गोस्वामी तुलसीदास के सुभाषित

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल वाल्मीकीय रामायण को आर्य काव्य का आदर्श मानते हैं। ’मानस‘ में तुलसीदास धर्मोपदेष्टा और नीतिकार के रूप में सामने आते हैं। वह ग्रंथ एक धर्मग्रंथ के रूप में भी लिखा गया है।


वास्तव में ’रामायण‘ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अमृतमय रूप है तो ’रामचरितमानस‘ रामभक्ति की श्रद्धा की सरयू एवं भक्ति की भागीरथी है। ’रामचरितमानस‘ शाश्वत जीवन मूल्यों का आकाशदीप है। प्रत्येक संस्कृति के कुछ ऐसे शाश्वत नियम, उपनियम एवं परंपराएँ होती हैं, जो इसकी आधारशिला होती है। व्यक्ति के निजी जीवन, समाज एवं राष्ट्र को निर्मल, समुन्नत एवं आदर्शलक्षी बनाने के लिए ऐसे नियम विवेकपूर्ण जीवनरीति- नीति के मार्गदर्शक होते हैं। ऐसे मानदंड निर्धारित करने में धर्मग्रंथों, शास्त्रग्रंथों एवं जीवनमूल्यनिष्ठ साहित्यिक रचनाएँ सहायक होती हैं। ये मूल्य समाज एवं राष्ट्र की आकांक्षाएँ होते हैं।


भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन के मूल्यों के रूप में उल्लेखित करते हुए ’मोक्ष‘ को निःश्रेयस की प्राप्ति का सर्वोत्तम लक्ष्य माना गया। ’श्रीमद्भागवत‘ में धर्म के ३० लक्षण बताए गये हैं - ’सत्य, दया, तपस्या, पवित्रता, कष्ट सहने की क्षमता, उचित-अनुचित का विचार, मन का संयम, इन्दि्रयों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, संतोष, समदृष्टि, सेवा, उदानसीनता, मौन, आत्मचिंतन, समी प्राणियों में अपने आराध्य को देखना और उन्हें अन्न देना, महापुरुषों का संग, ईशगुणों का गायन, ईश्वर-सेवापूजा और निर्वाह, ईश के प्रति दास्यभाव, ईशवंदना, सखा भाव और ईश को आत्मसमर्पण।‘ किन्तु इन में से बहुत कम मूल्य ऐसे होंगे जो सर्वदेशीय हों एवं वर्तमान भारतीय समाज के लिए भी संगत और उपादेय हों।

किन्तु मनुस्मृति में धर्म के दस भेद किए गये हैं ः यथा- धृति, क्षमा, दया, अस्तेय, शौच, इन्दि्रयनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध -


धृतिःक्षमादयोऽस्तेयं शौचमिन्द्रय निग्रहं

धी र्विद्या सत्यमक्रोधो, दशंक धर्मलक्षणम् ||


ये लक्षण शाश्वत जीवनमूल्यपरक हैं, जो सभी समाजों, देशों के लिए आवकार्य हो सकते हैं। तुलसीकृत रामचरितमानस उनकी विराट् प्रतिभा का साधनाजन्य वह पुरस्कार है, जो व्यक्ति के इहलोक एवं परलोक सुधारने की अद्वितीय क्षमता रखता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ’अग्निपुराण‘ के वचन का उल्लेख करते हुए कहा है, ’’नरत्वं दुलर्भं लोक, लोके विद्या सुदुर्लभा, कवित्वं दुलर्भं तत्र, शक्तिस्तत्र दुलर्भा।‘‘ महाकवि तुलसीदास को उक्त चारों विभूतियाँ परिप्राप्त थीं और इन का सदुपयोग उन्होंने ’सर्वजनहिताय‘ ही किया।


