत्पत्ति कब हुई इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। मैं भी केवल अनुमान ही लगा सकता हूँ, और वह सच या जूठ भी हो सकता है। लेकिन एक अंधा भी यह देख सकता है कि यह अधर्म है।
- वर्तमान अस्पृश्यता की उत्पत्ति हिन्दू धर्म के क्रमिक विकास की उस अवस्था में आई जब गाय की रक्षा करना हिन्दू धर्म का एक अंग बन गया और गाय को गौ-माता माना जाने लगा। उस काल में सामाजिक नियम बहुत कठोरता से लागू किए जाते थे। उस समय कुछ लोग ऐसे थे, जो अधिक सभ्य नहीं थे और गौ मांस खाते रहे, उन्हें समाज से तिरस्कृत कर दिया गया और वे तब से अस्पृश्य माने जाने लगे। इस कारण यह सामाजिक पाप, पिता से पुत्र को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होता रहा।
- इस प्रथा (अस्पृश्यता) की उत्पत्ति समाज की अवनति के दिनों में कुछ काल के लिए आपद धर्म के रूप में हुई।
- हिन्दू धर्म की अवनति के किसी अवस्था में जब भ्रष्टाचार आ गया और उंच-नीच की भावना ने इसमें प्रवेश करके इसे दूषित बना दिया, तब अस्पृश्यता की उत्पत्ति हुई।
- यह प्रथा हमारे बीच धर्म के नाम पर आई और हिन्दू धर्म में प्रविष्ट कर गई और इसका संबंध घृणा से रहा है। लेकिन इसका मूल आधार धर्म में नहीं है बल्कि उच्चता के झूठे अहंकार ने इसे जन्म दिया है।
- अस्पृश्यता-निवारण या दलितोत्थान के प्रश्न को हल करने के लिए सवर्ण हिन्दुओ की आत्मा को बदलना ही एकमात्र मार्ग है, चाहे सफलता मिलने में कुछ वर्ष क्यों न लग जाए।
- यह रोग ऐसा नहीं है जिसका कोई क़ानूनी इलाज किया जा सके या जिसे संसद के निर्णय से दूर किया जा सके, इसका उपचार तो पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने हृदय को बदलें।
- मैं जिस लक्ष्य को लेकर चल रहा हूँ, वह यह है कि हर सवर्ण हिन्दू अपने हृदय से अस्पृश्यता की भावना को निकाल दें और इस तरह अपना पूर्ण हृदय परिवर्नत करें।
आर्य समाज
[सम्पादित करें]- शूद्र भी वेद पढ़ सकता है, क्योंकि ईश्वर ने वेदों का प्रकाश सब मनुष्यों के लिए किया है। -- सत्यार्थ प्रकाश, तृतीय समुल्लास
- जैसे ईश्वर ने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और सूर्य आदि पदार्थ सबके लिए बनाए हैं, वैसे ही वेद विद्या भी सबके लिए है। -- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
- यदि हम अपने सात करोड़ भाइयों (अछूतों) को गले नहीं लगाते, तो हमें स्वराज्य मांगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। -- स्वामी श्रद्धानन्द, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन (अमृतसर, 1919) के दौरान दिए गए भाषण का अंश
- अस्पृश्यता केवल मानवीय दृष्टि से ही गलत नहीं है, बल्कि यह हमारे धर्म के मूल सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। हम एक ओर वेदों की बात करते हैं और दूसरी ओर अपने ही भाइयों को छूने से कतराते हैं, यह पाखंड है। -- लाला लाजपत राय 'लाला लाजपत राय के लेख एवं भाषण' (The Depressed Classes, 1913)
- सच्चा आर्य वही है जो समाज के गिरे हुए लोगों को उठाकर अपने बराबर खड़ा करे। मानवता की सेवा ही ईश्वर की सबसे बड़ी स्तुति है। -- महात्मा हंसराज, आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा के संबोधन से
- जाति-पाति का वर्तमान स्वरूप वेदों की आज्ञा नहीं, बल्कि स्वार्थ की उपज है। यदि हम जन्म के आधार पर किसी को अछूत मानते हैं, तो हम वेद के उस ऋषि का अपमान कर रहे हैं जिसने 'तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु' का गान किया था। -- पंडित चमूपति, लेख संग्रह
- आर्य समाज का उद्देश्य केवल मूर्ति पूजा छुड़ाना नहीं, बल्कि उस जीवित मूर्ति (मनुष्य) का सम्मान बहाल करना है जिसे समाज ने पैरों तले रौंद दिया है। अछूत कहलाने वाले भाई हमारी ही देह के अंग हैं। -- आर्य जगत (साप्ताहिक पत्रिका) के एक संपादन से
अन्य
[सम्पादित करें]- जब तक समाज में 'ऊंच-नीच' वाली जाति व्यवस्था बनी रहेगी, तब तक छुआछूत का अंत संभव नहीं है। छुआछूत जातिवाद की वह शाखा है जिसे केवल काटकर नहीं फेंका जा सकता, बल्कि हमें उस जातिवाद रूपी वृक्ष की जड़ को ही खोदना होगा। -- संतराम बी.ए. के लेखों का सारांश
- जाति-पाति के किले को केवल अंतरजातीय विवाहों के तोपखानों से ही ढहाया जा सकता है। जब रक्त का मेल होगा, तभी हृदय का मेल संभव है। -- सन्तराम बीए, 'जात-पांत तोड़क मंडल' के घोषणापत्र की प्रस्तावना में