[संपादन] रामचरित मानस में शाश्वत मूल्यचेतना

चाहे राजा हो या प्रजा, स्वामी हो या सेवक, संसारी हो या संन्यासी जब तक उस का मन ’भगवत्-मन‘ नहीं बनेगा, तब तक कोई भी व्यक्ति जीवन की सार्थकता का परितोष प्राप्त नहीं कर सकेगा और जीवन में सार्थकता का अहसास तभी होगा, जब वह सत्यनिष्ठ होगा, सदाचार-निष्ठ होगा। जो साहित्यकार साहित्य में मूल्यों के निरूपण का दृष्टिकोण रखेगा, वह सत्यं, शिवम, सुंदरम् के आदर्श को अपनी रचनाओं के आवश्यक मानेगा। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने साहित्य में मूल्यों का समर्थन करते हुए कहा है कि ’’मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो मनुष्य को दुर्गति, हीनता एवं परमुखापेक्षता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।‘‘ मूल्यवादी समीक्षक आई - ए रिचर्डसन ने भी काव्य में मूल्यों का जोरदार समर्थन करते हुए कहा कि ’’कला का मूल्य इस बात में है कि यह हमारे आवेगों में संमति और सन्तुलन स्थापित करे, हमारी अनुभूतियों के क्षेत्र को व्यापक बनाए तथा मनुष्य को परस्पर सहयोग के लिए प्रेरित करे।‘‘ तुलसी का साहित्यिक दृष्टिकोण कलालक्षी नहीं, जीवनलक्षी था। उन्होंने उस भक्ति को आदर्श स्वरूप माना, जिसमें श्रेय एवं प्रेय का समन्वय हो। तुलसी कभी किसी वाद के चौखटे में परिबद्ध नहीं रहे, क्योंकि वे सत्यग्रहणलक्षी साधक थे। इसलिए वे मनुष्य की केन्द्रीय स्थिति एवं जीवन की सार्थकता विषयक एक समन्वित दृष्टिकोण ’रामचरितमानस‘ में प्रस्तुत कर सके। विविध आदर्शों एवं समन्वयतात्मक दृष्टि के कारण ही तुलसी का लोकनायकत्व स्वयं सिद्ध होता है। वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिन्दू धर्म में निरन्तर उत्पन्न हो रहे मत-मतान्तरों, सम्प्रदायों और सामाजिक वैषम्य को दूर करके एक आदर्श समाज की कल्पना रामचरित मानस में की हैं । वे शुभ को ही जीवन का ’मूल्य‘ मानते हैं इसलिए उनका साहित्य मानवमूल्यों के जय जयकार के प्रति समर्पित है महादेवी वर्मा ने ’संस्कृति और जीवनमूल्य‘ की चर्चा करते हुए कहा था कि ’’वास्तव में थोडे-से सिद्धान्त में जो मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं, हम उन्हीं को जीवनमूल्य कहते हैं। वास्तव में ऐसे जीवनमूल्य ही मानवीय आवश्यकताओं की तुष्टि के साथ लोकमंगल तथा आत्मोपलब्धि की सिद्धि में सहायक होते हैं। ’उन्होंने लोकमांगल्य की भावना से प्रेरित होकर सामाजिक मर्यादा का स्वरूप निश्चित किया और समन्वयवादी होते हुए भी मर्यादा विरोधी तथा लोकविद्वेषकारी असत् प्रवृत्तियों के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया। शक्ति, शील सौंदर्य के समन्वित प्रतीक राम में मर्यादा की स्थापना और उसके व्यावहारिक रूप पर दृढता से टिकने की भावना अभिव्यंजित की गई है। पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के मधुर आदर्श तथा उत्सर्ग की भावना ’रामचरितमानस‘ में सर्वत्र बिखरी पडी है। तुलसी की काव्य चेतना में जीवन मूल्यों एवं मानव मूल्यों का समन्वय है और यह मूल्य निरूपण भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों एवं नैतिकता के आदर्शों से अनुप्राणित है। कर्त्तव्य परायणता, शिष्टाचार, सदाचरण, कर्मण्यता, निष्कपटता, कृतज्ञता, सच्चाई, न्यायप्रियता, उत्सर्ग की भावना समदृष्टि, क्षमा आदि नैतिक मूल्यों का इसलिए भक्ति काव्य में अग्रस्थान प्राप्त किए हुए दिखाया गया है, ताकि समाज, राजनीति एवं लोकजीवन उन्नत बने।‘


’रामचरितमानस‘ में जीवन मूल्यों का क्षेत्र सीमित नहीं है। उनमें वैश्विक दृष्टि है। मानव मात्र के कल्याण की कामना है। जीवन मूल्य स्थान, काल के बंधनों से मुक्त स्वस्थ समाज एवं कल्याणकारी राजनीति की स्थापना में सहायक एवं मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं। ’रामचरितमानस‘ में धार्मिक-दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों का निरूपण सुंदर ढंग से हुआ है। धर्म का उद्देश्य है मनुष्य को शुभत्व एवं शिवत्व की राह दिखा कर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर कराना। इसके लिए तप और त्याग आवश्यक है। तप की महत्ता बतानेवाली अनेक उक्तियाँ ’रामचरितमानस‘ में मिलती हैं जैसे.....


तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा। (१/७३)

तप के अगम न कछु संसारा। (१/१६३)


तुलसीदास जी ने तप का महत्त्व निरूपित करने के लिए ही वाल्मीकि, अत्रि, भरद्वाज, नारद आदि को तपस्यालीन चित्रित किया है। त्याग का मूर्तिमंत उदाहरण यह है - बंधुत्रय - राम, लक्ष्मण एवं भरत। चक्रवर्ती होने वाले राम वनवासी हो जाते हैं। लक्ष्मण अपने दाम्पत्य सुख की बलि देकर भ्रातृसेवा का त्यागदीप्त जीवनमार्ग अपनाता है और भरत महल में प्राप्त राज्य में लक्ष्मी को तृणवत् मानकर भाई को ढूँढने निकल पडता है। तुलसीदास ने भरत के इस त्यागपूर्ण व्यक्तित्व को प्रशंसित करते हुए कहा है -


चलत पयादे खात फल, पिता दीन्ह तजि राजु।

जात मनावन रघुबरहि, भरत सरसि को आजु।।

(रामचरित मानस २/२२२)


सामान्य धर्म के दस अंग माने गये हैं। ’रामचरित मानस‘ में तुलसीदास जी ने धर्म के इन सभी अंगों को भली-भाँति प्रतिपादित किया है। परधन हडप लेने की वृत्ति चौर्य कार्य है। तुलसीदास जी कहते हैं -


धन पराय विष ते विष भारी

(रामचरित मानस - ७/४९/१)


संयम के लिए इन्दि्रय-निग्रह आवश्यक है। पंचेन्दि्रयों को मनमाना न करने देना ही संयम है। इसलिए संत पुरुष काम-क्रोधादि का परित्याग करते हैं -


काम-क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहिं, भजहु भजहिं जेहि संत।।

(रामचरित मानस - सुंदरकाण्ड ५/३९)


सत्य को धर्म का पर्याय मानकर तुलसीदास कहते हैं- ’धरमु न दूसर सत्य समाना।‘ इसी प्रकार परहित और अहिंसा की भावना का निरूपण करते हुए वे कहते हैं -


परहित सरिस धर्म नहीं भाई,

पर पीडा सम नहिं अधमाई।।

(रामचरित मानस - ७/४९/१)


विश्व का व्यवहार धर्मपालन पर अवलम्बित है। तुलसीदास के मतानुसार धर्म का पालन करने से ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति होती है और सुख-संतोष की अनुभूति होती है -


धरम तडाग ग्यान विज्ञाना। ये पंकज विसके विधि नाना।।

सुख संतोष विराग विवेका। विगत सोक ये कोक अनेका।।

(रामचरित मानस - ७/३२/४)

ऐसी धार्मिकता कष्टसाध्य है। जिसमें

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी, कोउ एक होइ धर्मब्रतधारी।


गोस्वामी तुलसीदास ने धर्मरथ के रूपक के माध्यम से धर्म के विभिन्न अंगों का विस्तार से प्रतिपादन किया है। (७/१०३) ’ज्ञानदीपक‘ (लंकाकांड ८०/३-६) के प्रसंग में भी उन्होंने धर्म के विविध अंगों का परिचय दिया है। जीवन मनुष्य की कडी कसौटी लेता है। रामचरितमानस में वर्णधर्म, आश्रमधर्म, पुत्रधर्म, स्त्रीधर्म, युगधर्म का भी निरूपण किया है। जैसे ः

नित जुग धर्म होहिं सब केरे, हृदय राम माया के प्रेरें।। (७/१.४/१.२)


तत्पश्चात् उन्होंने युगविशेष में मनुष्य के हृदय में कौन-सी भावनाएँ धर्म प्रेरक हो सकती हैं, इसका वर्णन किया है। ’रामचरितमानस‘ समानाचरण मूल्यों की दृष्टि से भी एक समन्वय ग्रंथ है। समाज में संत का कार्य संसारियों का मार्गदर्शन बनता है। अतः समाज को शिक्षा देने हेतु तुलसी ने सन्त के लक्षण एवं आचरणों को विस्तार से उल्लेख किया है। जैसे -


उमा संत कइ इहइ बडाई। मंद करत जो करइ भलाई।। (सु.का. ४१-६)


संतहृदय जस निर्मल बारी,

बाँधे घाट मनोहर चारी।

संत उदय संतत सुखकारी,

संत विटप सरिता गिरि धरनी,

परहित हेतु सबन्ह कै करनी।

संत हृदय नवनीत समाना,

कहा कबिन्ह करि कहइ न जाना।

निज परिताप दवइ नवनीता,

परदुख द्रवहिं संत सुपुनीता।

(रामचरित मानस - ७/१२५/७)


तुलसी का संत, शील का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है। ऐसे संतत्व के लिए संन्यास ग्रहण करना आवश्यक नहीं। तुलसीदास ने भरत, विभीषण, हनुमान आदि में इसी संतत्व के महान् गुणों का निरूपण किया है। संत समाज का उन्नायक होता है और असंत अर्थात् खल प्रगतिपथ में रोडा। असंत के अवगुणों का भी उन्होंने वर्णन किया है। रावण के बारे में तुलसीदास जी ने कहा है -


काम रूप जानहिं सब माया।


सपनेहु जिन्ह के धरम न दाया।

(रामचरितमानस १/१८१)


तुलसीदास जी गुरुशिष्य सम्बन्ध को पावनतम संबंध मानते हैं। गुरु के गरिमामय व्यक्तित्व का उन्होंने प्रभावशाली शब्दों में वर्णन किया है।

हरइ शिष्य धन सोक न हरई,

सो गुरु घोर नरक महुँ परई।

(रामचरितमानस ७/९९)


कहकर धोखेबाज गुरुओं को उन्होंने आडे हाथों लिया है। गुरु की तरह मैत्री में वफादारी का मूल्य भी सुंदर ढंग से निरूपित किया है।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी

तिन्हहिं विलोकत पातक भारी।

(रामचरित मानस ४/८)


’रामचरितमानस‘ में राजनीतिपरक मूल्यों का भी तुलसीदास जी ने विशद् निरूपण किया है। ’रामचरितमानस‘ में तुलसी ने तत्कालीन मुगलप्रशासन तंत्र का चित्रण कलियुग के वर्णन के रूप में उत्तरकांड में किया है। उन्होंने नृपतंत्र के रूप में दशरथ के शासनतंत्र की मर्यादाएँ बताई हैं तो दूसरी ओर जनक जैसे दार्शनिक तथा त्यागी सम्राट के राज्य संचालन को भी वर्णित किया है। किन्तु तुलसीदास को राम के शासनतंत्र के समर्थक और रावण के शासनतंत्र के विरोधी हैं। तुलसी ने राजा को प्रजा का प्रतिनिधि माना है। राजा की सर्वोपरि सत्ता को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने उसकी निरंकुशता को सह्य नहीं माना है। उन्होंने उसी शासक को सच्चा शासक माना है जो पद को प्रजा की सेवा का निमित्त मानता है। जनता की अपेक्षाओं के परिपुष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि - ’जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।‘ राजा को तुलसी ने सूरज से उपमित किया है -


बरषत, हरषत लोग सब, करषत लखै न कोई।

तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होई।।


’राजा‘ को मुख समान होकर सब विधि प्रजा का पोषण करना चाहिए - इस बात पर जोर देते हुए कहा है कि -


मुखिया मुख सा चाहिए, खान पान को एक

पालहिं-पोषहिं सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।


तुलसीदास ने इसके लिए ’राम-राज्य‘ अथवा कल्याण-राज्य का आदर्श प्रस्तुत किया है। यह कल्याणकारी राज्य धर्म का राज्य होता है, न्याय का राज्य होता है, कर्त्तव्य-पालन का राज्य होता है। वह सत्ता का नहीं, सेवा का राज्य होता है। इस कल्याणकारी राज्य की झोली में है - क्षमा, समानता, सत्य, त्याग, बैर का अभाव, बलिदान एवं प्रजा का सर्वांगीण उत्कर्ष। इस कल्याणकारी राज्य की कल्पना की परिधि में व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य और विश्व का कल्याण समाविष्ट है। इसके केन्द्र में है धर्म जिसे हम वर्तमान के संदर्भ में ’कर्त्तव्य पालन‘ के स्वरूप में भी ले सकते हैं। जहाँ धर्म होगा, वहाँ सत्य होगा, शिवत्व होगा, सौंदर्य होगा, सुख होगा, शान्ति होगी, कल्याण होगा।

तुलसीदास ने देखा कि अपने युग में जनता पारस्परिक कलह, ईर्ष्या, द्वेष और अधर्म में फँसी हुई है। पति-पत्नी, भाई-भाई, राजा-प्रजा, परिवार-कुटुम्ब में छोटी-मोटी बातों पर कलह-विवाद ओर संघर्ष हो रहे हैं।

जहाँ समाज मानस-रोगों से विमुक्त होकर विमलता, शुभ्रता, नीति और धर्म का चरण करे, उसी का नाम कल्याणकारी राज्य। यह कल्याणकारी राज्य अशत्रुत्व और समता का राज्य है। इसके अभाव में राज्य कल्याण - राज्य न रहकर अनेक दूषणों से दूषित हो जाता है, जिसकी झाँकी तुलसी ने हमें ’कलि-काल‘ वर्णन में कराई है।

’रामचरित-मानस‘ उन आदर्शों की उर्वर भूमि है, जिसको अपनाने से किसी युग की प्रजा अपने कल्याण की साधना कर सकती है। वैसे तो रामराज्य का वर्णन रामचरितमानसेतर अन्य ग्रंथों में भी मिलता है ः जैसे भागवत, महापुराण, पद्मपुराण इत्यादि में। किन्तु ’रामचरितमानस‘ के ’उत्तर-कांड‘ में तुलसी ने राम-राज्य अथवा कल्याण-राज्य की परिकल्पना की है - पारस्परिक स्नेह, स्वधर्म पालन, धर्माचरण और आत्मिक उत्कर्ष का संदेश, प्रजा एवं प्रजेश की आत्मीयता और आदरभाव, प्रीति एवं नीतिपूर्ण दाम्पत्य जीवन, उदारता एवं परोपकार, प्रजा-कल्याण एवं सुराज्य का संतोषप्रद वातावरण- ये हैं उस धर्मयुक्त कल्याणमय राज्य की विशेषताएँ। रामराज्य के इस चित्रण के साथ तुलसी के आदर्श अथवा कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना सन्निहित है।

रामराज्य का विस्तृत वर्णन हमें ’रामचरितमानस‘ के ’उत्तरकांड‘ में मिलता है। तुलसीदास कहते हैं -


रामराज्य बैठे त्रैलोका, हरषित भये गए सब सोका।

बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई।।

बरनाश्रम निज-निज धरम, निरत बेद पथ लोग।

चलहिं सदा पावहिं सुखहि, नहि भय सोक न रोग।।

दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज नहीं काहुहिं व्यापा।

सब नर करहि परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति-नीति।

चारिऊ चरन धर्म जग माही। पूरि रहा सपनेहुँ दुःख नाही।।‘


अर्थात् रघुनाथ जी को जिस समय राज्य-तिलक दिया, उस समय त्रिलोक आनंदित हुए और सारे शोक मिट गये। कोई किसी से बैर नहीं रखता और राम के प्रभाव से सब की कुटिलता जाती रही। चारों वर्ण, चारों आश्रम - सब अपने वैदिक धर्म के अनुसार चलते हैं। सुख प्राप्त करते हैं, किसी को भय, शोक और रोग नहीं हैं दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त होकर सब लोग परस्पर स्नेह करने लगे और अपने कुल धर्मानुसार जीवन जीने लगे।

आगे की पंक्तियों में तुलसी ने गाया है कि तप, ज्ञान, यज्ञ, दान इन चारों चरण से धर्म जगत् में परिपूर्ण हो गया था कहीं पाप का नाम नहीं। नर-नारी राम के भक्त हो गये थे। राम-राज्य में अल्पमृत्यु अथवा किसी तरह की शारीरिक पीडा किसी को न थी। कोई दुःखी न था, दरिद्र न था, दीन न था, मूर्ख न था। सब लोग धर्म निरत, दयालु और गुणवान थे। रघुनाथ जी के राज्य की सुख-संपत्ति का वर्णन खुद शारदा भी नहीं कर सकती। मनुष्य का एक-नारी व्रत था। दंड के बजाय प्रेम से सबको जीत लिया गया था।

मनुष्यों के नीति - पूर्ण जीवन से प्रसन्न प्रकृति ने भी पूर्ण उदारता से फल, फूल इत्यादि देने में कोई कसर नहीं रखी थी। तुलसी कहते हैं -


फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन।

खग-मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढाई।

कूजहिं खग-मृग नाना वृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनन्दा।

सीतल सुरभ पवन वह मन्दा। गुंजत अलि लै चलि मकरन्दा।

ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेता भइ कृतजुग कै करनी।।


पर्वतों में से अनेक तरह की मणियों की खानें जगत्-प्राण राम को देखकर प्रकट हो गईं। सब नदियों में सुन्दर जल प्रवाहित होने लगा, जो शीतल, निर्मल और मजेदार था। सागर अपनी सीमा का अनुल्लंघन करते हुए किनारों पर रत्न फेंकते थे। सरोवरों में पंकज खिले थे। पूरा वायुमंडल मनोहर था।

इस प्रकार राम के राज्य में शशि की अमृतमयी किरणों से अवनि परिपूर्ण थी और बादल माँगने पर जलधारा बरसाते थे। धर्मयुक्त कल्याणकारी राज्य का मूल है ः प्रजा-कल्याण एवं शासकों की नीतिमता। राम के राजतंत्र में हमें प्रजा-सत्ता के कल्याणमय स्वरूप का दर्शन होता है। राम हमारे सामने कल्याणकारी शासक का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। आदर्श शासक अथवा सरकार वही है, जो प्रजा को सुख प्रदान करे। इसलिए तुलसीदासजी इस बात पर जोर देते हैं कि .....


जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।

सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।


जिसमें प्रजा सुखी है, वही कल्याणकारी राज्य है, वही सुराज्य है - ’’सुखी प्रजा जनु पाई सुराजु‘‘ - पंक्ति में वही भाव ध्वनित है - कल्याणकारी राज्य के राजा का प्रधान धर्म है ः वचन-पालन, सत्यनिष्ठा एवं स्वावलंबन। राम का राजा के रूप में वर्णन करते हुए तुलसीदास ने कहा है ः


साधु, सुजान, सुशील, नृपाला ईश अंश भव राम कृपाला।

रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्रान जाहि पर वचन न जाई।।


कल्याणकारी राज्य में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का बहुत बडा महत्त्व है। राम-राज्य एक तरह से प्रजा-तंत्रात्मक राज्य था। उसकी प्रजा को संपूर्ण स्वातंत्र्य था। अतः लोग निर्भीक होकर रानी कैकेयी के कलुषित कार्यों की आलोचना कर सकते थे। यहाँ तक कि राम के व्यक्तिगत जीवन की भी। प्रजा की भावना का आदर करते हुए राम ने सीता का परित्याग किया, इससे बढकर शायद ही कोई सबूत किसी राजा की प्रजा-प्रियता एवं महानता का मिल सके। कल्याणकारी राज्य में सत्ता प्रजा की धरोहर मानी जाती है। राम के राज्य में प्रजा अथवा पंचों के परामर्श को महत्त्व मिलता था। राम-राज्य सत्य, दया, नीति और धर्म का राज्य था। किसी भी राज्य के उत्कर्ष के लिए ये चार वस्तुएँ आधार-शिलाएँ हैं। जहाँ मानव मात्र को समान समझा जाय, वही कल्याकारी राज्य। ’रामचरितमानस‘ में इसका भी चित्र मिलता है। वनगमन के सिलसिले में राम चित्रकूट में डेरा लगाते हैं। उनके आगमन की खबर सुनकर गुह-किरात-शबर इत्यादि वनवासी लोग उनके दर्शनार्थ दौड आते हैं। उस समय राम का स्नेहासिक्त व्यवहार दर्शनीय है -


’राम स्नेह मगन सब जाने। कवि प्रिय वचन सकल सनमाने।

वचन किरातन के सुनत, जिमि पितु बालक बैन।।

राम सकल बनचर परितोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।


राज्य बनता है - व्यक्तियों से, परिवारों से और समाजों से। रामराज्य अथवा कल्याणकारी राज्य तभी संभव होता है, जब पारिवारिक जीवन शुद्ध और मर्यादायुक्त हो। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सास-बहू इत्यादि का पारस्परिक संबंध एवं व्यवहार यदि मर्यादापूर्ण एवं विवेकयुक्त होगा तो सामाजिक जीवन स्वस्थ रहेगा। भाई-भाई के बीच स्नेह, विश्वास और प्रेम होना चाहिए। राम भरत से कहते हैं -


गुरु, पितु-मातु स्वामि सिख पालें,

चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें

अस विचारि सब सोच बिहाई,

पालहु अवध अवधि भरि जाई।।


तुलसी ने स्वराज्य का स्वरूप, सुराज्य का आदर्श, राजा का आचरण, प्रजा का व्यवहार, मंत्री का कर्त्तव्य एवं दूत का धर्म कैसा होना चाहिए आदि के बारे में अपने विचार अनेक स्थलों पर प्रकट किये हैं, जो प्रजा- कल्याण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। राजा-राजा के बीच, सेवक - स्वामी के बीच कैसा व्यवहार अपेक्षित है, उसकी चर्चा तुलसी ने ’रामचरित मानस‘ में स्पष्टतः की है। इस तरह हम देखते हैं कि तुलसीकृत राम-राज्य के वर्णन में हमें धर्मयुक्त कल्याणलक्षी आदर्श राज्य का दर्शन होता है। राम का राज्य एक तंत्रात्मक था, किन्तु वही सही अर्थ में लोक-तंत्रात्मक था। क्योंकि सत्ता नहीं सेवा, सेवा नहीं जनकल्याण ही राम का आदर्श था। अतः धर्म अथवा कर्त्तव्यपरायणता ही उनका जीवन-मंत्र था।

अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि ’रामायण‘ या ’रामचरितमानस‘ को हम केवल धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथों के रूप में मूल्यांकित करें या कि यह वर्तमान युग में प्रासंगिक है। इन ग्रंथों की आज प्रासंगिकता क्या है? ष्त्मसंअंदबमष् अथवा ’प्रासंगिकता‘ आखिर है क्या? श्री अमृत मोदी के शब्दों में ष्त्मसंअंदबम तममितमे जव पजे इमपदह चतंबजपबंसण् । जीपदह पे तमहंतकमक ंे तमसमअमदजए प पज पे कममउमक ंे मिंेपइसमण् थ्मेंपइपसपजल पउचसपमे सवहपबंस चवपइपसपजल ंदक तिममकवउ तिवउ बवदजतंकपबजपवदष् अमुक सिद्धान्त आज के संदर्भ में व्यावहारिक हैं? इन्हें प्रयोग में लाना संभव है।


’तुलसीदासः आज के संदर्भ में‘ - पुस्तक में युगेश्वर जी ने उचित ही कहा है कि राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए जिस उदात्त चरित्र की आवश्यकता है, वह रामकथा में है। मानस एक ऐसा वाग्द्वार है जहाँ समस्त भारतीय साधना और ज्ञान परम्परा प्रत्यक्ष दीख पडती है। दूसरी ओर देशकाल से परेशान, दुःखी और टूटे मनों का सहारा तथा संदेश देने की अद्भुत क्षमता है। आज भी करोडों मनों का यह सहारा है। ’रामचरितमानस‘ के संदेश को केवल भारत तक सीमित स्वीकृत करना इस महान् ग्रंथ के साथ अन्याय होगा। ’रामचरितमानस‘ युगवाणी है। विश्व का एक ऐसा विशिष्ट महाकाव्य जो आधुनिक काल में भी ऊर्ध्वगामी जीवनदृष्टि एवं व्यवहारधर्म तथा विश्वधर्म का पैगाम देता है। ’रामचरितमानस‘ अनुभवजन्य ज्ञान का ’अमरकोश‘ है।


आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ’क्या है‘ यह तो बता सकता है, यह किन्तु ’क्या होना चाहिए‘ और क्यों होना चाहिए‘ इस प्रकार के प्रश्नों को नहीं छूता। मानवजीवन के मूल्यों का विचार न कभी विज्ञान ने किया है न करेगा। विज्ञान केवल ज्ञेय वस्तु तक ही सीमित है। ७ वैज्ञानिक प्रगति ने आज के मानव जीवन को ’सुखी‘ बनाया है, किन्तु ’प्रसन्न‘ बनाया है ? खाने-पीने, रहने-सोने, उठने-बैठने जैसी साधारण-सी बातों को लेकर समस्याएँ पैदा हो रही हैं। भौतिकवाद ने मनुष्य को आत्मकेन्द्री बनाया है। त्याग के स्थान पर ’परिग्रह‘ का महत्त्व अत्र-तत्र-सर्वत्र दृष्टिगत होता है। इसका मूल कारण है अध्यात्म की विस्मृति अर्थात् मानवजीवन के शाश्वत मूल्यों की उपेक्षा। कवि भर्तृहरि के शब्दों में कहें तो मनुष्य भोगों को नहीं भोग रहा, भोग मनुष्यों का उपभोग कर रहे हैं। इस विकट परिस्थितियों का उपाय है निर्मल, तपोद्दीप्त एवं त्यागपूर्ण जीवनदृष्टि। आज ’कामराज्य‘, ’दामराज्य‘ और ’जामराज्य‘ (मद्यपान) ने मनुष्य जीवन को बुरी तरह घेर लिया है। विश्वबंधुत्व की भावना की विस्मृति विश्व को भयग्रस्त बना रही है। ८


’तुलसी के हिय हेरि‘ में तुलसी-साहित्य के मर्मज्ञ स्व. विष्णुकान्त शास्त्री जी ने ’आधुनिकता की चुनौती और तुलसीदास‘ शीर्षक अध्याय में कहा है कि तुलसीदास की विचारधारा का विपुलांश आज भी वरणीय है। श्रीराम सगुण या निर्गुण ब्रह्म, अवतार, विश्वरूप, चराचर व्यक्त जगत् या चाम मूल्यों की समष्टि और स्रोत-उन का जो भी रूप आप को ग्राह्य हो) के प्रति समर्पित, सेवाप्रधान, परहित निरत, आधि-व्याधि-उपाधि रहित जीवन, मन, वाणी और कर्म की एकता, उदार, परमत सहिष्णु, सत्यनिष्ठ, समन्वयी दृष्टि, अन्याय के प्रतिरोध के लिए वज्र - कठोर, प्रेम-करुणा के लिए कुसुम कोमल चित्त, गिरे हुए को उठाने और आगे बढने की प्रेरणा और आश्वासन, भोग की तुलना में तप को प्रधानता देने वाला विवेकपूर्ण संयत आचरण, दारिद्रय मुक्त, सुखी, सुशिक्षित, समृद्ध समतायुक्त समाज, साधुमत और लोकमत का समादर करनेवाला प्रजाहितैषी शासन-संक्षेप में यही आदर्श प्रस्तुत किया है, तुलसी की ’मंगल करनि, कलिमल हरनि‘-वाणी ने। क्या आधुनिकता इस को खारिज कर सकती है ? विष्णुकान्त शास्त्री जी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखते हुए पूछते है ः ’’और फिर आधुनिकता को यह आदर्श चुनौती नहीं दे सकता ? क्या यह उस से नहीं पूछ सकता कि आधुनिक प्राचुर्ययुक्त समाज बाहर से जितना भरा-भरा लगता है, भीतर से उतना ही खोखला नहीं है ? भौतिक समृद्धि के साथ-ही-साथ मनुष्य की बेचैनी, छटपटाहट, हताशा, क्यों बढती जा रही है ? आज की उद्धत बौद्धिकता परंपरागत मूल्यों के खंडन में सफल होने का दावा करती है, वैसा दावा हृदय को अवलम्ब दे पाने वाले किसी विश्वास के निर्माण के लिए क्यों नहीं कर पाती ? लोकतंत्र का मुखौटा लगाये पूँजीवादी व्यवस्था हो या समाजवादी रामनामी ओढे वर्गवादी, दलीय तानाशाही - क्यों ऐसा है कि दोनों खेमों में झूठ, फरेब, दमन, प्रलोभन पर आधारित हृदयहीन शासनतंत्र पनप रहा ह और विचार की वाणी का दम घोंटा जा रहा है ? विज्ञान की सहायता से इंदि्रयों को सुख देने वाले एवं अहं को तृप्त करने वाले पदार्थों द्वारा अपने को संतुष्ट आन की स्नायविक तनावग्रस्त मानव दूसरों से क्यों करता और अकेला पडता चला जा रहा है ? आज विश्व असलामती, संत्रास, हिंसा एवं आततायी आक्रमणों के दौर से गुजर रहा है, तब रामायण और रामकथा की प्रेरणा इस युग के लिए प्रासंगिक है। तुलसीदास आज भी हम लोगों के लिए अपरिहार्य हैं। आज भी उनके आदर्श एक बडी सीमा तक हमारा पथ प्रदर्शन कर सकते हैं। क्योंकि तुलसी विश्वकवि से किसी भी तरह कम नहीं। आज भी तुलसी प्रासंगिक हैं। पारुकान्त देसाई की तुलसी विषयक कविता की निम्न पंक्तियाँ मर्मस्पर्शी हैं -

जीवन के प्रत्येक अंग में

घुल गया है जहर

तन में, मन में, व्रण में, प्रण में

कथन में, कवन में !

इस जहर का आकंठ पान करना होगा तुम्हें

साहित्यिक नीलकंठ !

जानता हूँ तुम मर्यादावादी थे

इस के बावजूद

बेलगाम, बेनकाब

होकर लिखना पड रहा है,

क्योंकि -

तेरे द्वारा खींची गयी आदर्शों की

सारी तसवीरें

आज बदसूरत हैं,

इसीलिए, इसीलिए कहता हूँ कि

तुलसी !

तेरी आज भी जरूरत है।



मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक।
पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।

समरथ को नहिं दोश गोसांई

शठ सुधरहि सतसंगति पाई,पारस परसि कुधातु सुहाई।

परहित सरसि धरम नहि भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।

का बर्षा जब कृषी सुखानी

सिया राम मै सब जग जानी,
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।

धीरज धरम मित्र अरु नारी,
आपद काल परखिये चारी।

जाके प्रिय न राम वैदेही,
तजिये ताम कोटि बैरी सम जदपि परम सनेही ।

शूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
विद्यमान रन पाई रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे अचरहिं ते नर न घनेरे।

भय बिनु होहिं न प्रीति ।

कादर मन कहुँ एक अधारा ।
दैव-दैव आलसी पुकारा ।।

सकल पदारथ एहि जग मांही, कर्महीन नर पावत नाही।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा।

जथा उलूकंहि तम पर नेहा।

कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सबकंह हित होई ।


तुलसी का धर्म-रथ

सुनहु सखा, कह कृपानिधाना, जेहिं जय होई, सो स्यन्दन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।
बल बिबेक दम पर-हित घोर, छमा कृपा समता रजु जोरे।
ईस भजनु सारथी सुजाना, बिरति चर्म संतोष कृपाना।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा, बर बिग्यान कठिन कोदंडा।
अमल अचल मन त्रोन सामना, सम जम नियम सिलीमुख नाना।
कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा, एहि सम बिजय उपाय न दूजा।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें, जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें।

महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर ।
जाकें अस रथ होई दृढ़, सुनहु सखा मति-धीर ।।
(लंकाकांड)

अति संघरषन जौं कर कोई ।
अनल प्रगट चन्दन तें होई ।।

परद्रोही कि होंहि निशंका ।
कामी पुनि कि रहैं अकलंका ।।

कहत कठिन, समुझत कठिन, साधत कठिन बिबेक ।
होइ घुनाक्षर न्याय जौं, पुनि प्रत्यूह अनेक ।।

मोह सकल ब्याधिन को मूला ।
तिन तें पुनि उपजें बहु सूला ।।

बिनु संतोस न काम नसाहीं।
काम अक्षत सुख सपनेहुं नाहीं।।

रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्राण जाइ पर बचन न जाई।।

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।

पण्डित सोई जो गाल बजावा।

मति अति नीच, ऊँचि रुचि आछी ।
चहिअ अमिय जग, जुरइ न छाछी । ।


[संपादन] सन्दर्भ

रामचरितमानस में शाश्वत जीवनमूल्य एवं रामायण की प्रासंगिकता - डॉ. चन्द्रकान्त मेहता

वैयक्तिक औज़ार